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25 जून 2018

न धर्म बचा है न इंसानियत, अब तो केवल ढोंग बचा है

मेरे एक पोस्ट पर दो महत्वपूर्ण कमेंट्स आये थे जिनका उत्तर मैं विस्तार से देना चाहता था...पहले पोस्ट पढ़ लीजिये, फिर वे दो महत्वूर्ण कमेंट्स और फिर मेरा उत्तर....

कोई मुस्लिम मारा जाए भीड़ द्वारा तो मुस्लिम समाज चिंतित हो जाएगा लेकिन कोई मुस्लिम भूख से मर रहा हो, उसके खेत की फसल नष्ट...
विशुद्ध चैतन्य द्वारा इस दिन पोस्ट की गई शनिवार, 23 जून 2018

"अप्राकृतिक मौत तो अत्यंत दुखद है। किन्तु गुरूजी मोब लिंचिंग व जैसा आपने इंगित किया, अन्य मौत में कुछ फर्क तो है ही। पहली समाज की क्रूरता प्रदर्शित करती है, जो कानूनन अपराध है जबकि दूसरी समाज की उदासीनता जिसे मोरल अपराध तो कहा जा सकता है किन्तु कानूनन अपराध नहीं है।" -Abdul Basit

"Sir with all due respect...
Mje aap ye bta do....
How a person dying from hunger and A person who is healthy, going to live a life,earnig well ..is killed by a anarchist mob is same...How?????
You are violently taking his life...he was capable of all thing...
Yahi to galat hai sir ji....
Aap jaise log iss inhuman crime ko justify karne ke lie aa jate hai......what to say i mean u all had justified kathua rape case..what else can be expected...

If cow are pious ...ask ur gov . To make a law prohibiting cow slaughter
Next time give BJP vote only when they will do that
Otherwise there will be anarchy if this kind of situation will go on
Ask BJP to make law
Stop killing people in name of religion
This is inhuman and cruel thing a man can do...And stop justifying it..plz"
-Arif Khan





उपरोक्त दोनों ही यह कहना चाहते हैं कि भीड़ द्वारा की गयी हत्या और समाज द्वारा किसी को मरता हुआ छोड़ देना, दोनों में भिन्नता है | एक जघन्य अपराध है और दूसरा अपराध की श्रेणी तो आता है लेकिन वह नैतिक अपराध है यानि वह अपराध जघन्य अपराध नहीं है | मुझपर यह भी आरोप लगाया गया कि मैं भीड़ द्वारा की गयी हत्या को जस्टीफाई कर रहा हूँ |

How a person dying from hunger and A person who is healthy, going to live a life,earnig well ..is killed by a anarchist mob is same...How?????


सबसे पहले तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं किताबी धार्मिक नहीं हूँ और न ही धार्मिकता या नैतिकता का ढोंग करना पसंद करता हूँ | मेरे लिए किसी भी भीड़ द्वारा की गयी किसी भी निर्दोष या दोषी की हत्या, बलात्कार....आदि सब अपराध ही है | मैं किसी एक अपराध को धार्मिकता के चश्में से और दूसरे अपराध को राष्ट्रीय कानून या संविधान की नजर से नहीं देखता | मेरे लिए धर्म, जाति या ईशनिंदा के नाम पर हत्या, बलात्कार, सार्वजनिक सम्पत्ति की क्षति, दंगा-फ़साद, लूट-पाट आदि सभी संवैधानिक, नैतिक व धार्मिक अपराध हैं | आप नैतिक अपराध और राष्ट्रीय संविधान की दृष्टि में किये गये अपराधों को अलग अलग रख सकते हैं, किसी को कम या या किसी को अधिक महत्व दे सकते हैं, लेकिन मैं नहीं |

किसी भी निर्दोष का मारा जाना मानवता पर कलंक है | हिंसक पशु भी किसी राह चलते निर्दोष को जान से नहीं मार देते यदि वे पागल या भूखे न हों | लेकिन मानव यदि नर-भक्षी हो जाए, नैतिकता या धार्मिकता के नाम पर तो शर्मनाक है | वह अपनी हवस, अपनी भूख मिटाने के लिए इंसानों का ही शिकार करने लग जाए तो यह शर्मनाक है |

कानून या संविधान


कानून या संविधान वह नियम हैं जो समाज को यह बताता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए | ये नियम तय करते हैं कि क्या पाप है क्या पुण्य, क्या नैतिक हैं और क्या अनैतिक, क्या अपराध है और क्या नहीं, क्या धर्म है और क्या अधर्म |  संविधान चाहे पारिवारिक हो, सामजिक हो, किसी संस्था का हो या किसी राज्य या देश का, सभी में यह सुनिश्चित किया जाता है कि अपराधियों सजा देने का अधिकार भीड़ को नहीं है | सजा केवल अधिकृत विशेषज्ञ ही दे सकते हैं और वह भी पूरी जांच परख करने के बाद |

आप पाप-पुण्य कहें या नैतिक-अनैतिक कहें या अपराध-निरपराध कहें या धर्म-अधर्म | केवल शब्दों का अंतर है, अर्थ एक ही है | धर्म वह जो समाज के लिए हितकर हो, सुखकर हो, सहयोगी हो और अधर्म है विपरीत | जब कोई समाज या भीड़ हिंसक हो जाए और वह किसी निर्दोष की हत्या पर उतारू हो जाए, तो निश्चित मानिए कि वे अपराधी हैं, अधर्मी हैं, अनैतिक हैं | फिर यह हत्या भीड़ की अनदेखी की वजह से हुई हो या जानबूझकर की गयी हो | फिर कोई भूख से मर गया हो, या कर्जों के बोझ से दबकर मर गया हो या दौड़ा दौड़ाकर, पीट पीट कर मार दिया गया हो, एक ही बात है | क्योंकि ये अधर्म है, अनैतिक है, पाप है, अपराध है |

धार्मिकों का दोगला समाज


समाज दोगला होता है विशेषकर धार्मिकों का समाज | वह अपने पाप की सजा के लिए कयामत के दिन की प्रतीक्षा करता है लेकिन दूसरों के पापों की सजा तुरंत देना चाहता है | उदाहरण के लिए ईशनिंदा के नाम पर हत्या या सजा | ईश्वर की निंदा की किसी ने, उसके लिखे किताब को क्षत्ति पहुँचाई तो सारा समाज दौड़ पड़ेगा उसे सजा देने के लिए | तब कयामत की प्रतीक्षा नहीं करेगा | तब नहीं कहेगा कि ईश्वर की निंदा की है, ईश्वर की किताब को क्षति पहुँचाई है, ईश्वर खुद उसे सजा देगा | यानि ईश्वर से ऊपर हो गया समाज जो ईश्वर का अनादर करने वाले को सजा देने निकल पड़ता है ??

दूसरा दोगलापन देखिये समाज का कि यदि अपराधी गरीब है, असहाय है, किसी राजनेता से संरक्षण प्राप्त नहीं है, तो उसे दौड़ा-दौड़ा कर पीट पीट कर मार देंगे | लेकिन यदि अपराधी आर्थिक रूप से समृद्ध है, ऊँचे पदों पर आसीन है, अच्छे रुतबे वाला है, तो वह देश भी बेचकर खा जाये तो यही न्यायप्रिय समाज उसके पीछे दुम हिलाता घूमेगा | यदि अपराधी ने सार्वजनिक रूप से घोषणा भी कर दी अपने अपराधों की, अपने ऊपर चल रहे केसों की, तब भी समाज उसकी जय जयजयकार करते हुए घूमेगा | और ऐसे लोगों में वे भी लोग होंगे, जो खुद को धर्म व नैतिकता का ठेकेदार समझते हैं, जो खुद को धर्मशास्त्रों, कानून व नैतिकता का जानकार समझते हैं |

कोई गरीब चोरी करता पकड़ा जाए तो भीड़ उसे मौत दे देगी, लेकिन यदि कोई नेता चोरी करता पकड़ा जाए तो कानून उसे सजा देगा | देगा भी या नहीं देगा उससे भी समाज को कोई सरोकार नहीं होता, वह जेल में बैठा बैठा ही चुनाव लडेगा और जीत जाएगा | और आप मुझ पर दोष लगा रहे हैं कि मैं अपराध को जस्टिफाई कर रहा हूँ ???

भीड़ द्वारा की गयी हत्या और भूख, बेरोजगारी व कर्ज से हुई आत्महत्या दोनों के लिए भीड़ ही जिम्मेदार है | भीड़ धार्मिकों की, भीड़ नैतिकता के ठेकेदारों की, भीड़ खुद को सभ्य वह शिक्षित मानने वालों की, भीड़ आर्थिक रूप से संपन्न लोगों की और भीड़ धर्म व जाति के नाम पर हत्या करने वालों की....भीड़ ही होती है | भीड़ के पास विवेक नहीं होता, भीड़ के पास अक्ल नहीं होती, वह तो केवल भीड़ है अपनी बुद्धि, सोचने समझने की शक्ति खो चुकी, मानसिक् रूप से विक्षिप्त हो चुकी भीड़ है वह बस और कुछ नहीं | फिर वह खुद को कितना ही धार्मिक दिखाने की कोशिश करे, कितना ही नैतिक दिखाने की कोशिश करे, सब व्यर्थ | क्योंकि कोई निर्दोष मारा गया भीड़ की लापरवाही या उन्माद में वह पाप ही होगा, वह अधर्म होगा |

कठुआ रेप केस धार्मिकता के आढ़ में किया गया था | वह धार्मिक ही नहीं, मानवीय रूप से भी अपराध ही था | किसी को ईशनिंदा के नाम पर मार दिया गया, किसी को कार्टून बनाने पर मार दिया, किसी को फिल्म बनाने पर मार दिया, किसी को आलोचनात्मक लेख लिखने पर मार दिया....ये सब अपराध ही हैं, अधर्म ही हैं | मैं इनमें से किसी भी हत्या को धर्मसंगत नहीं समझता और न ही धार्मिक पुस्तकों या मान्यताओं के आधार पर जस्टिफाई करूँगा |

पहले धर्म को समझ लें, पहले नैतिकता को समझ लें, पहले संविधान को समझ लें...फिर मुझपर कोई आरोप लगायें | कोई लड़की या लड़का आपस में प्रेम करें, वे अकेले में मिलें तो आपका धर्म, नैतिकता खतरे में पड़ जाते है | लेकिन कोई बैंक ही लूटकर फरार हो जाये, कोई दुनिया भर के टैक्स लगाकर आपको लुटे और उसका साथ देते समय आपका धर्म और नैतिकता खतरे में नहीं पड़ता | कोई भीड़ किसी को पीट पीट कर मार दे और मारने वाला और मरने वाला अलग अगल मजहब के हुए तो आपका धर्म और नैतिकता जाग जाता है | लेकिन आपके ही लापरवाही के कारण कोई भूख से तड़प तड़प कर मर जाता है, कोई किसान आत्महत्या कर लेता है, कोई निर्दोष बेघर हो जाता है...तब न तो आपकी नैतिकता जागती है और नहीं धर्म | न तब आपका खुदा नाराज होता है और न ही आपके समाज की नजर में कोई अपराध होता है |

