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18 दिसंबर 2016

चक्कर-भर्ती सम्राट का स्वर्णयुग


कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | मोतीचूर नामक चक्करभर्ती सम्राट राज्य करता था किसी देश में | वह बहुत ही आधुनिक विचारों का था और नई खोज करने के लिए विश्वभ्रमण करता रहता था | उसका राजकाज उसके मंत्री और उनके परममित्र धन्नासेठ चलाया करते थे | राजा का बस एक ही शौक था, देशविदेश घूमना, महंगे कपड़े पहनना | एक दिन जब राजा स्वदेश लौटा विश्वभ्रमण से तो दरबारियों ने सोचा कि राजा को विदेशी नजर लग गयी होगी, इसलिए अखण्ड रामायण पाठ रखवाया जाए | पंडितजी आयेंगे तो भविष्य भी बता देंगे और राजा भी तब तक देश में ही रुके रहेंगे |

06 अगस्त 2016

अरी निर्लज्ज अपनी बेटी को सम्भाल नहीं सकती तो पैदा क्यों किया ?

कई हज़ार साल पुरानी बात है एक महान देश के महान सम्राट का महान दरबार लगा हुआ था | पूरे देश के महान लोग वहाँ मंत्रणा कर रहे थे | विषय बहुत ही गंभीर था, एक मौलवी ने एक हिन्दू लड़की का बलात्कार करके उसका धर्म परिवर्तन कर दिया था और सभी हिन्दू चाहते थे कि मुस्लिमों के विरुद्ध जंग छेड़ दिया जाए और चुन चुन कर मुस्लिमों का कत्ले आम किया जाए ताकि देश में एक भी मुस्लिम न बच पायें |

सम्राट ने सभी से सारी रिपोर्ट देखी और देश के श्रेष्ठ विलायती डॉक्टरों व विशेषज्ञों से समझा | यह सब चल ही रहा था कि एक औरत खून से लतपथ अपनी छः साल की बेटी को लेकर उपस्थित हुई |

04 फ़रवरी 2016

अगर अहंकार कुशल हो, तो फूटी कौड़ी पर भी साम्राज्य खड़े कर सकता है

सुना है मैंने कि अकबर यमुना के दर्शन के लिए आया था।
यमुना के तट पर जो आदमी उसे दर्शन कराने ले गया था, वह उस तट का बड़ा पुजारी, पुरोहित था। निश्चित ही, गांव के लोगों में सभी को प्रतिस्पर्धा थी कि कौन अकबर को यमुना के तीर्थ का दर्शन कराए। जो भी कराएगा, न मालूम अकबर कितना पुरस्कार उसे देगा! जो आदमी चुना गया, वह धन्यभागी था। और सारे लोगर् ईष्या से भर गए थे। भारी भीड़ इकट्ठी हो गई थी।

अकबर जब दर्शन कर चुका और सारी बात समझ चुका, तो उसने सड़क पर पड़ी हुई एक फूटी कौड़ी उठा कर पुरस्कार दिया उस ब्राह्मण को, जिसने यह सब दर्शन कराया था। उस ब्राह्मण ने सिर से लगाया, मुट्ठी बंद कर ली। कोई देख नहीं पाया। अकबर ने जाना कि फूटी कौड़ी है और उस ब्राह्मण ने जाना कि फूटी कौड़ी है। उसने मुट्ठी बंद कर ली, सिर झुका कर नमस्कार किया, धन्यवाद दिया, आशीर्वाद दिया।

सारे गांव में मुसीबत हो गई कि पता नहीं, अकबर क्या भेंट कर गया है। जरूर कोई बहुत बड़ी चीज भेंट कर गया है। और जो भी उस ब्राह्मण से पूछने लगा, उसने कहा कि अकबर ऐसी चीज भेंट कर गया है कि जन्मों-जन्मों तक मेरे घर के लोग खर्च करें, तो भी खर्च न कर पाएंगे।

फूटी कौड़ी को खर्च किया भी नहीं जा सकता। खबर उड़ते-उड़ते अकबर के महल तक पहुंच गई। और अकबर से जाकर लोगों ने कहा कि आपने क्या भेंट दी है? दरबारी भीर् ईष्या से भर गए। क्योंकि ब्राह्मण कहता है कि जन्मों-जन्मों तक अब कोई जरूरत ही नहीं है; यह खर्च हो ही नहीं सकती। जो अकबर दे गया है, वह ऐसी चीज दे गया है, जो खर्च हो नहीं सकती।

अकबर भी बेचैन हुआ। क्योंकि वह तो जानता था कि फूटी कौड़ी उठा कर दी है। उसको भी शक पकड़ने लगा कि कुछ गड़बड़ तो नहीं है। उस फूटी कौड़ी में कुछ छिपा तो नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैंने सड़क से उठा कर दे दी; उसके भीतर कुछ हो! बेचैनी अकबर को भी सताने लगी। एक दिन उसकी रात की नींद भी खराब हो गई। क्योंकि सभी दरबारी एक ही बात में उत्सुक थे कि उस आदमी को दिया क्या है? उसकी पत्नियां भी आतुर हो गईं कि ऐसी चीज हमें भी तुमने कभी नहीं दी है। उस ब्राह्मण को तुमने दिया क्या है?

वह ब्राह्मण निश्चित ही कुशल आदमी था। आखिर अकबर को उस ब्राह्मण को बुलाना पड़ा।

वह ब्राह्मण बड़े आनंद से आया। उसने कहा कि धन्य मेरे भाग्य, ऐसी चीज आपने दे दी है कि कभी खर्च होना असंभव है। जन्मों-जन्मों तक हम खर्च करें, तो भी खर्च नहीं होगी। अकबर ने कहा कि मेरे साथ जरा अकेले में चल, भीतर चल! अकबर ने पूछा, बात क्या है? उसने कहा, बात कुछ भी नहीं है। आपकी बड़ी अनुकंपा है! अकबर कोशिश करने लगा तरकीब से निकालने की; लेकिन उस ब्राह्मण से निकालना मुश्किल था जो आधी कौड़ी पर इतना उपद्रव मचा दिया था। वह कहता कि आपकी अनुकंपा है, धन्य हमारे भाग्य! सम्राट बहुत हुए होंगे, लेकिन ऐसा दान कभी किसी ने नहीं दिया है। और ब्राह्मण भी बहुत हुए दान लेने वाले, लेकिन जो मेरे हाथ में आया है, वह कभी किसी ब्राह्मण के हाथ में नहीं आया होगा। यह तो घटना ऐतिहासिक है।

आखिर अकबर ने कहा, हाथ जोड़ता हूं तेरे, अब तू सच-सच बता दे, बात क्या है? तुझे मिला क्या है? मैंने तुझे फूटी कौड़ी दी थी! उस ब्राह्मण ने कहा, अगर अहंकार कुशल हो, तो फूटी कौड़ी पर भी साम्राज्य खड़े कर सकता है। हमने फूटी कौड़ी पर ही साम्राज्य खड़ा कर लिया। तुम्हारे मन में तकर् ईष्या पैदा हो गई कि पता नहीं, क्या मिल गया है! और तुम भलीभांति जानते हो कि फूटी कौड़ी ही थी।

अहंकार कुशल है। हो ऐसा नहीं; है ही। और अहंकार फूटी कौड़ी पर भी साम्राज्य खड़े कर लेता है। हम सबके पास अहंकार के नाम पर कुछ भी नहीं है; फूटी कौड़ी भी शायद नहीं है। पर साम्राज्य हम खड़ा कर लेते हैं।

~ओशो, ताओ उपनिषद

31 दिसंबर 2015

मैंने तुझे दुनिया में भेजा था कि तू मुझे लोगों से जोड़ना, तूने तो तोड़ना शुरू कर दिया !


