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10 दिसंबर 2016

क्या हम वास्तव में राष्ट्रभक्त हैं ?



बरसाती राष्ट्रभक्ति का दौर शुरू हुए लगभग तीनवर्ष बीत चुके हैं | इस दौर में हमने कई दोगले राष्ट्रभक्त और उनकी दोगली राष्ट्रभक्ति देखी | हमने देखा कि मिडिया में जो लोग बैठे है, जिनको आज के युवावर्ग विद्वान, समझदार और सुलझा हुआ समझती थी, वे भी वास्तव में बिन पेंदे के राष्ट्रभक्त हैं | उनकी राष्ट्रभक्ति सत्ता और पैसे से संचालित होती है, आत्मा, स्वाभिमान और स्वविवेक से नहीं | हमने देखा कि कैसे आधुनिक अर्थशास्त्री अर्थ का अनर्थ करते हैं, हमने देखा कि कैसे देश की जनता को मुर्ख बनाया जाता है | हमने यह भी देखा कि पढ़े-लिखे कहे जाने वाले डिग्रीधारी भी कैसे राष्ट्रभक्ति के नाम पर मूर्ख बनते और बनाते हैं | हमने यह भी देखा कि कैसे देश को विदेशियों के हाथो गिरवी रखने में देश के नेताओं और उद्योगपतियों को शर्म नहीं आती और हमने यह भी देखा कि उनके चमचे और चापलूस कैसे अपनी अपनी सेना बनाकर जनता के बीच घुसकर जनता को गुमराह करती है |

22 अगस्त 2016

प्रत्येक त्यौहार जो भी भारत में बनाये गये, वे सभी प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल हैं



भारत में जितने भी त्यौहार हैं, वे सभी किताबों पर आधारित नहीं हैं, कुछ प्राकृतिक वातावरण पर आधारित हैं | जैसे; दीवाली, वसंतोत्सव, होली, रक्षाबंधन, तीज, श्रावणी... आदि |

04 अगस्त 2016

स्वर्ग वहीं है, जहाँ मानवों के विकासशील आधुनिकता के कदम नहीं पड़े !

मानवों ने जहाँ जहाँ अपनी विकासशील आधुनिक मानसिकता के कदम नहीं रखे, वह जगह आज भी सुंदर व मनमोहक हैं | लेकिन जहाँ-जहाँ मानवों की भीड़ पहुँच जाती है वह विकास व आधुनिकता की वेदी पर स्वाहा हो जाता है | अभी भी भारत में कई जगह ऐसी हैं, जहाँ मानवों ने विकास नहीं किया जिसकी वजह से वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य आज भी आकर्षित करता है |

03 मई 2016

87 साल बीत जाने के बाद भी भारत अपनी गुलामी की इस पहचान को बदलने में नाकाम रहा है



क्या आपने कभी गौर किया है कि भारत में सभी हवाई जहाजों के विंग्स और बॉडी पर VT से शुरू होने वाला नाम प्रमुखता से लिखा होता है. असम में भारत के हर हवाई जहाज का नाम VT से ही शुरू होता है. लेकिन ये VT आखिर है क्या?

तरुण विजय ने संसद में बताया VT का मतलब
ज्यादातर लोगों की तरह हमारे सांसदों को भी या तो इसका मतलब पता ही नहीं था या फिर उन्होंने इस पर अभी तक गौर नहीं किया. लेकिन मंगलवार को जब बीजेपी सांसद तरुण विजय ने राज्यसभा में ये मामला उठाया और VT का मतलब सांसदों को बताया तो ज्यादातर सांसदों का सिर शर्म से झुक गया. दरअसल दो अक्षर का ये शब्द बताता है कि किस तरह हम 87 सालों से गुलामी के एक प्रतीक को ढो रहे हैं और दुनिया को बता भी रहे हैं. VT का मतलब है 'Viceroy Territory' यानी वायसरॉय का इलाका.

क्या होता है 5 अक्षरों के इस कोड का मतलब?
अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक, हर हवाई जहाज के उपर ये प्रमुखता से लिखा होना चाहिए कि वो किस देश का है, यानी उसकी पहचान क्या है. ये रजिस्ट्रेशन कोड पांच अक्षरों का होता है. पहले दो अक्षर देश का कोड होता है और उसके बाद के अक्षर ये दिखाते हैं कि हवाई जहाज की मालिक कौन सी कंपनी है. देश को ये कोड इंटरनेशनल सिव‍िल एविएशन ऑर्गनाइजेशन (ICAO) देती है.