मैं दोगला नहीं हूँ, मैं किसी भी कमजोर, निर्दोष, निहत्थे पर हुए अपराधों को अलग अलग नजरों से नहीं देखता | फिर अपराध असभ्यों की भीड़ करे या सभ्य धार्मिकों की भीड़....मेरे लिए दोनों ही भीड़ हैं और दोनों ही अपराधी हैं |

हाँ मैं परिस्थिति जन्य अपराधों के लिए भी समाज, धर्म व नैतिकता के ठेकेदार व सरकारों को ही दोषी मानता हूँ | किसी को अपने बच्चे या परिवार की जान बचाने के लिए चोरी करनी पड़ी या हथियार उठाने पड़े या हत्या करनी पड़ी तो मैं उसे अपराधी नहीं मानूंगा, बल्कि उस समाज को अपराधी मानूँगा जिसका वह सदस्य है | वह इस अवस्था में पहुँचा क्योंकि समाज ने उसकी सहायता नहीं की | क्योंकि सरकार ने उसकी सहायता नहीं की, उसे न्याय नहीं मिला, इसीलिए ही उसे अपराध करना पड़ा, इसीलिए वह व्यक्ति दोषी नहीं, बल्कि समाज व सरकार ही दोषी माने जायेंगे | मैं ऐसे व्यक्ति को कभी भी सजा देना पसंद नहीं करूँगा |

~विशुद्ध चैतन्य

आनंद और उत्सव है धर्म, घृणा और द्वेष नहीं



बचपन में फ़कीर या संन्यासी की रूपरेखा जो मेरे मन बस गयी थी, वह कुछ वैसा था जो सदैव प्रसन्नचित रहता है, हँसता, गाता, नाचता अपनी धुन में मगन रहता है | जब भी उनकी कोई तस्वीरें देखता तो ऐसा लगता था कि उनके जीवन में सुख ही सुख है और दुःख का उन्हें कोई अनुभव ही नहीं |

तब नहीं जानता था कि संन्यास क्या होता है और उनका जीवन कैसा होता है | माँ या पिताजी से बस यही पता चला कि संन्यासी वह होता है जो सामाजिक बंधनों से मुक्त होता है और केवल ईश्वर की आराधना व चिन्तन में लिप्त रहता है | चूँकि उन्हें समाज के सुख दुःख से कोई लेना देना नही होता, किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती, किसी से कोई अपेक्षा नहीं रहती, इसीलिए वे लोग हमेशा खुश रहते हैं | जबकि हम जैसे सामाजिक दायित्वों से बंधे लोगों के लिए सुख के भी पल होते हैं और दुःख के भी |

मुझे अपने जीवन में निश्चिंतता और सुख का अनुभव अपनी माँ के देहांत के बाद शायद कभी नहीं हुआ | अब हँसता भी हूँ तो लगता है दिखावा कर रहा हूँ, अब खुश भी होता हूँ, तो मन में कोई हलचल नहीं होती | बस बाहरी ओढ़ी हुई सी ख़ुशी होती है | कभी समझ नहीं पाया कि माँ के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ कि मैं फिर दोबारा वह सुख व ख़ुशी नहीं प्राप्त कर पाया | मुझे याद है वह अंतिम ख़ुशी जो मैंने नौ वर्ष की आयु में पायी थी वह है दिवाली मनाना | उस दिवाली के बाद फिर कभी कोई दिवाली नहीं आयी जो मुझे ख़ुशी दे पायी | क्योंकि दिवाली के बाद आयी जनवरी ने माँ को हमेशा के लिए मुझसे दूर कर दिया था | माँ के बाद कोई मेरा अपना नहीं बन पाया, माँ के बाद कोई इतना विश्वसनीय नहीं बन पाया जिससे में खुलकर मिल सकूं |

कई नौकरियाँ बदली, कई तरह के काम किये, कई मित्र बनाए...समय के साथ सब छूटते चले गये | मतलब की नौकरी, मतलब के मित्र, मतलब के सम्बन्ध स्थाई नहीं होते यह बहुत देर से समझ में आया | माँ से बेहतर अपना और कोई नहीं यह भी समझ में आया |

बचपन में सोचा करता था कि जब मैं विवाह योग्य हो जाऊँगा तो शायद दुबारा कोई मुझे अपना मिल जायेगा...लेकिन नहीं मिला | समझ में आया विवाह प्रेम पर नहीं, दौलत और शोहरत पर आधारित होता या फिर स्वार्थ पर | स्वार्थी तो मैं भी हूँ लेकिन इतना स्वार्थी नहीं बन पाया कि विवाह योग्य कोई साथी खोज पाऊँ | या फिर शायद इतनी दौलत नहीं इकट्ठी कर पाया कि विवाहित हो पाऊँ | फिर बरसों बाद समझ में आया कि विवाह शुद्ध व्यापार है | प्रेम खरीदने की योग्यता होनी चाहिए प्रेमिका मिल जायेगी | पत्नी खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पत्नी मिल जायेगी, पति खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पति मिल जाएगा.....यानी हर चीज बिकाऊ है और हर चीज खरीदी और बेचीं जा सकती हैं, व्यक्तिगत सम्बन्धी तक | और जो मेरे साथी विवाहित हुए, उनके मुरझाये चेहरे देखकर विवाह से मन घबरा गया |

फिर संन्यास लिया सोचा था कि संन्यासियों के बीच रहूँगा शायद मैं बदल जाऊँ | लेकिन नहीं बदल पाया क्योंकि आज भी मैं वही हूँ जो कल था | मैं संन्यासियों की तरह समाज के दुखों को भूलकर खुश नहीं हो पाया | 'मैं सुखी तो जग सुखी' के सिद्धांत को नहीं अपना पाया | लेकिन समझ में आया कि सबका दुःख उनका अपना है दूसरों का नहीं | कोई अमीर किसी गरीब की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई हिन्दू किसी मुस्लिम की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई मुस्लिम किसी हिन्दू की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई कांग्रेसी कभी भाजपाइयों की चिंता नहीं करता और कोई भाजपाई कभी कांग्रेसियों की चिंता नहीं करता |

कोई मुस्लिम मारा जाए भीड़ द्वारा तो मुस्लिम समाज चिंतित हो जाएगा लेकिन कोई मुस्लिम भूख से मर रहा हो, उसके खेत की फसल नष्ट हो जाने का कारण दुनिया भर के कर्जों में दब गया हो, तब मुस्लिम समाज आँखे मूँद लेगा | इसी प्रकार कोई हिन्दू मारा जाए मुस्लिम भीड़ के हाथों तो हिंदुत्व ही खतरे में पड़ जाएगा | सारे हिन्दू संगठन दिन भर उस हिन्दू का शोक मनाएंगे मुस्लिमों को कोसेंगे | लेकिन जब कोई हिन्दू भूख से मर जाये, गरीबी से मर जाए, उसकी जमीन कोई भूमाफिया छीन ले, किसान आत्महत्या कर ले, आदिवासी बेघर हो जाएँ....तब हिंदुत्व खतरे में नहीं पड़ेगा, तब किसी हिन्दू संगठन की सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ेगा | उनका व्यव्हार कुछ ऐसा होगा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं |

यानि ये शोक मानना, ये विरोध जताना भी साम्प्रदायिक है मानवीय नहीं | मौका मिलना चाहिए दुसरे सम्प्रदायों को बुरा दिखाने का, लेकिन अपनी बुराइयाँ दिखाई नहीं देगी इन्हें | इन्हें दिखाई नहीं देगा कि इनके अपने दड़बे में ही इनके अपनों के कारण ही कितने लोग शोषित पीड़ित व दुखी हैं....लेकिन दूसरे दड़बे के हाथों किसी पर अत्याचार हो जाये तो आसमान सर पर उठाये फिरने लगेंगे | और ढोंग करेंगे मानवता का, इन्सनियता का | वास्तविकता यह है कि न तो धर्म बचा है और न इंसानियत | अब तो केवल ढोंग ही बचा है |

यह सब देखकर मैं खुश नहीं हो पाता कभी भी | यह सब देखकर नाच नहीं पाता कभी भी, या सब देखकर गा नहीं पाता कभी भी | लेकिन कहते हैं न, सुख और दुःख सब अपने ही भीतर है ? तो भीतर जाने पर पाता हूँ कि मैं सबसे सुखी इंसान हूँ | मुझे दूसरों के दुखों को देखकर दुखी होने की आवश्यकता नहीं है | जो समाज खुद दुखों को गले लगाए रखना चाहता हो, जो समाज खुद को दुखों से मुक्त न करना चाहता हो, उनके दुखों को लेकर मैं भला क्यों दुखी होता हूँ ? जानबूझकर सोये हुए को नहीं जगाया जा सकता, जानबुझकर दुखी हुए लोगों को सुख नहीं पहुँचाया जा सकता...इसलिए अब बदलूँगा स्वयं को | अब अपने ही सुखों में सुखी रहूँगा, दूसरों के दुखों में दुखी रहने का मुझे कोई अधिकार नहीं |

वास्तव में संन्यासी होने का अर्थ ही समाज के ढोंग, पाखण्ड आडम्बरों से अलग करके स्वयं को सुखी व प्रसन्न रखें का उपाय खोजना | और जो ऊपर उठने का अभिलाषी हो उसे सही राह दिखाना | न कि उन समस्याओं को लेकर दुखी होना, जिसे आप सुलझा नहीं सकते, जिसके लिए आप जिम्मेदार नहीं, जिसका आप्स्से कोई सम्बन्ध नहीं |

~विशुद्ध चैतन्य

23 जून 2018

सावधान ! धर्म खतरे में है !!!