मोज़िज़ एक जंगल से गुजरते हैं और एक आदमी को प्रार्थना करते देखते हैं। एक गड़रिया गरीब आदमी, फटे चीथड़े पहने हुए भगवान से प्रार्थना कर रहा है। महीनों से नहाया नहीं होगा, ऐसी दुर्गंध आ रही है। अब भेड़ों के पास रहना हो तो नहा-धोकर रह भी नहीं सकते। दुर्गंध का अभ्यास करना होता है। बड़ी दुर्गध आ रही हैं। उस आदमी से–भेड़ की दुर्गंध आ रही है। चारों तरफ भेड़ें मिमिया रही हैं। और वह बैठा वहीं प्रार्थना कर रहा है। वह क्या कह रहा है, वह भी बड़े मजे की बात है। मोज़िज़ ने खड़े होकर सुना। वह बहुत हैरान हुए। उन्होंने बहुत प्रार्थना करनेवाले देखे थे, ऐसा आदमी नहीं देखा। वह भगवान से कह रहा है कि “हे भगवान, तू एक दफे मुझे बुला ले। ऐसी तेरी सेवा करूंगा कि तू भी खुश हो जाएगा। पांव दबाने में मेरा कोई सानी नहीं। पैर तो मैं ऐसे दबाता हूं कि तेरा भी दिल बाग-बाग हो जाए। और तुझे घिस-घिसकर नहलाऊंगा और तेरे सिर में जुएं पड़ गए होंगे तो उनकी भी सफाई कर दूंगा।’ अब उसके बेचारे के सिर में पड़े होंगे, तो स्वभावतः आदमी अपनी ही धारणा से भगवान को सोचेगा। “तेरे जुएं पड़ गए होंगे, वे भी बीन दूंगा। पिस्सू इत्यादि तेरे शरीर पर चढ़ जाते होंगे, पता नहीं कोई फिक्र तेरी करता है कि नहीं करता. . .।

मोज़िज़ के लिए तो बरदाश्त के बाहर हो गया कि यह आदमी क्या कह रहा है ! और कहा कि मैं रोटी भी अच्छी बनाता हूं, शाक-सब्जी भी अच्छी बनाता हूं। रोज भोजन भी बना दूंगा। थका-मांदा आएगा, पैर भी दाब दूंगा, नहला भी दूंगा। तू एक दफा मुझे मौका तो दे।

मोज़िज़ के बरदाश्त के बाहर हो गया, जब उसने कहा कि जुएं तेरे बीन दूंगा और तेरे शरीर पर गंदगी जम गयी होगी, घिस-घिस कर साफ कर दूंगा और पिस्सू इत्यादि पड़ ही जाते हैं, पता नहीं कोई तेरी वहां फिक्र करता है कि नहीं. . .। मोज़िज़ ने कहा :”चुप ! चुप ! शैतान ! तू क्या बातें कर रहा है? तू किससे बातें कर रहा है? भगवान से?

और उस आदमी की आंख से आंसू बहने लगे। वह आदमी तो डर गया। उससे कहा कि मुझे क्षमा करें। कोई गलत बात कही?

मोज़िज़ ने कहाः गलती बात ! और क्या गलती हो सकती है–भगवान को जुएं पड़ गए, पिस्सू हो गए ! उसका कोई पैर दबानेवाला नहीं ! उसका कोई भोजन बनानेवाला नहीं ! तू भोजन बनाएगा? और तू उसे घिस-घिसकर धोएगा? तूने बात क्या समझी है? भगवान कोई गड़रिया है?

वह गड़रिया रोने लगा। उसने मोज़िज़ के पैर पकड़ लिए। उसने कहाः मुझे क्षमा करो ! मुझे क्या पता, मैं तो बेपढ़ा-लिखा गंवार हूं। शास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है, अक्षर सीखा नहीं कभी, यहीं पहाड़ पर इसी जंगल में भेड़ों के साथ ही रहा हू, भेड़िया हूं, मुझे क्षमा कर दो ! अब कभी ऐसी भूल न करूंगा। मगर मुझे ठीक-ठीक प्रार्थना समझा दो।

तो मोज़िज़ ने उसे ठीक-ठीक प्रार्थना समझायी। वह आदमी कहने लगा : यह तो बहुत कठिन है। यह तो मैं भूल ही जाउंगा। यह तो मैं याद ही न रख सकूंगा। फिर से दोहरा दो।

फिर से मोज़िज़ ने दोहरा दी। वे बड़े प्रसन्न हो रहे थे मन में कि एक आदमी को राह पर ले आए–भटके हुए को। वह आदमी फिर बोला कि एक दफा और दोहरा दो। वह भी दोहरा दी। और फिर जब मोज़िज़ जंगल की तरफ अपने रास्ते पर जाने लगे, बड़े प्रसन्न भाव से, तो उन्होंने बड़े जोर की आवाज में गर्जना सुनी आकाश में और भगवान की आवाज आयी कि मोज़िज़, मैंने तुझे दुनिया में भेजा था कि तू मुझे लोगों से जोड़ना, तूने तो तोड़ना शुरू कर दिया !

अभी गड़रिए की घबड़ाने की बात थी, अब मोज़िज़ घबड़ाकर बैठ गया, हाथ-पैर कांपने लगे। उन्होंने कहाः क्या कह रहे हैं आप, मैंने तोड़ दिया ! मैंने उसे ठीक-ठीक प्रार्थना समझायी।

परमात्मा ने कहाः ठीक-ठीक प्रार्थना का क्या अर्थ होता है? ठीक शब्द? ठीक उच्चारण? ठीक भाषा? ठीक प्रार्थना का अर्थ होता हैः हार्दिक। वह आदमी अब कभी ठीक प्रार्थना न कर पाएगा। तूने उसके लिए सदा के लिए तोड़ दिया उसकी प्रार्थना से मैं बड़ा खुश था। वह आदमी बड़ा सच्चा था। वह आदमी बड़े हृदय से ये बातें कहता था और रोज कहता था। मैं उसकी प्रतीक्षा करता था रोज कि कब गड़रिया प्रार्थना करेगा। ऐसे तो तेरे जैसे बहुत लोग प्रार्थना करते हैं। उनकी प्रार्थना की मैं प्रतीक्षा नहीं करता। वे तो बंधी-बंधायी, पिटी-पिटायी बातें हैं। वे रोज वही-वही कहते रहते हैं। यह आदमी हृदय से कहता था। यह आदमी ऐसे कहता था जैसा प्रेमी कहता है। और फिर बेचारा गड़रिया है, तो गड़रिए की भाषा बोलता है। तू वापिस जा, उससे क्षमा मांग। उसके पैर छू, और उसे राजी कर कि वह जैसा करता था वैसा ही करे। तेरी प्रार्थना वापिस ले।

यह यहूदी कथा बड़ी प्यारी है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे शब्द क्या हैं। इससे ही फर्क पड़ता है कि तुम क्या हो। तुम्हारे आंसू सम्मिलित होने चाहिए तुम्हारे शब्दों में। जब तुम्हारे शब्द तुम्हारे आंसुओं से गीले होते हैं, तब उनमें हजार-हजार फूल खिल जाते हैं।

❇ अजहूं चेत गंवार, प्रवचन # १३, ओशो❇

01 नवंबर 2015

‘गुरु करता क्या है? आखिर गुरु का कृत्य क्या है?’

एक गुरु ने अपने शिष्य को तुलाधर वैश्य के पास ज्ञान लेने भेजा। शिष्य ने कहां, ‘आप ब्राह्मण हैं। आप महापण्डित हैं और एक बनिये के पास मुझे भेज रहे हैं ज्ञान लेने?’

तो उसके गुरु ने कहां, ‘ज्ञान न तो ब्राह्मण को देखता है, न वैश्य को देखता है, न क्षत्रिय को देखता है : जिसकी पात्रता होती है, उसका पात्र अमृत से भर जाता है। तो तू तुलाधर के पास जा।’

जाना पड़ा; गुरु ने कहां था शिष्य को। तो तुलाधर के पास बैठा। उसे कुछ समझ में न आया कि क्या इस आदमी में…! तुलाधर उसका नाम ही हो गया था कि दिनभर वह तराजू लेकर तौलता रहता, तौलता रहता! उसने पूछा कि ‘तुम्हारा राज क्या है?’

उसने कहां कि ‘मैं डांडी नहीं मारता। इतना ही मेरा राज है। चोर नहीं हूं। समभाव से तौलता हूं—समता, समत्व, सम्यतुल्‍य। मेरे तराजू को देखो, और मुझे पहचान लो। जैसा मेरा तराजू सधा हुआ होता है; जैसे मेरे तराजू का काटा ठीक मध्य में खड़ा हुआ है, ऐसा मैं भी मध्य में खड़ा हूं। न मेरा तराजू धोखा दे रहा है, न मैं धोखा दे रहा हूं। धोखा छोड़ दिया। पाखण्ड छोड़ दिया। जैसा हूं वैसा हूं। बस, जिस दिन से जैसा हूं वैसा ही रह गया हूं उसी दिन से न मालूम कहां—कहां से लोग आने लगे पूछने—सत्य का राजू!’ शूद्रों में भी हुए। सेना नाई हुआ। नाई था, लेकिन ऋषि तो कहना ही होगा उसे। रैदास चमार हुआ। चमार था, लेकिन ऋषि तो कहना ही होगा उसे। गोरा कुम्हार हुआ। उसके पास हजारों लोग दूर—दूर से आते थे पूछने जीवन का सत्य। और कुम्हार था, तो कुम्हार की भाषा में बोलता था। किसी ने पूछा कि ‘गुरु करता क्या है? आखिर गुरु का कृत्य क्या है?’