1929 में मिला था VT
भारत को ICOA से 'Viceroy Territory' (VT) कोड 1929 में तब मिला था, जब यहां अंग्रेजों का राज था. लेकिन हैरानी की बात है कि 87 साल बीत जाने के बाद भी भारत अपनी गुलामी की इस पहचान को बदलने में नाकाम रहा है. मंगलवार को जब ये मामला संसद में उठा तो सभी पार्टियों के सांसदों ने सरकार से एक स्वर में मांग की कि इस नाम से जल्दी से जल्दी छुटकारा पाया जाए. मामले को उठाने वाले बीजेपी सांसद तरुण विजय ने कहा कि हैरानी की बात है कि चीन, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और फि‍जी जैसे देशों ने भी अपने देश का कोड बदल कर नया कोड हासिल कर लिया. लेकिन भारत अभी तक ये करने में नाकाम रहा है.

यूपीए सरकार ने की थी नया कोड लेने की आधी-अधूरी कोश‍िश
सच्चाई ये है कि यूपीए सरकार के दौरान भारत की तरफ से इस बारे में आधी अधूरी कोशिश की गई थी. भारत ने BA (भारत) या IN (इंडिया) कोड हासिल करने की कोशिश की. लेकिन पता चला कि B कोड चीन और I कोड इटली पहले ही ले चुका है. इसके बाद तत्कालीन सिविल एविएशन मिनिस्टर प्रफुल्ल पटेल ने ऐलान कर दिया कि मनमुताबिक कोड उपलब्ध नहीं होने के कारण भारत VT कोड ही जारी रखेगा.

अब सभी पार्टियों के सांसद मिलकर मांग कर रहे हैं कि गुलामी के प्रतीक इस को़ड का नामोंनिशान मिटाया जाए और कोई नया कोड जल्द से जल्द हासिल किया जाए.

साभार: आजतक

01 अगस्त 2015

बड़ा गर्व हैं न अपने धर्मों पर ?


जरा गिरेबान पर झाँक लो एक बार पता चल जाएगा कि अपनी ही उन धार्मिक सिद्धांतों, गुरुओं के दिखाए आदर्शों के विरुद्ध हो गये हो सभी, जिनके नाम पर इतना इतरा रहे हो |

याकूब दोषी था या निर्दोष, यह तो अदालत ही जानती है | आज लोग उसके बेगुनाह होने की बात कर रहे हैं, हो सकता है बेगुनाह हो | सरबजीत भी बेगुनाह था... कितनों ने साथ दिया था सरबजीत का पकिस्तान में ? याकूब को जो लोग आज निर्दोष बता रहे हैं, वे बाईस साल से भैंस चरा रहे थे ?

ऊपर से याकूब के जनाजे में उमड़ी भीड़ क्या जताना चाहती थी कि जिसे कई तरह की अपीलों के बाद भी, आधी रात को अदालत खुलवाने के बाद भी नहीं बचा सके वह निर्दोष था ? या फिर यह जताना चाहते हैं कि वे आतंकियों के साथ हैं | इतना शोक तो उन २५७ लोगों के परिवारों के लिए भी नहीं किया होगा इस देश ने जितना याकूब के लिए कर रहा है | वे २५७ लोग किस जुर्म में मारे गये थे ? उनको तो इतनी अपील करने की मोहलत देना तो दूर, पता भी नहीं चलने दिया गया कि उनकी मौत तय कर दी गयी है | सोचा कभी किसी ने कि उनकी अंतिम इच्छा भी नहीं पूछी गयी थी |

अब रहे ये हिंदुत्व के ठेकेदार बने छिछोरे और दोगले दुमछल्ले | याकूब की मौत हुई, उनके परिवार में पहले ही मातम है, लोग वहां पहले ही दुःख और नाइंसाफी मानकर भड़के हुए हैं | ये हिंदुत्व के सड़क छाप ठेकेदार घटिया और भड़काऊ पोस्ट बना कर उनको और उकसा रहे हैं | कल उनमें से कोई फिर आतंकवादी बनेगा और उसके दोषी होंगे हम हिन्दू ही | क्योंकि हमारी छिछोरी और सड़कछाप हरकतों के कारण कोई और गलत रास्ता चुन लेगा |

