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25 जून 2018

न धर्म बचा है न इंसानियत, अब तो केवल ढोंग बचा है

मेरे एक पोस्ट पर दो महत्वपूर्ण कमेंट्स आये थे जिनका उत्तर मैं विस्तार से देना चाहता था...पहले पोस्ट पढ़ लीजिये, फिर वे दो महत्वूर्ण कमेंट्स और फिर मेरा उत्तर....

कोई मुस्लिम मारा जाए भीड़ द्वारा तो मुस्लिम समाज चिंतित हो जाएगा लेकिन कोई मुस्लिम भूख से मर रहा हो, उसके खेत की फसल नष्ट...
विशुद्ध चैतन्य द्वारा इस दिन पोस्ट की गई शनिवार, 23 जून 2018

"अप्राकृतिक मौत तो अत्यंत दुखद है। किन्तु गुरूजी मोब लिंचिंग व जैसा आपने इंगित किया, अन्य मौत में कुछ फर्क तो है ही। पहली समाज की क्रूरता प्रदर्शित करती है, जो कानूनन अपराध है जबकि दूसरी समाज की उदासीनता जिसे मोरल अपराध तो कहा जा सकता है किन्तु कानूनन अपराध नहीं है।" -Abdul Basit

"Sir with all due respect...
Mje aap ye bta do....
How a person dying from hunger and A person who is healthy, going to live a life,earnig well ..is killed by a anarchist mob is same...How?????
You are violently taking his life...he was capable of all thing...
Yahi to galat hai sir ji....
Aap jaise log iss inhuman crime ko justify karne ke lie aa jate hai......what to say i mean u all had justified kathua rape case..what else can be expected...

If cow are pious ...ask ur gov . To make a law prohibiting cow slaughter
Next time give BJP vote only when they will do that
Otherwise there will be anarchy if this kind of situation will go on
Ask BJP to make law
Stop killing people in name of religion
This is inhuman and cruel thing a man can do...And stop justifying it..plz"
-Arif Khan





उपरोक्त दोनों ही यह कहना चाहते हैं कि भीड़ द्वारा की गयी हत्या और समाज द्वारा किसी को मरता हुआ छोड़ देना, दोनों में भिन्नता है | एक जघन्य अपराध है और दूसरा अपराध की श्रेणी तो आता है लेकिन वह नैतिक अपराध है यानि वह अपराध जघन्य अपराध नहीं है | मुझपर यह भी आरोप लगाया गया कि मैं भीड़ द्वारा की गयी हत्या को जस्टीफाई कर रहा हूँ |

How a person dying from hunger and A person who is healthy, going to live a life,earnig well ..is killed by a anarchist mob is same...How?????


सबसे पहले तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं किताबी धार्मिक नहीं हूँ और न ही धार्मिकता या नैतिकता का ढोंग करना पसंद करता हूँ | मेरे लिए किसी भी भीड़ द्वारा की गयी किसी भी निर्दोष या दोषी की हत्या, बलात्कार....आदि सब अपराध ही है | मैं किसी एक अपराध को धार्मिकता के चश्में से और दूसरे अपराध को राष्ट्रीय कानून या संविधान की नजर से नहीं देखता | मेरे लिए धर्म, जाति या ईशनिंदा के नाम पर हत्या, बलात्कार, सार्वजनिक सम्पत्ति की क्षति, दंगा-फ़साद, लूट-पाट आदि सभी संवैधानिक, नैतिक व धार्मिक अपराध हैं | आप नैतिक अपराध और राष्ट्रीय संविधान की दृष्टि में किये गये अपराधों को अलग अलग रख सकते हैं, किसी को कम या या किसी को अधिक महत्व दे सकते हैं, लेकिन मैं नहीं |

किसी भी निर्दोष का मारा जाना मानवता पर कलंक है | हिंसक पशु भी किसी राह चलते निर्दोष को जान से नहीं मार देते यदि वे पागल या भूखे न हों | लेकिन मानव यदि नर-भक्षी हो जाए, नैतिकता या धार्मिकता के नाम पर तो शर्मनाक है | वह अपनी हवस, अपनी भूख मिटाने के लिए इंसानों का ही शिकार करने लग जाए तो यह शर्मनाक है |

कानून या संविधान


कानून या संविधान वह नियम हैं जो समाज को यह बताता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए | ये नियम तय करते हैं कि क्या पाप है क्या पुण्य, क्या नैतिक हैं और क्या अनैतिक, क्या अपराध है और क्या नहीं, क्या धर्म है और क्या अधर्म |  संविधान चाहे पारिवारिक हो, सामजिक हो, किसी संस्था का हो या किसी राज्य या देश का, सभी में यह सुनिश्चित किया जाता है कि अपराधियों सजा देने का अधिकार भीड़ को नहीं है | सजा केवल अधिकृत विशेषज्ञ ही दे सकते हैं और वह भी पूरी जांच परख करने के बाद |

आप पाप-पुण्य कहें या नैतिक-अनैतिक कहें या अपराध-निरपराध कहें या धर्म-अधर्म | केवल शब्दों का अंतर है, अर्थ एक ही है | धर्म वह जो समाज के लिए हितकर हो, सुखकर हो, सहयोगी हो और अधर्म है विपरीत | जब कोई समाज या भीड़ हिंसक हो जाए और वह किसी निर्दोष की हत्या पर उतारू हो जाए, तो निश्चित मानिए कि वे अपराधी हैं, अधर्मी हैं, अनैतिक हैं | फिर यह हत्या भीड़ की अनदेखी की वजह से हुई हो या जानबूझकर की गयी हो | फिर कोई भूख से मर गया हो, या कर्जों के बोझ से दबकर मर गया हो या दौड़ा दौड़ाकर, पीट पीट कर मार दिया गया हो, एक ही बात है | क्योंकि ये अधर्म है, अनैतिक है, पाप है, अपराध है |

धार्मिकों का दोगला समाज


समाज दोगला होता है विशेषकर धार्मिकों का समाज | वह अपने पाप की सजा के लिए कयामत के दिन की प्रतीक्षा करता है लेकिन दूसरों के पापों की सजा तुरंत देना चाहता है | उदाहरण के लिए ईशनिंदा के नाम पर हत्या या सजा | ईश्वर की निंदा की किसी ने, उसके लिखे किताब को क्षत्ति पहुँचाई तो सारा समाज दौड़ पड़ेगा उसे सजा देने के लिए | तब कयामत की प्रतीक्षा नहीं करेगा | तब नहीं कहेगा कि ईश्वर की निंदा की है, ईश्वर की किताब को क्षति पहुँचाई है, ईश्वर खुद उसे सजा देगा | यानि ईश्वर से ऊपर हो गया समाज जो ईश्वर का अनादर करने वाले को सजा देने निकल पड़ता है ??

दूसरा दोगलापन देखिये समाज का कि यदि अपराधी गरीब है, असहाय है, किसी राजनेता से संरक्षण प्राप्त नहीं है, तो उसे दौड़ा-दौड़ा कर पीट पीट कर मार देंगे | लेकिन यदि अपराधी आर्थिक रूप से समृद्ध है, ऊँचे पदों पर आसीन है, अच्छे रुतबे वाला है, तो वह देश भी बेचकर खा जाये तो यही न्यायप्रिय समाज उसके पीछे दुम हिलाता घूमेगा | यदि अपराधी ने सार्वजनिक रूप से घोषणा भी कर दी अपने अपराधों की, अपने ऊपर चल रहे केसों की, तब भी समाज उसकी जय जयजयकार करते हुए घूमेगा | और ऐसे लोगों में वे भी लोग होंगे, जो खुद को धर्म व नैतिकता का ठेकेदार समझते हैं, जो खुद को धर्मशास्त्रों, कानून व नैतिकता का जानकार समझते हैं |

कोई गरीब चोरी करता पकड़ा जाए तो भीड़ उसे मौत दे देगी, लेकिन यदि कोई नेता चोरी करता पकड़ा जाए तो कानून उसे सजा देगा | देगा भी या नहीं देगा उससे भी समाज को कोई सरोकार नहीं होता, वह जेल में बैठा बैठा ही चुनाव लडेगा और जीत जाएगा | और आप मुझ पर दोष लगा रहे हैं कि मैं अपराध को जस्टिफाई कर रहा हूँ ???

भीड़ द्वारा की गयी हत्या और भूख, बेरोजगारी व कर्ज से हुई आत्महत्या दोनों के लिए भीड़ ही जिम्मेदार है | भीड़ धार्मिकों की, भीड़ नैतिकता के ठेकेदारों की, भीड़ खुद को सभ्य वह शिक्षित मानने वालों की, भीड़ आर्थिक रूप से संपन्न लोगों की और भीड़ धर्म व जाति के नाम पर हत्या करने वालों की....भीड़ ही होती है | भीड़ के पास विवेक नहीं होता, भीड़ के पास अक्ल नहीं होती, वह तो केवल भीड़ है अपनी बुद्धि, सोचने समझने की शक्ति खो चुकी, मानसिक् रूप से विक्षिप्त हो चुकी भीड़ है वह बस और कुछ नहीं | फिर वह खुद को कितना ही धार्मिक दिखाने की कोशिश करे, कितना ही नैतिक दिखाने की कोशिश करे, सब व्यर्थ | क्योंकि कोई निर्दोष मारा गया भीड़ की लापरवाही या उन्माद में वह पाप ही होगा, वह अधर्म होगा |

कठुआ रेप केस धार्मिकता के आढ़ में किया गया था | वह धार्मिक ही नहीं, मानवीय रूप से भी अपराध ही था | किसी को ईशनिंदा के नाम पर मार दिया गया, किसी को कार्टून बनाने पर मार दिया, किसी को फिल्म बनाने पर मार दिया, किसी को आलोचनात्मक लेख लिखने पर मार दिया....ये सब अपराध ही हैं, अधर्म ही हैं | मैं इनमें से किसी भी हत्या को धर्मसंगत नहीं समझता और न ही धार्मिक पुस्तकों या मान्यताओं के आधार पर जस्टिफाई करूँगा |

पहले धर्म को समझ लें, पहले नैतिकता को समझ लें, पहले संविधान को समझ लें...फिर मुझपर कोई आरोप लगायें | कोई लड़की या लड़का आपस में प्रेम करें, वे अकेले में मिलें तो आपका धर्म, नैतिकता खतरे में पड़ जाते है | लेकिन कोई बैंक ही लूटकर फरार हो जाये, कोई दुनिया भर के टैक्स लगाकर आपको लुटे और उसका साथ देते समय आपका धर्म और नैतिकता खतरे में नहीं पड़ता | कोई भीड़ किसी को पीट पीट कर मार दे और मारने वाला और मरने वाला अलग अगल मजहब के हुए तो आपका धर्म और नैतिकता जाग जाता है | लेकिन आपके ही लापरवाही के कारण कोई भूख से तड़प तड़प कर मर जाता है, कोई किसान आत्महत्या कर लेता है, कोई निर्दोष बेघर हो जाता है...तब न तो आपकी नैतिकता जागती है और नहीं धर्म | न तब आपका खुदा नाराज होता है और न ही आपके समाज की नजर में कोई अपराध होता है |

मैं दोगला नहीं हूँ, मैं किसी भी कमजोर, निर्दोष, निहत्थे पर हुए अपराधों को अलग अलग नजरों से नहीं देखता | फिर अपराध असभ्यों की भीड़ करे या सभ्य धार्मिकों की भीड़....मेरे लिए दोनों ही भीड़ हैं और दोनों ही अपराधी हैं |

हाँ मैं परिस्थिति जन्य अपराधों के लिए भी समाज, धर्म व नैतिकता के ठेकेदार व सरकारों को ही दोषी मानता हूँ | किसी को अपने बच्चे या परिवार की जान बचाने के लिए चोरी करनी पड़ी या हथियार उठाने पड़े या हत्या करनी पड़ी तो मैं उसे अपराधी नहीं मानूंगा, बल्कि उस समाज को अपराधी मानूँगा जिसका वह सदस्य है | वह इस अवस्था में पहुँचा क्योंकि समाज ने उसकी सहायता नहीं की | क्योंकि सरकार ने उसकी सहायता नहीं की, उसे न्याय नहीं मिला, इसीलिए ही उसे अपराध करना पड़ा, इसीलिए वह व्यक्ति दोषी नहीं, बल्कि समाज व सरकार ही दोषी माने जायेंगे | मैं ऐसे व्यक्ति को कभी भी सजा देना पसंद नहीं करूँगा |

~विशुद्ध चैतन्य

23 जून 2018

सावधान ! धर्म खतरे में है !!!



अक्सर हम सुनते हैं कि धर्म खतरे में हैं | गली मोहल्लों से लेकर विश्वस्तर पर धर्म रक्षक बने लुच्चे लफंगों की सेनाएं तैनात हो रहीं हैं | हर किताबी रट्टामार धार्मिक इस बात पर बहुत ही गंभीरता से विश्वास करता है कि धर्म खतरे में हैं और उसकी रक्षा करने के लिए लठैतों, छुरेबाजों, तलवारबाजों, कट्टेबाजों और असाल्ट राइफलधारकों की सेनाओं की आवश्यकता है | इसलिए वह इन सड़क छाप लफंगों की सेनाओं को दोनों टाँगे उठा नतमस्तक होकर नमन करता है |

आये दिन गुंडे बदमाश और बेरोजगार लफंगे धर्म की रक्षा के नाम पर किसी न किसी निर्दोष निहत्थे की हत्या कर देते हैं या उसे बुरी तरह घायल कर देते हैं | कहीं गौ रक्षा के नाम पर हत्याएं हो रहीं हैं तो कहीं इस्लाम और हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर | कहीं धर्म की रक्षा के लिए लडकियाँ उठा ली जाती हैं तो कहीं बलात्कार करके मार दिया दिया जाता है.....और ये सारे काम धार्मिक काम धर्म के रक्षकों द्वारा बड़ी श्रृद्धा से किया जा रहा है |

यह और बात है कि मेरे जैसे मंदबुद्धि लोगों की समझ में यह बात नहीं आती और कभी भी नहीं मानते कि धर्म खतरे में हैं....लेकिन मैं भी अब मानने लगा हूँ | क्योंकि अब स्पष्ट दिखने लगा है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं | अब प्रमाणित हो चुका है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं |

 

क्या धर्म खतरे में है ?