तो गोरा कुम्हार उस वक्त अपने, कुम्हार के चाक पर घड़े बना रहा था। उसने कहां, ‘गौर से देख। एक हाथ मैं घड़े को भीतर से लगाये हुए हूं और दूसरे हाथ से बाहर से चोटें मार रहा हूं। बस, इतना ही काम गुरु का है। एक हाथ से सम्हालता है शिष्य को, दूसरे हाथ से मारता है शिष्य को। ऐसा भी नहीं मारता कि घडा ही फूट जाये, कि सम्हाल ही न दे! और ऐसा भी नहीं सम्हालता कि घडा बन ही न पाये! इन दोनों के बीच शिष्य निर्मित होता है। गुरु मारता है; जी भरकर मारता है—और सम्हालता भी है। मार ही नहीं डालता। यूं मिटाता भी है—बनाता भी है। यूं मारता भी है, नया जीवन भी देता है।’

कुम्हार है, कुम्हार की भाषा बोला है, लेकिन बात कह दी। और बात इस तरह से कही कि शायद किसी ने कभी नहीं कही थी। मैंने दुनिया के करीब—करीब सारे शास्त्र देखे हैं, लेकिन गुरु के कृत्य को जैसा गोरा कुम्हार ने समझा दिया, यूं सरलता से, यूं बात की बात में—ऐसा किसी ने नहीं समझाया। कि गुरु भीतर से तो सम्हालता है…। भीतर से सम्हालता है और बाहर से मारता है। बाहर से काटता है, छांटता है। बाहर बड़ा कठोर—भीतर बड़ा कोमल! भीतर यूं कि क्या गुलाब की पंखुड़ी में कोमलता होगी! और बाहर यूं कठोर कि क्या तलवारों में धार होगी!

तो जो मिटने और बनने को राजी हो एक साथ, वही शिष्य है। और जो मिटाने और बनाने में कुशल हो, वही गुरु है।

-ओशो ‘जो बोलैं तो हरिकथा’

27 अक्टूबर 2015

सात दिन में तेरे मन में कोई पाप उठा?

एकनाथ के जीवन में ऐसा उल्लेख है। एक युवक एकनाथ के पास आता था। जब भी आता था तो वह बड़ी ऊंची ज्ञान की बातें करता था। एकनाथ को दिखाई पड़ता था, वे ज्ञान की बातें सिर्फ अज्ञान को छिपाने के लिए हैं। एक दिन उसने एकनाथ को पूछा सुबह—सुबह कि एक संदेह मेरे मन में सदा आपके प्रति उठता है। आपका जीवन ऐसा ज्योतिर्मय, ऐसा निष्कलुष, ऐसी कमल की पंखडियों जैसा निर्दोष क्वांरा, लेकिन कभी तो आपके जीवन में भी पाप उठे होंगे? कभी तो अंधेरे ने भी आपको घेरा होगा? कभी आपकी जिंदगी में भी कल्मष घटा होगा? ऐसा तो नहीं हो सकता कि पाप से आप बिलकुल अपरिचित हों! मैं यही पूछना चाहता हूं। आज यही सवाल लेकर आया हूं, ओर चूंकि और कोई मौजूद नहीं है, आज आपको अकेला ही मिल गया हूं, इसलिए निस्संकोच पूछता हूं कि आपके मन में पाप उठता है कभी या नहीं; उठा है। कभी या है नहीं?


एकनाथ ने कहा; यह तो मैं पीछे बताऊं; इससे भी ज्यादा जरूरी बात पहले बतानी है कि कहीं मैं भूल न जाऊं, बातचीत में कहीं अटक न जाऊं, कहीं भूल ही न जाऊं, जरूरी बात चूक न जाए! कल अचानक जब तू जा रहा था तेरे हाथ पर मेरी नजर पड़ी तो मैं दंग रह गया; तेरे उम्र की रेखा समाप्त हो गयी है। सात दिन और जिएगा तू। बस, सातवें दिन सूरज के डूबने के साथ तेरा डूब जाना है। अब तू पूछ क्या पूछता था।

वह युवक तो उठकर खड़ा हो गया। अब कोई पूछने की बात, अब कोई समस्या समाधान, अब कोई जिज्ञासा, अब कोई दार्शनिक मीमांसा…वह तो उठकर खड़ा हो गया, उसने कहा: मुझे कुछ नहीं पूछना है। मुझे घर जाने दो।

एकनाथ ने कहा: बैठो भी, अभी आये, अभी चले, इतनी जल्दी क्या है?

सत्संग होगा चर्चा होगी, तत्व विचार होगा, रोज की ज्ञान की बातें—ब्रह्म, मोक्ष कैवल्य…।

उसने कहा कि छोड़ो भी, आज उनमें मुझे कुछ रस नहीं। वह जवान आदमी एकदम जैसे बूढ़ा हो गया। अभी आया था मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर तो उसके पैरों में बल था, लौटा तो दीवाल का सहारा लेकर उतर रहा था, पैर उसके कंप रहे थे। घर जाकर घर के लोगों को कहा; रोना—धोना शुरू हो गया। पास—पड़ोस के के लोग इकट्ठे हो गये। उस दिन तो घर में फिर चूल्हा ही न जला, पास—पड़ोस के लोगों ने लाकर भोजन करवाया। उसने तो भोजन ही नहीं किया; अब क्या भोजन! वह तो बोला ही नहीं, वह तो आंख बंद करके बिस्तर पर पड़ा रहा। सात दिन में उसकी हालत मरणासन्न जैसी हो गयी। बार—बार सातवें दिन पूछता था—सूरज के डूबने में और कितनी देर है? आवाज भी मुश्किल से निकलती थी। घर में रोआ—गायी मची थी। मेहमान इकट्ठे हो गये थे। दूर—दूर से प्रियजन आ गये थे अंतिम विदा देने।

और सूरज डूबने के ठीक पहले एकनाथ ने द्वार पर दस्तक दी। एकनाथ भीतर आये। एकनाथ उसके पास गये। वह तो आंख बंद किये पड़ा था। हाथ से उसकी आंखें खोलीं और कहा कि एक बात तुझे बताने आया हूं। यह तू क्या कर रहा है, ऐसा क्यों पड़ा है?

उसने कहा: और क्या करू? सूरज डूबने में कितनी देर है? ये सात दिन मैंने इतना नर्क भोगा है जितना कभी नहीं। अब तो ऐसा लगता है मर ही जाऊं तो झंझट कटे।

एकनाथ ने कहा कि मैं तुझे तेरे प्रश्न का उत्तर देने आया हूं। वह तूने मुझसे पूछा था न कि आपके मन में पाप कभी उठता है। मैं पूछने आया हूं तुझसे कि सात दिन में तेरे मन में कोई पाप उठा? उस आदमी ने कहा: कहां की बातें कर रहे हो! कैसा पाप, कैसा पुण्य? सात दिन तो कोई विचार ही नहीं उठा, बस एक ही विचार ही था—मौत,मौत, मौत; एक दिन गया, दो दिन गये, तीन दिन गये, चार दिन गये, यह घड़ी—घड़ी बीती जा रही है, पल—पल चूका जा रहा है। सातवां दिन दूर नहीं है, सूरज के डूबते ही सब जाएगा। मौत थी और भी न था। इन सात दिनों में अंधकार था अमावस का और कुछ भी न था। कहां का पाप, कहां का पुण्य?

एकनाथ ने कहा: तो उठ, अभी तुझे मरना नहीं है। तेरी हाथ की रेखा अभी काफी लंबी है। यह तो मैंने सिर्फ तेरे प्रश्न का उत्तर दिया था। ऐसे ही जिस दिन से मुझे मौत दिखाई पड़ गयी है, पाप नहीं उठा। जिसको मौत दिखाई पड़ जाती है पाप नहीं उठता, एकनाथ ने कहा।

ऐसा उत्तर कोई सद्गुरु ही दे सकता है। मगर ऐसे उत्तर महंगे तो हैं। यह सौदा सस्ता तो नहीं है।

ओशो; गुरू प्रताप साध की संगति

23 अक्टूबर 2015

हाजी


एक मुसलमान फकीर हुआ—हाजी मोहम्मद। साधु पुरुष था। एक रात उसने सपना देखा कि वह मर गया है और एक चौराहे पर खड़ा है, जहां से एक रास्ता स्वर्ग को जाता है, एक नरक को; एक रास्ता पृथ्वी को जाता है, एक मोक्ष को। चौराहे पर एक देवदूत खड़ा है—एक फरिश्ता, और वह हर आदमी को उसके कर्मों के अनुसार रास्ते पर भेज रहा है।

हाजी मोहम्मद तो जरा भी घबडाया नहीं; जीवनभर साधु था। हर दिन की नमाज पांच बार पूरी पढ़ी थी। साठ बार हज की, इसलिए हाजी मोहम्मद उसका नाम हो गया। जाकर द्वार पर खड़ा हो गया देवदूत के सामने।

देवदूत ने कहा, 'हाजी मोहम्मद! ' देवदूत ने इशारा किया, 'नरक की तरफ यह रास्ता है।’

हाजी मोहम्मद ने कहा, ' आप समझे नहीं शायद। कुछ भूल—चूक हो रही है। साठ बार हज किये हैं।’

देवदूत ने कहा, 'वह व्यर्थ गयी; क्योंकि जब भी कोई तुमसे पूछता तो तुम कहते, हाजी मोहम्मद! तुमने उसका काफी फायदा जमीन पर ले लिया। तुम बड़े अकड़ गये उसके कारण। कुछ और किया है?'