अब आइये धर्म और बताइए कि धर्म किसी को क्या इतना छिछोरा बना देता है कि मानवीयता ही मिट जाती ? क्या सीखा था अब तक स्कूलों में और धार्मिक गुरुओं से, यही छिछोरापन करना ? मैंने कई ऐसे लोगों के पोस्ट देखे जो जिनकी उम्र आधी से अधिक है, लेकिन याकूब या मुस्लिमों को लेकर उनके पोस्ट देखो तो लगता है कि ये आदमी इतनी उम्र किन मूर्खों की संगत में गुजार गया | ये आदमी ही है या केवल शक्ल आदमियों जैसी है | नौ दस साल का बच्चा इन जैसे बुजुर्गों से लाख गुना अधिक समझदार होगा | इनको तो जाकर किसी बच्चे के पैर पकड़ लेने चाहिए और उनकी सेवा करके ज्ञान प्राप्त करना चाहिए | ऐसे लोग समाज के लिए ही नहीं, राष्ट्र के लिए भी घातक हैं |

ये सजा एक राजनैतिक षड्यंत्र था यह हर किसी को समझ जाना चाहिए | उनका उद्देश्य ही था कि मुस्लिम समुदाय भड़के और जो नहीं भड़के उनको भड़काने के लिए अपने पालतू कुत्ते छोड़ दिए सोशल मिडिया में | वे उल्टियाँ करते फिर रहे हैं इधर उधर | उनको घुट्टी पिला दी गयी है कि जितना नफरत भड़काने वाली उल्टियाँ करोगे, उतने बड़े राष्ट्रभक्त और हिंदुत्व के रक्षक माने जाओगे | और ये सब करने का उद्देश्य केवल इतना ही है कि ओवैसी को जिन्ना की तरह मुस्लिमों का भगवान् बनाना है और बाकी संघी बजरंगी तो वही अपने कामों लगे ही हुए हैं | इस प्रकार फिर एक बार १९४७ दुहराया जाएगा और ओवैसी एक नये देश का प्रधानमंत्री बनेगा | वह देश भारत के ही टुकड़े से बनेगा | इसके साथ खालिस्तान बनेगा, बोडोलैंड बनेगा और न जाने कितने चीथड़े होंगे भारत के | न जाने इस दंगे में कितने निर्दोष मारे जायेंगे.....और्वैसी और संघी-बजरंगी अलग अलग दिखते जरुर हैं, लेकिन वास्तव में मिलजुल कर ही काम कर रहे हैं | उदाहरण के लिए भाजपा में एक ऐसे व्यक्ति का शामिल होना जिसे वे दाउद का आदमी कह रहे थे कल तक | बाकि और भी बहुत उदाहरण मिल जायेंगे यदि आप लोग आंख्ने खुली रखें | राजीव गाँधी के हत्यारों को माफ़ कर देना, हिन्दू आतंकवादियों के लिए नरमी बरतना.... ये सब सोची समझी रणनीति है ताकि मुस्लिमों को यह एहसास दिलाया जा सके कि यह देश उनके लिए अब गैर हो चूका है | सोचिये जरा ठन्डे दिमाग से क्या यही है राष्ट्रभक्ति ? क्या अपने ही देश के अपने ही लोगों को दंगों की आग में झोंक देना राष्ट्रभक्ति है ? क्या यही धर्म है ?

मुस्लिमों को भी चाहिए कि वे होश में रहें, हर दुर्घटना या नाइंसाफी के लिए इस देश के निर्दोष नागरिकों को सजा न दें | निर्दोषों को बम से उड़ा देने से समस्या का हल नहीं होगा | समस्या का हल होगा यदि हम इन राजनैतिक उपद्रवियों की चालों को समझें और आपसी सौहार्द बनाए रखें |

जो लोग भी राष्ट्रवादिता के नाम जहर उगल रहे हैं, भड़का रहे हैं दूसरों को, वे वास्तव में बिच्छु की वे औलादें हैं जो अपनी ही माँ का खून तब तक चूसते हैं जब तक उनकी माँ मर नहीं जाती | क्या भारत माँ को मारने की पूरी तयारी कर ली है ?