अक्सर हम सुनते हैं कि धर्म खतरे में हैं | गली मोहल्लों से लेकर विश्वस्तर पर धर्म रक्षक बने लुच्चे लफंगों की सेनाएं तैनात हो रहीं हैं | हर किताबी रट्टामार धार्मिक इस बात पर बहुत ही गंभीरता से विश्वास करता है कि धर्म खतरे में हैं और उसकी रक्षा करने के लिए लठैतों, छुरेबाजों, तलवारबाजों, कट्टेबाजों और असाल्ट राइफलधारकों की सेनाओं की आवश्यकता है | इसलिए वह इन सड़क छाप लफंगों की सेनाओं को दोनों टाँगे उठा नतमस्तक होकर नमन करता है |

आये दिन गुंडे बदमाश और बेरोजगार लफंगे धर्म की रक्षा के नाम पर किसी न किसी निर्दोष निहत्थे की हत्या कर देते हैं या उसे बुरी तरह घायल कर देते हैं | कहीं गौ रक्षा के नाम पर हत्याएं हो रहीं हैं तो कहीं इस्लाम और हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर | कहीं धर्म की रक्षा के लिए लडकियाँ उठा ली जाती हैं तो कहीं बलात्कार करके मार दिया दिया जाता है.....और ये सारे काम धार्मिक काम धर्म के रक्षकों द्वारा बड़ी श्रृद्धा से किया जा रहा है |

यह और बात है कि मेरे जैसे मंदबुद्धि लोगों की समझ में यह बात नहीं आती और कभी भी नहीं मानते कि धर्म खतरे में हैं....लेकिन मैं भी अब मानने लगा हूँ | क्योंकि अब स्पष्ट दिखने लगा है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं | अब प्रमाणित हो चुका है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं |

 

क्या धर्म खतरे में है ?

 

बिलकुल धर्म खतरे में है अब कोई संदेह नहीं रह गया | बस कुछ लोग समझ नहीं पा रहे कि धर्म खतरे में है, लेकिन धर्म वास्तव में खतरे में है | केवल भारत में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में धर्म खतरे में है |

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन....जैसे सम्प्रदायों, रिलीजन्स की बात नहीं कर रहा |  मैं केवल धर्म की ही बात कर रहा हूँ और उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे मैं सनातन धर्म कहता हूँ, जिसे मैं प्राकृतिक व ईश्वर प्रदत्त धर्म कहता हूँ | मैं किसी मानव निर्मित या किसी व्यक्ति-विशेष या किताब-विशेष पर आधारित धर्म की बात नहीं कर रहा | मैं तो उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे लोग मानवता कहते हैं, इंसानियत कहते हैं, Humanism कहते हैं |

 

जो सनातन है वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?


पड़ सकता है नहीं, पड़ चुका है | अब समाज, परिवार व माता-पिता अपने बच्चों को इंसान नहीं बनाते, बल्कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, कांग्रेसी, भाजपाई, सपाई, बसपाई बनाना पसंद करते हैं | अब माता-पिता स्वप्न नहीं देखते कि उनके बच्चे बड़े होकर इन्सान बन जाएँ, बल्कि अब सपने देखते हैं कि उनके बच्चे बड़े होकर डॉक्टर बने, इंजिनियर बनें, आईएएस बने, आइपीएस बने | अब माता पिता को बुरा नहीं लगता कि उनके बच्चे डिग्री लेकर लुच्चों लफंगों की सेना में शामिल होकर गुंडा-गर्दी करता फिरे, मोब-लिंचिंग करता फिरे, धूर्त-लम्पट नेताओं के तलुए चाटता फिरे, छुरा-कट्टा लेकर सड़कों पर आवारगर्दी करता फिरे...बल्कि अब उन्हें गर्व होता है कि उनका बच्चा यह सब करके धर्म की रक्षा कर रहा है |

और ऐसी मानसिकता का विस्तार होना सनातन धर्म को भी खतरे में डाल देता है | क्योंकि जब मानव ही सनातन धर्म से विमुख हो जायेगा और दड़बों को धर्म समझने लगेगा, तो धर्म का पतन निश्चित है | अब आपको न तो इस्लामिक समाज में धर्म दिखाई देगा और न ही हिन्दू समाज में, न ही साधू-समाज में, न ही बाल्मीकि, अम्बेडकर, मोदी या किसी और समाज में या दड़बे में धर्म दिखेगा | न तो मंदिरों में आपको धर्म दिखेगा, न ही मस्जिदों में आपको धर्म दिखेगा, न स्कूलों में, न कॉलेजों में.....यानि धर्म पुर्णतः बहिष्कृत हो चुका है समाज में और साम्प्रादायिकता को धर्म का नाम दे दिया गया |

अब केवल दिखावे के धार्मिक दिखेंगे, अब केवल दिखावे के धार्मिक कर्मकांड जैसे कि दान, सेवा, परोपकार, कमजोर व असहायों की निःस्वार्थ सहायता, शालीनता, सभ्य शालीनता पूर्वक बात करने की कला, अशिष्टता से परहेज, खुद खाने से पहले भूखे को खिलाना.....आदि इत्यादि सब व्यावहारिकता में लुप्त ही चुके हैं और जो थोड़ा बहुत दिख भी कही रहा है, तो वह भी दिखावा ही है | बिलकुल वैसे ही जैसे बड़े तोंद वाले बेडौल महापुरुषों का योग के प्रचार के लिए कैमरे के सामने योग करना | यानि जो कुछ भी किया जा रहा है वह भीतरी आवेग से नहीं, धार्मिक परम्परा मानकर किया जा रहा है |

यही कारण है कि अब धर्म की शिक्षा सभ्य व शालीन विद्वान नहीं देते, न ही स्कूलों, विश्वविद्यालयों में सिखाया जाता है | बल्कि सड़क छाप लुच्चे लफंगों को कट्टा, तमंचा, लाठी, बन्दूक थमाकर धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी सौंप देते हैं | इन लुच्चे लफंगों द्वारा किसी निर्दोष की हत्या कर देने पर न उनके माता-पिता शर्मिंदा होते हैं और न ही समाज या धार्मिक लोग शमिन्दा होते हैं | क्योंकि उनका धर्म तो किताबों में सुरक्षित है तो वे जानते हैं कि उनका धर्म खतरे में नहीं है | सारे देश में लोग आपस में मार काट-करने लगें, तब भी ये धार्मिक यही मानेंगे कि उनका धर्म खतरे में नहीं है...वे सही हैं | क्योंकि उनका धर्म किताबी है जो कभी व्यावहारिक नहीं हो सकता और जो व्यवहारिक ही नहीं है, वह खतरे में भला कैसे पड़ सकता है ? जो योद्धा अपने घर से बाहर ही न निकले, जो तलवार अपने म्यान से ही न निकले, भला वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?

 

धर्म क्या है और अधर्म क्या है ?


लेकिन मैं मानने लगा हूँ कि धर्म खतरे में है | क्योंकि धर्म पारम्परिक कर्मकाण्ड नहीं है | पूजा-पाठ, नमाज, तिलक, टोपी, घंटे-घड़ियाल, आरती-कीर्तन धर्म नहीं हैं | धर्म है परोपकार, सेवा, सहयोग, आपसी सद्भाव, प्रेम, करुणा, समाज के हितार्थ कार्य करना, अपने गाँव, मोहल्ले के हितार्थ कार्य करना, राष्ट्र व नागरिकों के हितार्थ कार्य करना | और यह सब करते हुए, स्वयं को प्रसन्न व स्वस्थ रखने के समस्त उपाय करना, अपने सामर्थ्यानुसार उपलब्ध भोगों का उपभोग करना, नाचना, गाना...उत्सव मनाना ये सब धर्म हैं |

दूसरों को कष्ट देना, दूसरों की सम्पत्ति छीनना, दूसरों पर अत्याचार करना, दूसरों के सुख में बाधा डालना, दूसरों के प्रेम में विष घोलना, समाज में सांप्रदायिक वैमनस्यता पैदा करना, निहत्थे, निर्दोषों की हत्याएं करना, गाली-गलौज करना, अशिष्टता से बात करना....ये सब अधर्म हैं |

 

सप्रमाण समझिये कि धर्म कैसे खतरे में हैं


भारत में शायद ही कोई होगा जो खुद को अधार्मिक कहता हो | नास्तिक भी खुद को अधार्मिक नहीं कह सकता क्योंकि नास्तिक भी कहीं न कहीं कोई न कोई परोपकार के कार्य कर ही देता है| और परोपकार धर्म है | तो जब सवा अरब से अधिक की आबादी धार्मिक है चाहे वह किसी भी पंथ, मत, संप्रदाय से सम्बंधित हो, लेकिन स्वयं को धार्मिक तो मानता ही | इनमें से कई लोग ऐसे भी होंगे जो खुद को हिन्दू नहीं मानता, मुस्लिम नहीं मानता, सिख नहीं मानता लेकिन इन्सान तो मानता ही है | और इंसानियत धर्म है क्योंकि इसका विपरीत हैवानियत अधर्म है |

लेकिन इतनी बड़ी संख्या में धार्मिकों के रहते हुए भी भारत में धर्म लुप्त होने के कागार पर पहुँच जाना गंभीर चिंता का विषय है

 

प्रथम प्रमाण:


एक खबर पढ़ी मैंने; 'तेजी से महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत में तकरीबन 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैंं और प्रतिदिन 3000 बच्चे भूख से मर जाते हैं। यह जानकारी ग्लोबल हंगर इंडैक्स के आंकड़ों से मिली है। हालांकि भारत का स्थान पिछले साल के मुकाबले ग्लोबल हंगर इंडैक्स में 63 के मुकाबले 53वां है। मंगल पर अपना यान भेजने वाले देश भारत में भूख के खिलाफ जंग सबसे बड़ी चुनौती है। बच्चों में कुपोषण और उनकी मृत्यु दर का स्तर बेहद चिंताजनक है। यहां तक कि नेपाल और श्रीलंका की स्थिति भारत से बेहतर है जबकि पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे पिछड़े देशों में स्थिति और भी बुरी है।' साभार: भोपाल समाचार

क्या कभी आपने सोचा कि लगभग हर सम्प्रदाय यह मानता है कि उनका सम्प्रदाय धर्म को महत्व देता है, लेकिन फिर भारत में ही 19 करोड़ लोग भूखे पेट क्यों सोते हैं ? क्यों प्रतिदिन तीन हज़ार बच्चे भूख से मर जाते हैं ?

चलिए मान भी लें कि ये आँकड़े झूठे हो सकते हैं...तीन हज़ार नहीं, हज़ार बच्चे ही रोज मरते हैं...तो भी क्यों मरते हैं ? क्या किताबी धार्मिकों की किताबों में यह नहीं लिखा है कि कोई पड़ोसी भूखा रह जाए और आपके गले से निवाला उतर जाए तो इससे बड़ा अधर्म और कुछ नहीं ? क्या सभी धार्मिकों के समाज में भूखे को भोजन, प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य नहीं माना गया ?