हाजी मोहम्मद के पैर थोडे डगमगा गये। जब साठ बार की हज व्यर्थ हो गयी, तो अब आशा टूटने लगी। उसने कहा, 'हाँ, रोज पांच बार की नमाज पूरी—पूरी पढ़ता था।’

उस देवदूत ने कहा, 'वह भी व्यर्थ गयी; क्योंकि जब कोई देखने वाला होता था तो तुम जरा थोड़ी देर तक नमाज पढ़ते थे। जब कोई भी न होता तो तुम जल्दी खत्म कर देते थे। तुम्हारी नजर परमात्मा पर नहीं थी; देखने वालों पर थी। एक बार तुम्हारे घर कुछ लोग बाहर से आये हुए थे, तो तुम बड़ी देर तक नमाज पढ़ते रहे। वह नमाज झूठी थी। ध्यान में परमात्मा न था, वे लोग थे। लोग देख रहे है तो जरा ज्यादा नमाज, ताकि पता चल जाये कि मैं धार्मिक आदमी हूं—हाजी मोहम्मद; वह बेकार गयी; कुछ और किया है?'

अब तो हाजी मोहम्मद घबड़ा गया और घबड़ाहट में उसकी नींद टूट गयी। सपने के साथ जिंदगी बदल गयी। उस दिन से उसने अपने नाम के साथ हाजी बोलना बंद कर दिया। नमाज छिपकर पढ़ने लगा; किसी को पता भी न हो। गांव में खबर भी पहुंच गयी कि हाजी मोहम्मद अब धार्मिक नहीं रहा। कहते हैं कि नमाज तक बंद कर दी है! बुढ़ापे में सठिया गया है। लेकिन उसने इसका कोई खंडन न किया। वह चोरी छिपे नमाज पढ़ता। वह नमाज सार्थक होने लगी। कहते है, मरकर हाजी मोहम्मद स्वर्ग गया।
~ओशो

08 अक्टूबर 2015

धर्म की रक्षा तो करेंगे, लेकिन धर्म मिलेगा कहाँ ?


गुल्लू ढोलकिया अपने दोस्तों के साथ दिन भर आवारा गर्दी करता या गाँव के बाहर कि पुलिया में बैठे गप्पे मारता रहता अपने दोस्तों के साथ | सभी गाँव वाले परेशान थे उनसे और समझा समझा कर थक गये कि कभी स्कूल चले जाया करो या कुछ काम धंधा ही कर लो..... लेकिन उनके कानों में जूँ भी न रेंगती | लेकिन भीतर ही भीतर गुल्लू और उसके दोस्तों को यह भी अहसास होने लगा था कि गाँव में उनकी कोई इज्जत नहीं है और कोई भी अब उनसे सीधे मुँह बात करना भी पसंद नहीं करता |

एक दिन गुल्लू अपने दोस्तों से बोला कि ऐसे जिन्दगी खराब करने से अच्छा है कि सेना में भर्ती हो जाते हैं और देश की सेवा करते हैं | सभी को बात जंच गयी और वे सभी एक दिन चले गये सेना में भर्ती होने के लिए | लेकिन फिटनेस टेस्ट में ही फेल हो गये क्योंकि सभी इतने दुबले पतले थे कि राइफल उनसे अधिक सेहतमंद दिखाई पड़ रही थी | तो निराश होकर उन्हें वापस आना पड़ा |

उन्हें यह अपमान बर्दाश्त भी नहीं हो रहा था तो सभी ने मिलकर तय किया कि हम अपनी ही सेना बनायेंगे और देश की न सही, धर्म की रक्षा करेंगे | बस फिर क्या था, नाम सोचा जाने लगा कि नाम क्या रखा जाये | कई नामों के सुझाव मिले लेकिन गुल्लू को पसंद आया 'सीताराम सेना' | एक दोस्त ने पूछा कि राम-सेना तो ठीक नाम है, श्रीकृष्ण-सेना भी ठीक है, बजरंग-सेना भी ठीक है.... यह सीताराम सेना नाम ही क्यों ? हमारी मंडली में कोई लड़की तो है ही नहीं, और हमारी तरह आवारा लड़की कहाँ से मिलेगी ? गाँव में लड़कियां आवारगर्दी करती नहीं फिरतीं ...हाँ शहर में तो फिर भी मिल सकती हैं |

गुल्लू मुस्कुराकर बोला कि अरे यह नाम लड़की की वजह से नहीं केवल इसलिए कि यह तो सभी की जबान पर रहता है गाँव में | सभी जय सीताराम कहते ही हैं.... हमारा प्रचार मुफ्त में हो जाएगा | सारे दोस्त वाह वाह कर उठे..... तो सीताराम सेना की स्थापना हो गई | वहीँ एक पीपल के पेड़ के नीचे रखे बड़े से पत्थर को उन्होंने अपना मंच बना लिया और उस जगह को अपना मुख्यालय | सबने पेड़ की डाल काटी और डंडे तैयार कर लिए और पेड़ के आसपास परेड करके अपनी सेना का कार्य शुरू किया |

लेकिन अब समस्या फिर खड़ी हुई कि धर्म की रक्षा तो करेंगे, लेकिन धर्म मिलेगा कहाँ ? गाँव के लोगों को कैसे बताएँगे कि धर्म हमारे पास है और हम उसकी रक्षा कर रहे हैं ? एक ने पूछा कि धर्म होता कैसा है अगर कुछ आइडिया दो तो मैं खोजकर ले आऊँ और यहीं पेड़ के पास रख लेते हैं और उसकी पहरे दारी करेंगे बारी बारी से | गुल्लू उनमें सबसे तेज दिमाग का था इसलिए वह उनका नेता भी था | तो सब उसकी ओर देखने लगे | काफी देर तक चिंतन-मनन करने के बाद भी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि धर्म मिलेगा कहाँ | अब कभी कोई धार्मिक ग्रन्थ तो उसने पढ़ी नहीं थी.....तो उसने कहा कि चिंता मत करो हमें केवल कहना है कि हम धर्म की रक्षा कर रहे हैं बस | और आते जाते किसी के भी लट्ठ बजा देना है.... कोई नहीं पूछने आएगा कि धर्म क्या है....और गाँव के जाहिलों ने तो आज तक धर्म कभी देखा ही नहीं तो फिर चिंता की बात ही क्या है ?

तो उस दिन से सीताराम सेना धर्म की रक्षा करती आ रही है और आज तक कर रही है | सारा गाँव उनपर जान छिडकता है और उनकी गुंडागर्दी सहता है, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि सीताराम सेना न होती तो धर्म नाम की चीज भी न होती | आज पूरे विश्व में जो धर्म नाम की चीज है वह सीताराम सेना की वजह से ही है...उन्होंने धर्म को इतनी हिफाजत से पीपल के पेड़ के नीचे छुपा कर रखा हुआ है कि उनके रहते, कोई धर्म को न चुरा सकता है और नहीं नष्ट कर सकता है |

आप सब भी दुआ कीजिये कि धर्म पीपल के पेड़ के नीचे सुरक्षित रहे कभी कोई दीमक आदि न लगे उसपर ! ~विशुद्ध चैतन्य

17 सितंबर 2015

"देखा कितना महान था वह तलवार एक की भी जान नहीं जाने दी !!!"


गुल्लू ढोलकिया को इतिहास में बहुत ही रूचि थी इसलिए वह बचपन से ड्रैगन, डायनासौर आदि के कॉमिक्स पढ़ता रहता था | जब भी कहीं इतिहास से सम्बंधित कोई बात होती वह बहुत ही ध्यान से सुना करता था | उसके घर में एक पुरानी तलवार थी उसका इतिहास भी इतनी पुरानी थी कि बहुत ही मोटा ग्रन्थ बन चुका था अब तक | क्योंकि बचपन से लेकर अब तक जो कुछ उसने सुना था उस तलवार के विषय में गाँव के बुजुर्गों से, वह सब वह लिखता आ रहा था |

अरे तुम क्या जानो क्या हुआ


कई हज़ार साल पुरानी बात है | चुनमुन परदेसी बहुत ही उदास था और बहुत ही गुस्से में भी | लोगों ने कारण पूछा कि क्या हुआ तो वह चिडचिडे अंदाज में बोला, "अरे तुम क्या जानो क्या हुआ, तुम लोग तो नाचो गाओ, ख़ुशी मनाओ...."

