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11 जून 2018

साधू संत और कलयुग


अक्सर देखता हूँ कि आध्यात्म और धर्म के नाम पर समाज दोहरी मानसिकता रखता है | जब भी आध्यात्म या धार्मिकता की बात आती है, तब समाज का व्यव्हार बिलकुल अलग होता है और जब विज्ञान व्यवहार की बात आती है तो बिलकुल अलग |

तो इस पोस्ट का मूल विषय है; "साधू संत और कलयुग" | जो कुछ भी मैं कहना या समझाना चाहता हूँ इस पोस्ट के माध्यम से, वह सीधे ही शुरू कर दूं तो समझ में नहीं आयेगा आप लोगों के | इसलिए आरम्भ करता हूँ दर्पण से यानि आइना दिखाने से और उसके बाद अपने मूल विषय पर आता हूँ | इस बीच कई बार आपको ऐसा भी लग सकता है कि मैं विषय से भटक रहा हूँ, लेकिन वह केवल आपका भ्रम होगा | क्योंकि यह लेख घुमावदार ही रखूँगा ताकि आपको भूल भुलैया का आनंद भी प्राप्त हो |

05 मार्च 2017

मैं सुखी तो जग सुखी


एक बहुत ही बड़ा भ्रम पाल लिया है पढ़े-लिखों ने कि भौतिक सुख ही वास्तविक सुख है और बाकी सभी कुछ भ्रम है मिथ्या है | इनको लगता है कि इंसानों ने जो आविष्कार किये वे ही जीवन दायिनी हैं, बाकि सभी कुछ व्यर्थ | और यह भ्रम इतनी गहराई तक लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा दिया गया है कि इनकी स्थिति उन धार्मिक कूपमंडूकों सी हो गयी है, जो यह मानते हैं कि ईश्वर ने उनके लिए कोई पुस्तक आसमान से उतारी थी और उसमें जो कुछ भी लिखा है वही सत्य है, बाकी सब झूठ | कुछ तो ऐसे धार्मिक कूपमंडूक हैं जो चाय भी पीने जायेंगे तो देखेंगे कि उनकी किताब में इसकी परमिशन है कि नहीं | लेकिन वही धार्मिक लोग यह नहीं देखेंगे कि बलात्कार, लूटपाट, निर्दोषों की हत्या, अपराधी प्रवृति के नेताओं को वोट देना.... आदि इत्यादि उनकी ईश्वरीय किताबों, वेद-पुराणों में वर्जित है या नहीं |

इसी प्रकार कुछ अध्यात्मिक कहे जाने वाले वाले विद्वानों का मानना है कि "मैं सुखी तो जग सुखी" के सिद्धांत पर चलना ही आध्यात्म है | और हम देखते ही हैं कि अध्यात्मिक गुरु लोग केवल अपने में मस्त रहते हैं | उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पड़ोस में कोई दुखी है या नहीं | मंदिर-मस्जिदों के सामने भीख माँगते लोगों को देखकर मुझे बहुत ही आश्चर्य होता है कि जो मंदिर-मस्जिद उन भिखारियों की दरिद्रता दूर नहीं कर पाता, वह भला दूर से आने वालों की मनोकामना कैसे पूरी कर सकता है ?

लेकिन मेरी नजर में आध्यात्मिक ज्ञान यानि अधि + आत्मा यानि वह सर्वशक्तिमान जिसके हम अंश हैं और वह आत्मा जो इस शरीर को चला रही है, उसका ज्ञान | अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए आजीवन न तो तपस्या करनी पड़ती है और न ही आजीवन कोई एक किताब, मन्त्र, आयत या श्लोक रटते रहना पड़ता है | न ही कोई कर्मकाण्ड आजीवन करते रहना पड़ता है | हाँ ध्यान आवश्यक है क्योंकि ध्यान से आप अपने मस्तिष्क व शरीर को रिफ्रेश कर पाते हैं | ध्यान कोई चमत्कार नहीं है, केवल अपने आपको न्यूट्रल मोड में डाल देना मात्र है | जब आप ध्यान की अवस्था में होते हैं, तब आपके मस्तिष्क के सेल्स रिलेक्स मोड में आ जाते हैं और साथ ही आपके शरीर की सभी कोशिकाएं भी | आपके बीस मिनट के ध्यान से आपको इतनी उर्जा मिलती है, जितनी कि आठ घंटे की नींद से मिलती है | आपके शरीर की चमक बढ़ जाती है, सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है, एकाग्रता बढ़ जाती है....व अन्य कई भौतिक व अध्यात्मिक लाभ मिलते हैं |

