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25 जून 2018

आनंद और उत्सव है धर्म, घृणा और द्वेष नहीं



बचपन में फ़कीर या संन्यासी की रूपरेखा जो मेरे मन बस गयी थी, वह कुछ वैसा था जो सदैव प्रसन्नचित रहता है, हँसता, गाता, नाचता अपनी धुन में मगन रहता है | जब भी उनकी कोई तस्वीरें देखता तो ऐसा लगता था कि उनके जीवन में सुख ही सुख है और दुःख का उन्हें कोई अनुभव ही नहीं |

तब नहीं जानता था कि संन्यास क्या होता है और उनका जीवन कैसा होता है | माँ या पिताजी से बस यही पता चला कि संन्यासी वह होता है जो सामाजिक बंधनों से मुक्त होता है और केवल ईश्वर की आराधना व चिन्तन में लिप्त रहता है | चूँकि उन्हें समाज के सुख दुःख से कोई लेना देना नही होता, किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती, किसी से कोई अपेक्षा नहीं रहती, इसीलिए वे लोग हमेशा खुश रहते हैं | जबकि हम जैसे सामाजिक दायित्वों से बंधे लोगों के लिए सुख के भी पल होते हैं और दुःख के भी |

मुझे अपने जीवन में निश्चिंतता और सुख का अनुभव अपनी माँ के देहांत के बाद शायद कभी नहीं हुआ | अब हँसता भी हूँ तो लगता है दिखावा कर रहा हूँ, अब खुश भी होता हूँ, तो मन में कोई हलचल नहीं होती | बस बाहरी ओढ़ी हुई सी ख़ुशी होती है | कभी समझ नहीं पाया कि माँ के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ कि मैं फिर दोबारा वह सुख व ख़ुशी नहीं प्राप्त कर पाया | मुझे याद है वह अंतिम ख़ुशी जो मैंने नौ वर्ष की आयु में पायी थी वह है दिवाली मनाना | उस दिवाली के बाद फिर कभी कोई दिवाली नहीं आयी जो मुझे ख़ुशी दे पायी | क्योंकि दिवाली के बाद आयी जनवरी ने माँ को हमेशा के लिए मुझसे दूर कर दिया था | माँ के बाद कोई मेरा अपना नहीं बन पाया, माँ के बाद कोई इतना विश्वसनीय नहीं बन पाया जिससे में खुलकर मिल सकूं |

कई नौकरियाँ बदली, कई तरह के काम किये, कई मित्र बनाए...समय के साथ सब छूटते चले गये | मतलब की नौकरी, मतलब के मित्र, मतलब के सम्बन्ध स्थाई नहीं होते यह बहुत देर से समझ में आया | माँ से बेहतर अपना और कोई नहीं यह भी समझ में आया |

बचपन में सोचा करता था कि जब मैं विवाह योग्य हो जाऊँगा तो शायद दुबारा कोई मुझे अपना मिल जायेगा...लेकिन नहीं मिला | समझ में आया विवाह प्रेम पर नहीं, दौलत और शोहरत पर आधारित होता या फिर स्वार्थ पर | स्वार्थी तो मैं भी हूँ लेकिन इतना स्वार्थी नहीं बन पाया कि विवाह योग्य कोई साथी खोज पाऊँ | या फिर शायद इतनी दौलत नहीं इकट्ठी कर पाया कि विवाहित हो पाऊँ | फिर बरसों बाद समझ में आया कि विवाह शुद्ध व्यापार है | प्रेम खरीदने की योग्यता होनी चाहिए प्रेमिका मिल जायेगी | पत्नी खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पत्नी मिल जायेगी, पति खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पति मिल जाएगा.....यानी हर चीज बिकाऊ है और हर चीज खरीदी और बेचीं जा सकती हैं, व्यक्तिगत सम्बन्धी तक | और जो मेरे साथी विवाहित हुए, उनके मुरझाये चेहरे देखकर विवाह से मन घबरा गया |

फिर संन्यास लिया सोचा था कि संन्यासियों के बीच रहूँगा शायद मैं बदल जाऊँ | लेकिन नहीं बदल पाया क्योंकि आज भी मैं वही हूँ जो कल था | मैं संन्यासियों की तरह समाज के दुखों को भूलकर खुश नहीं हो पाया | 'मैं सुखी तो जग सुखी' के सिद्धांत को नहीं अपना पाया | लेकिन समझ में आया कि सबका दुःख उनका अपना है दूसरों का नहीं | कोई अमीर किसी गरीब की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई हिन्दू किसी मुस्लिम की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई मुस्लिम किसी हिन्दू की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई कांग्रेसी कभी भाजपाइयों की चिंता नहीं करता और कोई भाजपाई कभी कांग्रेसियों की चिंता नहीं करता |

कोई मुस्लिम मारा जाए भीड़ द्वारा तो मुस्लिम समाज चिंतित हो जाएगा लेकिन कोई मुस्लिम भूख से मर रहा हो, उसके खेत की फसल नष्ट हो जाने का कारण दुनिया भर के कर्जों में दब गया हो, तब मुस्लिम समाज आँखे मूँद लेगा | इसी प्रकार कोई हिन्दू मारा जाए मुस्लिम भीड़ के हाथों तो हिंदुत्व ही खतरे में पड़ जाएगा | सारे हिन्दू संगठन दिन भर उस हिन्दू का शोक मनाएंगे मुस्लिमों को कोसेंगे | लेकिन जब कोई हिन्दू भूख से मर जाये, गरीबी से मर जाए, उसकी जमीन कोई भूमाफिया छीन ले, किसान आत्महत्या कर ले, आदिवासी बेघर हो जाएँ....तब हिंदुत्व खतरे में नहीं पड़ेगा, तब किसी हिन्दू संगठन की सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ेगा | उनका व्यव्हार कुछ ऐसा होगा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं |

यानि ये शोक मानना, ये विरोध जताना भी साम्प्रदायिक है मानवीय नहीं | मौका मिलना चाहिए दुसरे सम्प्रदायों को बुरा दिखाने का, लेकिन अपनी बुराइयाँ दिखाई नहीं देगी इन्हें | इन्हें दिखाई नहीं देगा कि इनके अपने दड़बे में ही इनके अपनों के कारण ही कितने लोग शोषित पीड़ित व दुखी हैं....लेकिन दूसरे दड़बे के हाथों किसी पर अत्याचार हो जाये तो आसमान सर पर उठाये फिरने लगेंगे | और ढोंग करेंगे मानवता का, इन्सनियता का | वास्तविकता यह है कि न तो धर्म बचा है और न इंसानियत | अब तो केवल ढोंग ही बचा है |

यह सब देखकर मैं खुश नहीं हो पाता कभी भी | यह सब देखकर नाच नहीं पाता कभी भी, या सब देखकर गा नहीं पाता कभी भी | लेकिन कहते हैं न, सुख और दुःख सब अपने ही भीतर है ? तो भीतर जाने पर पाता हूँ कि मैं सबसे सुखी इंसान हूँ | मुझे दूसरों के दुखों को देखकर दुखी होने की आवश्यकता नहीं है | जो समाज खुद दुखों को गले लगाए रखना चाहता हो, जो समाज खुद को दुखों से मुक्त न करना चाहता हो, उनके दुखों को लेकर मैं भला क्यों दुखी होता हूँ ? जानबूझकर सोये हुए को नहीं जगाया जा सकता, जानबुझकर दुखी हुए लोगों को सुख नहीं पहुँचाया जा सकता...इसलिए अब बदलूँगा स्वयं को | अब अपने ही सुखों में सुखी रहूँगा, दूसरों के दुखों में दुखी रहने का मुझे कोई अधिकार नहीं |

वास्तव में संन्यासी होने का अर्थ ही समाज के ढोंग, पाखण्ड आडम्बरों से अलग करके स्वयं को सुखी व प्रसन्न रखें का उपाय खोजना | और जो ऊपर उठने का अभिलाषी हो उसे सही राह दिखाना | न कि उन समस्याओं को लेकर दुखी होना, जिसे आप सुलझा नहीं सकते, जिसके लिए आप जिम्मेदार नहीं, जिसका आप्स्से कोई सम्बन्ध नहीं |

~विशुद्ध चैतन्य

19 जून 2018

समर्थ को सहायता एक अकाट्य सत्य




संन्यास एक ऐसी अवस्था होती है, जहाँ पहुंचकर आप वह सब देख व समझ पाते हैं, जो समान्य जीवन जीते हुए नहीं समझ पाते | हम यह कभी चिन्तन नहीं कर पाते अपनी दैनिक जीवन के उलझनों में कि समाज हमेशा समर्थ की सहायता को तत्पर क्यों रहता है ? हम यह कभी चिंतन-मनन नहीं कर पाते कि जिनके पेट भरे हुए होते हैं, उन्हें खिलाने पिलाने के लिए हर कोई आतुर रहता है, लेकिन जो भूख से मर रहे होते हैं, उन्हें पूछने कोई नहीं जाता | हम यह नहीं देख पाते कि बड़े बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों को खरबों का कर्ज माफ़ कर दिया जाता है, लेकिन किसी विवश लाचार व्यक्ति का घर नीलाम करके भी कर्ज वसूल लिया जाता है |

अभी हाल ही में पुण्य प्रसुन्न बाजपेयी ने अपने किसी टीवी शो में बताया कि 17 हज़ार करोड़ रूपये की कर्ज माफ़ी पिछले तीन वर्षों में उद्योगपतियों को दी गयी | एक और शो में उन्होंने बताया कि उद्योपतियों को दिए गये 48 खरब रूपये सरकार ने बट्टे खाते में डाल दिए, यानि वे कर्ज माफ़ कर दिए गये | लेकिन किसानो के लिए उनके पास पैसा नहीं है | किसानो को कर्ज माफ़ी के रूप में चेक दिए भी गये तो अस्सी पैसे से अट्ठारह रूपये तक के |



सभी धार्मिक, आसमानी, हवाई किताबों में यही पढ़ने को मिलता है कि दीन-दुखियो की सहायता करो, गरीबों की सहायता करो, असहायों की सहायता करो लेकिन सहायता हमेशा अमीरों की ही होती है, समर्थ व समृद्धों की ही होती | लाखों समाजसेवी संस्थाएं होंगी इस दुनिया में, लेकिन लाख लोगों की भी सहायता नहीं हो पाती | अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी बेघर भिखारियों को देखा जा सकता है जो फुटपाथों पर जीवन गुजारते हैं |

लेकिन ऐसा होता क्यों हैं, जिन्हें आवश्यकता है उनकी सहायता करने की बजाये उनकी सहायता क्यों की जाती है जो समर्थ हैं ? समाज ने कभी भी इस बात पर चिंतन नहीं किया | जिन्होंने चिंतन मनन किया, समझा जाना, वे समाज को समझा नहीं पाए या समाज ने उन्हें सुना ही नहीं |

समाज समर्थ का सहयोगी क्यों ?