सभी चौंक गये कि कुछ ख़ास ही बात हो गयी है | सभी घेर कर बैठ गये जानने के लिए कि आखिर हुआ क्या है | बहुत मान मनुव्वल के बाद चुनमुन इस बात पर राजी हुआ कि गम भुलाने के लिए पहले एक अद्धा मंगवाया जाये तब वह कुछ बोलेगा | आखिर अद्धा मंगवाया गया और चुनमुन दो पैग पीने के बाद बोला, "जानते कुछ इतिहास के बारे में ? फारुक ने जो प्लाट खरीद कर आज से तीस साल पहले मकान बनाया था उस प्लाट में गाय को दफनाया गया था !"

"तो ?" अरे तो इतनी पुरानी बात लेकर क्यों बैठ गये... अभी दुखी क्यों हो वह बताओ ?" सभी बोल पड़े

15 अप्रैल 2015

प्रेम क्या है ?

एक बहुत पुराना वृक्ष था | आकाश में सम्राट की तरह उसके हाथ फैले हुए थे | उस पर फूल और फल आते थे तो दूर-दूर से पक्षी सुगंध लेने आते थे, तितलियाँ मंडराती थीं | उसकी छाया, उसके फैले हाथ हवाओं में, उसका उसका खड़ा रूप आकाश में बड़ा सुन्दर था | एक सुन्दर बच्चा उसकी छाया में रोज खेलने आता था | उस बड़े वृक्ष को उस उस छोटे बच्चे से प्रेम हो गया |

बड़ों को छोटों से प्रेम हो सकता है, अगर बड़ों को पता न हो कि हम बड़े हैं | वृक्ष को कोई पता न था कि मैं बड़ा हूँ | यह पता सिर्फ आदमियों को होता है | इसलिए उसका प्रेम हो गया |

अहंकार हमेशा अपने से बड़ों को प्रेम करने की कोशिश करता है | अहंकार हमेशा अपने से बड़ों से सम्बन्ध जोड़ता है | प्रेम के लिए कोई बड़ा छोटा नहीं | जो आ जाए उसी से सम्बन्ध जुड़ जाता है |

वह एक छोटा सा बच्चा खेलता आता था उस वृक्ष के पास ? उस वृक्ष का उससे प्रेम हो गया | लेकिन वृक्ष की शाखाएं ऊपर थीं और बच्चा छोटा, तो वृक्ष अपनी शाखाएं नीचे झुकाता ताकि वह फल तोड़ सके, फूल तोड़ सके |

02 फ़रवरी 2015

व्यापार या तपस्या


चुन्नुमल घुन्घुनियाँ एक बहुत ही प्रतिष्ठित व्यापारी थे | देश विदेश में उनका व्यापार फैला हुआ था | करोंड़ों का लेन देन चलता था उनका | व्यस्त इतने रहते थे कि आँख खुलते ही काम पर लग जाते और आँख बंद होने तक काम करते रहते थे | चारों ओर जयजयकार था उनका |लेकिन चुन्नुमल खुश नहीं थे | कारण था राजकोष से लिया गया कर्ज जो उतर ही नहीं रहा था | हर दूसरे दिन राजा का कोई आदमी आ जाता था तकाजा करने के लिए | बेचारे जितना अधिक काम करते उतना ही व्यापार बढ़ता लेकिन कर्जा वहीँ का वही रहता | सेठ जी ने कई ज्योतिषी और पंडितों को कुंडली दिखवाई हवन करवाए लेकिन राहत नहीं मिल रही थी |

उधर उनकी धर्म पत्नी अलग मुँह फुलाए रहती थी कि कभी हमारी शक्ल भी देख लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि मैं मर जाऊं और तुम मुझे पहचान भी न पाओ और आग लगा आओ किसी और की चिता को | बच्चों की की शक्ल तो उसे याद ही नहीं थी |

10 जनवरी 2015

वाह रे दुनियावालों थोड़ा अपने गिरेबान में झांको

एक दिन मुल्ला बगदाद की गलियों से गुजर रहे थे। प्रायः वे गधे पर और वह भी उलटे बैठकर सवारी किया करते थे। और कहने की जरूरत नहीं कि उनका यह तरीका ही लोगों को हंसाने के लिए पर्याप्त था। खैर, उस दिन वे बाजार में उतरे और कुछ खजूर खरीदे। फिर बारी आई दुकानदार को मुद्राएं देने की। तो उन्होंने अपने पायजामे की जेब में टटोला, पर मुद्रा वहां नहीं थी। फिर उन्होंने अपने जूते निकाले और जमीन पर बैठ गए। जूतों को चारों ओर टटोलने लगे, परंतु मुद्राएं जूतों में भी नहीं थी। अबतक वहां काफी भीड़ एकत्रित हो गई थी। एक तो मुल्ला की सवारी ही भीड़ इकट्ठी करने को पर्याप्त थी, और अब ऊपर से उनकी चल रही हरकतें भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनती जा रही थी। देखते-ही-देखते पचास के करीब लोग मुल्ला के आसपास एकत्रित हो गए थे।

...यानी माजरा जम चुका था। इधर मुल्ला एक तरफ मुद्राएं ढूंढ़ रहे थे और दूसरी तरफ खरीदे खजूर भी खाए जा रहे थे। निश्चित ही दुकानदार इस बात से थोड़ा टेंशन में आ गया था। एक तो यह व्यक्ति उटपटांग जगह मुद्राएं ढूंढ़ रहा है और ऊपर से खजूर भी खाए जा रहा है। कहीं मुद्राएं न मिली तो क्या इसके पेट से खजूर निकालकर पैसे वसूलूंगा? ...अभी दुकानदार यह सब सोच ही रहा था कि मुल्ला ने सर से टोपी उतारी और फिर उसमें मुद्राएं खोजने लगा। अबकी दुकानदार से नहीं रहा गया, उसने सीधा मुल्ला से कहा- यह मुद्राएं यहां-वहां क्या खोज रहे हो? सीधे-सीधे कुर्ते की जेब में क्यों नहीं देखते?

इस पर मुल्ला बोला- लो, यह पहले क्यों नहीं सुझाया? इतना कहते-कहते मुल्ला ने कुर्ते की जेब में हाथ डाला और मुद्राएं दुकानदार को थमाते हुए बोला- वहां तो थी ही। यह तो ऐसे ही चान्स ले रहा था।

यह सुनते ही पूरी भीड़ हंस पड़ी। भीड़ में से एक बुजुर्ग बोला भी- लगता है कोई पागल है। जब मालूम है कि मुद्रा कुर्ते की जेब में है तो भी यहां-वहां ढूंढ़ रहा है।

अब मुल्ला की बारी आ गई थी। जो बात कहने हेतु उन्होंने इतना सारा नाटक किया था, वह कहने का वक्त आ गया था। सो उन्होंने बड़ी गंभीरतापूर्वक सबको संबोधते हुए कहा- पागल मैं, जो मुद्राएं जहां रखी है वहां नहीं खोज रहा हूँ। वाह रे दुनियावालों थोड़ा अपने गिरेबान में झांको। यह जानते हुए भी कि रब दिल में बसा हुआ है तुम लोग उसे मस्जिदों में खोजते फिर रहे हो। यदि मैं पागल हूँ तो तुम लोग महा-पागल हो। क्योंकि मैं तो मामूली बात पर यह मूर्खता कर रहा था, तुमलोग तो विश्व के सबसे अहम सत्य के मामले में यह मूर्खता कर रहे हो।

18 दिसंबर 2014

ए फॉर एप्पल

तो गुल्लू की प्रिंटिंग प्रेस की दूकान शुरू हो गयी धूम-धाम से | दूर दूर से लोग आने लगे गुल्लू के पास डिग्री बनवाने और गुल्लू की डिग्री की विशेषता थी कि वह इतनी आकर्षक होती थी कि लोग देखते रह जाते थे | जिस लड़के या लड़की कि शादी मंगल दोष के कारण न हो पा रही हो, उसकी भी शादी गुल्लू की डिग्री मिलते ही हो जाती थी | इसलिए उसकी दूकान के सामने इतनी लम्बी लाइन लगी होती थी कि लोग चार पाँच दिन का खाना बंधवाकर और एक चारपाई साथ में रखकर ही लाइन में लगते थे |

एक दिन गुल्लू को पता चला कि दूर किसी गाँव में एक बुजुर्ग हैं, जो अभी भी स्कूल जाते हैं और ए फॉर एप्पल, बी फॉर बुक नामक भजन रोज गाते हैं | पूरे गाँव में उसका बहुत ही सम्मान है और लोग कोई भी शादी-व्याह या धार्मिक त्यौहार में उनको बुलाना नहीं भूलते | कहते हैं कि वे जिस जोड़े के सर पर हाथ रख देते हैं, उनकी शादी फिर कभी नहीं टूटती | बस उनके पास कोई डिग्री नहीं है | बचपन में उनके पिताजी जब उसका दाखिला करवाया था, तब पहली बार जिस जगह उसे बैठाया था, वहीं आज भी बैठते हैं | न जाने तब से लेकर आज तक कितने शिक्षक आये और चले गये, बच्चों ने बड़े बड़े स्कूल कॉलेज पढ़कर भी छोड़ दिया लेकिन वे वहीँ के वहीँ हैं | बस गाँव के लोग चाहते हैं कि एक डिग्री उनको भी मिल जाए तो वे भी थोड़ा आराम कर लें पढाई-लिखाई से | गुल्लू को लगा कि उसे उनसे मिलना चाहिए आखिर वे अंग्रेजी में अटक कहाँ गए | और इतने सालों में वे आगे क्यों नहीं बढ़े ?