तो ध्यान करना आध्यात्मिक उत्थान का सरल मार्ग है | अध्यात्मिक उत्थान होने के बाद फिर आप किसी दड़बे में कैद नहीं रह पायेंगे, आपको बेचैनी होने लगेगी | क्योंकि तब आप मानव निर्मित सभी सीमाओं से स्वयं को मुक्त पायेंगे | आपको समझ में आ जायेगा कि दुनिया इतनी छोटी नहीं है, जितनी कि मानव समाज ने बना रखा है | दुनिया तो इतनी विशाल है कि उसका छोर ही ज्ञात नहीं हो पा रहा | फिर आपको यह भी समझ में आ जाएगा कि पढ़े-लिखे लोगों ने कितनी बड़ी बड़ी गलतियाँ कर रखी हैं.. जैसे कि प्लास्टिक का अविष्कार व उसका अनियंत्रित दुरुपयोग |

पानी या कोल्ड-ड्रिंक बेचने वाली कम्पनियाँ प्लास्टिक की बोतल में पानी या कोल्डड्रिंक आप तक पहुँचाती है | आप पानी की बोतल खरीदते हैं, पानी पीते हैं और बोतल फेंक देते हैं | न तो कम्पनी को इस बात की कोई फ़िक्र है कि वे प्लास्टिक की बोतलें कितने अन्य जीवों की जान लेंगी, कितने वनस्पति व जलचरों की जान लेंगीं...बस कंपनी को कुछ कागज के नोट चाहिए और आपको अपनी सुविधा | फिर आप लोग तो दुनिया से उठ जाओगे एक दिन, आने वालों के लिए नरक बनाकर | जैसे कि किसी टूरिस्ट प्लेस जाकर आप लोग करते हैं | साफ़ सुथरी झील देखी और प्लास्टिक की बोतलें उसमे फेंकनी शुरू कर दी, समुद्र देखा और प्लास्टिक की बोतलें फेंक दी... क्योंकि आप लोग पढ़े-लिखे हैं खुद को बुद्धिमान समझते हैं और ऐसा करना आधुनिकता मानते हैं |

लेकिन क्या कभी सोचा है आपने कि ऐसा करके आप लोगों ने दुनिया को नरक बना दिया ? केवल अपनी भौतिक सुखो के लिए न जाने कितने उन जीवों की जिन्दगी खतरे में डाल दी और कितने जीवों को लुप्त होने पर विवश कर दिया, जिनको न तो आपने देखा है और न ही उन्होंने आपको ? आप में से कई होंगे शाकाहारी... जो जीव हत्या पाप है का नारा लगाते घूम रहे हैं | लेकिन आपके द्वारा प्रयोग किये जा रहे भौतिक संसाधनों से न जाने कितने जीव हर रोज काल का ग्रास बन रहे हैं |

तो यह है आप लोगों का विकास और आधुनिकता | मजाक उड़ाते हैं आप लोग हम जैसे लोगों का क्योंकि हम आपको कुछ करते दिखाई नहीं देते | आप लोग जिसे कुछ करना कहते हैं, जरा सोचिये उस करने में आपको लाभ कम हानि अधिक हो रही है | आप केवल स्लेव बनकर रह गये हैं कुछ व्यापारियों, कुछ पूंजीपतियों और मुर्ख सरकारों के |

प्रकृति तो स्वयं इतनी व्यवस्थित व सुनियोजित है कि कुछ भी व्यर्थ नहीं है | मनुष्य कोई यंत्र बनाता है तो वह बेकार होने के बाद केवल कबाड़ सिद्ध होता है | जबकि प्रकृति ने जो भी स्वचालित यंत्र जिसमें मानव शरीर भी शामिल है, वह व्यर्थ नहीं होता | जमीन में छोड़ तो शरीर के भीतर से स्वयं ही उस शरीर को नष्ट करने के लिए कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं | साथ ही साथ कई पशु-पक्षी के भोजन के काम में आ जाता है | और यह भी न हुआ तो, मिटटी में मिलकर खाद बन जाता है जो कि वनस्पतियों के भोजन के काम आता है |