समाज समर्थ का सहयोगी इसीलिए होता है क्योंकि सहयोग की सार्थकता उन्हें दिखाई देती है | उन्हें ऐसा लगता है कि हम जिसका सहयोग कर रहे हैं वह चूँकि अपने आप में समर्थ है, आत्मनिर्भर है, समृद्ध है, इसीलिए वह धन का दुरूपयोग नहीं करेगा |

दूसरा प्रमुख कारण है किसी भी समृद्ध, ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की सहायता करके वास्तव में व्यक्ति अपने ही अहंकार को तृप्त करता है | वह उस समृद्ध व्यक्ति से स्वयम को जुड़ा हुआ पाता है और स्वयं को यह सांत्वना दे पाता है कि वह उतना अमीर या प्रसिद्द न सही, पर इस योग्य तो हुआ कि वह उस अमीर की योजनाओं में सहयोगी हुआ |

शेयर में पैसे लगाना, व्यापार में पैसे लगाना, राजनैतिक पार्टियों को चंदा देना, राजनेताओं को चंदा देना आदि सब व्यापारिक सहयोग हैं परमार्थ या परोपकार नहीं | बदले में उन्हें कुछ न कुछ चाहिए होता है | लेकिन यदि किसी गरीब की सहायता करते हैं, किसी असफल व्यक्ति की सहायता करते हैं तो पैसे बट्टे खाते में जाते हुए दिखाई देते हैं | उससे कोई लाभ नहीं होता उन्हें | यही कारण है कि समर्थ व समृद्ध व्यक्तियों को हर कोई सहायता देने के लिए तत्पर रहता है |

धर्म व आध्यात्म में निःस्वार्थ दान का महत्व


सभी सम्प्रदायों में दान या जकात का बहुत महत्व बताया गया है | इसका प्रमुख कारण था कि जो समर्थ नहीं हैं, असफल हैं, गरीब हैं, अयोग्य हैं, उनकी सहायता हो सके | लेकिन ऐसा होता नहीं | क्योंकि साल में एक बार या किसी धार्मिक पर्व में सौ पचास रूपये दान करके लोग समझते हैं कि उन्होंने अपना धर्म निभा लिया | वास्तव में इन्होंने दान किया ही नहीं होता, केवल ढोंग कर रहे होते हैं दान का |

यदि समाज वास्तव में दान कर रहा होता, वास्तव में जकात दे रहा होता, तो समाज में गरीबी देखने नहीं मिलती | कोई भूखा न मर रहा होता और कोई किसान धनाभाव में आत्महत्या नहीं कर रहा होता |

फिर किसी को धन छुपाने के लिए गोदामों, पनामा या स्विसबैंक न खोजना पड़ता और न ही किसी को काला धन सफ़ेद करने वाले नेताओं और बाबाओं की आवश्यकता पड़ती |

दान पुण्य का महत्व समाप्त हुआ भी तो उन मुफ्तखोरों की वजह से, जिन्होंने दान बटोरना ही धंधा बना लिया | कभी समाज सेवी संस्थाओं के नाम पर दान वसूलते हैं, लेकिन जिनकी सेवा का दावा करते हैं, उन तक पैसा पहुँचता ही नहीं | कई लोग भीख मांगने को ही धंधा बना रखे हैं | बड़ी बड़ी कोठियाँ बना लेते हैं, उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे होते हैं, लेकिन पेशा भीख मांगने का अपना रखे हैं |इसीलिए दान धर्म गर्त में चला गया |


मेरी अपनी समझ कहती है कि दान या जकात का मुख्य उद्देश्य किसी को सहयोग देकर आत्मनिर्भर बनाना होता है, किसी को सहयोग देकर उसे समस्याओं से बाहर निकालना होता है, न कि भिखारियों की तरह सौ पचास रूपये का चंदा देकर टरका देना |

दान भी लेना है तो पहले स्वयं को समर्थ करो


दुनिया में जितने भी महान दार्शनिक आये, जितने भी लोगों ने सत्य को जाना, जितने लोगों ने आध्यात्मिक या भौतिक उन्नति पायी, सभी के उपदेशों व सूत्रों में एक मूल सन्देश अवश्य छुपा मिलता है और वह है 'स्वयं को जानो, स्वयं को पहचानो !' गौतम बुद्ध ने भी कहा था, “अप्प दीपो भव:” अर्थात स्वयं का प्रकाश बनो !

इन्होने सत्य को जाना कि जब तक आप स्वयं को समर्थ, सबल नहीं बनाते, कोई भी आपकी सहायता करने को उत्सुक नहीं होगा | एक दो बार कोई सहायता कर भी देगा, लेकिन बाद में वह भी अपने हाथ खींच लेगा | चूँकि आप आलसी हैं या अयोग्य हैं, इसीलिए आप उन सहायता का सदुपयोग नहीं कर पाते, आपकी स्थिति वैसी ही दयनीय बनी रहती है | और अंत में आप दुनिया को कोसते हुए इस दुनिया से विदा ले लेते हैं भुखमरी और तंगी में जीते हुए | आपकी सारी महत्वाकांक्षाएँ भीतर ही दफन होकर रह जाती है | आप समाज सेवा भी करना चाहते हों, आप देश के लिए कुछ महत्वपूर्ण भी करना चाहते हों, तब भी लोग आपकी सहायता को आगे नहीं आएंगे | क्योंकि आप अयोग्य हैं, असमर्थ हैं, असफल हैं | और सदैव स्मरण रखें, खुद का पेट भरने या परिवार पालने की योग्यता न हो और सपने दूसरों की सेवा या सहायता की देख रहे हैं, तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं | पहले स्वयं को व स्वयं के परिवार को पालने योग्य बनिए, स्वयं  व स्वयं के परिवार को इतना समर्थ व समृद्ध बना लीजिये कि विपरीत परिस्थितियों में भी आपकी मानसिक स्थिति डाँवाडोल न हो सके |

इसीलिए पहले स्वयं को समर्थ व सफल बनाइये, दूसरों के सामने हाथ फैलाना बंद कर दीजिये | जब आप दूसरों की तरफ देखना बंद कर देते हैं, तब आप स्वयं की ओर मुड़ते हैं स्वयं की शक्तियों व योग्य्ताताओं को पहचान पाते हैं |

बुरा वक्त क्या वास्तव में बुरा होता है ?