कितने धार्मिक संगठनों ने भूखे को भोजन देने के लिए आन्दोलन किये और भूखों तक भोजन पहुँचाया ? कितने धर्मरक्षक तलवार की बजाय, भोजन की थाल और पानी की बोतल थामें भूखों के घर तक पहुँचे ? कितने धार्मिकों ने राजनैतिक दबाव बनाया कि भूखों को पहले भोजन दो, अच्छी चिकित्सीय सेवायें उपलब्ध करवाओ, उन्हें आत्मनिर्भर होने में सहयोग करो उसके बाद जीडीपी का ग्राफ दिखाना ? क्या कभी तनिक भी शर्म आयी खुद को धार्मिक कहते हुए जबकि धार्मिक कोई कार्य नहीं कर रहे केवल दिखावा कर रहे हो ?

जो कट्टा-तमंचा लिए धर्म की रक्षा के लिए निकले हैं, क्या उन मूर्खों को किसी ने बताया कि कट्टे तमंचों से नहीं सेवाभाव व सहयोग से धर्म की रक्षा होती है | दड़बा हिन्दू हो या मुस्लिम या कोई और, सभी में बेबस और लाचार मिल जाते हैं...लेकिन क्यों ? जब आप खुद धार्मिक नहीं हो पाए तो फिर ये धार्मिकता का ढोंग क्यों ?

दो चार लोग हर समाज में ऐसे मिल जाते हैं, जो गरीबों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं, उन्हीं की सहायता क्यों नहीं कर देते यदि खुद नहीं पहुँच पाते किसी गरीब के पास तो ??? चलिए माना कि आप कट्टर धार्मिक हैं अपने धर्म के अलावा किसी और धर्म को बर्दाश्त नहीं कर सकते...अरे तो कम से कम अपने ही धर्म नाम के दड़बे में जो बेबस और लाचार भरे पड़े हैं उनकी ही सहायता कर दो और मरने दो दूसरे दडबों के बेबस और लाचारों को | अरे कम से कम अपने ही समुदाय, सम्प्रदाय की सहायता तो करो ??

 

द्वितीय प्रमाण:


सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अधर्मियों का साथ मत दो, अत्याचारियों का साथ मत दो, अशिष्ट व असभ्य लोगों को सही राह दिखाओ या उनका बहिष्कार करो | लेकिन क्या धार्मिक लोग ऐसा कर रहे हैं ?

यदि अधर्मियों, अत्याचारियों का सहयोग नहीं कर रहे होते धार्मिक लोग, तो क्या अधर्मी आज सड़कों से लेकर ससंद तक उत्पात कर रहे होते ? क्या जनता को लूटकर कोई विदेश भाग सकता था ? क्या कोई जनता पर दुनिया भर के टैक्स थोपकर चैन से रह सकता था ? क्या कोई जनता को असहाय और लाचार बनाने के अपने उद्देश्य में सफल हो सकता था ? क्या धर्म की रक्षा के नाम पर लुच्चे-लफंगों का गिरोह किसी निर्दोष की हत्या कर सकता था ?

लेकिन ऐसा हो रहा है क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया है | अब दडबों को धर्म समझ बैठा है समाज, अब नेताओं, बाबाओं, राजनैतिक व सांप्रदायिक, जातिवादी पार्टियों को धर्म समझ बैठा है | अब इंसान होना महत्वपूर्ण नहीं रह गया, अब हिन्दू होना, मुसलमान होना, काँग्रेसी होना, भाजपाई होना, संघी होना, बजरंगी होना धर्म हो गया | और चूँकि दड़बों को धर्म मान लिया गया, इसीलिए इन दडबों की सुरक्षा के लिए लुच्चे लफंगों की सेनाओं की आवश्यकता पड़ गयी | वरना सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन लुच्चे लफंगों से निपटने के लिए ? क्या सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन धूर्त, जुमलेबाज, लुटेरे नेताओं को उनकी औकात बता देने के लिए ???

लेकिन दुर्भाग्य से जनता ही धर्म से विमुख हो गयी और यही कारण है कि कुछ मुट्ठीभर बदमाश पुरे देश को गुलाम बना कर बैठ गये | कुछ मुट्ठीभर लुटेरे पुरे देश को लूटकर मालामाल हो गये और जनता अपनी किस्मत को कोस रही है |

 

तृतीय प्रमाण:


क्या सभी सम्प्रदायों की धार्मिक पुस्तकों में शिक्षा के महत्व को नहीं स्वीकारा गया है ? क्या शिक्षा का प्रसार प्रसार करना सभी धार्मिकों के प्रमुख कर्तव्यों में से एक नहीं है ?

फिर शैक्षणिक संस्थानों की दुर्गति क्यों हो रही है ?

एनडीटीवी ने एक सर्वे में यह खुलासा किया है कि भारत में अधिकांश सरकारी स्कूलों में शौचालयों और पीने के पानी की बुनियादी सुविधाओं की कमी है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के कार्यान्वयन पर एनडीटीवी ने भारत के 13 राज्यों में 780 सरकारी स्कूलों का सर्वेक्षण किया। परिणाम बहुत शर्मनाक था उनमें से 63 प्रतिशत स्कूलों में कोई खेल का मैदान नहीं था। सर्वे किए गए स्कूलों में से एक तिहाई से अधिक स्कूलों की स्थिति बेहद खराब थी। ऐसी स्थित में अगर कोई छात्र शौचालय जाना चाहता है तो वह घर वापस चला जाता है। एनडीटीवी चैनल ने शौचालय की कमी को छात्राओं द्वारा अधिक मात्रा में स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण बताया। स्थित इतनी खराब थी की 80% से अधिक स्कूलों में उम्र के अनुसार छात्रों का प्रवेश नहीं था।

शिक्षा का अधिकार, अधिनियम (आरटीई) प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चों को मुफ्त और आवश्यक शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम छात्र शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के साथ-साथ स्कूलों की इमारतों, बुनियादी ढाचों, स्कूल के कामकाज के दिनों, शिक्षकों के काम करने के घंटों, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति को भी निर्दिष्ट करता है।

बहुत से सरकारी स्कूलों को लंबे समय से पुनःनिर्मित नहीं किया गया है। कभी-कभी छात्रों को कक्षा के बाहर फर्श पर बैठने के लिए कहा जाता है क्योंकि स्कूल की छत किसी भी समय गिर सकती है। साभार: Maps of India

क्या धार्मिकों ने कभी शिक्षा पर प्रश्न उठाया ? क्या कभी धार्मिकों ने सरकार पर दबाव बनाया कि उनके बच्चों को उचित शिक्षा मिले वह भी बच्चों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाये बिना ?

शायद नहीं ! क्योंकि आप लोगों के लिए ये धर्म नहीं है | धर्म तो है हिन्दू-मुस्लिम खेलना, ब्राह्मण-दलित खेलना.....और मेरी नजर में ये केवल साम्प्रदायिकता है धर्म नहीं | धर्म हिन्दू-मुस्लिम में नहीं बटा हुआ है, धर्म केवल धर्म ही होता है और सार्वभौमिक होता है | हिन्दू हो या मुस्लिम  या कोई और सम्प्रदाय, सभी के बच्चों को शिक्षा दिलाना धर्म है | सभी के बच्चों के स्वास्थ्य व सुरक्षा का ध्यान रखना धर्म है |

तो समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म मान बैठा, इसीलिए ही मैं कह रहा हूँ कि धर्म खतरे में हैं | धर्म वह नहीं जो ये लुच्छे लफंगों के नेता और ठेकेदार समझा रहे हैं | ये छुरेबाज, कट्टेबाज, बेरोजगार लफंगे और उनके ठेकेदार सिखायेंगे हमें धर्म ???

यदि ऐसी स्थिति आ गयी है कि अब इन लुच्चे लफंगों से धर्म सीखना पड़े, तो बेहतर है कि सारा समाज ही आत्महत्या कर ले | यदि इनके बहकावे में आकर पढ़े-लिखे भी गुंडागर्दी करने लगें, साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने लगें, तो बेहतर है कि समाज खुद को धार्मिक कहना ही छोड़ दे |

तो शायद अब आप समझ गये होंगे कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म के रूप में धारण कर चुका है | और यही स्थिति रही, तो बहुत ही जल्द धर्म लुप्त जाएगा और उसके साथ ही लुप्त हो जाएगा इंसान और इन्सानियत |

~विशुद्ध चैतन्य

15 जून 2018

आध्यात्मिकता, भौतिकता और दोगले धार्मिकों का समाज




कई प्रयोग करते हुए निरंतर बढ़ा चला जा रहा हूँ, लेकिन मेरा प्रयोग केवल मेरे लिए है | मेरे अपने ही आध्यात्मिक उत्थान के लिए | बिलकुल वैसे ही जैसे कोई ऋषि बियाबान में ध्यान करता रहता है, मैं समाज में रहकर ध्यान कर रहा हूँ | मेरा ध्यान उस रहस्य को जानने के लिए है, जिसे आज तक कोई धार्मिक, संत-महन्त नहीं समझ पाया |

सुनने में अजीब ही लगेगा आप सभी को, लेकिन ऐसा ही है |

निराकार का भी होता है आकार




साकार की उपासना तो समझ में आती है मुझे | क्योंकि जो प्रत्यक्ष आपकी सहायता करता है उसकी उपासना या सम्मान स्वाभाविक है | जैसे कि सूर्य की उपासना, चन्द्र की उपासना, नदी, वृक्ष, पहाड़, खेतों की उपासना | ये सभी जीवन दायी हैं | कुछ लोग नेताओं, अभिनेताओं, क्रिकेटरों की उपासना करते हैं वह भी समझ में आता है क्योंकि वे उनकी तरह होना चाहते हैं न कि अपनी तरह | कुछ लोगों की दाल रोटी ही उनकी चापलूसी से चलती है इसलिए वे उनकी उपासना करते है, वह भी समझ में आता है लेकिन….

11 जून 2018

साधू संत और कलयुग


अक्सर देखता हूँ कि आध्यात्म और धर्म के नाम पर समाज दोहरी मानसिकता रखता है | जब भी आध्यात्म या धार्मिकता की बात आती है, तब समाज का व्यव्हार बिलकुल अलग होता है और जब विज्ञान व्यवहार की बात आती है तो बिलकुल अलग |

तो इस पोस्ट का मूल विषय है; "साधू संत और कलयुग" | जो कुछ भी मैं कहना या समझाना चाहता हूँ इस पोस्ट के माध्यम से, वह सीधे ही शुरू कर दूं तो समझ में नहीं आयेगा आप लोगों के | इसलिए आरम्भ करता हूँ दर्पण से यानि आइना दिखाने से और उसके बाद अपने मूल विषय पर आता हूँ | इस बीच कई बार आपको ऐसा भी लग सकता है कि मैं विषय से भटक रहा हूँ, लेकिन वह केवल आपका भ्रम होगा | क्योंकि यह लेख घुमावदार ही रखूँगा ताकि आपको भूल भुलैया का आनंद भी प्राप्त हो |

अंधविश्वास



दुनिया का कोई भी किताबी मजहब या धर्म अन्धविश्वास के विरुद्ध नहीं है | क्योंकि सभी धर्मों, मजहबों में एक अंधविश्वास बहुत प्रभावी है और वह है निराकार की उपासना | उस काल्पनिक ईश्वर की उपासना करना जिसे न किसी ने देखा, न जाना, न समझा...बस किसी ने कहा और मान लिया और लगे पूजने उसे |

12 मार्च 2017

समाज में उनका सम्मान सर्वाधिक होता है जो ऐश्वर्यवान हो



"गुरु जी आखिर हम इन्सानों की जिंदगी का मक़सद किया है ?