14 दिसंबर 2014

अचकन

मुल्ला नसीरुद्दीन के दोस्त जमाल बहुत दिनों बाद उनसे मिलने पहुंचे। दोस्त से मिलकर मुल्ला बहुत खुश हुए। उन्होंने जमाल से कहा, चलो, बाहर घूम आते हैं। जमाल ने कहा, नहीं, मेरे कपड़े अच्छे नहीं हैं। ऐसे में बाहर जाकर लोगों से मिलना नहीं चाहता।

मुल्ला- बस, इतनी-सी बात है! मेरे पास एक बहुत अच्छी अचकन है। वह तुम पर बहुत फबेगी। तुम वही पहन लो।

जमाल- अरे नहीं, ऐसे ही ठीक है।

मुल्ला- नहीं, तुम मेरे दोस्त हो। तुम्हें पहननी होगी।

22 नवंबर 2014

गुड़िया

एक लेखक ने क्या खूब लिखा है  एक दुकान में
खरीददारी कर रहा था,
तभी मैंने उस दुकान के कैशियर को एक 5-6
साल की लड़की से
बात करते हुए देखा |

कैशियर बोला :~
"माफ़ करना बेटी,
लेकिन इस गुड़िया को
खरीदने के लिए
तुम्हारे पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं|"

फिर उस छोटी सी
लड़की ने मेरी ओर
मुड़ कर मुझसे पूछा:~

"अंकल,
क्या आपको भी यही लगता है
कि मेरे पास पूरे पैसे नहीं हैं?''

मैंने उसके पैसे गिने
और उससे कहा:~
"हाँ बेटे,
यह सच है कि तुम्हारे पास
इस गुड़िया को खरीदने के लिए पूरे पैसे
नहीं हैं"|

वह नन्ही सी लड़की
अभी भी अपने
हाथों में गुड़िया थामे हुए खड़ी थी |
मुझसे रहा नहीं गया |
इसके बाद मैंने उसके पास जाकर उससे
पूछा कि यह गुड़िया वह किसे
देना चाहती है?

इस पर उसने
उत्तर दिया कि यह
वो गुड़िया है,
जो उसकी बहन को
बहुत प्यारी है |
और वह इसे,
उसके जन्मदिन के लिए उपहार
में देना चाहती है |

बच्ची ने कहा यह गुड़िया पहले मुझे
मेरी मम्मी को देना है,
जो कि बाद में मम्मी
जाकर मेरी बहन को दे देंगी"|

यह कहते-कहते
उसकी आँखें नम हो आईं थी
मेरी बहन भगवान के घर गयी है...

और मेरे पापा कहते हैं
कि मेरी मम्मी भी जल्दी-ही भगवान से
मिलने जाने वाली हैं|
तो, मैंने सोचा कि
क्यों ना वो इस
गुड़िया को अपने साथ ले जाकर, मेरी बहन
को दे दें...|"

मेरा दिल धक्क-सा रह गया था |

उसने ये सारी बातें
एक साँस में ही कह डालीं
और फिर मेरी ओर देखकर बोली -
"मैंने पापा से कह दिया है कि मम्मी से
कहना कि वो अभी ना जाएँ|

वो मेरा,
दुकान से लौटने तक का
इंतजार
करें|

फिर उसने मुझे एक बहुत प्यारा-
सा फोटो दिखाया जिसमें वह
खिलखिला कर हँस
रही थी |

इसके बाद उसने मुझसे कहा:~
"मैं चाहती हूँ कि मेरी मम्मी,
मेरी यह
फोटो भी अपने साथ ले जायें,
ताकि मेरी बहन मुझे भूल नहीं पाए|
मैं अपनी मम्मी से बहुत प्यार करती हूँ और
मुझे नहीं लगता कि वो मुझे ऐसे छोड़ने के
लिए राजी होंगी,
पर पापा कहते हैं कि
मम्मी को मेरी छोटी
बहन के साथ रहने के
लिए जाना ही पड़ेगा क्योंकि वो बहुत छोटी है, मुझसे भी छोटी है | उसने धीमी आवाज मैं बोला।

इसके बाद फिर से उसने उस
गुड़िया को ग़मगीन आँखों-से खामोशी-से
देखा|

मेरे हाथ जल्दी से
अपने बटुए ( पर्स ) तक
पहुँचे और मैंने उससे कहा:~

"चलो एक बार
और गिनती करके देखते हैं
कि तुम्हारे पास गुड़िया के
लिए पर्याप्त पैसे हैं या नहीं?''

उसने कहा-:"ठीक है|
पर मुझे लगता है
शायद मेरे पास पूरे पैसे हैं"|

इसके बाद मैंने
उससे नजरें बचाकर
कुछ पैसे
उसमें जोड़ दिए और
फिर हमने उन्हें
गिनना शुरू किया |

ये पैसे उसकी
गुड़िया के लिए काफी थे
यही नहीं,
कुछ पैसे अतिरिक्त
बच भी गए
थेl |

नन्ही-सी लड़की ने कहा:~
"भगवान्
का लाख-लाख शुक्र है
मुझे इतने सारे पैसे
देने के लिए!

फिर उसने
मेरी ओर देख कर
कहा कि मैंने कल
रात सोने से पहले भगवान् से
प्रार्थना की थी कि मुझे इस
गुड़िया को खरीदने के
लिए पैसे दे देना,
ताकि मम्मी इसे
मेरी बहन को दे सकें |
और भगवान् ने मेरी बात सुन ली|

इसके अलावा
मुझे मम्मी के लिए
एक सफ़ेद गुलाब
खरीदने के लिए भी पैसे चाहिए थे, पर मैं भगवान से
इतने ज्यादा पैसे मांगने
की हिम्मत नहीं कर पायी थी
पर भगवान् ने तो
मुझे इतने पैसे दे दिए हैं
कि अब मैं गुड़िया के साथ-साथ एक सफ़ेद
गुलाब भी खरीद सकती हूँ !
मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत पसंद हैं|

"फिर हम वहा से निकल गए |
मैं अपने दिमाग से उस छोटी-
सी लड़की को
निकाल नहीं पा रहा था |

फिर,मुझे दो दिन पहले
स्थानीय समाचार
पत्र में छपी एक
घटना याद आ गयी
जिसमें
एक शराबी
ट्रक ड्राईवर के बारे में
लिखा था|

जिसने नशे की हालत में
मोबाईल फोन पर
बात करते हुए एक कार-चालक
महिला की कार को
टक्कर मार दी थी,
जिसमें उसकी 3 साल
की बेटी की
घटनास्थल पर ही
मृत्यु
हो गयी थी
और वह महिला कोमा में
चली गयी थी|
अब एक महत्वपूर्ण निर्णय उस परिवार
को ये लेना था कि,
उस महिला को जीवन
रक्षक मशीन पर बनाए रखना है
अथवा नहीं?
क्योंकि वह कोमा से बाहर
आकर,
स्वस्थ हो सकने की
अवस्था में
नहीं थी | दोनों पैर , एक हाथ,आधा चेहरा कट चुका था । आॅखें जा चुकी थी ।

"क्या वह परिवार इसी छोटी-
लड़की का ही था?"

मेरा मन रोम-रोम काँप उठा |
मेरी उस नन्ही लड़की
के साथ हुई मुलाक़ात के 2 दिनों बाद मैंने अखबार में
पढ़ा कि उस
महिला को बचाया नहीं जा सका,

मैं अपने आप को
रोक नहीं सका और अखबार
में दिए पते पर जा पहुँचा,
जहाँ उस महिला को
अंतिम दर्शन के लिए
रखा गया था
वह महिला श्वेत धवल
कपड़ों में थी-
अपने हाथ में
एक सफ़ेद गुलाब
और उस छोटी-सी लड़की का वही हॅसता हुआ
फोटो लिए हुए और उसके सीने पर रखी हुई
थी -
वही गुड़िया |
मेरी आँखे नम हो गयी । दुकान में मिली बच्ची और सामने मृत ये महिला से मेरा तो कोई वास्ता नही था लेकिन हूं तो इंसान ही ।ये सब देखने के बाद अपने आप को सभांलना एक बडी चुनौती थी
मैं नम आँखें लेकर वहाँ से लौटा|

उस नन्ही-सी लड़की का
अपनी माँ और
उसकी बहन के लिए
जो बेपनाह अगाध प्यार था,
वह शब्दों में
बयान करना मुश्किल है |

और ऐसे में,
एक शराबी चालक ने
अपनी घोर
लापरवाही से क्षण-भर में
उस लड़की से
उसका सब कुछ
छीन लिया था....!!!