आप स्वयं कल्पना करके देखिये कि मानव तो आज तक जल नहीं बना पाया.. आपको मिनरल वाटर भी बेच रहा है कोई तो जमीन से निकालकर ही बेच रहा है, न कि सागर से जल लेकर | सरकार को भी केवल कागज के नोटों से मतलब है, इसलिए कोकाकोला जैसे कंपनियों को जल बेच देती है.. जबकि सरकार स्वयं जल का निर्माण नहीं कर सकती | वह जल जो सभी जीव जंतुओं के लिए सामान रूप से ईश्वर द्वारा उपलब्ध करवाया गया है वह भी निःशुल्क, उसे वे लोग अपने अधिकार में ले रहे हैं, जिनकी इतनी भी हैसियत नहीं कि सागर का जल ही साफ़ करके पीने योग्य बना लें | और हम लोग खुद अपने हाथों से अपने ही देश के प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने के लिए ऐसी सरकारों को चुनते हैं जो मानसिक रूप से रुग्ण व मुर्ख होती है |

तो यह सब इसलिए क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है | भौतिक ज्ञान को सर्वोच्च मानने वाले मूर्ख पढ़े-लिखे विद्वानों ने पृथ्वी ही नहीं, सम्पूर्ण वायुमंडल व अंतरिक्ष तक को दूषित कर दिया...लेकिन भ्रम पाले बैठे हैं कि भौतिकता जीव सबसे बुद्धि मान हैं | बिगड़ा तो अब भी कुछ नहीं है यदि समय रहते लोग होश में आ जाएँ |

~विशुद्ध चैतन्य

 


29 सितंबर 2016

"गरीबी नसीब नहीं बल्कि एक साज़िश है"

"सलाम

"जनाब एक सवाल था , क्या गरीबी पूंजीवाद का एक महत्वपूण अंग है ??? मैंने कार्ल मार्क्स के कुछ विचार देखे है "YouTube" पर , जिसमे एक बात पे ज़ोर दिया गया है "गरीबी नसीब नहीं बल्कि एक साज़िश है" ! समय मिले तो please अपने विचार दीजियेगा "


19 सितंबर 2016

नास्तिकों के देवता पेरियार के अनुत्तरित प्रश्न और अनपढ़ विशुद्ध चैतन्य के उत्तर

Swami Ji - I saw one post on face book -



पेरियार नायकर के ईश्वर से सवाल
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1) क्या तुम कायर हो जो हमेशा छिपे रहते हो,,, कभी किसी के सामने नहीं आते...???
2) क्या तुम खुशामद परस्त हो जो लोगों से दिन रात पूजा,,अर्चना करवाते हो..???
3) क्या तुम हमेशा भूखे रहते हो जो लोगों से मिठाई,, दूध,,घी आदि लेते रहते हो..???
4) क्या तुम मांसाहारी हो जो लोगों से निर्बल पशुओं की बलि मांगते हो..???
5) क्या तुम सोने के व्यापारी हो जो मंदिरों में लाखों टन सोना दबाये बैठे हो..???
6) क्या तुम व्यभिचारी हो जो मंदिरों में देवदासियां रखते हो..???
7) क्या तुम कमजोर हो जो हर रोज होने वाले बलात्कारों को नही रोक पाते... ???
क्या तुम मूर्ख हो जो विश्व के देशों में गरीबी-भुखमरी होते हुए भी अरबों रुपयों का अन्न,, दूध,, घी,, तेल बिना खाए ही नदी नालों में बहा देते हो???
9) क्या तुम बहरे हो जो बेवजह मरते हुए आदमी,,, बलात्कार होती हुयी मासूमों की आवाज नहीं सुन पाते..??
10) क्या तुम अंधे हो जो रोज अपराध होते हुए नहीं देख पाते...???
11) क्या तुम आतंकवादियों से मिले हुए हो जो रोज धर्म के नाम पर लाखों लोगों को मरवाते रहते हो....???
12) क्या तुम आतंकवादी हो जो ये चाहते हो कि लोग तुमसे डरकर रहें?
13) क्या तुम गूंगे हो जो एक शब्द नहीं बोल पाते लेकिन करोड़ों लोग तुमसे लाखों सवाल पूछते हैं...???
14) क्या तुम भ्रष्टाचारी हो जो गरीबों को कभी कुछ नहीं देते,, जबकि गरीब पशुवत काम करके कमाये गये पैसे का कतरा-कतरा तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर देते हैं..??
I know it is written by left wing person but looks like it has valid points ..
would you be able to comment on this or point me to some resources to explain truth ?

06 अगस्त 2016

...सबका उद्देश्य है तो क्या हर कोई अपने आप उस रास्ते पर आ जाता है ?