बुरा वक्त कभी भी बुरा नहीं होता | बुरा वक्त वास्तव में वह समय होता है, जो प्रकृति आपको उपलब्ध करवाती है, स्वयं को जानने व समझने के लिए | जब तक व्यक्ति के जीवन में बुरा वक्त नहीं आता, वह इंसान नहीं बन पाता | उसे दूसरों के दुःख-दर्द समझ में नहीं आते | और जिन्हें दूसरों के दुःख-दर्द नहीं समझ में आते, उनमें दूसरों की सहायता के लिए बढ़ने की भावना विकसित नहीं हो पाती, वह मनुष्य नहीं बन पाता | वास्तव में मनुष्य योनी में जन्म लेने का मुख्य कारण यही होता है कि हम पशु योनी में कुछ ऐसा काम कर जाते हैं जो उस योनी के सामान्य व्यवहारों से अलग होता है | आपने कई बार पढ़ा होगा कि किसी मछली ने या किस हिंसक पशु ने किसी की जान बचाई | तो ये उनके सामान्य व्यव्हार के विरुद्ध होता है, और जब कोई पशु अपनी जाति से अलग किसी और जाति या प्रजाति के जीव के प्रति सद्भावना से भरने लगता है, तब वह मनुष्य योनी के अनुकूल होने लगता है | क्योंकि मनुष्यता का अर्थ ही है परस्पर सहयोगिता, दया, करुणा, प्रेम, सेवा का मिश्रित भाव से भरा होता है मनुष्य |

दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति के भीतर भी ये भाव होते हैं, लेकिन वे सब बचपन में मिले अनुभवों, परवरिश, व विश्वासघातों के परिणाम स्वरुप भीतर ही दफन होकर रह जाते हैं | वे अब चाहकर भी उन भावों को नहीं खोज पाते क्योंकि अनुभव ही उनका बुरा रहा | इसीलिए ही क्षमा शब्द का महत्व हो गया | विद्वानों ने कहा कि जो बीत गया उसे भुला दो, क्षमा कर दो उन्हें जिन्होंने तुम पर अत्याचार किया | तुम उस समय इतने ताकतवर नहीं थे कि तुम अत्याचारियों का सामना कर पाते, इसीलिए उस विषय पर अब चिन्तन करने उसके आधार पर वर्तमान में दूसरों से नफरत करने का कोई लाभ नहीं | क्षमा कर दो उन्हें और क्षमा कर दो स्वयं को और आगे बढ़ो | स्वयं को खोजो, स्वयं को जानो और स्वयं को समृद्ध, शक्तिशाली बनाओ |

दूसरों से सहायता की आस लगाए बैठे रहने वाले लोग कभी भी सफल नहीं हो पाते | और जब आप स्वयं समर्थ, शक्तिशाली हो जायेंगे, तो दुनिया स्वतः ही आपकी सहायता करने वैसे ही आगे बढ़ेगी, जैसे कि आज बड़े बड़े धूर्त नेताओं, व्यापारियों, ठगों, देश व जनता के लुटेरों की सहायता के लिए पलकें बिछाए बैठे रहती है |

~विशुद्ध चैतन्य

यहाँ नीचे नितिन खुराफाती का एक विडियो दे रहा हूँ, उसे अवश्य देखें |

15 जून 2018

आध्यात्मिकता, भौतिकता और दोगले धार्मिकों का समाज




कई प्रयोग करते हुए निरंतर बढ़ा चला जा रहा हूँ, लेकिन मेरा प्रयोग केवल मेरे लिए है | मेरे अपने ही आध्यात्मिक उत्थान के लिए | बिलकुल वैसे ही जैसे कोई ऋषि बियाबान में ध्यान करता रहता है, मैं समाज में रहकर ध्यान कर रहा हूँ | मेरा ध्यान उस रहस्य को जानने के लिए है, जिसे आज तक कोई धार्मिक, संत-महन्त नहीं समझ पाया |

सुनने में अजीब ही लगेगा आप सभी को, लेकिन ऐसा ही है |

20 मार्च 2017

" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं ! "




सुसंस्कृत, सभ्य, धार्मिक व पढ़े-लिखे समाज को जब मैं देखता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि ये लोग मेरे लिए अजनबी हैं | ये लोग मुझे कभी भी अपने जैसे नहीं लगते, बहुत गैर लगते हैं | शायद यही कारण रहा कि मैं इनसे दूर एकांत में रहना पसंद करता हूँ | मिलना जुलना भी रास नहीं आता मुझे इस लोगों से |

नौ दस वर्ष की उम्र में जब मैं शहर यानी दिल्ली आया तो सबकुछ बहुत ही अजीब सा लगा | हालांकि कुछ ही दिनों में हम सामान्य हो गये, लेकिन भीतर से सामान्य कभी नहीं हो पाया | जैसे जैसे मैंने दिल्ली के समाज को गहराई से जाना, उतना ही दिल्ली बेगानी होती चली गयी | फिर मैं हरिद्वार चला गया, लेकिन वहां और दिल्ली के व्यव्हार में कोई विशेष अंतर नहीं मिला मुझे और फिर मैंने हरिद्वार भी छोड़ दिया |

08 मार्च 2017

मैं मूर्ती पूजक नहीं हूँ


 मैं शायद ऐसा व्यक्ति हूँ जो कभी किसी की समझ में नहीं सकता क्योंकि मैं अंधों की उस दुनिया में रहता हूँ जिसके लिए हाथी को समग्रता से देख व समझ पाना लगभग असंभव होता है | कोई हाथी को उसके पैर से जानता है और कोई उसकी पूँछ से तो कोई उसकी सूंड या कान से | पूरा हाथी उनकी समझ में कभी नहीं आ सकता |