ये दुख रोज कितने परिवारों की सच्चाइ बनता है मुझे पता नहीं!!!!  शायद ये मार्मिक घटना
सिर्फ
एक पैग़ाम
देना चाहती है कि:::::::::::::

कृपया~~~

कभी भी शराब
पीकर और
मोबाइल पर बात
करते समय
वाहन ना चलायें
क्यूँकि आपका आनन्द
किसी के लिए
श्राप साबित हो सकता हैँ।

इस पोस्ट को
पढ़कर यदि आप
'भावुक' हुऐ
हों तो किसी भी एक व्यक्ति को शेयर'
जरूर करें .........!!

16 नवंबर 2014

मानव जीवन का उद्देश्य

कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | मैं, मेरी तन्हाई और दारु की मटकी भटकते हुए एक संत-सम्मलेन में पहुँच गये | वहाँ दुनिया भर से संत-महंत और धर्मों के ठेकेदार आये हुए थे | लाखों धार्मिक भी वहाँ पर एकत्रित थे | विषय था, 'मानव जीवन का उद्देश्य' |

मैंने दो घूँट लगाए और वहीँ एक पेड़ के नीचे लुढ़क गया | सोचा कि जीवन में कभी कोई पुन्य तो किया नहीं, आज इतने महान आत्माएं एकत्रित हुईं हैं तो इनके कुछ अमृत-वचन सुन लूँगा तो शायद कुछ पुण्य प्राप्त हो जाए |

सभी विद्वान् अपने अपने विचार रख रहे थे और धार्मिक लोग भाव-विभोर हो रहे थे | कोई गीता के श्लोक सुना रहा था तो कोई रामायण के, कोई क़ुरान की आयतें सुना रहा था तो कोई बाइबल के अंश | शाम तक वहीँ बैठा रहा मैं और मुझे यह जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि सभी धर्म तो एक ही बात कहते हैं, बस कहने का ढंग अलग अलग है | सभी ईश्वर से प्रेम करना ही सिखाते हैं, सभी समर्पण करने के लिए ही कहते हैं और सभी मोह-माया के विरुद्ध ही हैं | सभी नशे को गलत बताते हैं, सभी हिंसा के विरोध में हैं..... कुल मिलाकर भीतर कोई भेद नहीं है | केवल मानव से प्रेम करना पाप है, केवल सुख की अभिलाषा करना पाप है....जो कुछ पाना है वह मरने के बाद ही पाना | जो कुछ भी मिलेगा वह स्वर्ग, जन्नत और हेवन में ही मिलेगा | हूरें, अप्सराएँ, परी सभी कुछ.... लेकिन जीते जी नहीं, क्योंकि जीते जी इनकी कामना करना पाप है |

सभा के अंत में मंच में बैठे संतों में से एक की नजर मुझपर पड़ी और मुझे बुलाया; "आपको शर्म नहीं आती इतने बड़े धार्मिक अनुष्ठान में आकर भी नहीं सुधरे ? यहीं बैठ कर शराब पी रहे हो ?" उन्होंने मुझे बड़े प्यार से कहा |

"जी मैं तो सांसारिक व्यक्ति हूँ, आप लोगों की तरह महान आत्मा तो हूँ नहीं, इसलिए शर्म आदि से मेरा कभी परिचय हुआ नहीं | सोचा था कि आप लोगों की अमृतवाणी से कोई लाभ हो जाएगा...." मैंने भोलेपन से उत्तर दिया और दो घूँट लगा लिया | "वैसे आप सभी की बातें सुनने के बाद यही समझ में आया कि मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर की अराधना करना और उनका नाम जपते रहना मात्र ही है | हमें केवल ईश्वर को पाने का प्रयत्न करना चाहिए... है न ?" मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा |

"बिलकुल बिलकुल ऐसा ही है | वाह तुमने कुछ तो सीखा कम से कम !" वे खुश होते हुए बोले |

"यदि ईश्वर को केवल अपने भक्ति ही करवानी होती, जयकारे ही लगवाने होते, तो वे हमें दुनिया में भेजते ही क्यों ? क्या उनके पास जगह की कमी थी जो उन्होंने हमें पृथ्वी पर भेजा ? क्या उनके पास घंटे, घड़ियाल आदि नहीं थे ? क्या मानव को मानव का सहयोगी होना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए ?" मैंने कई प्रश्न कर दिए उनसे |

वे आँखे बड़ी बड़ी करके देखने लगे और बोले, "इस बेवड़े को उठाकर बाहर फेंक दो क्योंकि इस पापी को धर्म की बातें समझ में कभी नहीं आ सकती |" और मुझे उठाकर धार्मिकों की दुनिया से बाहर फेंक दिया गया | तब से आज तक फिर कभी धार्मिक नहीं हो पाया | -विशुद्ध चैतन्य

08 अप्रैल 2014

सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन परास्त नहीं !



कई हज़ार साल पहले की बात है | दरोगा सिंह नाम का एक महान योद्धा एक गाँव में रहता था | उसने कई लड़ाइयाँ लड़ीं थी और किसी भी लड़ाई में उसे खरोंच तक नहीं आयी थी इसलिए हर कोई उसकी युद्ध कौशल की चर्चा करता था | उसने अपने आईफ़ोन से युद्ध क्षेत्र में संघर्ष करते हुए कई फोटो खींच रखी थी और उनमें से कई को फ्रेम करवा कर दीवारों पर भी लगा रखी थी | वे उस गाँव की शान हुआ करते थे | वे हमेशा कहा करते थे कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन परास्त नहीं |

एक दिन दूर किसी राज्य से एक योद्धा जंग बहादुर आ गया दरोगा सिंह को चुनौती देने | दूर दूर तक के गाँवों में मुनादी करवा दी गयी कि सभी लोग दरोगा सिंह और जंग बहादुर की ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा देखने के लिए उपस्थित हों | 

निश्चित तिथि को सभी एक बड़े मैदान में उपस्थित हुए और दोनों योद्धा भी पहुँच गए | लेकिन जब दरोगा सिंह और जंग बहादुर आमने सामने आये तो सभी आश्चर्य चकित रह गये | क्योंकि दरोगा सिंह खाली हाथ थे और उनकी ऐतिहासिक तलवार भी उनके हाथ में नहीं थी | सभी बोले कि बिना तलवार के सामना कैसे करेंगे दरोगा सिंह जी ? लेकिन दरोगा सिंह मुस्कुराते रहे और बोले मैंने अपनी तलवार सुरक्षित रखी हुई है और सत्य केवल परेशान हो सकता है, परास्त नहीं | इसलिए जीत तो मेरी ही होगी |

प्रतिस्पर्धा आरंभ करने का शंख नाद हुआ और दोनों योद्धा एक दूसरे के ओर बढ़ने लगे | जंग बहादुर के हाथ में तलवार थी जिसे लिए वह दरोगा सिंह की ओर बढ़ा | दरोगा सिंह बोले, “तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते | क्योंकि मेरे पास तुम्हारी तलवार से भी
मजबूत तलवार है | मेरे पास कई प्रमाणपत्र हैं वीरता के....”

अभी दरोगा सिंह यही सब गिना रहे था कि जंग बहादुर ने उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी | --विशुद्ध चैतन्य  

"कथा सार: सत्य हमेशा जीतता है, यदि सत्य की सार्थकता तथा कब और कहाँ प्रयोग करना है का ज्ञान हो !"

26 मार्च 2014

एकाएक आंसूओं की धारा बहने लगी

रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले लड़के की नजरें अचानक एक बुजुर्ग दंपति पर पड़ी। उसने देखा कि वो बुजुर्गपति अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर उसे सहारा देते हुए चल रहा था। थोड़ी दूर जाकर वो दंपति एक खाली जगह देखकर बैठ गए। कपड़ो के पहनावे से वो गरीब ही लग रहे थे।

तभी ट्रेन के आने के संकेत हुए और वो चाय वाला अपने काम में लग गया।शाम में जब वो चाय वाला वापिस स्टेशन पर आया तो देखा कि वो बुजुर्ग दंपति अभी भी उसी जगह बैठेहुए है। वो उन्हें देखकर कुछ सोच में पड़ गया।

देर रात तक जब चाय वाले ने उन बुजुर्ग दंपति को उसी जगह पर देखा तो वो उनके पास गया और उनसे पूछने लगा कि बाबा आप सुबह से यहाँ क्या कर रहे है? आपको जाना कहाँ है?