 

बिलकुल धर्म खतरे में है अब कोई संदेह नहीं रह गया | बस कुछ लोग समझ नहीं पा रहे कि धर्म खतरे में है, लेकिन धर्म वास्तव में खतरे में है | केवल भारत में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में धर्म खतरे में है |

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन....जैसे सम्प्रदायों, रिलीजन्स की बात नहीं कर रहा |  मैं केवल धर्म की ही बात कर रहा हूँ और उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे मैं सनातन धर्म कहता हूँ, जिसे मैं प्राकृतिक व ईश्वर प्रदत्त धर्म कहता हूँ | मैं किसी मानव निर्मित या किसी व्यक्ति-विशेष या किताब-विशेष पर आधारित धर्म की बात नहीं कर रहा | मैं तो उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे लोग मानवता कहते हैं, इंसानियत कहते हैं, Humanism कहते हैं |

 

जो सनातन है वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?


पड़ सकता है नहीं, पड़ चुका है | अब समाज, परिवार व माता-पिता अपने बच्चों को इंसान नहीं बनाते, बल्कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, कांग्रेसी, भाजपाई, सपाई, बसपाई बनाना पसंद करते हैं | अब माता-पिता स्वप्न नहीं देखते कि उनके बच्चे बड़े होकर इन्सान बन जाएँ, बल्कि अब सपने देखते हैं कि उनके बच्चे बड़े होकर डॉक्टर बने, इंजिनियर बनें, आईएएस बने, आइपीएस बने | अब माता पिता को बुरा नहीं लगता कि उनके बच्चे डिग्री लेकर लुच्चों लफंगों की सेना में शामिल होकर गुंडा-गर्दी करता फिरे, मोब-लिंचिंग करता फिरे, धूर्त-लम्पट नेताओं के तलुए चाटता फिरे, छुरा-कट्टा लेकर सड़कों पर आवारगर्दी करता फिरे...बल्कि अब उन्हें गर्व होता है कि उनका बच्चा यह सब करके धर्म की रक्षा कर रहा है |

और ऐसी मानसिकता का विस्तार होना सनातन धर्म को भी खतरे में डाल देता है | क्योंकि जब मानव ही सनातन धर्म से विमुख हो जायेगा और दड़बों को धर्म समझने लगेगा, तो धर्म का पतन निश्चित है | अब आपको न तो इस्लामिक समाज में धर्म दिखाई देगा और न ही हिन्दू समाज में, न ही साधू-समाज में, न ही बाल्मीकि, अम्बेडकर, मोदी या किसी और समाज में या दड़बे में धर्म दिखेगा | न तो मंदिरों में आपको धर्म दिखेगा, न ही मस्जिदों में आपको धर्म दिखेगा, न स्कूलों में, न कॉलेजों में.....यानि धर्म पुर्णतः बहिष्कृत हो चुका है समाज में और साम्प्रादायिकता को धर्म का नाम दे दिया गया |

अब केवल दिखावे के धार्मिक दिखेंगे, अब केवल दिखावे के धार्मिक कर्मकांड जैसे कि दान, सेवा, परोपकार, कमजोर व असहायों की निःस्वार्थ सहायता, शालीनता, सभ्य शालीनता पूर्वक बात करने की कला, अशिष्टता से परहेज, खुद खाने से पहले भूखे को खिलाना.....आदि इत्यादि सब व्यावहारिकता में लुप्त ही चुके हैं और जो थोड़ा बहुत दिख भी कही रहा है, तो वह भी दिखावा ही है | बिलकुल वैसे ही जैसे बड़े तोंद वाले बेडौल महापुरुषों का योग के प्रचार के लिए कैमरे के सामने योग करना | यानि जो कुछ भी किया जा रहा है वह भीतरी आवेग से नहीं, धार्मिक परम्परा मानकर किया जा रहा है |

यही कारण है कि अब धर्म की शिक्षा सभ्य व शालीन विद्वान नहीं देते, न ही स्कूलों, विश्वविद्यालयों में सिखाया जाता है | बल्कि सड़क छाप लुच्चे लफंगों को कट्टा, तमंचा, लाठी, बन्दूक थमाकर धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी सौंप देते हैं | इन लुच्चे लफंगों द्वारा किसी निर्दोष की हत्या कर देने पर न उनके माता-पिता शर्मिंदा होते हैं और न ही समाज या धार्मिक लोग शमिन्दा होते हैं | क्योंकि उनका धर्म तो किताबों में सुरक्षित है तो वे जानते हैं कि उनका धर्म खतरे में नहीं है | सारे देश में लोग आपस में मार काट-करने लगें, तब भी ये धार्मिक यही मानेंगे कि उनका धर्म खतरे में नहीं है...वे सही हैं | क्योंकि उनका धर्म किताबी है जो कभी व्यावहारिक नहीं हो सकता और जो व्यवहारिक ही नहीं है, वह खतरे में भला कैसे पड़ सकता है ? जो योद्धा अपने घर से बाहर ही न निकले, जो तलवार अपने म्यान से ही न निकले, भला वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?

 

धर्म क्या है और अधर्म क्या है ?


लेकिन मैं मानने लगा हूँ कि धर्म खतरे में है | क्योंकि धर्म पारम्परिक कर्मकाण्ड नहीं है | पूजा-पाठ, नमाज, तिलक, टोपी, घंटे-घड़ियाल, आरती-कीर्तन धर्म नहीं हैं | धर्म है परोपकार, सेवा, सहयोग, आपसी सद्भाव, प्रेम, करुणा, समाज के हितार्थ कार्य करना, अपने गाँव, मोहल्ले के हितार्थ कार्य करना, राष्ट्र व नागरिकों के हितार्थ कार्य करना | और यह सब करते हुए, स्वयं को प्रसन्न व स्वस्थ रखने के समस्त उपाय करना, अपने सामर्थ्यानुसार उपलब्ध भोगों का उपभोग करना, नाचना, गाना...उत्सव मनाना ये सब धर्म हैं |

दूसरों को कष्ट देना, दूसरों की सम्पत्ति छीनना, दूसरों पर अत्याचार करना, दूसरों के सुख में बाधा डालना, दूसरों के प्रेम में विष घोलना, समाज में सांप्रदायिक वैमनस्यता पैदा करना, निहत्थे, निर्दोषों की हत्याएं करना, गाली-गलौज करना, अशिष्टता से बात करना....ये सब अधर्म हैं |

 

सप्रमाण समझिये कि धर्म कैसे खतरे में हैं


भारत में शायद ही कोई होगा जो खुद को अधार्मिक कहता हो | नास्तिक भी खुद को अधार्मिक नहीं कह सकता क्योंकि नास्तिक भी कहीं न कहीं कोई न कोई परोपकार के कार्य कर ही देता है| और परोपकार धर्म है | तो जब सवा अरब से अधिक की आबादी धार्मिक है चाहे वह किसी भी पंथ, मत, संप्रदाय से सम्बंधित हो, लेकिन स्वयं को धार्मिक तो मानता ही | इनमें से कई लोग ऐसे भी होंगे जो खुद को हिन्दू नहीं मानता, मुस्लिम नहीं मानता, सिख नहीं मानता लेकिन इन्सान तो मानता ही है | और इंसानियत धर्म है क्योंकि इसका विपरीत हैवानियत अधर्म है |

लेकिन इतनी बड़ी संख्या में धार्मिकों के रहते हुए भी भारत में धर्म लुप्त होने के कागार पर पहुँच जाना गंभीर चिंता का विषय है

 

प्रथम प्रमाण:


एक खबर पढ़ी मैंने; 'तेजी से महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत में तकरीबन 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैंं और प्रतिदिन 3000 बच्चे भूख से मर जाते हैं। यह जानकारी ग्लोबल हंगर इंडैक्स के आंकड़ों से मिली है। हालांकि भारत का स्थान पिछले साल के मुकाबले ग्लोबल हंगर इंडैक्स में 63 के मुकाबले 53वां है। मंगल पर अपना यान भेजने वाले देश भारत में भूख के खिलाफ जंग सबसे बड़ी चुनौती है। बच्चों में कुपोषण और उनकी मृत्यु दर का स्तर बेहद चिंताजनक है। यहां तक कि नेपाल और श्रीलंका की स्थिति भारत से बेहतर है जबकि पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे पिछड़े देशों में स्थिति और भी बुरी है।' साभार: भोपाल समाचार

क्या कभी आपने सोचा कि लगभग हर सम्प्रदाय यह मानता है कि उनका सम्प्रदाय धर्म को महत्व देता है, लेकिन फिर भारत में ही 19 करोड़ लोग भूखे पेट क्यों सोते हैं ? क्यों प्रतिदिन तीन हज़ार बच्चे भूख से मर जाते हैं ?

चलिए मान भी लें कि ये आँकड़े झूठे हो सकते हैं...तीन हज़ार नहीं, हज़ार बच्चे ही रोज मरते हैं...तो भी क्यों मरते हैं ? क्या किताबी धार्मिकों की किताबों में यह नहीं लिखा है कि कोई पड़ोसी भूखा रह जाए और आपके गले से निवाला उतर जाए तो इससे बड़ा अधर्म और कुछ नहीं ? क्या सभी धार्मिकों के समाज में भूखे को भोजन, प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य नहीं माना गया ?

कितने धार्मिक संगठनों ने भूखे को भोजन देने के लिए आन्दोलन किये और भूखों तक भोजन पहुँचाया ? कितने धर्मरक्षक तलवार की बजाय, भोजन की थाल और पानी की बोतल थामें भूखों के घर तक पहुँचे ? कितने धार्मिकों ने राजनैतिक दबाव बनाया कि भूखों को पहले भोजन दो, अच्छी चिकित्सीय सेवायें उपलब्ध करवाओ, उन्हें आत्मनिर्भर होने में सहयोग करो उसके बाद जीडीपी का ग्राफ दिखाना ? क्या कभी तनिक भी शर्म आयी खुद को धार्मिक कहते हुए जबकि धार्मिक कोई कार्य नहीं कर रहे केवल दिखावा कर रहे हो ?

जो कट्टा-तमंचा लिए धर्म की रक्षा के लिए निकले हैं, क्या उन मूर्खों को किसी ने बताया कि कट्टे तमंचों से नहीं सेवाभाव व सहयोग से धर्म की रक्षा होती है | दड़बा हिन्दू हो या मुस्लिम या कोई और, सभी में बेबस और लाचार मिल जाते हैं...लेकिन क्यों ? जब आप खुद धार्मिक नहीं हो पाए तो फिर ये धार्मिकता का ढोंग क्यों ?

दो चार लोग हर समाज में ऐसे मिल जाते हैं, जो गरीबों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं, उन्हीं की सहायता क्यों नहीं कर देते यदि खुद नहीं पहुँच पाते किसी गरीब के पास तो ??? चलिए माना कि आप कट्टर धार्मिक हैं अपने धर्म के अलावा किसी और धर्म को बर्दाश्त नहीं कर सकते...अरे तो कम से कम अपने ही धर्म नाम के दड़बे में जो बेबस और लाचार भरे पड़े हैं उनकी ही सहायता कर दो और मरने दो दूसरे दडबों के बेबस और लाचारों को | अरे कम से कम अपने ही समुदाय, सम्प्रदाय की सहायता तो करो ??

 

द्वितीय प्रमाण:


सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अधर्मियों का साथ मत दो, अत्याचारियों का साथ मत दो, अशिष्ट व असभ्य लोगों को सही राह दिखाओ या उनका बहिष्कार करो | लेकिन क्या धार्मिक लोग ऐसा कर रहे हैं ?

यदि अधर्मियों, अत्याचारियों का सहयोग नहीं कर रहे होते धार्मिक लोग, तो क्या अधर्मी आज सड़कों से लेकर ससंद तक उत्पात कर रहे होते ? क्या जनता को लूटकर कोई विदेश भाग सकता था ? क्या कोई जनता पर दुनिया भर के टैक्स थोपकर चैन से रह सकता था ? क्या कोई जनता को असहाय और लाचार बनाने के अपने उद्देश्य में सफल हो सकता था ? क्या धर्म की रक्षा के नाम पर लुच्चे-लफंगों का गिरोह किसी निर्दोष की हत्या कर सकता था ?

लेकिन ऐसा हो रहा है क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया है | अब दडबों को धर्म समझ बैठा है समाज, अब नेताओं, बाबाओं, राजनैतिक व सांप्रदायिक, जातिवादी पार्टियों को धर्म समझ बैठा है | अब इंसान होना महत्वपूर्ण नहीं रह गया, अब हिन्दू होना, मुसलमान होना, काँग्रेसी होना, भाजपाई होना, संघी होना, बजरंगी होना धर्म हो गया | और चूँकि दड़बों को धर्म मान लिया गया, इसीलिए इन दडबों की सुरक्षा के लिए लुच्चे लफंगों की सेनाओं की आवश्यकता पड़ गयी | वरना सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन लुच्चे लफंगों से निपटने के लिए ? क्या सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन धूर्त, जुमलेबाज, लुटेरे नेताओं को उनकी औकात बता देने के लिए ???