"चैतन्य जी, ये हमें कैसे पता चलेगा कि इस दुनिया में हम किस उद्देश्य के लिए आये हैं, जैसे की मै अपनी ही बात करता हूँ, मेरी पढाई मेरे ही काम नही आ रही..कोचिंग पढ़ाने के बहुत प्रयास किये..असफल रहा..और भी कोशिश की कोई जुगाड़ जम जाए,अलग अलग क्षेत्र में कोशिश भी,बात भी हुई पर कहीं बात बढ़ी नही,...सवाल घूमते रहता है करू क्या ? आगे बढ़ने का थोड़ा तो घर में दबाव रहता ही है लेकिन ऐसा लगता है भटक रहा हूँ, आपके कहे अनुसार, सबका उद्देश्य है तो क्या हर कोई अपने आप उस रास्ते पर आ जाता है ? इस प्रकृति को कुछ देने के लिए ! क्या आप दूसरों की मदद कर सकते है उनके लिए सही रास्ता और उद्देश्य ढूँढने में ?" -मंगल 

02 अगस्त 2016

क्या बातें करें अध्यात्म की हम ?


 जीवन के अंतिम पड़ाव में अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा में बैठे लोग ही अध्यात्म में रूचि लेते हैं क्योंकि अब कुछ और करने लायक रह ही नहीं गये | नाती-पोते हो गये, गंभीरता दिखानी ज़रूरी हो गयी नहीं तो समाज क्या कहेगा... आदि इत्यादि |

युवाओं के पास अपना दुःख है | नौकरी के लिए पढाई की थी, लेकिन नौकरी है कि मिल नहीं रही | मनपसन्द नौकरी तो दूर, चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल पा रही इंजीनियरिंग करने के बाद भी | तो उनका गुस्सा अपनी जगह है क्योंकि उनको लगता है कि उनको गलत दिशा में दौड़ा दिया गया और अब लौटने का कोई रास्ता ही नहीं है | अब वे बचपन में वापस नहीं लौट सकते और समाज और सरकार अपनी ही दुनिया में खोई हुई है | उनकी समझ में नहीं आता कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए |

कई युवा मुझे बताते हैं जिनमें लड़कियां अधिक हैं कि पढ़ाई पूरी कर ली लेकिन अब समझ में नहीं आ रहा कुछ भी | सरकारी नौकरी चाहिए लेकिन कब मिलेगी कैसे मिलेगी समझ में नहीं आ रहा... डिप्रेशन बढ़ता जा रहा है और कई बार आत्महत्या करने का मन करता है.......

04 मई 2016

धरती पर खतरा बढ़ रहा है, कहीं और बसेरा तलाशें : स्टीफन हॉकिन्स




पृथ्वी से लगभग चालीस प्रकाश वर्ष दूर दो ऐसे ग्रहों का पता लगा है, जिसमें जीवन होने का अनुमान है |

अब आप लोग यह बताइये कि आप में से कितने लोग उनमें से किसी एक में जाने के योग्य हैं ?

जमीन, खेत, जंगल, पहाड़, नदी, नाले, पीने का पानी... सब तो आप लोग बेच ही चुके हैं, तो अब पृथ्वी में रहने का अधिकार ही कहाँ रहा आप लोगों के पास ? और किराया भी कब तक और कितना चुकायेंगे ?


हर साल तो किराया बढ़ ही रहा है |

जरा कल्पना कीजिये.. !!!

आप लोगों के आका यानि नेतागण, धन्नासेठ और फिरंगी मालिक, सब दूसरे ग्रहों में चले जाएँ, तब आप लोगों का क्या होगा ?

कौन आप लोगों को नौकरी देगा और कौन आप लोगों आरक्षण देगा ?

कौन आप लोगों को धर्म और जाति के नाम पर आपस में लड़वा कर आप लोगों का मन बहलायेगा ?

पानी होगा नहीं पृथ्वी पर क्योंकि वह तो आपने बेच दिया मिनरल वाटर, सोडा और दारु वालों को | खेत आप लोगों के पास होगी नहीं कि दो वक्त की रोटी ही उगा लें | जब अनाज ही नहीं उगेगा, तो फिर पिज़्ज़ा और बर्गर भी कहाँ से आयेंगे और मैगी और चाउमीन भी कैसे मिलेगा ?

फिर शाकाहारी लोग जिन्दा कैसे रहेंगे ?

माँसाहारी तो मुर्दों को खाकर भी जी लेंगे, लेकिन शाकाहारी क्या खायेंगे ? और कैसे जियेंगे ?