बुजुर्ग पति ने अपना जेब से कागज का एक टुकड़ा निकालकर चाय वाले को दिया और कहा कि बेटा हम दोनों में से किसी को पढ़ना नहीं आता, इस कागज में मेरे बड़े बेटे का पता लिखा हुआ है। मेरे छोटे बेटे ने कहा था कि अगर भैया आपको लेने ना आ पाये तो किसी को भी ये पता बता देना, आपको सही जगह पहुँचा देगा।

चाय वाले ने उत्सुकतावश जब वो कागज खोला तो उसकी आँखों से एकाएक आंसूओं की धारा बहने लगी।



उस कागज में लिखा था कि कृपया इन दोनों को आपके शहर के किसी वृध्दाश्रम में भर्ती करा दीजिए, बहुत बहुत मेहरबानी होगी।

11 फ़रवरी 2014

ब्रम्हराक्षस


चुन्नुमल घुन्घुनियाँ एक बहुत ही प्रतिष्ठित व्यापारी थे | देश विदेश में उनका व्यापार फैला हुआ था | करोंड़ों का लेन देन चलता था उनका | व्यस्त इतने रहते थे कि आँख खुलते ही काम पर लग जाते और आँख बंद होने तक काम करते रहते थे | चारों ओर जयजयकार था उनका |

लेकिन चुन्नुमल खुश नहीं थे | कारण था राजकोष से लिया गया कर्ज जो उतर ही नहीं रहा था | हर दूसरे दिन राजा का कोई आदमी आ जाता था तकाजा करने के लिए | बेचारे जितना अधिक काम करते उतना ही व्यापार बढ़ता लेकिन कर्जा वहीँ का वही रहता | सेठ जी ने कई ज्योतिषी और पंडितों को कुंडली दिखवाई हवन करवाए लेकिन राहत नहीं मिल रही थी |

उधर उनकी धर्म पत्नी अलग मुँह फुलाए रहती थी कि कभी हमारी शक्ल भी देख लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि मैं मर जाऊं और तुम मुझे पहचान भी न पाओ और आग लगा आओ किसी और की चिता को | बच्चों की शक्ल तो उसे याद ही नहीं थी |

एक दिन उस नगर में एक बहुत ही पहुँचे हुए संत पहुँच गए | वैसे भी पहुँचे हुए लोग ही पहुँचते हैं, सो पहुँच गए उस नगर में भी | सेठ जी को पता चला तो बड़ी मुश्किल से थोड़ा समय निकाल कर रात में पहुँचे जब सब लोग जा चुके थे और संत सोने की तैयारी में थे | बहुत अनुनय विनय के बाद संत उनसे मिलने को तैयार हुए |

सेठ जी ने अपनी समस्या उनको बताई कि कैसे वह इतना मेहनत करते हैं और फिर भी सभी दुखी रहते हैं और धनलाभ भी नहीं हो रहा |कर्जे बढ़ रहें हैं सो अलग | संत ने ध्यान से सारी बातें ध्यान से सुनी और अपनी आँख बंद कर कुछ देर ध्यान लगाने के बाद बोले, "समस्या तो बहुत ही गंभीर है और एक बहुत ही शक्तिशाली ब्रम्हराक्षस का साया पड़ा हुआ आपके पीछे |"

"क्या बात कर रहें हैं आप महाराज ???" सेठ जी ब्रम्हराक्षस का नाम सुनते ही थर-थर काँपने लगे |

"मैं ठीक कह रहा हूँ और मैं तो उसे अभी भी तुम्हारे पास ही खड़े देख भी रहा हूँ |" संत ने सेठ के दाहिने ओर इशारा करते हुए कहा |

सेठ जी जहाँ बैठे थे वहाँ से उछल कर सीधे संत के चरणों में आ गिरे, "मुझे बचा लीजिये महाराज !!! मैं और मेरा परिवार बर्बाद हो रहें है | आप जितना भी धन मांगेंगे मैं देने को तैयार हूँ |"

"अगर धन से ही समस्या सुलझ जाती तो पहले ही नहीं सुलझ गई होती ? इसके लिए कम से कम छः महीने की तपस्या करनी होगी और वह भी आपको अपने पुरे परिवार के साथ | इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है |

"महाराज लेकिन मेरा व्यापार संभालेगा कौन ? मैं तो एक दिन क्या एक घंटे के लिए भी छुट्टी नहीं ले सकता तो छः महीने की तो सोचना भी असंभव है |" सेठ ने अपनी असमर्थता जताते हुए हाथ जोड़े |

"ठीक है फिर जैसी प्रभु की इच्छा | आप जाइए अपना व्यापार संभालिये और ब्रम्हराक्षस तो आपको संभाल ही रहा है |" यह कहते हुए संत ने सेठ जी को एक माला दी और कहा कि इसे गले में डाल लो ताकि अकेले में डर न लगे |

सेठ जी बुझे मन से अपने घर लौट गए | घर पहुँच कर सारी बात पत्नी को बताई तो पत्नी के भी होश उड़ गए | बोली, "मुझे तो पहले ही शक था कि कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि इतना हवन करवाने के बाद भी हमारे घर में शान्ति नहीं है तो बड़ी मुसीबत ही होगी |"


तब तक नौकर खाना लेकर आ गया लेकिन अब खाना कहाँ खिलाया जाता ? सेठ जी बार बार अपनी दाहिने और देखते कि कहीं ब्र्म्हराक्शस न दिख जाए | थोड़ी देर बाद पत्नी बोली "चलिए जी उठिए अभी चलते हैं स्वामी जी के पास |"

"अभी ??? इतनी रात में ???" सेठ जी चौंक कर बोले |

"जी हाँ अभी !!!" और सेठानी ने सेठ जी का हाथ पकड़ कर खींचा और घर से बाहर आ गए | थोड़ी देर बाद स्वामी जी के पास पहुंचे और उन्हें नींद से जगाने के लिए क्षमा मांगते हुए सेठानी ने तपस्या में जाने के लिए स्वीकृति दे दी |

संत ने सेठ जी से पूछा कि जब आप सपरिवार बाहर जा रहें हैं तो व्यापार की जिम्मेदारी किस पर सौंप कर जायेंगे ?

सेठ जी बोले कि बर्बाद तो हम हो ही रहें हैं और यदि यह तपस्या नहीं की तो हमारा परिवार भी नहीं बचेगा इस ब्रम्हराक्षस से | इसलिए जाना तो आवश्यक है ही | चूँकि और कोई उपाय नहीं है इसलिए मैं अपने मैनेजर को ही सारी जिम्मेदारी सौंप कर जाऊँगा |

"क्या वह इतना विश्वसनीय है कि आपके लौटने तक सब संभाल ले ?" संत ने फिर पूछा |

"महाराज मैंने कभी किसी पर विश्वास नहीं किया लेकिन मैनेजर ही सबसे पुराना आदमी है और अभी तक उसके विरुद्ध कोई शिकायत भी नहीं सुनी मैंने |" सेठ अपनी विवशता जताते हुए बोले |

"सोच लीजिये फिर से एक बार | क्योंकि हो सकता है आपके जाने के बाद सारा व्यापार चौपट कर दे या फिर सब कुछ हडप कर कहीं और भाग जाए ?"

"नहीं महाराज ऐसा तो वह शायद नहीं करेगा लेकिन कर भी सकता है |" सेठ जी की आखों में परेशानी झलक रही थी |

"देखिये यदि आप तपस्या पर निकले और आपका ध्यान यहाँ व्यापार की तरफ रहा तो कोई लाभ नहीं होने वाला | यह एक बहुत ही कठोर तपस्या है और बहुत ही कम लोग इस तपस्या में सफल हो पाते हैं | इसलिए सोच लीजिये कि क्या करना है ? व्यापार या तपस्या ? संत ने फिर पूछा

"तपस्या !!!" सेठ और सेठानी दोनों एक स्वर में बोले |

संत ने उनको तपस्या के कुछ नियम बताये और आशीर्वाद देकर उन्हें विदा कर दिया | छः महीने बाद जब वे लौटे तो सेठजी पूरी तरह से बदले हुए थे | उनका पूरा परिवार खुश था | जब सेठ जी ने अपने व्यापार के विषय में जानकारी ली तो पता चला कि राजा का सारा कर्ज भी चुकता हो गया और दूसरे सारे कर्ज भी समाप्त हो चुके थे |

नोट: अब आप बताएं कि संत ने तपस्या के लिए कौन सी विधि बतायी थी कि सारी समस्या सुलझ गयी ?