नोट: मुझे दुःख है कि मुझे इस प्रकार से लिखना पड़ा, हो सकता है कि यह लेख मुझे किसी बड़ी मुसीबत में डाल दे | लेकिन यह सब अब लिखना आवश्यक हो गया था | क्योंकि अब स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगडती ही जा रही है, जमीन में न सही पर सोशल मिडिया में तो ऐसा ही है | और यही कारण बनेगा जमीनी स्थिति बिगाड़ने के | सरकार गांधारी बन चुकी है उसे अपने लोग्नो के उपद्रव अब दिखेंगे नहीं | एक साम्प्रदायिक प्रधानमंत्री और एक साम्प्रदायिक पार्टी से हम अब अधिक आशा कर भी नहीं सकते | इनके अपने ही नेता आये दिन कोई न कोई भड़काऊ बयान दे देंगे और फिर बाद में माफ़ी भी मांग लेंगे दिखाने के लिए | दुर्भाग्य से भारत में इस समय ऐसा को और नेता दिख भी नहीं रहा जिसे हम भारतीय सिद्धांतों व आदर्शों के संरक्षक के रूप में देखें | ऐसा भी कोई नहीं दिख रहा जो राष्ट्र को धर्म और जाति के दलदल से उठाकर आपसी सौहार्द स्थापित करे और मूल समस्याओं पर ध्यान देकर राष्ट्र को समृद्धि की और ले जाए | अधिकांश नेता तो नेता कम और नौटंकी अधिक दिखते हैं | काम में ध्यान देने से अधिक सेल्फी और नौटंकी में धयान देते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

29 अप्रैल 2015

...लेकिन हम सवा सौ करोड़ लोग मुट्ठी भर नेताओं के भरोसे बैठे हैं !!!



एक अकेला चंदू पूरे गाँव के लिए कुआँ खोद कर पानी निकाल सकता है, लेकिन हम सवा सौ करोड़ लोग मुट्ठी भर नेताओं के भरोसे बैठे हैं !!!
Posted by विशुद्ध चैतन्य on Tuesday, April 29, 2014

कानून के जानकारों को हिंदी बोलने, लिखने, पढ़ने में शर्म आती है



बहुत ही दुःख की बात है कि भारत आज भी अंग्रेजों का गुलाम है | आज भी अंग्रेजी से मुक्त नहीं हो पाया | आज भी न्याय व्यवस्था...
Posted by विशुद्ध भारतीय on Tuesday, April 29, 2014

26 अप्रैल 2015

कहीं विदेश जाने की जरुरत नहीं आपको...



कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत में एक से एक शानदार पहाड़ हैं, पहाड़ों की श्रृंखलाएं हैं और सुंदर एवं मनोरम घाटियां हैं।
Posted by Webdunia Hindi on Sunday, April 26, 2015

28 दिसंबर 2014

‘कभी भी रतन टाटा बनने की कोशिश मत करना’

उद्योगपति श्री रतन टाटा 

  •  यदि जीवन में सफल होना है तो सफल व्यक्ति की तरह काम करना चाहिए और उसके बताए रास्ते पर चलना चाहिए पर रतन टाटा ऐसा नहीं मानते हैं उनका कहना है कि ‘प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेष गुण एवं कुछ विशेष प्रतिभाएं होती हैं इसलिए व्यक्ति को सफलता प्राप्त करने के लिए अपने गुणों की पहचान करनी चाहिए’. यहां तक कि रतन टाटा ने सायरश मिस्त्री को भी यही कहा था कि ‘कभी भी रतन टाटा बनने की कोशिश मत करना’.
  •  दूसरों की नकल करने वाले व्यक्ति थोड़े समय के लिए सफलता तो प्राप्त कर सकते हैं परंतु जीवन में बहुत आगे नहीं बढ़ सकते हैं.
  • अपने जीवन की परिस्थितियों और अपनी प्रतिभाओं के अनुसार अपने लिए अवसर एवं चुनौतियों को चिन्हित करना चाहिए.
  • दूसरे सफल लोगों से इस बात की प्रेरणा लेनी चाहिए कि जब वह व्यक्ति सफल हो सकता है तो मैं क्यों नहीं हो सकता हूं पर प्रेरणा लेते समय आंखों को बंद नहीं कर लेना चाहिए.
  • दुनिया में करोड़ो लोग मेहनत करते हैं फिर भी सबको भिन्न-भिन्न परिणाम प्राप्त होते हैं. इस सब के लिए मेहनत करने का तरीका जिम्मेदार है इसलिए व्यक्ति को मेहनत करने के तरीके में सुधार करना चाहिए.
  • पेड़ काटने के पूर्व कुल्हाड़ी की धार देखने की आवश्यकता होती है इसलिए जब आठ घंटे में पेड़ काटना हो तो छः घंटे कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाने पर सफलता प्राप्त होने के अवसर बढ़ जाते हैं.
  • किसी भी कार्य को निर्धारित समय सीमा में ही पूरा करना चाहिए और वो ही कार्य करना चाहिए जिसमें पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो.