लेकिन दुर्भाग्य से जनता ही धर्म से विमुख हो गयी और यही कारण है कि कुछ मुट्ठीभर बदमाश पुरे देश को गुलाम बना कर बैठ गये | कुछ मुट्ठीभर लुटेरे पुरे देश को लूटकर मालामाल हो गये और जनता अपनी किस्मत को कोस रही है |

 

तृतीय प्रमाण:


क्या सभी सम्प्रदायों की धार्मिक पुस्तकों में शिक्षा के महत्व को नहीं स्वीकारा गया है ? क्या शिक्षा का प्रसार प्रसार करना सभी धार्मिकों के प्रमुख कर्तव्यों में से एक नहीं है ?

फिर शैक्षणिक संस्थानों की दुर्गति क्यों हो रही है ?

एनडीटीवी ने एक सर्वे में यह खुलासा किया है कि भारत में अधिकांश सरकारी स्कूलों में शौचालयों और पीने के पानी की बुनियादी सुविधाओं की कमी है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के कार्यान्वयन पर एनडीटीवी ने भारत के 13 राज्यों में 780 सरकारी स्कूलों का सर्वेक्षण किया। परिणाम बहुत शर्मनाक था उनमें से 63 प्रतिशत स्कूलों में कोई खेल का मैदान नहीं था। सर्वे किए गए स्कूलों में से एक तिहाई से अधिक स्कूलों की स्थिति बेहद खराब थी। ऐसी स्थित में अगर कोई छात्र शौचालय जाना चाहता है तो वह घर वापस चला जाता है। एनडीटीवी चैनल ने शौचालय की कमी को छात्राओं द्वारा अधिक मात्रा में स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण बताया। स्थित इतनी खराब थी की 80% से अधिक स्कूलों में उम्र के अनुसार छात्रों का प्रवेश नहीं था।

शिक्षा का अधिकार, अधिनियम (आरटीई) प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चों को मुफ्त और आवश्यक शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम छात्र शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के साथ-साथ स्कूलों की इमारतों, बुनियादी ढाचों, स्कूल के कामकाज के दिनों, शिक्षकों के काम करने के घंटों, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति को भी निर्दिष्ट करता है।

बहुत से सरकारी स्कूलों को लंबे समय से पुनःनिर्मित नहीं किया गया है। कभी-कभी छात्रों को कक्षा के बाहर फर्श पर बैठने के लिए कहा जाता है क्योंकि स्कूल की छत किसी भी समय गिर सकती है। साभार: Maps of India

क्या धार्मिकों ने कभी शिक्षा पर प्रश्न उठाया ? क्या कभी धार्मिकों ने सरकार पर दबाव बनाया कि उनके बच्चों को उचित शिक्षा मिले वह भी बच्चों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाये बिना ?

शायद नहीं ! क्योंकि आप लोगों के लिए ये धर्म नहीं है | धर्म तो है हिन्दू-मुस्लिम खेलना, ब्राह्मण-दलित खेलना.....और मेरी नजर में ये केवल साम्प्रदायिकता है धर्म नहीं | धर्म हिन्दू-मुस्लिम में नहीं बटा हुआ है, धर्म केवल धर्म ही होता है और सार्वभौमिक होता है | हिन्दू हो या मुस्लिम  या कोई और सम्प्रदाय, सभी के बच्चों को शिक्षा दिलाना धर्म है | सभी के बच्चों के स्वास्थ्य व सुरक्षा का ध्यान रखना धर्म है |

तो समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म मान बैठा, इसीलिए ही मैं कह रहा हूँ कि धर्म खतरे में हैं | धर्म वह नहीं जो ये लुच्छे लफंगों के नेता और ठेकेदार समझा रहे हैं | ये छुरेबाज, कट्टेबाज, बेरोजगार लफंगे और उनके ठेकेदार सिखायेंगे हमें धर्म ???

यदि ऐसी स्थिति आ गयी है कि अब इन लुच्चे लफंगों से धर्म सीखना पड़े, तो बेहतर है कि सारा समाज ही आत्महत्या कर ले | यदि इनके बहकावे में आकर पढ़े-लिखे भी गुंडागर्दी करने लगें, साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने लगें, तो बेहतर है कि समाज खुद को धार्मिक कहना ही छोड़ दे |

तो शायद अब आप समझ गये होंगे कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म के रूप में धारण कर चुका है | और यही स्थिति रही, तो बहुत ही जल्द धर्म लुप्त जाएगा और उसके साथ ही लुप्त हो जाएगा इंसान और इन्सानियत |

~विशुद्ध चैतन्य

22 जून 2018

गुरुस्साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुस्साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥१॥
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥२॥
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरं।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥३॥
अनेकजन्मसंप्राप्तकर्मबन्धविदाहिने
आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥४॥
मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः।
ममात्मासर्वभूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ॥५॥
बर्ह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥६॥

गुरु का स्थान माता-पिता से भी ऊपर माना गया है | गुरु का अर्थ होता है अन्धकार से मुक्त कर उजाले की ओर ले जाने वाला | सौभाग्यशाली होते हैं वे गुरु जो अपने दायित्व को निभा पाने में सफल होते हैं | सामान्यतः गुरु बहुत ही कम लोग बन पाते हैं | अधिकांश तो सरकारी नौकर बनकर रह जाते हैं या फिर ट्यूटर जो केवल आजीविका के लिए शिक्षण, अध्यापन का क्षेत्र चुनते हैं | उनके लिए शिक्षण कार्य केवल खानापूर्ति होती है, सिलेबस रटा देना भर उनका दायित्व होता है और महीने के अंत में अपनी सेलेरी उठा लेना, बस हो गये शिक्षक |


गुरु और शिक्षक में अंतर होता है | शिक्षक जब किताबी ज्ञान से ऊपर उठकर व्यावहारिक ज्ञान देने लग जाये, जब शिष्यों पर कुछ थोपने की बजाये, उन्हीं के भीतर छिपे गुणों को उजागर कर शिष्यों को आत्मज्ञान करवाए, तब वह गुरु कहलाने योग्य होता है | जब तक वह पाठ्यक्रमों को थोपता है, रटाता है तब तक वह शिक्षक है, अध्यापक है | लेकिन जब वह शिष्यों के लिए प्रेरणा बन जाए, जब वह शिष्यों के लिए आदर्श बन जाए, जब वह शिष्यों के दिलों में समा जाए तब वह गुरु है |

ऐसा ही एक शिक्षक जो गुरु बन गया उनसे सम्बंधित के समाचार प्रकाश में आया | तमिलनाडु के वेल्लियागारम सरकारी स्कूल का एक 28 वर्षीय शिक्षक भगवान् बच्चों को इतना प्रिय हो गया, कि जब उनके स्थानान्तरण का आदेश आया तो बच्चों ने उत्पात मचा दिया | बच्चे शिक्षक से लिपट गये कि मत जाओ हमें छोड़कर | कुछ उनके पैर पड़ने लगे कि मत जाओ | रोना धोना मच गया स्कूल में | बात इतनी बढ़ गयी कि बच्चों के परिजन भी पहुँच गये और उन्हें भी जब पता चला कि शिक्षक का स्थानान्तरण हो गया है, तो वे भी रोना धोना शुरू कर दिए | अंत में स्कूल के प्रिसिपल को ट्रांसफर रुकवाने के अपील भेजनी पड़ी |

बच्चों का कहना था कि पुरे स्कूल में वही एक शिक्षक थे जो बच्चों के लिए हर समय उपलब्ध रहते थे | बच्चे यदि रात में भी कोई प्रश्न या उलझन लेकर पहुँचते तो वे नाराज नहीं होते थे, बल्कि प्रेम से समझाते थे | बच्चे उनसे किसी भी विषय में प्रश्न कर सकते थे और कभी भी....यानि वे चौबीस घंटे उनके लिए उपलब्ध थे | वे किसी सरकारी बाबू की तरह नौ से पांच की ड्यूटी नहीं कर रहे थे, वे वास्तव में उनके लिए सरकारी शिक्षक से गुरु हो चुके थे |

सौभाग्यशाली हैं वे बच्चे जिन्हें भगवान् जैसा गुरु मिला | काश हर सरकारी स्कूल के बच्चों को ऐसा ही गुरु मिले यही प्रार्थना है ईश्वर से |

~विशुद्ध चैतन्य


 ‘To Sir, with Love’, A heartwarming incident in Tamil Nadu

 

Most of us would have read a very famous Novel, ‘To Sir, With Love’, an autobiography by E. R. Braithwaite. The novel was based on true incidents of his life where Braithwaite takes a job of a teacher and how he transforms the most stubborn students in his class to a well mannered civilized people. Although the novel takes a different turn later, here is a partly similar story from Tamil Nadu which has shown the deep affection and respect towards a teacher from his students.

For these innocent students, their teacher Bhagwan is their inspiration and motivation. This young 28-year-old teacher was getting ready to walk out of the gates of government high school in Velliagaram, Tamil Nadu. But he was stopped with hundreds of children who hugged him and pleaded him not to leave the school. These young kids started crying, weeping and pleading him not to go out. All this happened because of a transfer order was given to teacher Bhagwan.


Bhagwan who was teaching English from Class 6 to 10th was favourite to all his students. According to the students, he took keen interest to teach his students and was very supportive in all aspects. He was always there to clear doubts and encouraged them in every way.

“Many of us were not comfortable with English but with his encouragement, we were able to improve. He was always available to clear doubts at any time of the day and we could call him even late in the evenings after the special classes,” said Tamilarasan, a student. 

“We don’t want him to be transferred. He has been one of the most supportive staff members and has been like a brother to many of us,” said Nithya, a student. Not every teacher can boast of such love from students. “But then, not all teachers are Bhagawan Sir,” say his students. In a matter of four years, the teacher has formed long-lasting friendships with his students, comforting the teens as brother, ally and guide (Times Report).
 
Bhagwan not just taught what was in the syllabus, but he took interest to teach us GK, social service, developing skills and prepare for competitive exams and focused on employment-oriented education. He helped us to visit museums and learn new things which we had never seen before said another student.
 
Looking at the plight of students, the parents also joined the chorus and requested the education department to cancel his transfer order. The children even protested by not attending the classes for a day and demanded the teacher be brought back.

Principal A Aravind said that he had submitted a representation to officials of the education department based on the requests by parents and students. “We have requested the department if there is a possibility of retaining the teacher. He is one of the best teachers we have, completely involving himself in teaching students. During special classes that would go beyond school hours, he would help in arranging food for students and had been overall very friendly,” he said. (Times Report).

The teacher Bhagwan said, the children were hugging me and crying, they even started falling on my feet, refusing to let me go, watching this, even I broke down and took them to a hall and consoled them that I would return after few days.

courtesy: postcard.news

21 जून 2018

गरीब क्यों रह जाते हैं गरीब जब कि अमीर और अमीर होते जाते हैं ?



इसका प्रमुख कारण है गरीब के मन में बचपन से बैठा दी गयी यह बात कि वह गरीब है, और उसे अमीर होने का अधिकार नहीं | उसे सपने में भी नहीं सोचना चाहिए कि वह अमीर हो सकता है |

चेतन भगत का एक भाषण सुन रहा था अभी दो तीन दिन पहले | उसमें बहुत ही अच्छी बात कही उन्होंने कि भारत में एक शब्द प्रचलित है 'औकात' ! आम बोलचाल में सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला शब्द है यह शायद | अक्सर कहा जाता है कि अपनी औकात में रहो, या अपनी औकात देखकर बात करो....आदि | और यही औकात ऐसी हद बना दी गयी है कि कोई उससे ऊपर उठने की सोच भी नहीं सकता | और यदि किसी ने उठने की कोशिश की तो उसे औकात बता दी जाती है |

जिस दिन भी व्यक्ति अपनी औकात से ऊपर सोचने की क्षमता विकसित कर लेता है, फिर वह सीमाओं में नहीं बंधा रहता फिर वह ऊँचाइयों को छूने लगता है | दुनिया में कई गरीब ऐसे भी रहे, जो देश के राष्ट्राध्यक्ष बन गये | कई गरीब ऐसे भी रहे, जो बड़े बड़े बिजनेसमेन बन गये | क्योंकि वे औकात की सीमा से बाहर निकलने में समर्थ हुए |

दूसरा प्रमुख कारण है गरीब की सहायता करने जाने का मतलब यह हो जाता है कि उन्हें बैठे बिठाए खिलाते रहो | उदाहरण के लिए मैंने गाँव के लोगों को बुलाया और कहा कि हम सब एक आपसी सहयोग योजना बनाते हैं और सब मिलकर किसी एक घर की सहायता करते हैं | उसके बाद दुसरे घर की और फिर तीसरे घर की | हर महीने सब लोग मिलकर कुछ न कुछ रूपये जोड़ेंगे और फिर किसी एक घर की सहायता करने की कोशिश करेंगे.....मैंने देखा कि किसी को भी मेरी बात रास नहीं आयी | वे सब एक ही रट लगाये हुए थे कि सरकार से हमें पेंशन दिलवा दो, बेटी की शादी के लिए अनुदान दिलवा दो.....मैंने सबको विदा किया और दोबारा फिर कभी ग्रामीणों को सलाह देने की कोशिश नहीं की |

आप देखेंगे कि दुनिया में जितने भी लोग अमीर हुए हैं, जितने भी लोग समृद्ध हुए हैं, वे गरीबों की चिंता में नहीं घुल रहे होते | वे केवल उन लोगों के साथ उठना बैठना पसंद करते हैं जो समृद्ध हैं और दुखड़ा रोते नहीं फिरते | बड़े बड़े साधू-संत हों या व्यापारी या राजनेता, सभी गरीबों से दूरी ही बनाये रहते हैं | क्योंकि गरीब के पास जाने के मतलब ही होता है जो कुछ कमाया है वह सब उनमें बाँट दो....गरीब इसी आस में आपसे मिलता है कि आपके पास तो बहुत है, हमें कुछ दे दो | गरीब कभी भी यह नहीं सोचता कि उसे स्वयं ऊपर उठने की कोशिश करनी है | जो आज अमीर हैं वे भी कभी गरीब थे, उनके पुरखे कभी गरीब थे लेकिन अपनी मेहनत व लगन से वे अमीर हुए | इसलिए नहीं कि अपनी कमाई गरीबों में बाँटते फिरें |

मैं स्वयं अनुभव करता हूँ कि गरीब को चमत्कारी बाबाओं, देवताओं से ही संतुष्टि मिलती है | उन्हें जागरूक करने का प्रयत्न करने वाला साधू संत रास नहीं आता | ओशो ने भी एक समय बाद गरीबों से हमेशा के लिए दूरी बना ली थी | क्योंकि उन्हें भी समझ में आ गया था कि आध्यत्मिक ज्ञान इनकी समझ में नहीं आएगा | इनकी समझ में रोटी और पैसा देने दिलाने वाला बाबा या भगवान् ही समझ में आएगा | और जब तक गरीब खुद को आत्मनिर्भर करने की योजना पर काम नहीं शुरू करता, जब तक वह झूठे आश्वासन और दिलासा देने वाले नेताओं, बाबाओं के चरणों में पड़ा रहता है, तब तक उसका उद्धार असंभव है |

~विशुद्ध चैतन्य

“The Only Cure I Had To Sadness Was To Keep On Working”
“उदासी का एक ही इलाज था मेरे पास और वह था निरंतर काम करते रहना ”
                                                                                           -शाहरुख़ खान 

आइये कुछ ऐसे लोगों के विषय में जानते हैं जो कभी गरीब थे |

स्टीव जॉब्स

Apple कंपनी की स्थापना करने वाले Steve Jobs को ने अपनी जिंदगी में कोई कम दुःख नहीं देखा, Jobs ने अपनी पढाई कैलिफ़ोर्निया में की, और उस वक्त उनके पास में पढाई के लिए पैसे नहीं होते थे तब वो गर्मियों की छुट्टियो में काम किया करते थे.