कभी फुर्सत मिले तो चिंतन मनन कीजियेगा, क्योंकि भविष्य यही है पृथ्वी का | या तो अभी से कृषि व जल संरक्ष्ण पर ध्यान दें, वरना ये पूंजीपति और नेता आपकी शक्ल पहचानने से भी इंकार कर देंगे | वैसे भी चुनाव जीतने के बाद इनकी याददाश्त अगले चुनाव तक के लिए चली जाती है...तो सोचियेगा | ऐसा न हो कि आप लोगों की याददाश्त भी चली जाये |

अब यहाँ यह भी विचार करने वाली बात है कि इतने बड़े बड़े वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, भू-वैज्ञानिक, कृषि-वैज्ञानिक और दुनिया भर के विख्यात विश्वविद्यालयों से निकलने वाले गोल्डमेडलिस्ट डिग्रीधारियों, नास्तिकों, आस्तिकों, धार्मिकों के होते हुए भी, हम अपनी ही पृथ्वी को इस तरह तहस-नहस कर चुके कि अब वैज्ञानिकों ने भी हाथ खड़े कर लिए कि पृथ्वी का अब कुछ नहीं हो सकता | इसकी स्थिति भी बिलकुल किताबी धर्मों की तरह जर्जर हो चुकी है | अब इसमें सुधार की कोई संभावना नहीं बची |

क्यों ? ऐसा क्यों हुआ ?

लोग तो वैज्ञानिक सोच के बच्चे ही पैदा करते हैं | पैदा होते हैं अंग्रेजी बोलने लगते हैं और हिंदी को अटपटी भाषा बताने लगते हैं | अध्यात्म को ढोंग और भौतिकतावाद व उपभोक्तावाद को सार्थक मानते हैं | उत्पादक किसानों को विवश कर रहे हैं अपने खेत छोड़ने के लिए और कंक्रीट के जंगल खड़े करने को विकास बता रहे हैं | फिर भी पृथ्वी रहने लायक नहीं रही, ऐसा क्यों ? इतनी अंग्रेजी सीखने और बोलने का लाभ क्या हुआ ?



हम भारतीय तो जब तक अंग्रेजी नहीं जानते थे, भारत में पर्यावरण प्रदूषित नहीं था | यहाँ के लोग हट्टे-कट्टे योद्धा हुआ करते थे | कृषिप्रधान देश के रूप में जाना जाता था और पुरे विश्व को अनाज उपलब्ध करवाता था | लेकिन जब से अंग्रेजी सीख ली, किसान ही भूखे मरने लगे | लोग खेत छोड़कर नौकरी करने लगे | पूरे विषय को वस्त्र उपलब्ध करवाने वाले भारतीय खुद चीथड़ों में घुमने लगे... क्यों ? इतनी सारी डिग्रियाँ, इतनी महँगी-महँगी पढ़ाई का लाभ क्या हुआ ? क्यों हम भारतीय अपने ही देश की भूमि और पानी बचा पाने में असफल हो गये ?

अपना देश हमसे संभला नहीं, विश्व को क्या दिशा दिखायेंगे हम ? खुद को विश्वगुरु कहने वाले हम भारतीय विदेशियों की नकल करने के चक्कर में धोबी का गधा बन कर रह गये | चिंतन करिए आपकी डिग्रियों से क्या मानवजाति का कोई कल्याण हो सकता है ? क्या वन, कृषि, जल, पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है ? ~विशुद्ध चैतन्य

19 नवंबर 2015

आनंद का अर्थ यह नहीं की सारे दिन चारपाई पर पसरें रहें...

प्रश्न: आपके अनुशार '''''मोक्ष''' केसे परिभिषित किया जा सकता है ?

मोक्ष का मेरे अनुसार परिभाषा बनती है संतुलन | जब हम भौतिक जगत में होते हैं तो यह समझाया जाता है कि मोक्ष भौतिक जगत छोड़ने पर मिलेगा, लेकिन जब शरीर छूट जाता है तब पता चलता है कि कुछ मोक्ष भौतिक जगत में ही मिलता है और वह फिर वापस आता है | यह आना-जाना तब तक चलता रहता है जब तक हम संतुलित नहीं हो जाते, जब हम समझ जाते हैं कि अति से गति नहीं हो सकती | जब हम भौतिक और आध्यात्मिक जगत के बीच की उस स्थिति को पा लेते हैं जहाँ केवल आनंद ही आनंद है |