  आशा है कि आपको दिए गए ‘रतन टाटा के टिप्स’ आपके व्यापार और अन्य काम के लिए सफल साबित होंगे.

07 दिसंबर 2014

सारे सुविचार खोखले हैं...

"....केवल प्रवचन तक ही सीमित है व्यवहारिक कहीं नहीं | यदि व्यवहारिक होते, तो ये धार्मिक, सभ्य, पढ़े-लिखे, अंग्रेजी बोलने वाली भेड़ें, नेताओं और पूंजीपतियों के दुमछल्ले न होते | ये नेताओं और मंदिरों को दान देने के स्थान पर आपस में सहयोगी हो गये होते, अपने से कमजोरों को सहयोग करते कि वे भी समृद्ध हो सकें |

जबकि इतने सारे सुविचार हर रोज लोग पढ़ और सुन रहें हैं, फिर भी नेताओं और बाबाओं के चरणों में लोट रहें हैं |" -विशुद्ध चैतन्य

03 दिसंबर 2014

मानवता अभी भी जिंदा है भारत में




अहमदाबाद के एक मुहल्ले में गली के कुत्ते की मौत होने पर पूरा मुहल्ला शोक में डूब गया। इस कुत्ते का नाम सोनू था।  18 साल पुराने कुत्ते की मौत से शोक में डूबे मुहल्ले वालों ने पूरे विध-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया। गली के कुत्ते की मौत से मुहल्ले वाले इतना दुखी हुए क‌ि कई के आंसू नहीं रुक रहे थे। लोगों का कहना था कि सोनू 24 घंटे मुहल्ले की रखवाली करता और मुहल्ले के सभी निवासियों उससे बहुत ही प्रेम करते थे।

मुहल्ला वासियों ने सोनू के शव के ऊपर फूल चढ़ाकर अपनी श्रद्धांजलि दी।


01 दिसंबर 2014

बुराई करने के लिए तो सारा ज़माना है....


अक्सर हम सभी दूसरों की नजर में अच्छे बनने के चक्कर वह नहीं हो पाते जो होना चाहते हैं | मुझे याद है जब अन्नुमालिक का इंटरव्यू पहली बार देखा था, तब मेरे पिताजी के मुँह से निकला था कि यह मैं मैं बहुत करता है | मुझे भी यही लगा था तब, लेकिन उसके बाद उसकी कई सुपरहिट गाने आने लगे | उसके बारे में मेरे साथी जो उसे जानते थे, वे बताते थे कि ये प्रोड्यूसरों के बाथरूम के बाहर भी खड़े होकर अपनी धुनें सुनाने से नहीं हिचकता था | कहता था कि आप आराम से निपट लीजिये मैं बाहर से ही धुन सुना देता हूँ.....चलिए ये सारी बातें तो लोग कहते ही हैं जब कोई सफल हो जाता है | लेकिन मुख्य मुद्दा यह कि आज की दुनिया में यदि आप सफल होना चाहते हैं तो अपने मुँहमियाँ मिट्ठू बने अन्नुमालिक की तरह | क्योंकि आज किसी की पास समय नहीं है आपके विषय में जानने या प्रचार करने का | और न ही हर कोई इतना सौभाग्यशाली होता है कि अम्बानी अदानी जैसे लोग करोड़ों रूपये फूँक दें आपके प्रचार के लिए |

पूरे वर्ष में केवल दो दिन ही हमें अधिकार है राष्ट्रभक्त होने का

कल डीएवी पब्लिक स्कूल की शाखा खुलवाने के लिए बात करने एक पंडित जी आये | वे बोले कि आपके पास तो इतनी जमीन पड़ी हुई है, इसमें तो कई स्कूल खुल सकते हैं | डीएवीपी स्कूल वाले काफी समय से मुझे कह रहे थे कि आप लोगों से बात करूँ और यदि आप आज्ञा दें तो स्कूल खुलवा देंगे यहाँ पर | आप लोगों की दरिद्रता भी समाप्त हो जायेगी और महीने के महीने अच्छी कमाई भी हो जाएगी | उस स्कूल का बहुत नाम है.......