हर धर्म की अपनी ही ढपली है | तमाम धर्म की बुनयाद डर और लालच पर रखी गई है। जो समझ से परे है।

डर "" नर्क,दोज़ख़, लालच """ अप्सरा, हूर, वह भी वर्जिन,श़राब,कबाब..."

08 मार्च 2017

मैं मूर्ती पूजक नहीं हूँ


 मैं शायद ऐसा व्यक्ति हूँ जो कभी किसी की समझ में नहीं सकता क्योंकि मैं अंधों की उस दुनिया में रहता हूँ जिसके लिए हाथी को समग्रता से देख व समझ पाना लगभग असंभव होता है | कोई हाथी को उसके पैर से जानता है और कोई उसकी पूँछ से तो कोई उसकी सूंड या कान से | पूरा हाथी उनकी समझ में कभी नहीं आ सकता |

इसी प्रकार मैं भी शायद कभी नहीं समझ में आऊंगा किसी के | मेरे आश्रम के लोगों का मानना है कि मैं मूर्ती-पूजक नहीं हूँ और आश्रम के बाहर के लोगों का माना है कि मैं मूर्तीपूजक हूँ | कुछ लोग मुझे नास्तिक मानते हैं तो कुछ लोग मुझे वामपन्थी | कुछ लोग मुझे मुसलमान मानते हैं तो कुछ लोग मुझे पाखण्डी | कुछ को मैं मोदी विरोधी दीखता हूँ तो कुछ को सरकार विरोधी | तो सभी ने मेरे प्रति अपनी अपनी मान्यताएं बना रखीं हैं |

चलिए मैं अपने विषय में आप लोगों की कुछ गलतफहमियाँ दूर करने का प्रयास करता हूँ, हालांकि जानता हूँ यह एक मूर्खतापूर्ण प्रयास ही होगा

05 मार्च 2017

मैं सुखी तो जग सुखी


एक बहुत ही बड़ा भ्रम पाल लिया है पढ़े-लिखों ने कि भौतिक सुख ही वास्तविक सुख है और बाकी सभी कुछ भ्रम है मिथ्या है | इनको लगता है कि इंसानों ने जो आविष्कार किये वे ही जीवन दायिनी हैं, बाकि सभी कुछ व्यर्थ | और यह भ्रम इतनी गहराई तक लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा दिया गया है कि इनकी स्थिति उन धार्मिक कूपमंडूकों सी हो गयी है, जो यह मानते हैं कि ईश्वर ने उनके लिए कोई पुस्तक आसमान से उतारी थी और उसमें जो कुछ भी लिखा है वही सत्य है, बाकी सब झूठ | कुछ तो ऐसे धार्मिक कूपमंडूक हैं जो चाय भी पीने जायेंगे तो देखेंगे कि उनकी किताब में इसकी परमिशन है कि नहीं | लेकिन वही धार्मिक लोग यह नहीं देखेंगे कि बलात्कार, लूटपाट, निर्दोषों की हत्या, अपराधी प्रवृति के नेताओं को वोट देना.... आदि इत्यादि उनकी ईश्वरीय किताबों, वेद-पुराणों में वर्जित है या नहीं |

इसी प्रकार कुछ अध्यात्मिक कहे जाने वाले वाले विद्वानों का मानना है कि "मैं सुखी तो जग सुखी" के सिद्धांत पर चलना ही आध्यात्म है | और हम देखते ही हैं कि अध्यात्मिक गुरु लोग केवल अपने में मस्त रहते हैं | उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पड़ोस में कोई दुखी है या नहीं | मंदिर-मस्जिदों के सामने भीख माँगते लोगों को देखकर मुझे बहुत ही आश्चर्य होता है कि जो मंदिर-मस्जिद उन भिखारियों की दरिद्रता दूर नहीं कर पाता, वह भला दूर से आने वालों की मनोकामना कैसे पूरी कर सकता है ?

लेकिन मेरी नजर में आध्यात्मिक ज्ञान यानि अधि + आत्मा यानि वह सर्वशक्तिमान जिसके हम अंश हैं और वह आत्मा जो इस शरीर को चला रही है, उसका ज्ञान | अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए आजीवन न तो तपस्या करनी पड़ती है और न ही आजीवन कोई एक किताब, मन्त्र, आयत या श्लोक रटते रहना पड़ता है | न ही कोई कर्मकाण्ड आजीवन करते रहना पड़ता है | हाँ ध्यान आवश्यक है क्योंकि ध्यान से आप अपने मस्तिष्क व शरीर को रिफ्रेश कर पाते हैं | ध्यान कोई चमत्कार नहीं है, केवल अपने आपको न्यूट्रल मोड में डाल देना मात्र है | जब आप ध्यान की अवस्था में होते हैं, तब आपके मस्तिष्क के सेल्स रिलेक्स मोड में आ जाते हैं और साथ ही आपके शरीर की सभी कोशिकाएं भी | आपके बीस मिनट के ध्यान से आपको इतनी उर्जा मिलती है, जितनी कि आठ घंटे की नींद से मिलती है | आपके शरीर की चमक बढ़ जाती है, सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है, एकाग्रता बढ़ जाती है....व अन्य कई भौतिक व अध्यात्मिक लाभ मिलते हैं |

तो ध्यान करना आध्यात्मिक उत्थान का सरल मार्ग है | अध्यात्मिक उत्थान होने के बाद फिर आप किसी दड़बे में कैद नहीं रह पायेंगे, आपको बेचैनी होने लगेगी | क्योंकि तब आप मानव निर्मित सभी सीमाओं से स्वयं को मुक्त पायेंगे | आपको समझ में आ जायेगा कि दुनिया इतनी छोटी नहीं है, जितनी कि मानव समाज ने बना रखा है | दुनिया तो इतनी विशाल है कि उसका छोर ही ज्ञात नहीं हो पा रहा | फिर आपको यह भी समझ में आ जाएगा कि पढ़े-लिखे लोगों ने कितनी बड़ी बड़ी गलतियाँ कर रखी हैं.. जैसे कि प्लास्टिक का अविष्कार व उसका अनियंत्रित दुरुपयोग |

पानी या कोल्ड-ड्रिंक बेचने वाली कम्पनियाँ प्लास्टिक की बोतल में पानी या कोल्डड्रिंक आप तक पहुँचाती है | आप पानी की बोतल खरीदते हैं, पानी पीते हैं और बोतल फेंक देते हैं | न तो कम्पनी को इस बात की कोई फ़िक्र है कि वे प्लास्टिक की बोतलें कितने अन्य जीवों की जान लेंगी, कितने वनस्पति व जलचरों की जान लेंगीं...बस कंपनी को कुछ कागज के नोट चाहिए और आपको अपनी सुविधा | फिर आप लोग तो दुनिया से उठ जाओगे एक दिन, आने वालों के लिए नरक बनाकर | जैसे कि किसी टूरिस्ट प्लेस जाकर आप लोग करते हैं | साफ़ सुथरी झील देखी और प्लास्टिक की बोतलें उसमे फेंकनी शुरू कर दी, समुद्र देखा और प्लास्टिक की बोतलें फेंक दी... क्योंकि आप लोग पढ़े-लिखे हैं खुद को बुद्धिमान समझते हैं और ऐसा करना आधुनिकता मानते हैं |

लेकिन क्या कभी सोचा है आपने कि ऐसा करके आप लोगों ने दुनिया को नरक बना दिया ? केवल अपनी भौतिक सुखो के लिए न जाने कितने उन जीवों की जिन्दगी खतरे में डाल दी और कितने जीवों को लुप्त होने पर विवश कर दिया, जिनको न तो आपने देखा है और न ही उन्होंने आपको ? आप में से कई होंगे शाकाहारी... जो जीव हत्या पाप है का नारा लगाते घूम रहे हैं | लेकिन आपके द्वारा प्रयोग किये जा रहे भौतिक संसाधनों से न जाने कितने जीव हर रोज काल का ग्रास बन रहे हैं |

तो यह है आप लोगों का विकास और आधुनिकता | मजाक उड़ाते हैं आप लोग हम जैसे लोगों का क्योंकि हम आपको कुछ करते दिखाई नहीं देते | आप लोग जिसे कुछ करना कहते हैं, जरा सोचिये उस करने में आपको लाभ कम हानि अधिक हो रही है | आप केवल स्लेव बनकर रह गये हैं कुछ व्यापारियों, कुछ पूंजीपतियों और मुर्ख सरकारों के |

प्रकृति तो स्वयं इतनी व्यवस्थित व सुनियोजित है कि कुछ भी व्यर्थ नहीं है | मनुष्य कोई यंत्र बनाता है तो वह बेकार होने के बाद केवल कबाड़ सिद्ध होता है | जबकि प्रकृति ने जो भी स्वचालित यंत्र जिसमें मानव शरीर भी शामिल है, वह व्यर्थ नहीं होता | जमीन में छोड़ तो शरीर के भीतर से स्वयं ही उस शरीर को नष्ट करने के लिए कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं | साथ ही साथ कई पशु-पक्षी के भोजन के काम में आ जाता है | और यह भी न हुआ तो, मिटटी में मिलकर खाद बन जाता है जो कि वनस्पतियों के भोजन के काम आता है |

आप स्वयं कल्पना करके देखिये कि मानव तो आज तक जल नहीं बना पाया.. आपको मिनरल वाटर भी बेच रहा है कोई तो जमीन से निकालकर ही बेच रहा है, न कि सागर से जल लेकर | सरकार को भी केवल कागज के नोटों से मतलब है, इसलिए कोकाकोला जैसे कंपनियों को जल बेच देती है.. जबकि सरकार स्वयं जल का निर्माण नहीं कर सकती | वह जल जो सभी जीव जंतुओं के लिए सामान रूप से ईश्वर द्वारा उपलब्ध करवाया गया है वह भी निःशुल्क, उसे वे लोग अपने अधिकार में ले रहे हैं, जिनकी इतनी भी हैसियत नहीं कि सागर का जल ही साफ़ करके पीने योग्य बना लें | और हम लोग खुद अपने हाथों से अपने ही देश के प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने के लिए ऐसी सरकारों को चुनते हैं जो मानसिक रूप से रुग्ण व मुर्ख होती है |