इसी प्रकार मैं भी शायद कभी नहीं समझ में आऊंगा किसी के | मेरे आश्रम के लोगों का मानना है कि मैं मूर्ती-पूजक नहीं हूँ और आश्रम के बाहर के लोगों का माना है कि मैं मूर्तीपूजक हूँ | कुछ लोग मुझे नास्तिक मानते हैं तो कुछ लोग मुझे वामपन्थी | कुछ लोग मुझे मुसलमान मानते हैं तो कुछ लोग मुझे पाखण्डी | कुछ को मैं मोदी विरोधी दीखता हूँ तो कुछ को सरकार विरोधी | तो सभी ने मेरे प्रति अपनी अपनी मान्यताएं बना रखीं हैं |

चलिए मैं अपने विषय में आप लोगों की कुछ गलतफहमियाँ दूर करने का प्रयास करता हूँ, हालांकि जानता हूँ यह एक मूर्खतापूर्ण प्रयास ही होगा

17 फ़रवरी 2017

नकली व दिखावटी रिश्ते बनाने से बेहतर हैं, कि अकेले रहो




बात उन दिनों की है जब मैं जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुका था | काम ऐसा था कि दो-दो दिन तक दिन की रौशनी देखने नहीं मिलता था, केवल स्टूडियो की लाइट्स और शिफ्टों में आते म्यूजिशियन, सिंगर, प्रोडूसर...बस | उन दिनों कई सिंगर उभर रहे थे, जैसे कि शिवानी कश्यप, पलाश सेन, सुनिधि चौहान, सोनू निगम...आदि और कुछ बैंड्स जैसे इंडियन ओशन, इयुफोरिया... आदि |

हर रोज इनकी कोई जिंगल रिकार्ड्स होता था और कभी एल्बम के गाने | समय ही नहीं मिला संगीत की दुनिया में खोने के बाद अपनी ही तरफ ध्यान देने का | उन दिनों शांतनु मोइत्रा, प्रदीप सरकार, शुभामुद्ग्ग्ल, शेरोन लोइन का चहेता हुआ करता था तो बस उनकी रिकॉर्डिंग्स बेस्ट होनी चाहिए इससे अधिक कुछ और नहीं सोचता था | उनकी ही नहीं, जितने भी प्रोडूसर उन दिनों मुझसे रिकॉर्डिंग करवाने आया करते थे सभी के लिए बेस्ट करने का प्रयास करता था |

कई बार यूँ भी लगता था कि अकेली जिंदगी कैसे कटेगी क्योंकि ये लोग आज मेरी वाह वाही कर रहे हैं क्योंकि इनके लिए कुछ बेहतर कर रहा हूँ | लेकिन फिर कल ???

02 फ़रवरी 2017

साधना वास्तव में है क्या ??



अक्सर आपने देखा होगा कि कुछ लोग साधना करते हैं | समाज उन्हें साधक के नाम से जानता है | कई बार आपने देखा होगा कि कोई व्यक्ति कहता है कि मैं फ़लाने देवी-देवता की साधना करने जा रहा हूँ, या मन्त्र साधने जा रहा हूँ....

22 जनवरी 2017

दूसरों की थाली देखना छोड़ दें, अपनी थाली को कैसे उपयोगी बनायें उसका उपाय खोजें


'सभी ऊँची जाति वालो को लगता है की आरक्षण खत्म कर देना चाहिए। मैं भी सोचता हूँ की आरक्षण अब खत्म ही हो जाये तो आईये आरक्षण खत्म करते हैं........ -शंकराचार्य की कुर्सी पर ब्राह्मण का आरक्षण है, उसे खत्म करें और कुछ सालो के लिए एक दलित को नियुक्त किया जाये । - आर.एस.एस. प्रमुख अभी तक कोई महिला नहीं बनी, पाँच साल किसी दलित महिला को मोका देकर वहाँ भी आरक्षण खत्म करें। - काशी, सोमनाथ आदि मन्दिरों में भंगी -चमारों से एक वर्ष पूजा करवाकर वहाँ भी आरक्षण खत्मकरें. - कूड़ा-सफाई का काम अभी तक भंगी ही करते आये हैं, अब किसी ऊँची जाति वालो को नौकरी देकर आरक्षण खत्म करते हैं। - एक शिक्षा एक पाठ्यक्म और विद्यालय पद्धति लागू करें और सभी के बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढेंगे, शिक्षा की समानता कर नौकरी में आरक्षण खत्म करेँ. - दलितों को 5 हजार वर्षों तक शिक्षा से वंचित रखा गया, स्वर्णों को सिर्फ 5 वर्ष तक शिक्षा से वंचित करें और हर जगह से आरक्षण खत्म करें। - एक कदम हम बढाये, एक कदम आप बढाईये आरक्षण खत्म करके समानता का लाभ उठाइये।'

उपरोक्त विचार आरक्षण समर्थकों के पोस्ट में आपको अक्सर शेयर होते हुए मिल जायेंगे | उक्त विचारों को अम्बेकरवादी, आरक्षणवादी बहुत ही गर्व के साथ शेयर करते हैं यह मानकर कि ये विचार जिसने भी लिखा है, बहुत ही तर्क-संगत व सवर्णों/ब्राह्मणों और आरक्षण विरोधियों को निरुत्तर करने वाला विचार है |

चूँकि ईश्वर ने मुझे बुद्धि व विवेक दोनों ही देने में कोई कंजूसी नहीं की, इसलिए मैं ऐसे विचारों को थोड़ा अलग अंदाज़ में पढता व समझता हूँ | इस तरह के विचार लिखने वाला व्यक्ति वास्तव में बहुत ही कुंठा में जी रहा है | उसकी कुंठा इसलिए नहीं है कि वह कमजोर है, आर्थिक, सामजिक या शैक्षणिक रूप से, अपितु कुंठा है दूसरों की थाली और अपनी थाली की तुलना से उपजने वाली कुंठा | तुलना करना मानव ही नहीं, सभी जीव जंतुओं की स्वाभाविक आदत होती है और दूसरों से अधिक पाने की हवस लगभग प्रत्येक प्राणी में समान ही होती है |