मैंने उनसे कहा, "पंडित जी आप गलत आ गये मेरे पास | बेहतर है आप जाकर ट्रस्टियों और आश्रम के अध्यक्ष से ही बात करें क्योंकि उन्हीं को शौक है अंग्रेजी संस्कृति और भाषा का | उन्हें शर्म आती है भारतीय होने में.......मेरे से पूछोगे तो साफ़ मना कर दूंगा | और जब तक बस में रहेगा अंग्रेजी संस्कृति वाले स्कूल तो यहाँ नहीं खुलने दूंगा |

यदि कभी खुला भी, या मैं इस योग्य हुआ कभी कि स्कूल खुलवा सकूं तो एक ऐसा स्कूल खोलना चाहता हूँ जो विश्व में अद्वितीय हो | जो भारतीय संस्कृति को ठीक उसी प्रकार प्रभावी रूप से सिखा व समझा पाए जैसे कि नालंदा और तक्षिला सिखाते व समझाते थे प्राचीन काल में | मेरे स्कूल के बच्चे वैसे ही राष्ट्रभक्त हों, जैसे जापान, जर्मन या रशिया के होते हैं | लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं अभी इतना समर्थ नहीं हूँ लेकिन एक दिन हो जाऊंगा |"

वे बोले, "वाह वाह...! कितने उच्च विचार हैं आपके...आप ने मेरे भीतर भी राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार कर दिया.... वैसे अध्यक्ष महोदय कब लौटेंगे ?"

"अगले हफ्ते |" मैंने उत्तर दिया |

"फिर ठीक है मैं अगले हफ्ते आता हूँ उन्हीं से बात कर लूँगा स्कूल के विषय में...." कहकर व चले गये |

मेरी समझ में नहीं आया कि पंडित जी ने राष्ट्रभक्ति की परिभाषा क्या निकाली, और किस राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार हुआ उनमें ? कहीं वही तो नहीं जो आजकल के नेता और उनके दुमछल्लों के भीतर प्रवाहित हो रहा है.... जब तक विदेशी भारत में अपनी दुकान नहीं खोलेंगे हम भारतीयों का विकास नहीं होगा, जब तक अमेरिका हमारे सर पर हाथ नहीं रखेगा हम अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पायेंगे, जब तक अंग्रेजी नहीं बोलेंगे तब तक खेतों में फसल नहीं होगी और गाय दूध नहीं देगी.... आदि इत्यादि ?

चलिए जाने दीजिये हमें क्या करना अपना दिमाग खराब करके | पूरा राष्ट्र और उसके नेता ही जब अंग्रेजों के क़दमों में पड़ा हुआ है तो किस किस को उठाते फिरूंगा मैं भी | वैसे भी खाली हाथ आया था खाली हाथ जीया और खाली हाथ ही जाऊँगा | अकेला आया, अकेला जीया और अकेला ही जाऊँगा | तो काहे को इन अंग्रेजों की अवैध संतानों के मुँह लग कर अपना यह जन्म खराब करना ?

न जाने क्यों मैं कब विकसित हो पाऊंगा ? आज भी यही मानकर बैठा हूँ कि भारत भारतीयों का है जबकि सारी दुनिया जानती है कि भारत नेताओं, अपराधियों, पूंजीपतियों और विदेशियों का है | हम भारतीय तो केवल वोट-टैक्स देने और  ताली व जयकारा लगाने के लिए ही हैं | पूरे वर्ष में केवल दो दिन ही हमें अधिकार है राष्ट्रभक्त होने का, बाकी तो पूरा साल अमेरिका भक्ति में बीतता है | -विशुद्ध चैतन्य 