तो यह सब इसलिए क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है | भौतिक ज्ञान को सर्वोच्च मानने वाले मूर्ख पढ़े-लिखे विद्वानों ने पृथ्वी ही नहीं, सम्पूर्ण वायुमंडल व अंतरिक्ष तक को दूषित कर दिया...लेकिन भ्रम पाले बैठे हैं कि भौतिकता जीव सबसे बुद्धि मान हैं | बिगड़ा तो अब भी कुछ नहीं है यदि समय रहते लोग होश में आ जाएँ |

~विशुद्ध चैतन्य

 


26 फ़रवरी 2017

शिक्षा भी एक घातक अस्त्र है और हर किसी के हाथों नहीं सौंपी जा सकती

लोग जो समय रोज़े, नमाज़,संध्‍या-पूजा और प्रार्थना में नष्ट करते हैं, उसे यदि समाज के किसी उपयोगी काम में लगावें, तो अपने भाइयों का अपना बहुत कल्याण कर सकते हैं। यदि संसार से ईश्वर और धर्म के व्यर्थ गपोड़े मिट जायँ, तो लोगों में फ़ैले हुए झगड़ों का अन्त हो जाय। जब कोई मूर्ख से मूर्ख पिता भी अपना वश चलते अपने पुत्रों को नहीं लड़ने देता तो, यदि वास्तव में कोई खुदा होता और सर्वशक्तिमान् खुदा होता- तो वह अपनी संतान को कदाचित् अपने नाम पर कुत्तों की तरह न लड़ाता। यदि खुदा शक्ति और बुद्धिवाला होता तो भी वह एक ही धर्म सारे संसार के लिए बनाता- सारे संसार की एक ही बोली और एक ही संस्कृति होती- जिससे इन झगड़ों का बीज ही न पड़ता। जो खुदा झगड़ों का बीज बोता हो, जो धर्म मनुष्यों के लिए वास्तविक हितकर न हो, वह यदि वास्तव में कुछ हो भी तो विषवत् त्याज्य ही है। -राधामोहन गोकुलजी (पुस्तक: ईश्वर का बहिष्कार)

मेरे एक मित्र श्री D.r. Godara जी ने इस पुस्तक के विषय में जानकारी दी और मुझसे अपनी राय व्यक्त करने का आग्रह किया | मैंने पुस्तक के कुछ अंश पढ़े, लेकिन पूरी नहीं पढ़ी | फिर भी मैं इतना तो समझ ही चुका था कि पुस्तक के लेखक गोकुलजी, बहुत ही सुलझे विचारों वाले, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं |

पढ़े-लिखे व्यक्तियों कि सबसे बड़ी समस्या यह होती कि उनकी कल्पनाशीलता ध्वस्त हो जाती है | वे केवल उन्ही चीजों पर विश्वास करते हैं जो भौतिक है या जो दिखाई दे सकती है, जिन्हें अपनी पाँचो इन्द्रियों से अनुभव किया जा सकता हो.. यानी हवा और गैसों को भी वे इसलिए मानते हैं क्यों कि उन्हें पाँचों इन्द्रियों में से किसी एक से महसूस किया जा सकता है | उनके लेख का एक अंश यहाँ दे रहा हूँ,

“ईश्वर एक ऐसा कल्पित पदार्थ है, जिसे कभी किसी ने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं किया इसलिए कि उसका सर्वथा अभाव है। ईश्वर कोई ऐसी चीज़ है ही नहीं। जिस पदार्थ का अत्यन्त अभाव है, उसका अस्तित्व कभी हो ही नहीं सकता। संसार में जितनी वस्तुएँ हैं, वे चाहे कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हों, सबका प्रादुर्भाव प्रकृति से होता है; प्रकृतिजन्य सारे पदार्थ किसी न किसी दशा में इन्द्रिय ग्राह्य होते हैं। उदाहरण के लिए जल को लीजिए। यह भाप की सूरत में आँखों को दिखाई देता है। यदि यह और विश्लिष्ट होकर सूक्ष्मतम वायव्य (Gaseous) हो जाय अर्थात् गैस का रूप धारण कर ले, तो भी वह इन्द्रियों द्वारा जानने का विषय होगा। फि़र देखिए बिजली बहुत ही सूक्ष्म रूप की एक वस्तु है; आँख, कान, नाक द्वारा इसे नहीं जान सकते। लेकिन बिजली की उत्पत्ति प्राकृत पदार्थों से होती है; और जब हम उसका व्यवहार किसी रूप में करते हैं तो द्रव्यों में उसे स्पष्ट देखते हैं कि काम कर रही है।”

तो जो भी थोड़ा बहुत पढ़ा मैंने इस पुस्तक से उससे यही सिद्ध हो रहा था कि हमारे पूर्वजों ने जिन्हें शूद्र कहा, वह गोकुल जी जैसे विद्वानों के लिए ही कहा | शायद यही कारण था कि शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखा गया क्योंकि शिक्षा एक ऐसा अस्त्र है, जिससे निर्माण व अविष्कार भी संभव है और पतन व विनाश भी | बंदर को शस्त्र विद्या सिखा देने से इस बात की सम्भावना कम ही होती है कि वह कुछ अच्छा करेगा, हाँ इस बात की सम्भावना अधिक अवश्य होती है कि वह किसी की मौत का कारण अवश्य बनेगा |

विदेश की एक घटना पढ़ी थी मैंने कई वर्षों पहले कि एक व्यक्ति ने एक बन्दर पाला हुआ था | बंदर और मालिक में दोस्ती इतनी गहरी थी कि मालिक को बंदर पर इतना विश्वास हो गया था कि वह उसे बंदर नहीं, बल्कि अपना बेटा ही मानने लगा था | बंदर भी इतना समझदार था कि वह हर चीज बहुत जल्दी सीख व समझ लेता था | मालिक ने उसे कई तरह के हुनर सिखाये थे और वह सब बंदर बहुत ही कुशलता पुर्वक्र कर लिया करता था | एक दिन उस व्यक्ति ने बंदर को बन्दूक चलाना सिखाने की सोची | बंदर ने वह भी बड़ी जल्दी सीख लिया, लेकिन अचानक बंदर ने अपने मालिक की तरफ ही बन्दूक तान दी और ट्रिगर दबा दिया | मालिक की उसी समय मौत हो गयी….अब उस बंदर का तो कोई दोष था नहीं क्योंकि वह तो यह जानता ही नहीं था कि इससे किसी की मौत हो सकती है | उसने तो बस शरारत की थी और हादसा हो गया | यह विडियो देखिये, इसमें भी ऐसा ही ही कुछ है | कुछ सैनिक जंगल में ठहरे हुए हैं और एक चिम्पांजी का बच्चा उनके बीच पहुँच जाता है | वे उस चिन्म्पांजी से खेलने लगते हैं लेकिन…..बंदर के हाथ बन्दूक

तो शिक्षा भी इसी प्रकार एक घातक अस्त्र है और हर किसी के हाथों नहीं सौंपी जा सकती | आइन्स्टीन के पास परमाणु बम बनाने की तकनीक थी | जब तक उनके पास रही, सब ठीक था | लेकिन जैसे अमेरिकियों के पास पहुँची, हिरोशिमा और नागासाकी की घटना घट गयी | क्योंकि शिक्षा बंदरों के हाथ लग गयी थी | आप ध्यान से यदि इतिहास को पढ़ें और समझें तो शिक्षा जब तक सही व्यक्ति के हाथ रही, सदुपयोग होता रहा, लेकिन जैसे ही शूद्रों के हाथ पहुँची विनाशक चीजें ही बनी और आज इन्हीं पढ़े लिखों के द्वारा किये गये विकास का ही परिणाम है कि धरती, जल और आकाश तीनों ही प्रदूषित हो गये | तो फिर शिक्षा कैसे अछूती रहती ?

अब गोकुल जी भौतिक जगत से ऊपर उठ पाने में अक्षम हैं और गोकुल जी जाने कितने ही ऐसे पढ़े-लिखे होंगे, जिन्होंने केवल पढाई की है, ध्यान आदि का कोई प्रयोग कभी नहीं क्या होगा | किया भी होगा तो कोई चमत्कार होता न देख, छोड़ दिया होगा |

ध्यान इनसे होगा नहीं उसमें भी इनको चमत्कार देखना होगा तो स्वाभाविक है कि ध्यान से इनको कुछ समझ में आना नहीं है | इनको कोई ईश्वर के विषय में समझाए तो समझाए कैसे ? क्योंकि ईश्वर कोई ऐसी वस्तु, पदार्थ या द्रव्य तो है नहीं कि इनको सुंघा कर, छुवाकर महसूस करवा दी जाये, वह तो स्वयं जानने व अनुभव करने की चीज है | कोई जान भी जाए तो कह नहीं सकता, बुद्ध भी नहीं कह पाए और महावीर भी नहीं कह पाए…बुद्ध ने तो बड़ी सफाई से ईश्वर को ही नकार दिया क्योंकि वे जानते थे कि मूर्खों को ईश्वर के विषय में नहीं समझाया जा सकता | लेकिन फिर दुर्भाग्य दूसरा भी है हमारा कि धूर्त पाखंडियों ने ईश्वर के एजेंट होने का ढोंग करना शुरू कर दिया | अब वे ईश्वर के नाम पर धंधा खोल कर बैठ गये… अरे ईश्वर छोड़िये लोग तो बुद्ध के नाम पर ही धंधा खोलकर बैठे हुए हैं | समाज को जागृत व चैतन्य करने कि जगह तमाशा दिखाते फिर रहे हैं | तो ईश्वर समझ में आएगा कैसे ?