उनके जिंदगी में ऐसा वक्त भी आया है जब उन्हें अपने दोस्त के रूम में जमीन पर सोना पड़ता था, और अपने खाने के लिए कोक की बोतल बेच कर अपना पेट भरते थे. Jobs कृष्णा मंदिर में मुफ्त भोजन भी किया करते थे.

फिर Jobs ने एक दिन Apple company शुरू की और बहुत success हुए और एक समय के आने के बाद Jobs के पास 5 अरब डॉलर की संपत्ति हो गई थी जिसके साथ वो अमेरिका के सबसे अमीर व्यक्ति में से एक व्यक्ति बन गए थे. हालाँकि Jobs आज इस दुनिया में नहीं है लेकिन पूरी दुनिया में माना जाता है कि अब तक Steve Jobs जैसा marketer/entrepreneur कोई नहीं आया है.

कर्नल सेंडर्स 

आपको KFC का चिकन पसंद है या नहीं लेकिन KFC के success के पीछे कर्नल सैंडर्स की story आपको जरुर पसंद आएगी।

कर्नल केवल 5 वर्ष के थे अब उनके पापा की मृतु हो गई थी, फिर उनकी माँ ने दूसरी शादी लार ली लेकिन कर्नल अपने सोतेले पापा से तंग आकर घर छोड़ दिया तब वो केवल 10 साल के थे, उसके बाद वे कई वक्त तक बेघर रहे और कई नौकरिया की और जीवन में परेशानियों का सामना किया.

एक बार किसी कारण से कर्नल सैंडर्स का चलता हुआ बिज़नस बंद हो गया। उस वक्त उनकी उम्र 65 हो चुकी थी और हाल यह था की खोने के लिए अब उनके पास में कुछ भी नहीं बचा था।

उनको अपने चिकन प्रयोग पर बहुत भरोसा था, वो मसाले और प्रेसर कुकर लेकर अपनी चिकन बनाने का प्रयोग की मार्केटिंग करने निकल पड़े। उन्होंने अलग-अलग रेस्टोरेंट से मिलना शुरू किया। और सब उनको रिजेक्ट करते गये।

लेकिन कर्नल सैंडर्स भी अड़े रहे, लगे रहे, सीखते रहे और चलते रहे। और करते-करते एक हजार नौ (1009) लोगो ने उनको रिजेक्ट कर दिया फिर जाकर उनको मिली उनकी पहली हाँ।
हाँ अपने सही पढ़ा है, एक हजार नौ बार रिजेक्ट होने के बाद, एक हजार नौ बार ना सुनने के बाद उनको उनकी पहली हाँ मिली।

सोचो 65 की उम्र में, एक एसी उम्र जब लोग रिटायर हो जाते है, एक इस उम्र में जब लोग दुबारा उठने से हार मान लेते है। उस उम्र में उन्होंने अपने चिकन प्रयोग के साथ एक ऐसा बिज़नस खड़ा कर दिया जो आज 120 देश में है, 18000 से ज्यादा KFC के रेस्टोरेंट्स (Restaurants) है और 20 अरब डॉलर से ज्यादा उनका एक साल की कमाई है।
 

आदमखोर भीड़ का आतंक




आज से कुछ वर्ष पहले कभी कभार सुनने मिलता था कि किसी आदमखोर तेंदुआ, बाघ ने आतंक फैलाया हुआ है और आदमियों का शिकार कर रहा है | लेकिन अब पिछले तीन चार वर्षों में आदमखोर भीड़ के आतंक से देश दहला हुआ है | आदमियों की भीड़ ही आदमियों का शिकार कर रही है | आये दिन कोई न कोई निर्दोष व्यक्ति इस भीड़ का शिकार बन रहा है लेकिन कोई एयरटेल के सिम का बहिष्कार करने में व्यस्त है, कोई मोदी स्तुति में व्यस्त है, या फिर कोई अपने-अपने नेताओं, पार्टियों की चाटुकारिता में व्यस्त है | समाज कभी भी ऐसे गंभीर विषयों पर ध्यान नहीं देता, जब भी ध्यान देता है तो कोई टुच्चे विषयों पर ही ध्यान देता है |

ये भीड़ आदमखोर कैसे ??


मैं मोबलिंचिंग करने वाली भीड़ को ही आदमखोर भीड़ कह रहा हूँ | ये उन लोगों की भीड़ है जो असंतुष्ट हैं खुद से, जो उलझे हुए अपने ही घरेलू झगड़ों में, जो उलझे हुए हैं रिश्वतखोर अधिकारीयों और भ्रष्टाचार से ग्रस्त प्रशासनिक सेवाओं से | जो अपनी आर्थिक हालत से परेशान हैं, जो अपनी बेरोजगारी से परेशान हैं......अपना क्रोध वे प्रशासनिक अधिकारीयों और सरकारों पर व्यक्त नहीं कर पाते क्योंकि नक्सली या आतंकी घोषित कर दिए जायेंगे | और फिर सरकार के पालतू शिकारी उन्हें चुन चुनकर मारेंगे | और क्रोध ऐसी चीज है जो भीतर दबाये रखने पर अधिक घातक बन जाती है |

यही भीतर ही भीतर घुटने वालों की संख्या जब बढ़ जाती है, तब एक ऐसी भीड़ तैयार होती है जो आदमखोर बन जाती है | चाहे ये लोग आपको आदमियों का मांस खाते हुए न दिखते हों, लेकिन ये लोग वही कर रहे हैं जो एक माँसाहारी करता है | यानि अपनी भूख मिटाने के लिए किसी की हत्या | ये भीड़ किसी भी मांसाहारी से अधिक क्रूर व अमानवीय होती है | इनमें न तो विवेक होता है और न ही बुद्धि, क्योकि सबकुछ स्वाहा हो चुका होता है क्रोध में | और ऐसी भीड़ का न कोई जात होता है, न कोई धर्म होता है, न कोई चेहरा होता है | बस एक हवस होती है इनमें और वह है खून की होली खेलने की | बस हवस होती है इनमें वह है किसी पर अत्याचार करने की, भीतर छुपी पूरी पाशविकता को बाहर निकाल देने की |

ये आदमखोर भीड़ कहीं आसमान से टपके हैं या फिर पड़ोसी देशों से घुसपैठ करवाए गये हैं ?


न तो ये आदमखोर आसमान से टपके हैं और न ही विदेशियों ने घुसपैठ करवाए हैं | ये भीड़ हमारे ही नेताओं के बोये जहर की फसल है | ये भीड़ तैयार हुए हैं हमारे ही अपने नेताओं के जहरीले भाषणों से | ये भीड़ तैयार हुए हैं हमारे ही नेताओं के संरक्षण पर और हमने ही उन नेताओं को इतनी छूट दी कि वे देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक दें | हम ऐसे जहरीले नेताओं को सर आँखों पर बैठाते हैं और उसी का परिणाम है कि आज इन आदमखोर भीड़ का ताण्डव आये दिन देखने मिल रहा है |

ये तांडव अभी और बढ़ेगा क्योंकि देश के नेता और जनता ही यह चाहती है | क्योंकि न तो नेताओं ने कभी इन आतंकियों पर कोई कठोर कार्यवाही की और न ही देश की जनता ने | बस इनके अत्याचारों को देखते रहे और फिर आगे बढ़ गये | जिसकी जान गयी, जिसका परिवार उजड़ा वे ही रह गये अपने में सिमट कर अपने दुखों को सहने के लिए | समाज अपने में मस्त हो गया और नेता लोग योगासन करने लगे |




और शायद यह केवल आरम्भ है, अभी सारा देश ही एक जलेगा | हर कोई एक दूसरे का खून पिएगा और हर घर से लाशें गिरेंगी, तब जो बच जायेंगे वे अहिंसा का पाठ पढ़ाएंगे और बताएँगे कि हिसा बुरी चीज है | बाकी तब तक देश के सभ्य व धार्मिक कहे जाने वाले लोग तमाशा देखेंगे, नेता लोग तमाशा देखेंगे, नेताओं के चाटुकार तमाशा देखेंगे | बहुत हुआ तो कह देंगे कि इसमें अमेरिका का हाथ था या पाकिस्तान का हाथ था | लेकिन रोका कैसे जाये, इस विषय पर कोई भी चिंतन मनन नहीं करेगा और न ही कोई उचित कदम उठाने की पहल करेगा |

~विशुद्ध चैतन्य

19 जून 2018

समर्थ को सहायता एक अकाट्य सत्य




संन्यास एक ऐसी अवस्था होती है, जहाँ पहुंचकर आप वह सब देख व समझ पाते हैं, जो समान्य जीवन जीते हुए नहीं समझ पाते | हम यह कभी चिन्तन नहीं कर पाते अपनी दैनिक जीवन के उलझनों में कि समाज हमेशा समर्थ की सहायता को तत्पर क्यों रहता है ? हम यह कभी चिंतन-मनन नहीं कर पाते कि जिनके पेट भरे हुए होते हैं, उन्हें खिलाने पिलाने के लिए हर कोई आतुर रहता है, लेकिन जो भूख से मर रहे होते हैं, उन्हें पूछने कोई नहीं जाता | हम यह नहीं देख पाते कि बड़े बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों को खरबों का कर्ज माफ़ कर दिया जाता है, लेकिन किसी विवश लाचार व्यक्ति का घर नीलाम करके भी कर्ज वसूल लिया जाता है |

अभी हाल ही में पुण्य प्रसुन्न बाजपेयी ने अपने किसी टीवी शो में बताया कि 17 हज़ार करोड़ रूपये की कर्ज माफ़ी पिछले तीन वर्षों में उद्योगपतियों को दी गयी | एक और शो में उन्होंने बताया कि उद्योपतियों को दिए गये 48 खरब रूपये सरकार ने बट्टे खाते में डाल दिए, यानि वे कर्ज माफ़ कर दिए गये | लेकिन किसानो के लिए उनके पास पैसा नहीं है | किसानो को कर्ज माफ़ी के रूप में चेक दिए भी गये तो अस्सी पैसे से अट्ठारह रूपये तक के |



सभी धार्मिक, आसमानी, हवाई किताबों में यही पढ़ने को मिलता है कि दीन-दुखियो की सहायता करो, गरीबों की सहायता करो, असहायों की सहायता करो लेकिन सहायता हमेशा अमीरों की ही होती है, समर्थ व समृद्धों की ही होती | लाखों समाजसेवी संस्थाएं होंगी इस दुनिया में, लेकिन लाख लोगों की भी सहायता नहीं हो पाती | अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी बेघर भिखारियों को देखा जा सकता है जो फुटपाथों पर जीवन गुजारते हैं |

लेकिन ऐसा होता क्यों हैं, जिन्हें आवश्यकता है उनकी सहायता करने की बजाये उनकी सहायता क्यों की जाती है जो समर्थ हैं ? समाज ने कभी भी इस बात पर चिंतन नहीं किया | जिन्होंने चिंतन मनन किया, समझा जाना, वे समाज को समझा नहीं पाए या समाज ने उन्हें सुना ही नहीं |

समाज समर्थ का सहयोगी क्यों ?