आनंद का अर्थ यह नहीं की सारे दिन चारपाई पर पसरें रहें.... आनंद का अर्थ है कि आप अपने वर्तमान स्थिति को पूर्णता से जीना आरम्भ कर देते हैं | जैसे एक माँ अपने बच्चे के लिए सारी तकलीफ उठाने को तैयार रहती है लेकिन उसे कभी कोई कष्ट या दुःख का अनुभव नहीं होता | जैसे एक पति या पत्नी अपने साथी के लिए जो कुछ करता है वह कोई कष्ट नहीं होता वह उन्हें आनंद प्रदान करता हैं |

तो कहने का तात्पर्य यह कि जब हम भौतिक जगत में हैं तब हम अपने शरीर व इस जगत का सम्मान करें और जब शरीर न रहे तब भी हम उस स्थिति का सम्मान कर पायें इस योग्य बनना ही मोक्ष है | ~विशुद्ध चैतन्य

11 नवंबर 2015

अलग अलग व्यक्ति या समुदाय के लिए अलग अलग धर्म क्यों ?



आज सुबह सुबह जो महत्वपूर्ण प्रश्न मुझे मैसेज बॉक्स में मिला, उसका उत्तर सार्वजनिक रूप से देना ही मुझे बेहतर लगा |

प्रश्न: Sir ji,
मेरे जीवन में कुछ सवाल हैं, पता नहीं मुझे पूछना चाहिए या नहीं ?

  1. मानव जीवन में धर्म क्यों जरुरी है ?
  2. मानव जीवन में धर्म का क्या महत्व होना चाहिए ?
  3. अलग अलग व्यक्ति या समुदाय के लिए अलग अलग धर्म क्यों ?
  4. क्या धर्म में विरोधाभास उचित है ?
  5. क्या अलग अलग धर्म एक दूसरे के विपरीत हो सकते हैं, जबकि ईश्वर तो विरोधाभास कभी नहीं चाहेंगे ?

उत्तर:

  • पहली बात तो यह ध्यान में रखें कि प्रश्न तभी उठते हैं, जब व्यक्ति चिन्तन मनन करता है | और जो बिना प्रश्न किये मान लेता है वह जीवन भर कुछ नहीं जान पाता | भागवतगीता हो या उपनिषद... सभी प्रश्नोत्तर ही हैं |
  • धर्म न केवल मानव जीवन में, बल्कि पशु-पक्षी से लेकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के छोटे से ग्रह से लेकर विराट तारामंडल और आकाशगंगाओं के लिए समान रूप से आवश्यक है | यदि धर्म न हो, तब कोई भी ग्रह अपने पथ पर नहीं चलेगा, दिन और रात भी नियमित समय पर नहीं होंगे, मौसम परिवर्तन भी नहीं होगा पृथ्वी पर, न सृजन होगा, न प्रजनन होगा |
  • सम्पूर्ण सृष्टि विविधताओं से भरी हुई है और सभी का गुण-धर्म, अकार-प्रकार, रूप-रंग भिन्नताएँ लिए हुए हैं | हम मानवों की अँगुलियों के निशान भी समान नहीं हैं | इसलिए सभी समुदायों के अलग अलग धर्म हैं |
  • विरोधाभास् कहीं नहीं हैं, सभी अपने अपने गुण धर्मानुसार ही आचरण कर रहे हैं | जैसे चोर का धर्म है चोरी करना, नेताओं का धर्म हैं घोटाले करना, व्यापारियों का धर्म कालाबाजारी, जमाखोरी करके महँगाई बढ़ाना.... तो ये सभी अपने अपने धर्म का ही पालन कर रहे हैं | केवल हमें उनसे हानि होती है, इसलिए हमें विरोधाभास दिखाई देता है | यदि हम भी उन्हीं के परिवार के अंग होते, या हम भी उनके पार्टनर होते तो हमें यह विश्व का श्रेष्ठ धर्म लगता क्योंकि हमें लाभ हो रहा है |
  • जैसा मैंने कहा कि विरोधाभास कहीं नहीं हैं, और सम्पूर्ण विश्व की सुन्दरता ही भिन्नताओं के साथ ही है, इसलिए एक दूसरे के विपरीत दिखाई पड़ते हैं | और ईश्वर कभी कुछ नहीं चाहता, वह तो साक्षी है, दृष्टा है | चाहना न चाहना हम जीवों का ही स्वभाव है |