फिर गोकुलजी को पूरी तरह से गलत भी नहीं कह सकता क्योंकि धर्मों के ठेकेदारों ने धर्म के नाम पर इतना उपद्रव मचाया हुआ है, इतनी नफरत फैला रखी है कि यही लग रहा है यदि सारे धर्म मिट जाएँ तो शायद कुछ शान्ति आ जाये | मुसलमान अपनी क़ुरान से चिपका हुआ है, हिन्दू वेद और गीता से चिपका हुआ है, इसाइ बाइबल से चिपका हुआ है | आगे बढ़ने को कोई तैयार नहीं, ऊपर उठने को कोई तैयार नहीं…हर कोई एक ही राग अलाप रहा है हमारी किताब पढ़ो तो धर्म समझ में आएगा, हमारी किताब पढो तो ईश्वर समझ में आएगा, हमारी किताब पढो तो जन्नत/स्वर्ग, मोक्ष, अप्सराएं, हूरें मिलेंगी | और ऐसा कहने वाले इन रट्टू तोतों को खुद नहीं पता कि धर्म क्या है | इनकी नजर में तो साउदी के कर्मकांड कर लो और क़ुरान रट लो बस, हो गये मुसलमान | गीता रट लो, तिलक लगा लो, जनेऊ डाल लो तो बस हो गये सच्चे हिन्दू….उसके बाद मारकाट करो, बलात्कार करो, चोरी करो, देश से गद्दारी करो, दंगा-फसाद करो धर्म के नाम पर….सब जायज |

यहाँ यह कहानी पढ़िए.. फिर आगे बढ़ते हैं:

~मुल्ला नसरुद्दीन ने एक मनोवैज्ञानिक से पूछा कि मैं क्या करूं? मेरे दफ्तर में लोग काम ही नहीं करते! जिससे कहो वही कहता है: कल देखेंगे। कि कर लेंगे, क्या जल्दी पड़ी है! फाइलें इकट्ठी होती जाती हैं, कोई काम करता नहीं। महा अलाल इकट्ठे हो गए हैं। मैं क्या करूं?

मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह सूत्र हरेक की टेबल पर टांग दो–

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।

पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब।।

जंची बात नसरुद्दीन को, उसने कहा यह ठीक है। बनवा कर सुंदर तख्तियां हरेक कमरे में, हरेक कार्यकर्ता के सामने, हरेक कर्मचारी के सामने टांग दीं बड़े-बड़े अक्षरों में।

तीन दिन बाद मनोवैज्ञानिक ने फोन किया कि नसरुद्दीन, क्या हाल हैं?

नसरुद्दीन ने कहा, अस्पताल में भरती हूं। आप आ जाएं। और देर न करें। पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब। आ ही जाएं शीघ्र, क्योंकि शरीर में फ्रैक्चर ही फ्रैक्चर हो गए हैं। क्या कमाल का सूत्र दिया आपने!

मनोवैज्ञानिक तो बहुत हैरान हुआ। भागा, देखा तो पट्टियां ही पट्टियां बंधी हैं नसरुद्दीन पर! पलस्तर चढ़ा है–पैर पर, हाथ पर, खोपड़ी पर। पूछा, यह हुआ क्या? यह दुर्गति कैसे हुई?

उसने कहा, यह तुम्हारे सूत्र की कृपा है। अभी उठ नहीं सकता, नहीं तो वह मजा चखाता…। क्योंकि जैसे ही मैंने यह तख्ती टांगी, उपद्रव हो गया। वह जो खजांची था वह सारी तिजोरी लेकर नदारद हो गया। और एक चिट लिख कर छोड़ गया कि जिंदगी भर से सोच रहा था कि कब तिजोरी लेकर नदारद हो जाऊं, आपने क्या सूत्र टांगा कि मैंने सोचा बात तो बिलकुल सच है–पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब! सो मैं तो जाता हूं, जयरामजी की!

और वह जो मैनेजर था वह मेरी टाइपिस्ट को लेकर भाग गया। वह भी लिख कर नोट छोड़ गया कि नजर तो मेरी तुम्हारी टाइपिस्ट पर बहुत दिन से थी, मगर तुम्हारे डर से छिप-छिप कर छेड़ खानी करता था। मगर तुमने सूत्र क्या टंगवा दिया, मैंने भी सोचा बात तो सच है, जिंदगी यूं ही बीती जा रही है, ऐसे ही ख्वाब देखते-देखते। तो अब जा रहा हूं और तुम्हारी टाइपिस्ट को भी भगाए लिए जा रहा हूं। अब कहीं रहेंगे छिप कर और जीएंगे मौज से।

और मेरा जो दरबान है, वह एकदम भीतर घुसा और लगा मुझे पीटने। मैंने पूछा, भाई, तू यह क्या करता है? उसी ने ही ये मेरी हड्डी-पसली तोड़ दीं।

उसने कहा कि चाहता तो कब से करना था यह कि तुम्हारी हड्डी-पसली तोड़ दूं। लेकिन यह सोच कर कि देखेंगे, फिर देखेंगे…बाल-बच्चों वाला आदमी हूं, कोई झंझट हो, पुलिस हो, अदालत हो। मगर तुमने तख्ती क्या टांगी, मैंने कहा कि बात तो ठीक है।

मनोवैज्ञानिक ने कहा कि मैं बड़ा दुखी हूं। मुझे क्या पता था कि सूत्र का ऐसा परिणाम होगा! अब यह सूत्र किसी को न दूंगा। मुझे क्षमा करो। बहुत दुख हो रहा होगा तुम्हें, जगह-जगह पीड़ा हो रही होगी।

मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि जब हंसता हूं तभी दर्द होता है, वैसे नहीं होता।

मनोवैज्ञानिक ने कहा, हंसते किसलिए हो?

तो उसने कहा, हंसता इसलिए हूं कि क्या गजब दुनिया है! काहे के लिए सूत्र टांगा था और क्या हो गया! कैसे गजब के लोग हैं! इससे कभी-कभी हंसी आ जाती है भीतर ही भीतर तो दर्द होता है, हंसी में; नहीं तो वैसे तो ……सब शांत पड़ा हूं तो ठीक है..!!


चलिए अब चलते हैं यह जानने कि ईश्वर का बहिष्कार करने से क्या समस्या हल हो जायेगी ?

सबसे पहली बात तो यह कि जिसने भी ‘ईश्वर के बहिष्कार’ की कल्पना की है, वह नास्तिक नहीं है | क्योंकि नास्तिक लोग किसी अनदेखी अनजानी चीजों का विरोध नहीं करते, वे उन्हीं चीजों का विरोध करेंगे, जिसको वे जानते हैं, छु सकते हैं या देख सकते हैं | लेकिन ईश्वर के आस्तित्व को ही जो नहीं मानते, भला उसका बहिष्कार कैसे कर सकते हैं ? ईश्वर का बहिष्कार करने के लिए भी तो कल्पना की ही आवश्यकता होगी, कुछ तो बताना ही पड़ेगा कि जिसे तुम लोग ईश्वर मानते हो वह वास्तव में है नहीं | और उसे समझाने के लिए दूसरों की कल्पनाओ को तोडना होगा, उनको भी अपनी ही तरह मंदबुद्धि या किताबी कूपमंडूक बनाना होगा |

इन नास्तिक सम्प्रदायों के ठेकेदार और अन्य सम्प्रदायों के ठेकेदारों में कोई बहुत अंतर नहीं है, बस एक नहीं मानते और दूसरे मानते हैं… जानते दोनों में से कोई नहीं हैं | दोनों का ही आधार है किताबें…एक की किताब में लिखा है ईश्वर नहीं है, और दूसरे की किताब में लिखा है नहीं | एक रिफरेन्स देता है स्टीफन हॉक, पेरियार, आंबेडकर का, तो दूसरा रेफ़रन्स देता है पैगम्बर, अवतारों और आध्यात्मिक गुरुओं का | एक कहता है कि हमारा अल्लाह ही सच्चा है तो दूसरा कहता है कि हमारा स्टीफन हॉक और पेरियार ही सच्चा है | एक कहता है कि हम जो कहते हैं उसे मानो और दूसरा कहता है कि मत मानो | एक कहता है कि केवल हमारा सम्प्रदाय, हमारी किताबें और हमारे भगवान ही सच्चे हैं, बाकी सभी काफ़िर, अधार्मिक हैं उनको मिटा दिया जाना चाहिए या धर्म परिवर्तन करवा दिया जाना चाहिए, दूसरा कहता है कि सारे धर्म और उनकी किताबों को ही मिटा दिया जाना चाहिए……. मुझे तो इन सभी सम्प्रादयों में मौलिक कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता | एक ही नस्ल है, एक ही मानसिकता है, एक सी ही विचार धारा है… बस हम सही हैं और बाकि सभी गलत |

सुकरात, गैलीलियों, जीसस को ऐसी ही मानसिकता के विद्वानों ने मरवा दिया था | बोधिधर्मन को ऐसी ही मानसिकता लोगों के कारण चीन भाग जाना पड़ा, चीन में भी आज अध्यात्मिक लोगों का दमन जोरों पर है ऐसा सुनने में आया | तो कोई भेद नहीं है ऐसे कूपमंडूक नास्तिकों और आस्तिकों में |

नास्तिकों को लगता है कि ध्यान में बैठना समय की बर्बादी है, इस्लामिकों को लगता है कि पूजा-पाठ मूर्ती पूजा आदि समय की बर्बादी है, हिन्दुओं को लगता है कि नमाज पढ़ना मस्जिद जाना समय की बर्बादी है, यानि हर किसी को लगता है कि वही समय का सदुपयोग कर रहा है, बाकि सभी बर्बाद कर रहे हैं | नास्तिकों के लिए समय का सदुपयोग का मतलब नोट छापने की मशीन बन जाना… आप अपनी भक्ति में खोये हैं अपने में मस्त हैं, न किसी को कुछ कहते हैं, न किसी पर कुछ थोपते हैं… फिर भी सभी के पेट में दर्द रहता है.. जैसे मीरा से लोग परेशान थे | यानी ये लोग खुद को भगवान सिद्ध करना चाहते हैं, ये जैसे चाहेंगे वैसे सब चलें क्योंकि इनकी किताबें ऐसा कहती हैं क्योंकि ये उन्नत नहीं हो पा रहे, क्योंकि ये नहीं उठ पा रहे ऊपर.. तो कोई दूसरा भी नहीं उठना चाहिए… इन्हीं की तरह भेड़बकरियों की तरह किसी किताब, किसी नेता किसी इकलौते अनदेखे ईश्वर के नाम पर धर्मों के ठेकेदारों, जाति के ठेकेदारों, आरक्षण के ठेकेदारों की पीछे दुम हिलाते घूमते रहें… हद हो गयी…..यह तो…..