अब इस पोस्ट से अर्थ क्या निकलता है वह समझने की आवश्यकता है | अर्थ यहः निकलता है कि हम इस योग्य नहीं हैं कि अपने दम पर कुछ श्रेष्ठ कर पायें, बल्कि दूसरों के पास जो कुछ है उसमें से हमें चाहिए | फिर सामने वाले ने धर्म से कमाया हो या अधर्म से उससे कोई अंतर नहीं पड़ता, फिर सामने वाला सही है या गलत है, उससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता, बस हमें उसमें से ही चाहिए जो उसके पास है | जैसे कि शंकराचार्य की कुर्सी चाहिए इनको | क्योंकि शंकराचार्य दूसरी जाति है यानि शत्रु जाति का है और शत्रु की कुर्सी मिल जाए तो हमारी जीत हो जाए | काशी, सोमनाथ का मन्दिर.... अपना मन्दिर बनाने की योग्यता नहीं है इसलिए बने बनाए मंदिरों में इनको अधिकार चाहिए | कूड़ा अब वे उठायें जो पहले नहीं उठाते थे......सारे तर्क यदि देखें इनके तो कहीं से भी नहीं लगता कि किसी शिक्षित व्यक्ति के तर्क हैं | मुझे तो ऐसा लगता है कि किसी रट्टामार डिग्रीधारी ने यह तर्क लिखे हैं, शिक्षा से कभी सामना हुआ ही नहीं, या शिक्षित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ही नहीं इसे |

यह तर्क बिलकुल नारीवादियों, कूपमंडूक धार्मिकों के तर्कों की तरह ही हैं | जैसे नारीवादियों का मानना है कि पुरुषों को वही सब करना चाहिए, जो स्त्रियों को करना पड़ता था, जैसे खाना बनाना, बच्चे पैदा करना, बच्चे पालना आदि | और स्त्रियों को वह काम करना चाहिए जो पुरुष करते थे, जैसे सिगरेट पीना, डिस्कोथिक जाना, दारु पीकर सड़क या नाली में गिरना आदि | मुस्लिमों का तर्क है कि देश में मुस्लिम प्रधानमंत्री बन जायेगा तो मुस्लिमों की सारी समस्या मिट जायेगी या सभी लोग कुरआन पढ़ने लगें भारत में तो सभी समस्याएं मिल जायेंगी.. लेकिन ये लोग यह नहीं देखते कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में मुस्लिमों की क्या स्थिति है | वहां समस्याएं दूर क्यों नहीं हो पायीं, जबकि वहां तो मुस्लिम प्रधानमन्त्री ही नहीं, सारी सरकारी तंत्र ही मुसलमानों का है |

दूसरों की चीजें, संपत्ति छीनना न तो किसी धार्मिक ग्रन्थ में नीतिगत माना गया है और न ही किसी भी सभ्य समाज में माना जाता है | फिर वह तरीका शस्त्र हो, शास्त्र हो या आरक्षण | आरक्षण उनको मिले जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और वह भी केवल इसलिए ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें, तब तो सार्थक है | अन्यथा वह आरक्षण भी व्यक्ति को परजीवी व कमजोर ही बनाएगा | वह आर्थिक रूप से समृद्ध दिखेगा, लेकिन मौलिक रूप से वह गुलाम ही रहेगा जीवन भर और हीन भावना से ग्रस्त रहेगा वह अलग |

आप सभी ने कई फ़िल्में ऐसी अवश्य देखी होंगी, जिसमें कोई बच्चा अपनी लगन व मेहनत से न केवल ऊँचाइयों को छूता है, अपितु अपने परिवार को मान सम्मान दिलाता है | कई श्रेष्ठ व्यक्तियों की जीवनियाँ भी पढ़ी होंगी जो, कठिन संघर्ष के बाद मान सम्मान प्राप्त करते हैं, न कि आरक्षण मांग कर | और फिर प्रकृति में चले जाएँ और जीव जंतुओं को देखें, कि वे लोग कैसे सर्वाइव करते हैं बिना आरक्षण के | आप लोग तो उनके लिए दाना पानी भी नहीं रखते, फिर भी वे संघर्ष करते हुए जी रहे हैं | आप लोग तो उनके जंगलों को भी ध्वस्त कर रहे हैं, फिर भी वे सभी संघर्ष कर रहे हैं जीने के लिए |

इन्सान होने का अर्थ ही संघर्ष करते हुए उपर उठना | आज मुझे भी लोग कहते हैं कि आराम से बैठकर खा रहा है भगवा पहनकर.. लेकिन मैं ही जानता हूँ कि मैंने अपने जीवन में कितना संघर्ष किया | हमारे परिवार ने कितना संघर्ष किया, क्या क्या खोया यह हम ही जानते हैं.... लेकिन दया की जिंदगी की कामना हमने कभी नहीं की | हमारा आश्रम है लेकिन दया, दान पर नहीं पलता, अपनी खेत, अपनी जमीन से जो कुछ मिलता है वही हमारे दो वक्त की रोटी के लिए पर्याप्त है | अधिक की हमें कोई कामना नहीं |

अतः दूसरों की थाली देखना छोड़ दें, अपनी थाली को कैसे उपयोगी बनायें उसका उपाय खोजें | और यह ध्यान रखें;

"इतिहास में कभी भी आसानी से जीवन जीने वाले किसी आदमी ने याद करने लायक नाम नहीं छोड़ा है." - थियोडोर रूजवेल्ट