तो यह तो थे आपके प्रश्नों के क्रमवार उत्तर | अब समझिये कि धर्म क्या है |

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि कोई धर्म नहीं हैं, केवल समुदायों के नाम हैं या यह कहें कि भिन्न भिन्न मतों व मान्यताओं को मानने वालों के समूहों के नाम हैं | इन्हें मैं दड़बा कहता हूँ क्योंकि यही श्रेष्ठ शब्द दिखाई देता है मुझे इन समूहों के लिए | क्योंकि जब आप सनातनी हो जाते हैं, जब आप सनातन धर्म को समझ जाते हैं, जब वास्तव में धर्म को समझ जाते हैं, तब ये सब दड़बे ही दिखाई देते हैं, जिनका कोई अनदेखा मालिक होता है, जैसे बम्बैया फिल्मों में होता है बॉस, जो विदेश में कहीं रहता है और जिसे फिल्म के अंत तक कोई नहीं देख पाता और फिर जब हीरो उसे खोज निकालता है, तब जमकर उसकी पिटाई करता है | तब तक उनके गुर्गे ही सारे उपद्रव मचाये रखते हैं | बिलकुल ठीक वैसे ही इन दड़बों में भी होता है |

हर दड़बे का एक अनदेखा मालिक होता है, कुछ ऑथोराइज़ड एजेंट्स होते हैं, जो दड़बों के नियम तय करते हैं कि कैसे खाना है, क्या खाना है, क्या पहनना है, कब सोना है, कब उठना है, किससे दोस्ती रखनी है, किससे नफरत करनी है....आदि इत्यादि | हर दड़बों में अनदेखे ईश्वर के कई दफ्तर होते हैं, उनमें ईश्वर अपने अपने समय पर आते हैं और लोगों की शिकायतें सुनते हैं | उनसे मिलने के लिए उनके एजेंट्स को दान-दक्षिणा देना होता है, तब वह ईश्वर के दर्शन करवाता है, वह भी अपने ही बनाये मूर्तियों के रूप में... असल ईश्वर वहां है या नहीं, वह तो उसे भी नहीं पता होता |

तो विरोधाभास जो आपको दिखता है वह दड़बे के भीतर होने के कारण ही दिखता है, क्योंकि हर दड़बे के अपने अपने ईश्वर हैं अपने अपने मालिक और नियम कानून | लेकिन यदि आप सनातन धर्म को समझते हैं, जानते हैं, जीते हैं... जैसे कि पशु-पक्षी, सम्पूर्ण सौरमंडल... तो आपको बिलकुल यह सब वैसा ही लगेगा, जैसे किसी बगीचे में चले जाएँ और रंग बिरंगे फूलों, पेड़, पौधों को देखकर लगेगा | वहां आपको कोई विरोधाभास नहीं दिखाई देगा | यदि आप अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखें तो आपको पृथ्वी बहुत ही सुंदर दिखेगी, कोई विरोधाभास नहीं दिखेगा | इसलिए यदि आप अपना धर्म समझना चाहते हैं, तो स्वयं को समझिये, स्वयं को जानिये... ये किताबी धर्म दड़बों के धर्म है, जिसे उन दड़बों के मालिकों के एजेंट्स लिखते हैं.... ईश्वर कोई किताब नहीं लिखता, वह तो सृष्टि रचता है | ~विशुद्ध चैतन्य

21 जनवरी 2015

सीमेन की मात्रा घट जाना कोई बीमारी नहीं है |

सवाल - मैं 14 साल की उम्र से ही मैस्टरबेशन का रहा हूं। अब मैं 24 साल का हूं। जब मैंने मैस्टरबेशन करना शुरू किया था तब क्लाईमैक्स पर पहुंचने पर ज्यादा मात्रा में सीमेन निकलता था, लेकिन अब यह काफी कम हो गया है। क्या यह किसी बीमारी की वजह से है?

जवाब - पहले आप यह समझ लें कि जिसे आप सीमेन समझ रहे हैं उसमें स्पर्म का हिस्सा काफी कम होता है। स्पर्म की मात्रा 0.1 से 1 फीसदी तक हो सकती है, बाकी का लिक्विड सेमिनल वेसिकल्स और प्रोस्टेट से बनता रहता है। इसका बनना ज्यादातर पुरुष हॉर्मोन पर निर्भर करता है। पुरुष हॉर्मोन 14-16 की उम्र तक सबसे ज्यादा मात्रा में बनते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे उसमें कमी आती है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे सीमेन की मात्रा थोड़ी कम होती है और रंग सफेद से पीलापन लिए हुए हो जाता है। सीमेन के गाढ़ेपन में भी कमी आ जाती है। यह नॉर्मल प्रक्रिया है, बीमारी नहीं।