समाज समर्थ का सहयोगी इसीलिए होता है क्योंकि सहयोग की सार्थकता उन्हें दिखाई देती है | उन्हें ऐसा लगता है कि हम जिसका सहयोग कर रहे हैं वह चूँकि अपने आप में समर्थ है, आत्मनिर्भर है, समृद्ध है, इसीलिए वह धन का दुरूपयोग नहीं करेगा |

दूसरा प्रमुख कारण है किसी भी समृद्ध, ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की सहायता करके वास्तव में व्यक्ति अपने ही अहंकार को तृप्त करता है | वह उस समृद्ध व्यक्ति से स्वयम को जुड़ा हुआ पाता है और स्वयं को यह सांत्वना दे पाता है कि वह उतना अमीर या प्रसिद्द न सही, पर इस योग्य तो हुआ कि वह उस अमीर की योजनाओं में सहयोगी हुआ |

शेयर में पैसे लगाना, व्यापार में पैसे लगाना, राजनैतिक पार्टियों को चंदा देना, राजनेताओं को चंदा देना आदि सब व्यापारिक सहयोग हैं परमार्थ या परोपकार नहीं | बदले में उन्हें कुछ न कुछ चाहिए होता है | लेकिन यदि किसी गरीब की सहायता करते हैं, किसी असफल व्यक्ति की सहायता करते हैं तो पैसे बट्टे खाते में जाते हुए दिखाई देते हैं | उससे कोई लाभ नहीं होता उन्हें | यही कारण है कि समर्थ व समृद्ध व्यक्तियों को हर कोई सहायता देने के लिए तत्पर रहता है |

धर्म व आध्यात्म में निःस्वार्थ दान का महत्व


सभी सम्प्रदायों में दान या जकात का बहुत महत्व बताया गया है | इसका प्रमुख कारण था कि जो समर्थ नहीं हैं, असफल हैं, गरीब हैं, अयोग्य हैं, उनकी सहायता हो सके | लेकिन ऐसा होता नहीं | क्योंकि साल में एक बार या किसी धार्मिक पर्व में सौ पचास रूपये दान करके लोग समझते हैं कि उन्होंने अपना धर्म निभा लिया | वास्तव में इन्होंने दान किया ही नहीं होता, केवल ढोंग कर रहे होते हैं दान का |

यदि समाज वास्तव में दान कर रहा होता, वास्तव में जकात दे रहा होता, तो समाज में गरीबी देखने नहीं मिलती | कोई भूखा न मर रहा होता और कोई किसान धनाभाव में आत्महत्या नहीं कर रहा होता |

फिर किसी को धन छुपाने के लिए गोदामों, पनामा या स्विसबैंक न खोजना पड़ता और न ही किसी को काला धन सफ़ेद करने वाले नेताओं और बाबाओं की आवश्यकता पड़ती |

दान पुण्य का महत्व समाप्त हुआ भी तो उन मुफ्तखोरों की वजह से, जिन्होंने दान बटोरना ही धंधा बना लिया | कभी समाज सेवी संस्थाओं के नाम पर दान वसूलते हैं, लेकिन जिनकी सेवा का दावा करते हैं, उन तक पैसा पहुँचता ही नहीं | कई लोग भीख मांगने को ही धंधा बना रखे हैं | बड़ी बड़ी कोठियाँ बना लेते हैं, उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे होते हैं, लेकिन पेशा भीख मांगने का अपना रखे हैं |इसीलिए दान धर्म गर्त में चला गया |


मेरी अपनी समझ कहती है कि दान या जकात का मुख्य उद्देश्य किसी को सहयोग देकर आत्मनिर्भर बनाना होता है, किसी को सहयोग देकर उसे समस्याओं से बाहर निकालना होता है, न कि भिखारियों की तरह सौ पचास रूपये का चंदा देकर टरका देना |

दान भी लेना है तो पहले स्वयं को समर्थ करो


दुनिया में जितने भी महान दार्शनिक आये, जितने भी लोगों ने सत्य को जाना, जितने लोगों ने आध्यात्मिक या भौतिक उन्नति पायी, सभी के उपदेशों व सूत्रों में एक मूल सन्देश अवश्य छुपा मिलता है और वह है 'स्वयं को जानो, स्वयं को पहचानो !' गौतम बुद्ध ने भी कहा था, “अप्प दीपो भव:” अर्थात स्वयं का प्रकाश बनो !

इन्होने सत्य को जाना कि जब तक आप स्वयं को समर्थ, सबल नहीं बनाते, कोई भी आपकी सहायता करने को उत्सुक नहीं होगा | एक दो बार कोई सहायता कर भी देगा, लेकिन बाद में वह भी अपने हाथ खींच लेगा | चूँकि आप आलसी हैं या अयोग्य हैं, इसीलिए आप उन सहायता का सदुपयोग नहीं कर पाते, आपकी स्थिति वैसी ही दयनीय बनी रहती है | और अंत में आप दुनिया को कोसते हुए इस दुनिया से विदा ले लेते हैं भुखमरी और तंगी में जीते हुए | आपकी सारी महत्वाकांक्षाएँ भीतर ही दफन होकर रह जाती है | आप समाज सेवा भी करना चाहते हों, आप देश के लिए कुछ महत्वपूर्ण भी करना चाहते हों, तब भी लोग आपकी सहायता को आगे नहीं आएंगे | क्योंकि आप अयोग्य हैं, असमर्थ हैं, असफल हैं | और सदैव स्मरण रखें, खुद का पेट भरने या परिवार पालने की योग्यता न हो और सपने दूसरों की सेवा या सहायता की देख रहे हैं, तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं | पहले स्वयं को व स्वयं के परिवार को पालने योग्य बनिए, स्वयं  व स्वयं के परिवार को इतना समर्थ व समृद्ध बना लीजिये कि विपरीत परिस्थितियों में भी आपकी मानसिक स्थिति डाँवाडोल न हो सके |

इसीलिए पहले स्वयं को समर्थ व सफल बनाइये, दूसरों के सामने हाथ फैलाना बंद कर दीजिये | जब आप दूसरों की तरफ देखना बंद कर देते हैं, तब आप स्वयं की ओर मुड़ते हैं स्वयं की शक्तियों व योग्य्ताताओं को पहचान पाते हैं |

बुरा वक्त क्या वास्तव में बुरा होता है ?


बुरा वक्त कभी भी बुरा नहीं होता | बुरा वक्त वास्तव में वह समय होता है, जो प्रकृति आपको उपलब्ध करवाती है, स्वयं को जानने व समझने के लिए | जब तक व्यक्ति के जीवन में बुरा वक्त नहीं आता, वह इंसान नहीं बन पाता | उसे दूसरों के दुःख-दर्द समझ में नहीं आते | और जिन्हें दूसरों के दुःख-दर्द नहीं समझ में आते, उनमें दूसरों की सहायता के लिए बढ़ने की भावना विकसित नहीं हो पाती, वह मनुष्य नहीं बन पाता | वास्तव में मनुष्य योनी में जन्म लेने का मुख्य कारण यही होता है कि हम पशु योनी में कुछ ऐसा काम कर जाते हैं जो उस योनी के सामान्य व्यवहारों से अलग होता है | आपने कई बार पढ़ा होगा कि किसी मछली ने या किस हिंसक पशु ने किसी की जान बचाई | तो ये उनके सामान्य व्यव्हार के विरुद्ध होता है, और जब कोई पशु अपनी जाति से अलग किसी और जाति या प्रजाति के जीव के प्रति सद्भावना से भरने लगता है, तब वह मनुष्य योनी के अनुकूल होने लगता है | क्योंकि मनुष्यता का अर्थ ही है परस्पर सहयोगिता, दया, करुणा, प्रेम, सेवा का मिश्रित भाव से भरा होता है मनुष्य |

दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति के भीतर भी ये भाव होते हैं, लेकिन वे सब बचपन में मिले अनुभवों, परवरिश, व विश्वासघातों के परिणाम स्वरुप भीतर ही दफन होकर रह जाते हैं | वे अब चाहकर भी उन भावों को नहीं खोज पाते क्योंकि अनुभव ही उनका बुरा रहा | इसीलिए ही क्षमा शब्द का महत्व हो गया | विद्वानों ने कहा कि जो बीत गया उसे भुला दो, क्षमा कर दो उन्हें जिन्होंने तुम पर अत्याचार किया | तुम उस समय इतने ताकतवर नहीं थे कि तुम अत्याचारियों का सामना कर पाते, इसीलिए उस विषय पर अब चिन्तन करने उसके आधार पर वर्तमान में दूसरों से नफरत करने का कोई लाभ नहीं | क्षमा कर दो उन्हें और क्षमा कर दो स्वयं को और आगे बढ़ो | स्वयं को खोजो, स्वयं को जानो और स्वयं को समृद्ध, शक्तिशाली बनाओ |

दूसरों से सहायता की आस लगाए बैठे रहने वाले लोग कभी भी सफल नहीं हो पाते | और जब आप स्वयं समर्थ, शक्तिशाली हो जायेंगे, तो दुनिया स्वतः ही आपकी सहायता करने वैसे ही आगे बढ़ेगी, जैसे कि आज बड़े बड़े धूर्त नेताओं, व्यापारियों, ठगों, देश व जनता के लुटेरों की सहायता के लिए पलकें बिछाए बैठे रहती है |

~विशुद्ध चैतन्य

यहाँ नीचे नितिन खुराफाती का एक विडियो दे रहा हूँ, उसे अवश्य देखें |

18 जून 2018

साम्प्रदायिकता नहीं, परस्पर सहयोगिता है वास्तविक धर्म

बीबीसी हिंदी समाचार की एक हेडलाइन 'नौ देशों में विलुप्त हो सकता है धर्म' पर नजर पड़ी | समाचार में लिखा था;

अमेरिकन फ़िज़िकल सोसाइटी' में छपे शोध के नतीजे इशारा करते हैं कि इन देशों में धर्म का लगभग अंत हो जाएगा. डॉक्टर रिचर्ड वीनर कहते हैं कि पेरु में लोग विलुप्त होती जा रही स्थानीय भाषा 'क्यूचुआन' के बजाय स्पेनी भाषा बोलने को कारगर समझ सकते हैं, और यही धर्म के साथ भी हो सकता है.

शोधकर्त्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चेक गणराज्य, फ़िनलैंड, आयरलैंड, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैंड और स्विटज़रलैंड के एक सदी के जनगणना आंकड़ों का अध्ययन किया. रिसर्च कॉरपोरेशन फ़ॉर साइंस एडवांसमेंट' के डॉक्टर रिचर्ड वीनर बीबीसी को बताया, "ये एक सीधा-सा विचार है. जिस सामाजिक समूह में अधिक लोग होंगे, उसकी ओर और अधिक लोग आकर्षित होंगे. बहुत से आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रों में लोग ख़ुद को धर्म से अलग करते जा रहे हैं. नीदरलैंड्स में ये आंकड़ा 40 फ़ीसदी है लेकिन चेक गणराज्य में 60 फ़ीसदी लोग किसी भी धर्म से प्रतिबद्धता नहीं दिखाते."






खबर पढ़ने के बाद मन में प्रश्न उठा कि क्या वास्तव में धर्म खतरे में हैं ? क्या वास्तव में एक दिन धर्म लुप्त हो जाएगा ?

फिर उत्तर भीतर से ही आया कि बिलकुल सच है | आसमानी, हवाई किताबों पर आधारित धर्म एक दिन लुप्त हो ही जाएगा और लोग हिन्दू, मुस्लिम सिख इसाई बनने की बजाये इंसान बना करेंगे | लोग धार्मिक कर्मकाण्ड और परमपराओं को निभाने से बेहतर समझेंगे मानवीय कर्मकांडों को निभाना, मानवता को निभाना |


लेकिन प्रश्न फिर उठा कि धर्म मानवता के विरुद्ध कैसे हो सकता है ? धर्म के प्रति लोगों की विरक्ति कैसे हो सकती है ? धर्म तो मानव के कल्याण के लिए लिए ही है, धर्म तो आपसी सद्भाव व सौहार्द के लिए ही है ?

तो उत्तर आया कि बिलकुल धर्म मानवता के कल्याण के लिए ही है, धर्म आपसी सद्भाव व सौहार्द के लिए ही है | लेकिन जिन धर्मों के लुप्त होने की बात कही जा रही है, वे सब किताबी धर्म हैं | वे सब आसमानी, हवाई किताबों पर आधारित धर्म हैं | यानि जो अव्यवहारिक हैं जो केवल प्रवचनों और उपदेशों में सीमित होकर रह गया, इंसानों के आचरण में नहीं उतर पाया | जो केवल कर्मकांडों, दिखावों, बाह्य आडम्बरों, कपड़ों, रंगों, तिलक, टोपी, जनेऊ में सिमट कर रह गया वही धर्म खतरे में है | और यही कारण है कि वे लोग चिल्ला रहे हैं धर्म खतरे में हैं |

वस्तुतः वे सभी धर्म हैं ही नहीं, बल्कि सम्प्रदाय विशेष के पूर्वजों द्वारा निर्धारित नियम कानून व परम्पराएं हैं जिन्हें अब कोई व्यव्हार में नहीं लाता | और जो भी चीजें अव्यवहारिक हो जातीं हैं, वे लुप्त हो जाती हैं |


क्या वास्तव में धर्म खतरे में हैं ?


समाज ने सम्प्रदायों को धर्म घोषित कर दिया, जिसके कारण यह कहा जाने लगा कि धर्म खतरे में हैं | वास्तव में धर्म कभी भी खतरे में नहीं हो सकता, क्योंकि जिस दिन धर्म खतरे में पड़ जाएगा, मानवों का ही नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का ही आस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा | जिस दिन गुर्त्वाकर्षण बल धर्म विमुख जाएगा, हम सब हवा में तैरते दिखाई देंगे और जल्द ही हवा भी पृथ्वी को छोड़ देगा | क्योंकि हवा भी पृथ्वी पर टिका है तो गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही और जो कुछ भी पृथ्वी पर टिका है वह गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही |


जिस दिन माँ अपने धर्म से विमुख हो जायेगी, जिस दिन पिता अपने धर्म से विमुख हो जाएगा, जिस दिन जल अपने धर्म से विमुख हो जाएगा, जिस दिन अग्नि अपने धर्म से विमुख हो जायेगी.....उस दिन सब कुछ ध्वस्त हो जाएगा, यह सृष्टि ही ध्वस्त हो जायेगी |


चूँकि सृष्टि का कोई भी पदार्थ, तत्व या प्राणी धर्म विहीन नहीं रह सकता, इसीलिए धर्म खतरे में है ही नहीं, बल्कि सम्प्रादयिकता खतरे में हैं | सम्प्रदायों को धर्म मानने की मुर्खता के कारण ही धर्म खतरे में दिखाई दे रहा है | और चूँकि धर्म की समझ नहीं किसी को, इसीलिए शोर मचाते फिर रहे हैं कि धर्म खतरे में हैं |

साम्प्रदायिकता खतरे में क्यों पड़ा ?