कभी समय मिले और आरक्षण की बैसाखी छोड़कर स्वाभिमानी व आत्मनिर्भर होने का विचार ये तो रॉबर्ट शूलर की पुस्तक 'संघर्ष करने वाले हमेशा जीतते हैं' ( Tough Times Never Last, But Tough People Do ! by ROBERT H. SCHULLER) अवश्य पढ़ें | यह अवश्य ध्यान रखें कि यहाँ आरक्षण की बैसाखी के लिए संघर्ष करने के लिए नहीं कह रहा हूँ और न ही इस पुस्तक में ऐसा कुछ लिखा है | मैं उस संघर्ष की बात कर रहा हूँ, जो स्वाभिमानी मनुष्यों के ही बस की बात है | ~विशुद्ध चैतन्य




13 जनवरी 2017

स्वयं को सुधारने का अर्थ गाँधी जी के तीन बंदर बनना नहीं होता



गुरु जी आप महान है। लेकिन ये महानता कब एकत्र होगी ओर देश का कल्याण होगा। सभी तरफ गलत ही गलत है। हम सिर्फ अपने को सुधार सकते ओर रहै है लेकिन कुछ नही कर सकते । न भक्त सिंह बन सकते ओर न गांधी जी। कोई रास्ता नही दिखाई देता ओर सिर्फ अपने गुणों को सुधारना मेरे को पाप् लगता है। जब हम कुछ नही कर पातै तो हमसे अछहै तो वै लोग जो कुछ गलत कर रहै है गलत मैं भी कुछ तो सही होता ही है | -रूद्र प्रताप

19 दिसंबर 2016

शौक यानि हॉबी वह विशेषताएं हैं जो जन्मजात हमको मिलती हैं

Alma Deutscher
शौक यानि हॉबी को हम सेकंडरी चीज मानते हैं | समय मिला तो कर लिया, नहीं तो और भी ज़रूरी काम है ज़माने में |

मैं ऐसा नहीं मानता था, लेकिन मेरे पिताजी, मेरे अड़ोसी-पड़ोसी ऐसा ही मानते थे | मुझे शौक था ड्राइंग बनानेका, स्कूल में भी थर्ड प्राइज़ ले ही आता था | मुझे शौक था गाने का और स्कूल के टीचर मुझे गायन प्रतियोगिताएं में अवश्य शामिल करते थे | मुझे शौक था मार्शल आर्ट्स का, मुझे शौक था पियानो, इलेक्ट्रिक बेन्जो, हारमोनियम बजाने का और मेरा सपना था ऑस्कर विनर साउंडइंजीनियर बनने का | लेकिन मेरे पिताजी को यह सब शेखचिल्ली के सपने लगते थे | पिताजी शैक्षिक काल में, कभी भी सेकंड नहीं आये थे वही मुझसे भी आशा करते थे | जबकि में कभी भी स्कूल गया ही नहीं, केवल मेरा शरीर ही स्कूल गया | मेरा मन तो खेतों और जंगलों में लगता था |

लेकिन आज वे शौक अलमारी में रखे पुरानी किताबों की तरह हो गये | कभी कभी नजर पड़ती है, लेकिन फिर मन सोचता है कि अब इन सब शौकों का क्या करना... थोड़ी सी उम्र पड़ी है कट जाए फिर अगले जन्म में नए सिरे से सोचेंगे |

मैं अक्सर सोचता हूँ कि कभी जो शौक मुझे बहुत प्रिय थे, जिसके लिए मैं खाना-पीना भी भूल जाता था, आज वही शौक मुझे उत्साह क्यों नहीं दिला पाते ? आज आश्रम में टूटा-फूटा बेसुरा हारमोनियम भी है, ढोलक भी है...लेकिन वे आकर्षित नहीं करते, कभी जब सुर का ही पता नहीं था, तब दिन रात हारमोनियम, बेन्जो से शोर मचाकर सबकी ज़िन्दगी नरक बनाता था | आज अंगुलियाँ ही नहीं चलती | क्या हो गया ऐसा जो मुझे मुझसे ही दूर ले गया ?

हम सभी अपने परिवार, अपने माता-पिता को सर्वोपरि मानते हैं और माता-पिता भी अपने बच्चों के लिए जो श्रेष्ठ है वह करते हैं | लेकिन कई बार वे बच्चों को नहीं समझ पाते क्योंकि उनके पास बहुत ही कम समय होता है बच्चों को समझने जानने का | अधिकाँश वे अपने काम में ही व्यस्त रहते हैं | उन बच्चों को सबसे अधिक समस्या होती है, जिनकी माँ बचपन में ही गुजर जाती है | माँ ही होती है जो बच्चे को सही रूप में समझती है या फिर जीवन साथी | तो माँ यदि न हो, तो बच्चे के वे शौक, जो कि उसके पूर्वजन्मों की यादों के साथ जुड़े थे, वे सब समाप्त कर दिए जाते हैं | उन्हें दफना दिया जाता है, बस उसकी कब्र में हर बरस कुछ आँसू टपका कर बचपन की उस दुर्घटना को भूलने का प्रयास करते हैं |

शौक यानि हॉबी वह विशेषताएं हैं जो जन्मजात हमको मिलती हैं | इनमें से कई शौक पूर्वजन्मों से जुड़ी होतीं हैं, तो कई पूर्वजन्मों के अधूरे सपने | ये ऐसे भाव होते हैं जो भीतर से फ़ोर्स करते हैं | इसमें बच्चों को कुछ थोपना नहीं पड़ता, लेकिन परिवार व समाज वही चीजें पसंद करता है, जो थोपा जा सके | वास्तव में बहुत ही कम बच्चे होते हैं, जिनको वह वातावरण मिलता हो, जिसके लिए वे आये थे | लेकिन अधिकांश भटक जाते हैं | जो परिवारवाले थोपते हैं, जो समाज थोपता है उससे वह बगावत कर बैठता है और फिर लोग कहते हैं कि देखो यह नालायक अपने बाप की नहीं सुनता, या अपने परिवार की नहीं सुनता... और कई बार वह बच्चा घर, परिवार व समाज से हमेशा के लिए अलग हो जाता है | संस्कार अच्छे रहे तो सद्मार्ग पकड़ लेता है, नहीं तो अधिकांश अपराध जगत में कदम रख देते हैं |