सीमेन के पतले, पीले या कम होने से पुरुष की मर्दानगी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। सीमेन का बनना पूरे जीवन चलता रहता है। अगर नॉर्मल तरीके से सीमेन बढ़ाना चाहते हैं तो खुराक में उड़द की दाल शामिल करें। हफ्ते में 2 दिन, 2 कटोरी उड़द की दाल गाय के घी में हींग और लहसुन का तड़का लगा कर लेने से सीमेन की मात्रा में काफी इजाफा होता है और पतलापन भी दूर होता है। कुछ जानकारों का मानना है कि रात को सोने से पहले 2 चम्मच साबुत मेथी गुनगुने पानी के साथ निगलने से भी पुरुष हॉर्मोन और सीमेन की मात्रा में इजाफा होता है।

प्रकाश कोठारी, सेक्सॉलजिस्ट

05 जनवरी 2015

इंसान, या हिन्दू-मुसलमान ?


आंखों का स्पर्म से नहीं है लेना-देना


सवाल - अगर मैं रोज सेक्स करता हूं और ज्यादा स्पर्म निकालता हूं तो क्या इसका बुरा असर मेरी सेहत पर पड़ता है? दरअसल मुझे काफी वक्त से लग रहा है कि इस वजह से मेरी आंखों के आसपास काले घेरे बन गए हैं और आंखें धंस गई हैं। क्या आंखों की यह समस्या ज्यादा स्पर्म रिलीज करने की वजह से है?

जवाब - जिसे आप स्पर्म समझते हैं, वह सिर्फ स्पर्म नहीं होता। स्पर्म तो डिस्चार्ज का 0.1-1 फीसदी ही होता है। बाकी का फ्लूइड सेमिनल वेसिकल्स और प्रोस्टेट से आता है। आप इसे शरीर से बाहर नहीं निकालेंगे, तो यह खुद-ब-खुद निकल जाएगा। ऐसे में रोजाना स्पर्म निकालने से कोई परेशानी नहीं आती है।

अक्सर हम लोगों को कमजोरी का एहसास होने के पीछे बचपन से दिमाग में बैठ गई वह गलत धारणा है, जिसमें 1 बूंद सीमेन बनने में 100 बूंद खून की जरूरत और एक बूंद खून के बनने के लिए सीमेन 24x7 निकलने के लिए ही बनता है। इसे जमा करना या रोक कर रखना असंभव है। स्पर्म का आखों से कोई लेना-देना नहीं है। हां यह जरूर संभव है कि स्पर्म के बारे में ऐसी गलत धारणा पैदा हुई एंग्जाइटी की वजह से शरीर या चेहरे की चमक फीकी पड़ गई हो। इससे कई गुना ज्यादा पोषण से भरपूर खाना खाने की बातें कही जाती हैं। यह धारणा पूरी तरह से निराधार है। -प्रकाश कोठारी, सेक्सॉलजिस्ट

03 जनवरी 2015

होनहार पप्पू


टीचर: नेपोलियन की मृत्यु किस लड़ाई में हुई?
पप्पू: उसकी आखिरी लड़ाई में।

टीचर: स्वतंत्रता की घोषणा पर कहाँ हस्ताक्षर किये गए?
पप्पू: किताब के पृष्ठ के आखिर में।

टीचर: तलाक का मुख्य कारण क्या होता है?
पप्पू: शादी।

टीचर: असफल होने का मुख्य कारण क्या है?
पप्पू: परीक्षा।

टीचर: आप ब्रेकफास्ट में क्या नही खा सकते?
पप्पू: लंच और डिनर।

टीचर: आधे सेब की तरह क्या दिखता है?
पप्पू: दूसरा आधा सेब।

टीचर: अगर आप नीले समुंद्र में लाल पत्थर फेंकेंगे तो ये कैसा हो जायेगा?
पप्पू: यह गीला हो जायेगा।

टीचर: कोई आदमी आठ दिन तक बिना सोये कैसे रह सकता है?
पप्पू: कोई समस्या नही है, वह रात को सो जायेगा।

टीचर: तुम एक हाथी को एक हाथ से कैसे उठा सकते हो?
पप्पू: आपको ऐसा हाथी ही नही मिलेगा जिसका एक ही हाथ हो।

टीचर: अगर एक दीवार को आठ आदमी दस घंटे में बनाते है तो चार आदमी को इस दीवार को बनाने में कितना समय लगेगा?
पप्पू: थोड़ा भी नही, क्योंकि दीवार तो पहले ही बन चुकी है।