खतरे में इसलिए पड़ गया क्योंकि सम्प्रदाय अब हाईजेक कर लिए गये, सड़क छाप गुंडों मवालियों द्वारा | सम्प्रदाय हाईजेक कर लिए गये धूर्त, कपटी, देशद्रोही नेताओं और उनके चाटुकारों द्वारा | सम्प्रदाय हाईजेक कर लिए गये धूर्त, धंधेबाज धर्म के ठेकेदारों द्वारा | और खुद को धार्मिक कहने वाले लोग वास्तव में धर्म से दूर और साम्प्रदायिकता के नशे में धुत्त होने लगे | जब सारा समाज ही साम्प्रदायिकता के नशे में धुत्त हो जाये या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से साम्प्रदायिकता का समर्थन करने लगे, तब जिन्हें धर्म की समझ है, वे खुद को उन मानसिक रोगियों के समूह से अलग करने लगते हैं | कुछ खुद् को नास्तिक कहने लगते हैं तो कोई नए पंथ की ओर रुख करने लगते हैं | कुछ लोग असमंजस में रह जाते हैं कि वे आस्तिक हैं या नास्तिक तो वे इस बहस से खुद को दूर कर लेते हैं और किसी अविष्कार में खो जाते हैं या फिर किसी अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं |


जो बेरोजगार हैं, जिनके पास कोई काम नहीं, जीवन का कोई उद्देश्य नहीं, वे धर्म रक्षक सेनाएं बनाते हैं और सड़कों पर आवारागर्दी, गुंडागर्दी करते घूमते हैं | धार्मिकों का समाज उन्हें देखकर खुश होता रहता है कि हमारी नालायक औलादें कम से कम कुछ कर तो रहीं हैं | देश की सेना के लायक न सही, सड़क छाप गुंडों मवालियों की सेना में शामिल हो गये यही बहुत है | कम से कम उनकी तस्वीरें तो मिडिया में छपती हैं, चाहे तोड़फोड़, मारपीट करते हुए ही छपे | कम से कम पुलिस उन्हें पकड़ कर जेल तो ले जाती है, इतनी इज्जत क्या कम है ? जेल में तो बड़े बड़े लोग जाते हैं, श्री कृष्ण तो जेल में ही पैदा हुए थे...हमारी नालायक औलादें कम से कम इस लायक तो हुए कि कृष्ण की जन्मभूमि में आते जाते रहते हैं ?


और चूँकि धार्मिक की समाज मानसिक् रूप से इतना नीचे गिर चुका है, तो स्वाभाविक है कि धर्म नाम के सम्प्रदायों से सभ्य लोगों की विरक्ति होगी ही | और इसी लिए धर्म नाम के सभी सम्प्रदाय खतरे में पड़ गये |


दूसरा कारण यह भी कि जितने भी धार्मिक सम्प्रदाय हैं, उनमें अब इतनी भी क्षमता नहीं रह गयी कि वे नालायक, गुंडे बदमाश, आवारा, लुच्चे लफंगों को पैदा होने से रोक सकें | उनकी सारी धार्मिक शिक्षाएं बेअसर साबित हुईं और वे अपने समाज में इनकी बढ़ती जनसँख्या पर लगाम लगा पाने में पूरी तरह विफल हो गये | धार्मिकों का समाज भ्रष्टाचारियों को पैदा होने से रोक पाने में असफल हुआ, धार्मिकों का समाज धूर्त मक्कार नेताओं को उभरने से रोक पाने में असफल हुआ | और परिणाम यह हुआ कि धर्म का सुन्दर नाम लिए, साम्प्रदायिकता अब बोझ बन गयी | सभ्य लोग अब इस बोझ से मुक्त होना चाहते हैं | सभ्य लोगों को समझ में आ गया कि ये धर्मों के बाजार जीवन का आधार नहीं है | न ही ये ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है और न ही आत्मिक, आर्थिक और भौतिक उत्थान का मार्ग | ये केवल धार्मिक उन्मादियों, लुच्चों लफंगों की महफ़िल बनकर रह गयी है |


और लुच्चे लफंगों ने कभी भी किसी का भला नहीं किया, तो स्वाभाविक है धर्म का भी भला नहीं करेंगे और न ही समाज व देश का भला करेंगे |


साम्प्रदायिकता नहीं, परस्पर सहयोगिता है वास्तविक धर्म


पहली गलती तो यह की समाज ने कि साम्प्रदायिकता को धर्म समझ लिया | और दूसरी गलती यह की समाज ने कि सम्प्रादयिकता के नाम पर धार्मिक उन्माद, उत्पात को रोकने की बजाये, उन्हें हवा देते रहे, उन्हें सुलगाते रहे | अपने अपने समाज की कुरीतियों को दूर करने की बजाए, अपने समाज के शोषित पीड़ित वर्गों को न्याय व रोजगार दिलाने की बजाये मूर्ख बनाते रहे कि मंदिर जाओ तो भला होगा, मस्जिद जाओ तो भला होगा, धर्म परिवर्तन कर लो तो भला होगा....और ये मूर्ख बनाने का काम सदियों से चला आ रहा है और आज तक जारी है |


धर्मगुरुओं ने कभी भी लोगों को आत्मनिर्भर होने में सहयोग नहीं किया, केवल शोषण किया समाज का | राजनेताओं ने भी समाज को आत्मनिर्भर होने में सहयोग करने की बजाये केवल कुछ चुनिन्दा पूंजीपतियों को समृद्ध करने में सारा जोर लगा दिया | इसलिए धर्म नाम के सम्प्रदायों का महत्व अब समाप्त होने लगा |


धार्मिक विद्वानों ने भौतिक सुखों को माया बताया, इससे दूर रहना सिखाया, परिणाम यह हुआ कि समाज आत्मनिर्भर होने की बजाये भगवानों, बाबाओं और नेताओं पर निर्भर हो गया | और जो दूसरों पर निर्भर हो जाता है, वह अपाहिज हो जाता है |


यहाँ नीचे विडियो दे रहा हूँ, ध्यान से देखिये कि कैसे एक गाँव पानी के लिए सरकार भरोसे बैठा रहा और उनके खेत बंजर हो गये | लेकिन जब उन्हें अक्ल आ गयी कि दूसरों पर निर्भर रहने पर केवल मौत ही मिलने वाली है, तब उन्होंने आपसी सहयोग की योजना बनायी और आज वे जल के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं | हो सके तो इनसे प्रेरणा लें ताकि धर्म को सही रूप में समझ सकें |


~विशुद्ध चैतन्य


बुंदेलखंड के गांव ने दिखाई राह

बुंदेलखंड में लोग पानी के आकाल से लंबे अर्से से परेशान हैं. हजारों करोड़ के पैकेज दिए गए लेकिन जमीन पर फर्क नहीं पड़ा. फर्क पड़ा तो सिर्फ एक गांव में. एनडीएवी ने इस पूरे इलाके की हकीकत जानने की कोशिश की. यहां आज भी लोग पानी की किल्लत से दो चार हो रहे हैं.

NDTVKhabar.com द्वारा इस दिन पोस्ट की गई 16 जून 2018 


15 जून 2018

आध्यात्मिकता, भौतिकता और दोगले धार्मिकों का समाज




कई प्रयोग करते हुए निरंतर बढ़ा चला जा रहा हूँ, लेकिन मेरा प्रयोग केवल मेरे लिए है | मेरे अपने ही आध्यात्मिक उत्थान के लिए | बिलकुल वैसे ही जैसे कोई ऋषि बियाबान में ध्यान करता रहता है, मैं समाज में रहकर ध्यान कर रहा हूँ | मेरा ध्यान उस रहस्य को जानने के लिए है, जिसे आज तक कोई धार्मिक, संत-महन्त नहीं समझ पाया |

सुनने में अजीब ही लगेगा आप सभी को, लेकिन ऐसा ही है |

22 मार्च 2017

गृह-प्रवेश से पहले शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है ?

"गुरू जी एक बात बताइये ?
क्या उस स्थान का शुद्धिकरण करना उचित है, जहाँ हाल ही में कोई परिवार रह कर गया हो ?

विशुद्ध चैतन्य जी, अगर उचित है तो फिर अगर में नेता हु तो मुझे भी शुद्धिकरण कराना चाहिए ?

हाँ स्थान के बजाए वोटो का शुद्धिकरण कराना चाहिए, पता नही किस किस प्रजाति के मनुष्यों ने मुझे वोट दिया हो ?" -Asif Khan


योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री आवास में प्रवेश से पहले शुद्धिकरण करवाया तो उपरोक्त प्रश्न हर जगह से उठने लगे | जो भी खुद को पढ़ा-लिखा आधुनिक व वैज्ञानिक सोच का मानता है, वह इसी प्रश्न को अलग अलग रूपों में उछाल रहा है | कुछ इसे जातिवाद से जोड़ रहे हैं तो कुछ रूढ़ीवाद व अन्धविश्वास से | इसका कारण केवल इतना ही है, कि जैसे जैसे मनुष्य पढ़ा-लिखा व आधुनिक होता चला गया, उसकी ज्ञानेन्द्रिया कमजोर होतीं चलीं गयीं | वह मात्र एक मशीन बनकर रह गया और उतनी भी प्राकृतिक क्षमता नहीं बचा पाया, जितनी की पशु-पक्षियों में होती हैं | चलिए मैं आपको समझाता हूँ कि शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है नए या कई वर्षों तक दूसरों के द्वारा प्रयोग हुए घर में प्रवेश से पहले |

20 मार्च 2017

" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं ! "




सुसंस्कृत, सभ्य, धार्मिक व पढ़े-लिखे समाज को जब मैं देखता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि ये लोग मेरे लिए अजनबी हैं | ये लोग मुझे कभी भी अपने जैसे नहीं लगते, बहुत गैर लगते हैं | शायद यही कारण रहा कि मैं इनसे दूर एकांत में रहना पसंद करता हूँ | मिलना जुलना भी रास नहीं आता मुझे इस लोगों से |

नौ दस वर्ष की उम्र में जब मैं शहर यानी दिल्ली आया तो सबकुछ बहुत ही अजीब सा लगा | हालांकि कुछ ही दिनों में हम सामान्य हो गये, लेकिन भीतर से सामान्य कभी नहीं हो पाया | जैसे जैसे मैंने दिल्ली के समाज को गहराई से जाना, उतना ही दिल्ली बेगानी होती चली गयी | फिर मैं हरिद्वार चला गया, लेकिन वहां और दिल्ली के व्यव्हार में कोई विशेष अंतर नहीं मिला मुझे और फिर मैंने हरिद्वार भी छोड़ दिया |

12 मार्च 2017

समाज में उनका सम्मान सर्वाधिक होता है जो ऐश्वर्यवान हो



"गुरु जी आखिर हम इन्सानों की जिंदगी का मक़सद किया है ?

हर धर्म की अपनी ही ढपली है | तमाम धर्म की बुनयाद डर और लालच पर रखी गई है। जो समझ से परे है।

डर "" नर्क,दोज़ख़, लालच """ अप्सरा, हूर, वह भी वर्जिन,श़राब,कबाब..."

05 मार्च 2017

मैं सुखी तो जग सुखी


एक बहुत ही बड़ा भ्रम पाल लिया है पढ़े-लिखों ने कि भौतिक सुख ही वास्तविक सुख है और बाकी सभी कुछ भ्रम है मिथ्या है | इनको लगता है कि इंसानों ने जो आविष्कार किये वे ही जीवन दायिनी हैं, बाकि सभी कुछ व्यर्थ | और यह भ्रम इतनी गहराई तक लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा दिया गया है कि इनकी स्थिति उन धार्मिक कूपमंडूकों सी हो गयी है, जो यह मानते हैं कि ईश्वर ने उनके लिए कोई पुस्तक आसमान से उतारी थी और उसमें जो कुछ भी लिखा है वही सत्य है, बाकी सब झूठ | कुछ तो ऐसे धार्मिक कूपमंडूक हैं जो चाय भी पीने जायेंगे तो देखेंगे कि उनकी किताब में इसकी परमिशन है कि नहीं | लेकिन वही धार्मिक लोग यह नहीं देखेंगे कि बलात्कार, लूटपाट, निर्दोषों की हत्या, अपराधी प्रवृति के नेताओं को वोट देना.... आदि इत्यादि उनकी ईश्वरीय किताबों, वेद-पुराणों में वर्जित है या नहीं |

इसी प्रकार कुछ अध्यात्मिक कहे जाने वाले वाले विद्वानों का मानना है कि "मैं सुखी तो जग सुखी" के सिद्धांत पर चलना ही आध्यात्म है | और हम देखते ही हैं कि अध्यात्मिक गुरु लोग केवल अपने में मस्त रहते हैं | उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पड़ोस में कोई दुखी है या नहीं | मंदिर-मस्जिदों के सामने भीख माँगते लोगों को देखकर मुझे बहुत ही आश्चर्य होता है कि जो मंदिर-मस्जिद उन भिखारियों की दरिद्रता दूर नहीं कर पाता, वह भला दूर से आने वालों की मनोकामना कैसे पूरी कर सकता है ?