क्षमा चाहता हूँ कि इतना लम्बा पोस्ट लिख दिया… क्योंकि समझाने के लिए आवश्यक लगा… यह भी जानता हूँ कि आपसे से अधिकाँश तो पूरा पढेंगे भी नहीं, और कई कि समझ में ही नहीं आयेगा… फिर भी यदि दो चार धैर्यवान व्यक्तियों कि समझ में आ जाये कि मैं क्या कहना चाहता हूँ, वही मेरे लिए बहुत है | मुझे बर्दाश्त करने के लिए आपका आभार.. ईश्वर आप सभी की आत्मा को शांति प्रदान करें | ~विशुद्ध चैतन्य

20 फ़रवरी 2017

कोई भी धार्मिक ग्रन्थ ऐसा नहीं है दुनिया में जो किसी को अच्छा या बुरा बनाता है


आपने सुना या देखा होगा कि जब भी कोई हिंसक घटना घटती है, फिर चाहे वह इस्लामिक या हिन्दू आतंकवादियों द्वारा घटित हो या दंगाइयों द्वारा या गौरक्षकों, संघी-बजरंगियों द्वारा | सभी धार्मिक अपने अपने सम्प्रदाय का बचाव करते हुए कहते मिलेंगे कि उनसे हमारे धर्म के कोई लेना देना नहीं, हमारी ईश्वरीय किताबें (कुरान, वेद, गीता, बाइबल...आदि) कभी भी ऐसे कामों का समर्थन नहीं करतीं | ये लोग भटके हुए हैं या फिर ईश्वर के आदेश को समझ नहीं पाए |

17 फ़रवरी 2017

असली और नकली हर क्षेत्र में, हर समाज में, हर देश में होते हैं




कल रात किसी से चैट हो रही थी | उनके कहने का भाव जो मेरी समझ में आया वह यह कि भारत की राजनीति और यहाँ की जनता में कोई सुधार संभव नहीं है | आप इनको जागृत करना चाहते हैं, इनको चैतन्य करना चाहते हैं, यह मुर्खता ही है | बड़े बड़े महात्मा, जैसे कि स्वामी विवेकानंद, ओशो, और न जाने कितने, सभी विदेशियों को चैतन्य करने में अपनी भलाई समझीं, क्योंकि वे समझ चुके थे कि ये लोग न तो खुद सुधरेंगे, न दूसरों को सुधरने देंगे उलटे ओशो की तरह धक्के मारकर बाहर निकालेंगे | फिर एक प्रश्न भी पूछा कि साधू-संतों में किसी के पास कोई शक्ति होती भी या सभी केवल ढोंग करते हैं ?

16 फ़रवरी 2017

जहाँ देखो ढोंगी-पाखंडियों का बोलबाला है


बचपन में ही मुझे अपने माता-पिता से व्यवहारिक ज्ञान ही मिला, न कि किताबी ज्ञान | वे यदि ध्यान, पूजा-पाठ के विषय में भी समझाते तो उसे तर्कपूर्ण तरीके से समझाते, न कि यह कहते कि किताबों में लिखा है इसलिए करना है |


लेकिन २४ जनवरी १९८० में अपनी माँ की मृत्यु के बाद मैं नास्तिक हो गया | विश्वास ही उठ गया था ईश्वर से क्योंकि जो माँ कभी कोई व्रत नहीं छोडती थी, जो माँ कभी किसी का दिल नहीं दुखातीं थीं यहाँ तक कि अपने गहने जेवर भी अपनी ननदों को बाँट देती थीं, अपनी सारी अच्छी साड़ियाँ उनको दे देती थीं और खुद फटी हुई साड़ियों को हाथ से सिल सिल कर पहनती थीं...उनको इतने कष्ट सहने पड़े और अंत में कष्ट सहते हुए ही दुनिया से विदा हो गयीं |

सोचा करता था तब, "यदि ईश्वर कभी मिलेंगे तो पूछूँगा कि धूर्त और मक्कारों पर आप इतने कृपावान क्यों रहते हैं, जबकि निःस्वार्थ जीने वालों की खुशियाँ भी छीन लेते हैं ?"

10 जनवरी 2017

बहुमत जिसे मिला हो, वह सही ही होगा इस बात की कोई गारन्टी नहीं है



माना जाता है कि बहुमत जिसके पास हो, वही विजेता है | लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि बहुमत सत्यता का मानक कभी नहीं बन सकता और न ही कभी ऐसा हो सकता है कि सभी एकमत हो सकें | कुछ रिश्वतखोरी, घोटाले, भ्रष्टाचार के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में, कुछ अधर्म के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में....और यही देखा गया है कि अधर्म, असत्य व अपराध के पक्ष में ही अधिक लोग रहे हैं हमेशा |

11 दिसंबर 2016

उनकी रूचि अर्थ (धन) में हैं आध्यात्म में नहीं

 ठाकुर दयानन्द देव (१८८१-१९३७) ने कहा था, "मैं भौतिक जगत और अध्यात्मिक जगत के बीच सेतु बनाना चाहता हूँ" | उनका कहना था, "True welfare lies in harmony between the spiritual and the material. Spirituality without material well bring tends to decay and emasculation. Materialism, if it is not allied with the spiritual realization, if it is not aided and controlled by spiritual force will bring its own destruction.”

यह ऐसा विचार था जो मुझे अपनी ओर खींच लिया क्योंकि मेरी यही मान्यता थी और वह भी तब जब मेरा अपना परिवार कभी आध्यात्म और भौतिकता को एक साथ स्वीकार नहीं करता था | उनके लिए अध्यात्म की उपलब्धि तभी हो सकती है, जब हम भौतिकता से मुक्त होंगे | अधिकांश साधू-संतों या जितने भी विद्वानों से मैं अपने जीवन में मिला हूँ या पढ़ा हूँ, सभी भौतिकता के विरुद्ध ही थे सिवाय ओशो के |

अब हम अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने लायक भी नहीं रह गये

 जब मानव इंसानियत से परे हो जाये, जब मानव शैतान बन जाए, तब वह इतना नीचे गिर जाता है, कि पशु-पक्षी भी उनसे श्रेष्ठ हो जाते हैं |

यह तस्वीरें रोहिंगिया मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचारों की दास्ताँ कह रहे हैं | और आश्चर्य की बात तो यह है कि वह देश बौद्धधर्म के अनुयाइयों का देश है | वह बुद्ध जिसने अहिंसा को सर्वोपरि माना, वह बुद्ध जो दुर्दांत हत्यारे अंगुलिमाल को भी बिना हिंसा के सद्मार्ग पर ले आया... लेकिन वह पूरा देश जो बुद्ध का अनुयाई मानता है स्वयं को वहीँ के लोग नरपिशाच बन गये | और मैंने अभी तक किसी भी बौद्ध गुरु या स्वयं दलाई लामा से इस नरसंहार के विरोध में कोई वक्तव्य नहीं सुना | या फिर कहा भी होगा तो वह मिडिया ने लोगों तक नहीं पहुँचाया |

07 नवंबर 2016

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया

बचपन से द्वन्द रहता था मन में कि माँसाहार यदि पाप है तो फिर अंग्रेजों को पाप क्यों नहीं लगता, अरबियों को पाप क्यों नहीं लगता, आदिवासियों को पाप क्यों नहीं लगता ?

कई विद्वानों और पंडितों से प्रश्न किया कई से तर्क किये... लेकिन कोई ऐसा उत्तर नहीं मिल पाया जो मुझे संतुष्टि दे पाता | सारे वैज्ञानिक-अवैज्ञानिक तथ्यों को खंगाले लेकिन यह सिद्ध नहीं हो पाया कि माँसाहार करने से पाप लगता है |

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया, दोनों ही जीवनदाई है, दोनों ही वंशवृद्धि करते हैं, दोनों ही जीवित हैं, लेकिन एक को खाने से पाप नहीं लगता और दूसरे को खाने से पाप लगता है |
फिर यही नहीं समझ में आया कि झूठ बोलने से भी पाप लगता है, लेकिन मैंने किसी भी जुमलेबाज नेता को पाप लगते नहीं देखा, उलटे अदालतों से उसे बरी होते ही देखा है | दुनिया भर के घोटाले करने वाले, रिश्वतखोरों, अत्याचारियों, शोषकों को दुनिया भर के गंभीर अपराधों में आरोपी होते हुए भी सत्ता सुख भोगते देखा है | वहीँ अपने बच्चों को भूख से मरने से बचाने के लिए की गयी चोरी पर भी प्रताड़ित होते हुए, जेल भोगते हुए देखा है और वह भी बिना अदालत का फैसला आये | तो समझ में नहीं आया कि यह पाप किस बला का नाम है, होता कैसा है, दिखता कैसा है |

कई विद्वान कहते हैं कि माँसाहार अध्यात्मिक मार्ग में बाधक है, लेकिन मनुस्मृति कहती है,

29 अक्टूबर 2016

भ्रष्ट, दुष्ट दानवों को अमरता का वरदान प्राप्त है



हर आश्रम में एक परम्परा होती है, गुरु की प्रतिमा को स्नान करवाने का, यहाँ भी है | तो हर संन्यासी का कर्तव्य होता है कि वह हफ्ते में एक बार गुरु की प्रतिमा को विधिवत स्नान करवाए | लेकिन मैंने आज तक स्नान नहीं करवाया |

इस कारण आश्रम के सभी भक्तों और संन्यासियों से लेकर ट्रस्टियों और ग्रामीणों की नजर में अधार्मिक व्यक्ति हूँ | तो मुझे अक्सर किसी न किसी बहाने से उस दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाता है, जिसे आश्रम की परम्परा निभाना कहा जाता है | लेकिन शब्दों से खेलने की तो हमें बचपन से ही बीमारी लग चुकी थी, तो कौन किस उद्देश्य से कौन सी कहानी सूना रहा है, तुरंत समझ में आ जाता है | मुझसे कहा जाता है कि ठाकुर का स्नान करवाने से परमसुख की अनुभूति होती है, अध्यात्म की महान उपलब्धी होती है....और मेरा प्रश्न होता है कि कोई एक व्यक्ति ऐसा दिखा दीजिये जिसने ठाकुर को स्नान करवाया और उसे परम की उपलब्धि हो गयी ?

19 अक्टूबर 2016

नास्तिक-आस्तिक

आधुनिक पढ़े-लिखे नास्तिकों में वेलेंटाइन डे सम्मानित है, लेकिन होली पाखंड |

Teacher's-Day सम्मानित है, लेकिन गुरु-पूर्णिमा पाखंड |

Women's-Day सम्मानित है, लेकिन करवा-चौथ पाखंड |

इसी प्रकार से ऐसी कई बातें हैं जो पाखंड, ढोंग दिखाई देती हैं उन्हें जो आत्मिक जगत से दूर हो जाते हैं, लेकिन उसी को नए रूप में अंग्रेजी नाम देकर स्वयं मनाते भी हैं | बस अंतर केवल इतना हो जाता है कि नास्तिकों के पर्व आस्तिकों के पर्व मनाने की विधि के बिलकुल विपरीत होती है | कल कोई ऐसे पर्व का विरोध करेंगे ये लोग जिसमें दान या जकात देना अनिवार्य होता है, तो इनका पर्व बन जाएगा उसी के विपरीत कि दान या जकात लेना अनिवार्य होगा |