03 जुलाई 2014

१२ जून, १८५७ को रोहिणी (देवघर) में स्वतंत्रता का प्रथम शंखनाद गूंजा

२१ मार्च, १८५७ को बैरकपुर छावनी (बंगाल) के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया | अंग्रेज सार्जेंट ह्युम और लेफ्टिनेंट बॉब को भारत माता के चरणों में बलि देने (क़त्ल करने) के जुर्म में ८ अप्रैल, १८५७ को भारत माता के वीर सपूत मंगल पाण्डेय को अंग्रेजों ने अपनी सैनिक अदालत में प्रातः ५ बजे फाँसी पर लटका दिया |

बैरकपुर सैनिक विद्रोह और वीर मंगल  पाण्डेय की फाँसी की खबर जब रोहिणी (देवघर) स्थित देशी घुड़सवार सैनिक छावनी पहुँची तो १२ जून, १८५७  को रोहिणी (देवघर) में स्वतंत्रता का प्रथम शंखनाद गूंजा | रोहिणी छावनी के घुड़सवार सैनिकों ने विद्रोह कर दिया |

भारतीय सैनिकों कने हाथों में हथियार ले कर भारत माता की जय जयकार करते हुए तीन अंग्रेज सेनाधिकार जो उनके ऊपर तैनात थे, मेजर मेक्डोनाल्ड, लेफ्टिनेंट सर नॉर्मन लेजली तथा सहायक सर्जन डॉ० ग्राहम पर हमला कर दिया | इस हमले में लेफ्टिनेंट मारे गए और दो अंग्रेज घायल अवस्था में भागने में सफल हो गये | सैनिकों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया और समवेत स्वर में मुक्ति के गीत गाने लगे |

इस विद्रोह की सुचना अंग्रेजी सैनिकों के मुख्यालय भागलपुर पहुँची और वहाँ से तीन डिविजन अंग्रेजी फ़ौज रोहिणी आ गयी और सैनिक छावनी को चारों और से घेर लिया गया | १६ जून, १८५७ को सैनिक न्यायालय में विप्लवी सेना नायक वीर सलामत अली, वीर अमानत अली, वीर शेख हारो एवं अन्य हिन्दू-मुस्लिम सैनिकों को विशाल आम वृक्ष की शाखाओं में लगे फाँसी के फंदों में हाथियों पर चढ़ा चढ़ा कर लटका दिया गया |

महामृत्यु के पूर्व इन देशभक्त क्रान्तिवीरों ने नमाज अदा की, धरती पर माथा टेका और सिंहनाद करते हुए कहा;
"आज ही के दिन, उस काले १६ जून, १७५७ को सत्तालोलुप मीरजाफ़र ने पाक क़ुरान शरीफ़ पर हाथ रख कर झूठी कसम खाई थी और वतनपरस्त नवाब सिराजुद्दौला के साथ गद्धारी की थी , उस कलंक को आज हम अपने लहू से धो रहें हैं | अलविदा !"
इस प्रकार, आजादी के परिंदों ने फाँसी के फंदे को चूम लिया और सदा के लिए अमर हो गये | अन्य भारतीय सैनिकों के साथ अंग्रेज फौजियों ने घोर अमानुषिक अत्याचार कर उनको भी मौत के घाट उतार दिया |

इस विद्रोह को दबाने के क्रम में ६ मास तक अंग्रेजी सेना रोहिणी में ठहरी रही और उनका सारा राशन बन्दूक की नोंक पर रोहिणी के किसानों और व्यापारियों को देना पड़ा | जिस मैदान में गोरी फ़ौज ठहरी थी, उस स्थान पर बसा मोहल्ला आज 'गोराडीह' के नाम से जाना जाता है |  -बैकुंठ नाथ झा द्वारा लिखित पुस्तक: मातृ-बंधन मुक्ति-संग्राम में संथाल परगना से साभार 

"मेरा शत शत नमन हैं देश के उन सच्चे वीरों को | लेकिन दुःख इस बात का है कि उन वीरों को नहीं मालुम था, कि मीर जाफर के वंशज आज भी उनके बलिदान को कलंक लगायेंगे | फिर विदेशियों के साथ हाथ मिलाकर, देश को फिर से गिरवी रखने के लिए ऍफ़डीआई के समर्थन में नारे लगायेंगे |" -विशुद्ध चैतन्य