लेकिन मेरी नजर में आध्यात्मिक ज्ञान यानि अधि + आत्मा यानि वह सर्वशक्तिमान जिसके हम अंश हैं और वह आत्मा जो इस शरीर को चला रही है, उसका ज्ञान | अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए आजीवन न तो तपस्या करनी पड़ती है और न ही आजीवन कोई एक किताब, मन्त्र, आयत या श्लोक रटते रहना पड़ता है | न ही कोई कर्मकाण्ड आजीवन करते रहना पड़ता है | हाँ ध्यान आवश्यक है क्योंकि ध्यान से आप अपने मस्तिष्क व शरीर को रिफ्रेश कर पाते हैं | ध्यान कोई चमत्कार नहीं है, केवल अपने आपको न्यूट्रल मोड में डाल देना मात्र है | जब आप ध्यान की अवस्था में होते हैं, तब आपके मस्तिष्क के सेल्स रिलेक्स मोड में आ जाते हैं और साथ ही आपके शरीर की सभी कोशिकाएं भी | आपके बीस मिनट के ध्यान से आपको इतनी उर्जा मिलती है, जितनी कि आठ घंटे की नींद से मिलती है | आपके शरीर की चमक बढ़ जाती है, सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है, एकाग्रता बढ़ जाती है....व अन्य कई भौतिक व अध्यात्मिक लाभ मिलते हैं |

तो ध्यान करना आध्यात्मिक उत्थान का सरल मार्ग है | अध्यात्मिक उत्थान होने के बाद फिर आप किसी दड़बे में कैद नहीं रह पायेंगे, आपको बेचैनी होने लगेगी | क्योंकि तब आप मानव निर्मित सभी सीमाओं से स्वयं को मुक्त पायेंगे | आपको समझ में आ जायेगा कि दुनिया इतनी छोटी नहीं है, जितनी कि मानव समाज ने बना रखा है | दुनिया तो इतनी विशाल है कि उसका छोर ही ज्ञात नहीं हो पा रहा | फिर आपको यह भी समझ में आ जाएगा कि पढ़े-लिखे लोगों ने कितनी बड़ी बड़ी गलतियाँ कर रखी हैं.. जैसे कि प्लास्टिक का अविष्कार व उसका अनियंत्रित दुरुपयोग |

पानी या कोल्ड-ड्रिंक बेचने वाली कम्पनियाँ प्लास्टिक की बोतल में पानी या कोल्डड्रिंक आप तक पहुँचाती है | आप पानी की बोतल खरीदते हैं, पानी पीते हैं और बोतल फेंक देते हैं | न तो कम्पनी को इस बात की कोई फ़िक्र है कि वे प्लास्टिक की बोतलें कितने अन्य जीवों की जान लेंगी, कितने वनस्पति व जलचरों की जान लेंगीं...बस कंपनी को कुछ कागज के नोट चाहिए और आपको अपनी सुविधा | फिर आप लोग तो दुनिया से उठ जाओगे एक दिन, आने वालों के लिए नरक बनाकर | जैसे कि किसी टूरिस्ट प्लेस जाकर आप लोग करते हैं | साफ़ सुथरी झील देखी और प्लास्टिक की बोतलें उसमे फेंकनी शुरू कर दी, समुद्र देखा और प्लास्टिक की बोतलें फेंक दी... क्योंकि आप लोग पढ़े-लिखे हैं खुद को बुद्धिमान समझते हैं और ऐसा करना आधुनिकता मानते हैं |

लेकिन क्या कभी सोचा है आपने कि ऐसा करके आप लोगों ने दुनिया को नरक बना दिया ? केवल अपनी भौतिक सुखो के लिए न जाने कितने उन जीवों की जिन्दगी खतरे में डाल दी और कितने जीवों को लुप्त होने पर विवश कर दिया, जिनको न तो आपने देखा है और न ही उन्होंने आपको ? आप में से कई होंगे शाकाहारी... जो जीव हत्या पाप है का नारा लगाते घूम रहे हैं | लेकिन आपके द्वारा प्रयोग किये जा रहे भौतिक संसाधनों से न जाने कितने जीव हर रोज काल का ग्रास बन रहे हैं |

तो यह है आप लोगों का विकास और आधुनिकता | मजाक उड़ाते हैं आप लोग हम जैसे लोगों का क्योंकि हम आपको कुछ करते दिखाई नहीं देते | आप लोग जिसे कुछ करना कहते हैं, जरा सोचिये उस करने में आपको लाभ कम हानि अधिक हो रही है | आप केवल स्लेव बनकर रह गये हैं कुछ व्यापारियों, कुछ पूंजीपतियों और मुर्ख सरकारों के |

प्रकृति तो स्वयं इतनी व्यवस्थित व सुनियोजित है कि कुछ भी व्यर्थ नहीं है | मनुष्य कोई यंत्र बनाता है तो वह बेकार होने के बाद केवल कबाड़ सिद्ध होता है | जबकि प्रकृति ने जो भी स्वचालित यंत्र जिसमें मानव शरीर भी शामिल है, वह व्यर्थ नहीं होता | जमीन में छोड़ तो शरीर के भीतर से स्वयं ही उस शरीर को नष्ट करने के लिए कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं | साथ ही साथ कई पशु-पक्षी के भोजन के काम में आ जाता है | और यह भी न हुआ तो, मिटटी में मिलकर खाद बन जाता है जो कि वनस्पतियों के भोजन के काम आता है |

आप स्वयं कल्पना करके देखिये कि मानव तो आज तक जल नहीं बना पाया.. आपको मिनरल वाटर भी बेच रहा है कोई तो जमीन से निकालकर ही बेच रहा है, न कि सागर से जल लेकर | सरकार को भी केवल कागज के नोटों से मतलब है, इसलिए कोकाकोला जैसे कंपनियों को जल बेच देती है.. जबकि सरकार स्वयं जल का निर्माण नहीं कर सकती | वह जल जो सभी जीव जंतुओं के लिए सामान रूप से ईश्वर द्वारा उपलब्ध करवाया गया है वह भी निःशुल्क, उसे वे लोग अपने अधिकार में ले रहे हैं, जिनकी इतनी भी हैसियत नहीं कि सागर का जल ही साफ़ करके पीने योग्य बना लें | और हम लोग खुद अपने हाथों से अपने ही देश के प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने के लिए ऐसी सरकारों को चुनते हैं जो मानसिक रूप से रुग्ण व मुर्ख होती है |

तो यह सब इसलिए क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है | भौतिक ज्ञान को सर्वोच्च मानने वाले मूर्ख पढ़े-लिखे विद्वानों ने पृथ्वी ही नहीं, सम्पूर्ण वायुमंडल व अंतरिक्ष तक को दूषित कर दिया...लेकिन भ्रम पाले बैठे हैं कि भौतिकता जीव सबसे बुद्धि मान हैं | बिगड़ा तो अब भी कुछ नहीं है यदि समय रहते लोग होश में आ जाएँ |

~विशुद्ध चैतन्य

 


26 फ़रवरी 2017

शिक्षा भी एक घातक अस्त्र है और हर किसी के हाथों नहीं सौंपी जा सकती

लोग जो समय रोज़े, नमाज़,संध्‍या-पूजा और प्रार्थना में नष्ट करते हैं, उसे यदि समाज के किसी उपयोगी काम में लगावें, तो अपने भाइयों का अपना बहुत कल्याण कर सकते हैं। यदि संसार से ईश्वर और धर्म के व्यर्थ गपोड़े मिट जायँ, तो लोगों में फ़ैले हुए झगड़ों का अन्त हो जाय। जब कोई मूर्ख से मूर्ख पिता भी अपना वश चलते अपने पुत्रों को नहीं लड़ने देता तो, यदि वास्तव में कोई खुदा होता और सर्वशक्तिमान् खुदा होता- तो वह अपनी संतान को कदाचित् अपने नाम पर कुत्तों की तरह न लड़ाता। यदि खुदा शक्ति और बुद्धिवाला होता तो भी वह एक ही धर्म सारे संसार के लिए बनाता- सारे संसार की एक ही बोली और एक ही संस्कृति होती- जिससे इन झगड़ों का बीज ही न पड़ता। जो खुदा झगड़ों का बीज बोता हो, जो धर्म मनुष्यों के लिए वास्तविक हितकर न हो, वह यदि वास्तव में कुछ हो भी तो विषवत् त्याज्य ही है। -राधामोहन गोकुलजी (पुस्तक: ईश्वर का बहिष्कार)

मेरे एक मित्र श्री D.r. Godara जी ने इस पुस्तक के विषय में जानकारी दी और मुझसे अपनी राय व्यक्त करने का आग्रह किया | मैंने पुस्तक के कुछ अंश पढ़े, लेकिन पूरी नहीं पढ़ी | फिर भी मैं इतना तो समझ ही चुका था कि पुस्तक के लेखक गोकुलजी, बहुत ही सुलझे विचारों वाले, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं |

पढ़े-लिखे व्यक्तियों कि सबसे बड़ी समस्या यह होती कि उनकी कल्पनाशीलता ध्वस्त हो जाती है | वे केवल उन्ही चीजों पर विश्वास करते हैं जो भौतिक है या जो दिखाई दे सकती है, जिन्हें अपनी पाँचो इन्द्रियों से अनुभव किया जा सकता हो.. यानी हवा और गैसों को भी वे इसलिए मानते हैं क्यों कि उन्हें पाँचों इन्द्रियों में से किसी एक से महसूस किया जा सकता है | उनके लेख का एक अंश यहाँ दे रहा हूँ,

“ईश्वर एक ऐसा कल्पित पदार्थ है, जिसे कभी किसी ने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं किया इसलिए कि उसका सर्वथा अभाव है। ईश्वर कोई ऐसी चीज़ है ही नहीं। जिस पदार्थ का अत्यन्त अभाव है, उसका अस्तित्व कभी हो ही नहीं सकता। संसार में जितनी वस्तुएँ हैं, वे चाहे कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हों, सबका प्रादुर्भाव प्रकृति से होता है; प्रकृतिजन्य सारे पदार्थ किसी न किसी दशा में इन्द्रिय ग्राह्य होते हैं। उदाहरण के लिए जल को लीजिए। यह भाप की सूरत में आँखों को दिखाई देता है। यदि यह और विश्लिष्ट होकर सूक्ष्मतम वायव्य (Gaseous) हो जाय अर्थात् गैस का रूप धारण कर ले, तो भी वह इन्द्रियों द्वारा जानने का विषय होगा। फि़र देखिए बिजली बहुत ही सूक्ष्म रूप की एक वस्तु है; आँख, कान, नाक द्वारा इसे नहीं जान सकते। लेकिन बिजली की उत्पत्ति प्राकृत पदार्थों से होती है; और जब हम उसका व्यवहार किसी रूप में करते हैं तो द्रव्यों में उसे स्पष्ट देखते हैं कि काम कर रही है।”

तो जो भी थोड़ा बहुत पढ़ा मैंने इस पुस्तक से उससे यही सिद्ध हो रहा था कि हमारे पूर्वजों ने जिन्हें शूद्र कहा, वह गोकुल जी जैसे विद्वानों के लिए ही कहा | शायद यही कारण था कि शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखा गया क्योंकि शिक्षा एक ऐसा अस्त्र है, जिससे निर्माण व अविष्कार भी संभव है और पतन व विनाश भी | बंदर को शस्त्र विद्या सिखा देने से इस बात की सम्भावना कम ही होती है कि वह कुछ अच्छा करेगा, हाँ इस बात की सम्भावना अधिक अवश्य होती है कि वह किसी की मौत का कारण अवश्य बनेगा |

विदेश की एक घटना पढ़ी थी मैंने कई वर्षों पहले कि एक व्यक्ति ने एक बन्दर पाला हुआ था | बंदर और मालिक में दोस्ती इतनी गहरी थी कि मालिक को बंदर पर इतना विश्वास हो गया था कि वह उसे बंदर नहीं, बल्कि अपना बेटा ही मानने लगा था | बंदर भी इतना समझदार था कि वह हर चीज बहुत जल्दी सीख व समझ लेता था | मालिक ने उसे कई तरह के हुनर सिखाये थे और वह सब बंदर बहुत ही कुशलता पुर्वक्र कर लिया करता था | एक दिन उस व्यक्ति ने बंदर को बन्दूक चलाना सिखाने की सोची | बंदर ने वह भी बड़ी जल्दी सीख लिया, लेकिन अचानक बंदर ने अपने मालिक की तरफ ही बन्दूक तान दी और ट्रिगर दबा दिया | मालिक की उसी समय मौत हो गयी….अब उस बंदर का तो कोई दोष था नहीं क्योंकि वह तो यह जानता ही नहीं था कि इससे किसी की मौत हो सकती है | उसने तो बस शरारत की थी और हादसा हो गया | यह विडियो देखिये, इसमें भी ऐसा ही ही कुछ है | कुछ सैनिक जंगल में ठहरे हुए हैं और एक चिम्पांजी का बच्चा उनके बीच पहुँच जाता है | वे उस चिन्म्पांजी से खेलने लगते हैं लेकिन…..बंदर के हाथ बन्दूक

तो शिक्षा भी इसी प्रकार एक घातक अस्त्र है और हर किसी के हाथों नहीं सौंपी जा सकती | आइन्स्टीन के पास परमाणु बम बनाने की तकनीक थी | जब तक उनके पास रही, सब ठीक था | लेकिन जैसे अमेरिकियों के पास पहुँची, हिरोशिमा और नागासाकी की घटना घट गयी | क्योंकि शिक्षा बंदरों के हाथ लग गयी थी | आप ध्यान से यदि इतिहास को पढ़ें और समझें तो शिक्षा जब तक सही व्यक्ति के हाथ रही, सदुपयोग होता रहा, लेकिन जैसे ही शूद्रों के हाथ पहुँची विनाशक चीजें ही बनी और आज इन्हीं पढ़े लिखों के द्वारा किये गये विकास का ही परिणाम है कि धरती, जल और आकाश तीनों ही प्रदूषित हो गये | तो फिर शिक्षा कैसे अछूती रहती ?

अब गोकुल जी भौतिक जगत से ऊपर उठ पाने में अक्षम हैं और गोकुल जी जाने कितने ही ऐसे पढ़े-लिखे होंगे, जिन्होंने केवल पढाई की है, ध्यान आदि का कोई प्रयोग कभी नहीं क्या होगा | किया भी होगा तो कोई चमत्कार होता न देख, छोड़ दिया होगा |

ध्यान इनसे होगा नहीं उसमें भी इनको चमत्कार देखना होगा तो स्वाभाविक है कि ध्यान से इनको कुछ समझ में आना नहीं है | इनको कोई ईश्वर के विषय में समझाए तो समझाए कैसे ? क्योंकि ईश्वर कोई ऐसी वस्तु, पदार्थ या द्रव्य तो है नहीं कि इनको सुंघा कर, छुवाकर महसूस करवा दी जाये, वह तो स्वयं जानने व अनुभव करने की चीज है | कोई जान भी जाए तो कह नहीं सकता, बुद्ध भी नहीं कह पाए और महावीर भी नहीं कह पाए…बुद्ध ने तो बड़ी सफाई से ईश्वर को ही नकार दिया क्योंकि वे जानते थे कि मूर्खों को ईश्वर के विषय में नहीं समझाया जा सकता | लेकिन फिर दुर्भाग्य दूसरा भी है हमारा कि धूर्त पाखंडियों ने ईश्वर के एजेंट होने का ढोंग करना शुरू कर दिया | अब वे ईश्वर के नाम पर धंधा खोल कर बैठ गये… अरे ईश्वर छोड़िये लोग तो बुद्ध के नाम पर ही धंधा खोलकर बैठे हुए हैं | समाज को जागृत व चैतन्य करने कि जगह तमाशा दिखाते फिर रहे हैं | तो ईश्वर समझ में आएगा कैसे ?

फिर गोकुलजी को पूरी तरह से गलत भी नहीं कह सकता क्योंकि धर्मों के ठेकेदारों ने धर्म के नाम पर इतना उपद्रव मचाया हुआ है, इतनी नफरत फैला रखी है कि यही लग रहा है यदि सारे धर्म मिट जाएँ तो शायद कुछ शान्ति आ जाये | मुसलमान अपनी क़ुरान से चिपका हुआ है, हिन्दू वेद और गीता से चिपका हुआ है, इसाइ बाइबल से चिपका हुआ है | आगे बढ़ने को कोई तैयार नहीं, ऊपर उठने को कोई तैयार नहीं…हर कोई एक ही राग अलाप रहा है हमारी किताब पढ़ो तो धर्म समझ में आएगा, हमारी किताब पढो तो ईश्वर समझ में आएगा, हमारी किताब पढो तो जन्नत/स्वर्ग, मोक्ष, अप्सराएं, हूरें मिलेंगी | और ऐसा कहने वाले इन रट्टू तोतों को खुद नहीं पता कि धर्म क्या है | इनकी नजर में तो साउदी के कर्मकांड कर लो और क़ुरान रट लो बस, हो गये मुसलमान | गीता रट लो, तिलक लगा लो, जनेऊ डाल लो तो बस हो गये सच्चे हिन्दू….उसके बाद मारकाट करो, बलात्कार करो, चोरी करो, देश से गद्दारी करो, दंगा-फसाद करो धर्म के नाम पर….सब जायज |

यहाँ यह कहानी पढ़िए.. फिर आगे बढ़ते हैं:

~मुल्ला नसरुद्दीन ने एक मनोवैज्ञानिक से पूछा कि मैं क्या करूं? मेरे दफ्तर में लोग काम ही नहीं करते! जिससे कहो वही कहता है: कल देखेंगे। कि कर लेंगे, क्या जल्दी पड़ी है! फाइलें इकट्ठी होती जाती हैं, कोई काम करता नहीं। महा अलाल इकट्ठे हो गए हैं। मैं क्या करूं?

मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह सूत्र हरेक की टेबल पर टांग दो–

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।

पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब।।

जंची बात नसरुद्दीन को, उसने कहा यह ठीक है। बनवा कर सुंदर तख्तियां हरेक कमरे में, हरेक कार्यकर्ता के सामने, हरेक कर्मचारी के सामने टांग दीं बड़े-बड़े अक्षरों में।

तीन दिन बाद मनोवैज्ञानिक ने फोन किया कि नसरुद्दीन, क्या हाल हैं?

नसरुद्दीन ने कहा, अस्पताल में भरती हूं। आप आ जाएं। और देर न करें। पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब। आ ही जाएं शीघ्र, क्योंकि शरीर में फ्रैक्चर ही फ्रैक्चर हो गए हैं। क्या कमाल का सूत्र दिया आपने!

मनोवैज्ञानिक तो बहुत हैरान हुआ। भागा, देखा तो पट्टियां ही पट्टियां बंधी हैं नसरुद्दीन पर! पलस्तर चढ़ा है–पैर पर, हाथ पर, खोपड़ी पर। पूछा, यह हुआ क्या? यह दुर्गति कैसे हुई?

उसने कहा, यह तुम्हारे सूत्र की कृपा है। अभी उठ नहीं सकता, नहीं तो वह मजा चखाता…। क्योंकि जैसे ही मैंने यह तख्ती टांगी, उपद्रव हो गया। वह जो खजांची था वह सारी तिजोरी लेकर नदारद हो गया। और एक चिट लिख कर छोड़ गया कि जिंदगी भर से सोच रहा था कि कब तिजोरी लेकर नदारद हो जाऊं, आपने क्या सूत्र टांगा कि मैंने सोचा बात तो बिलकुल सच है–पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब! सो मैं तो जाता हूं, जयरामजी की!

और वह जो मैनेजर था वह मेरी टाइपिस्ट को लेकर भाग गया। वह भी लिख कर नोट छोड़ गया कि नजर तो मेरी तुम्हारी टाइपिस्ट पर बहुत दिन से थी, मगर तुम्हारे डर से छिप-छिप कर छेड़ खानी करता था। मगर तुमने सूत्र क्या टंगवा दिया, मैंने भी सोचा बात तो सच है, जिंदगी यूं ही बीती जा रही है, ऐसे ही ख्वाब देखते-देखते। तो अब जा रहा हूं और तुम्हारी टाइपिस्ट को भी भगाए लिए जा रहा हूं। अब कहीं रहेंगे छिप कर और जीएंगे मौज से।

और मेरा जो दरबान है, वह एकदम भीतर घुसा और लगा मुझे पीटने। मैंने पूछा, भाई, तू यह क्या करता है? उसी ने ही ये मेरी हड्डी-पसली तोड़ दीं।

उसने कहा कि चाहता तो कब से करना था यह कि तुम्हारी हड्डी-पसली तोड़ दूं। लेकिन यह सोच कर कि देखेंगे, फिर देखेंगे…बाल-बच्चों वाला आदमी हूं, कोई झंझट हो, पुलिस हो, अदालत हो। मगर तुमने तख्ती क्या टांगी, मैंने कहा कि बात तो ठीक है।

मनोवैज्ञानिक ने कहा कि मैं बड़ा दुखी हूं। मुझे क्या पता था कि सूत्र का ऐसा परिणाम होगा! अब यह सूत्र किसी को न दूंगा। मुझे क्षमा करो। बहुत दुख हो रहा होगा तुम्हें, जगह-जगह पीड़ा हो रही होगी।

मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि जब हंसता हूं तभी दर्द होता है, वैसे नहीं होता।

मनोवैज्ञानिक ने कहा, हंसते किसलिए हो?

तो उसने कहा, हंसता इसलिए हूं कि क्या गजब दुनिया है! काहे के लिए सूत्र टांगा था और क्या हो गया! कैसे गजब के लोग हैं! इससे कभी-कभी हंसी आ जाती है भीतर ही भीतर तो दर्द होता है, हंसी में; नहीं तो वैसे तो ……सब शांत पड़ा हूं तो ठीक है..!!


चलिए अब चलते हैं यह जानने कि ईश्वर का बहिष्कार करने से क्या समस्या हल हो जायेगी ?

सबसे पहली बात तो यह कि जिसने भी ‘ईश्वर के बहिष्कार’ की कल्पना की है, वह नास्तिक नहीं है | क्योंकि नास्तिक लोग किसी अनदेखी अनजानी चीजों का विरोध नहीं करते, वे उन्हीं चीजों का विरोध करेंगे, जिसको वे जानते हैं, छु सकते हैं या देख सकते हैं | लेकिन ईश्वर के आस्तित्व को ही जो नहीं मानते, भला उसका बहिष्कार कैसे कर सकते हैं ? ईश्वर का बहिष्कार करने के लिए भी तो कल्पना की ही आवश्यकता होगी, कुछ तो बताना ही पड़ेगा कि जिसे तुम लोग ईश्वर मानते हो वह वास्तव में है नहीं | और उसे समझाने के लिए दूसरों की कल्पनाओ को तोडना होगा, उनको भी अपनी ही तरह मंदबुद्धि या किताबी कूपमंडूक बनाना होगा |

इन नास्तिक सम्प्रदायों के ठेकेदार और अन्य सम्प्रदायों के ठेकेदारों में कोई बहुत अंतर नहीं है, बस एक नहीं मानते और दूसरे मानते हैं… जानते दोनों में से कोई नहीं हैं | दोनों का ही आधार है किताबें…एक की किताब में लिखा है ईश्वर नहीं है, और दूसरे की किताब में लिखा है नहीं | एक रिफरेन्स देता है स्टीफन हॉक, पेरियार, आंबेडकर का, तो दूसरा रेफ़रन्स देता है पैगम्बर, अवतारों और आध्यात्मिक गुरुओं का | एक कहता है कि हमारा अल्लाह ही सच्चा है तो दूसरा कहता है कि हमारा स्टीफन हॉक और पेरियार ही सच्चा है | एक कहता है कि हम जो कहते हैं उसे मानो और दूसरा कहता है कि मत मानो | एक कहता है कि केवल हमारा सम्प्रदाय, हमारी किताबें और हमारे भगवान ही सच्चे हैं, बाकी सभी काफ़िर, अधार्मिक हैं उनको मिटा दिया जाना चाहिए या धर्म परिवर्तन करवा दिया जाना चाहिए, दूसरा कहता है कि सारे धर्म और उनकी किताबों को ही मिटा दिया जाना चाहिए……. मुझे तो इन सभी सम्प्रादयों में मौलिक कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता | एक ही नस्ल है, एक ही मानसिकता है, एक सी ही विचार धारा है… बस हम सही हैं और बाकि सभी गलत |

सुकरात, गैलीलियों, जीसस को ऐसी ही मानसिकता के विद्वानों ने मरवा दिया था | बोधिधर्मन को ऐसी ही मानसिकता लोगों के कारण चीन भाग जाना पड़ा, चीन में भी आज अध्यात्मिक लोगों का दमन जोरों पर है ऐसा सुनने में आया | तो कोई भेद नहीं है ऐसे कूपमंडूक नास्तिकों और आस्तिकों में |

नास्तिकों को लगता है कि ध्यान में बैठना समय की बर्बादी है, इस्लामिकों को लगता है कि पूजा-पाठ मूर्ती पूजा आदि समय की बर्बादी है, हिन्दुओं को लगता है कि नमाज पढ़ना मस्जिद जाना समय की बर्बादी है, यानि हर किसी को लगता है कि वही समय का सदुपयोग कर रहा है, बाकि सभी बर्बाद कर रहे हैं | नास्तिकों के लिए समय का सदुपयोग का मतलब नोट छापने की मशीन बन जाना… आप अपनी भक्ति में खोये हैं अपने में मस्त हैं, न किसी को कुछ कहते हैं, न किसी पर कुछ थोपते हैं… फिर भी सभी के पेट में दर्द रहता है.. जैसे मीरा से लोग परेशान थे | यानी ये लोग खुद को भगवान सिद्ध करना चाहते हैं, ये जैसे चाहेंगे वैसे सब चलें क्योंकि इनकी किताबें ऐसा कहती हैं क्योंकि ये उन्नत नहीं हो पा रहे, क्योंकि ये नहीं उठ पा रहे ऊपर.. तो कोई दूसरा भी नहीं उठना चाहिए… इन्हीं की तरह भेड़बकरियों की तरह किसी किताब, किसी नेता किसी इकलौते अनदेखे ईश्वर के नाम पर धर्मों के ठेकेदारों, जाति के ठेकेदारों, आरक्षण के ठेकेदारों की पीछे दुम हिलाते घूमते रहें… हद हो गयी…..यह तो…..

क्षमा चाहता हूँ कि इतना लम्बा पोस्ट लिख दिया… क्योंकि समझाने के लिए आवश्यक लगा… यह भी जानता हूँ कि आपसे से अधिकाँश तो पूरा पढेंगे भी नहीं, और कई कि समझ में ही नहीं आयेगा… फिर भी यदि दो चार धैर्यवान व्यक्तियों कि समझ में आ जाये कि मैं क्या कहना चाहता हूँ, वही मेरे लिए बहुत है | मुझे बर्दाश्त करने के लिए आपका आभार.. ईश्वर आप सभी की आत्मा को शांति प्रदान करें | ~विशुद्ध चैतन्य

20 फ़रवरी 2017

कोई भी धार्मिक ग्रन्थ ऐसा नहीं है दुनिया में जो किसी को अच्छा या बुरा बनाता है


आपने सुना या देखा होगा कि जब भी कोई हिंसक घटना घटती है, फिर चाहे वह इस्लामिक या हिन्दू आतंकवादियों द्वारा घटित हो या दंगाइयों द्वारा या गौरक्षकों, संघी-बजरंगियों द्वारा | सभी धार्मिक अपने अपने सम्प्रदाय का बचाव करते हुए कहते मिलेंगे कि उनसे हमारे धर्म के कोई लेना देना नहीं, हमारी ईश्वरीय किताबें (कुरान, वेद, गीता, बाइबल...आदि) कभी भी ऐसे कामों का समर्थन नहीं करतीं | ये लोग भटके हुए हैं या फिर ईश्वर के आदेश को समझ नहीं पाए |