मेरी अपने शौक अपनी इच्छाएं, कुछ महान करने या बनने की महत्वाकांक्षाएँ मर चुकी है, इसलिए ही तो मैं आराम से एकांत में जी लेता हूँ | लेकिन यह नहीं चाहता कि दुनिया के किसी भी बच्चे से उसका शौक, उसकी भावनाएँ, उसकी महत्वाकांक्षाएं कोई छीन ले, केवल झूठे अभिमान व स्वार्थ के लिए | कोशिश करियेगा कि अपने बच्चो के शौक आपके ही हाथों दफन न हो जाएँ | ~विशुद्ध चैतन्य

06 दिसंबर 2016

जिसे आप लोग यथार्थ की दुनिया मानते है, मुझे वे काल्पनिक लगतीं हैं


अक्सर देखता हूँ कि लोग सत्य खोजने निकले हैं | वे खोज रहे हैं कि रामायण के पात्र वास्तविक थे कि काल्पनिक, महाभारत के पात्र वास्तविक थे कि काल्पनिक, क़ुरान, बाइबल के पात्र वास्तविक हैं या काल्पनिक | तो पुरातत्ववेताओं की खोजों और शोधपत्रों को खंगालते हैं | लेकिन कुछ भी ठीक से पता नहीं चलता कि सही क्या है और गलत क्या, कोई कुछ कह रहा है तो कोई कुछ |

इन खोजियों में सर्वाधिक बुरी स्थिति उनकी है, जिन्होंने बचपन में चंदामामा, चम्पक, नंदन, बिल्लू, चाचा-चौधरी, पिंकी, लोटपोट जैसी पत्रिकाएं नहीं पढ़ीं | इनको कथाओं से समझाये जाने वाली शिक्षाओं का कोई ज्ञान नहीं | ये लोग फेरीटेल्स से दी जाने वाली शिक्षाओं से कोई शिक्षा नहीं ले पाते क्योंकि उनके पात्र वास्तविक नहीं होते | ये रिअलिटी शो से शिक्षा लेते हैं और यही कारण है कि रियलिट शो बिग बॉस सुपर डुपर हिट है |

14 नवंबर 2016

हमेशा हाथ फैलाये रहने वालों से लोग दूरी बना लेते हैं


"मैं भौतिक और अध्यात्मिक जगत के बीच सेतु बनाना चाहता हूँ |" -ठाकुर दयानन्द देव (१८८१-१९३७)

यही एक लाइन थी, जिसने मुझे इनके आश्रम में खींच लिया क्योंकि यही है सच्ची शिक्षा और जो ऐसा कह सकता है, वही सही मायने में सही गुरु है | बाकी जितने भी गुरु, संत या बाबा मुझे मिले, सभी ने यही कहा कि जगत मिथ्या है, माया है बस ईश्वर सत्य है, मृत्यु सत्य है |

07 नवंबर 2016

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया

बचपन से द्वन्द रहता था मन में कि माँसाहार यदि पाप है तो फिर अंग्रेजों को पाप क्यों नहीं लगता, अरबियों को पाप क्यों नहीं लगता, आदिवासियों को पाप क्यों नहीं लगता ?

कई विद्वानों और पंडितों से प्रश्न किया कई से तर्क किये... लेकिन कोई ऐसा उत्तर नहीं मिल पाया जो मुझे संतुष्टि दे पाता | सारे वैज्ञानिक-अवैज्ञानिक तथ्यों को खंगाले लेकिन यह सिद्ध नहीं हो पाया कि माँसाहार करने से पाप लगता है |

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया, दोनों ही जीवनदाई है, दोनों ही वंशवृद्धि करते हैं, दोनों ही जीवित हैं, लेकिन एक को खाने से पाप नहीं लगता और दूसरे को खाने से पाप लगता है |
फिर यही नहीं समझ में आया कि झूठ बोलने से भी पाप लगता है, लेकिन मैंने किसी भी जुमलेबाज नेता को पाप लगते नहीं देखा, उलटे अदालतों से उसे बरी होते ही देखा है | दुनिया भर के घोटाले करने वाले, रिश्वतखोरों, अत्याचारियों, शोषकों को दुनिया भर के गंभीर अपराधों में आरोपी होते हुए भी सत्ता सुख भोगते देखा है | वहीँ अपने बच्चों को भूख से मरने से बचाने के लिए की गयी चोरी पर भी प्रताड़ित होते हुए, जेल भोगते हुए देखा है और वह भी बिना अदालत का फैसला आये | तो समझ में नहीं आया कि यह पाप किस बला का नाम है, होता कैसा है, दिखता कैसा है |

कई विद्वान कहते हैं कि माँसाहार अध्यात्मिक मार्ग में बाधक है, लेकिन मनुस्मृति कहती है,

29 अक्टूबर 2016

भ्रष्ट, दुष्ट दानवों को अमरता का वरदान प्राप्त है



हर आश्रम में एक परम्परा होती है, गुरु की प्रतिमा को स्नान करवाने का, यहाँ भी है | तो हर संन्यासी का कर्तव्य होता है कि वह हफ्ते में एक बार गुरु की प्रतिमा को विधिवत स्नान करवाए | लेकिन मैंने आज तक स्नान नहीं करवाया |

इस कारण आश्रम के सभी भक्तों और संन्यासियों से लेकर ट्रस्टियों और ग्रामीणों की नजर में अधार्मिक व्यक्ति हूँ | तो मुझे अक्सर किसी न किसी बहाने से उस दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाता है, जिसे आश्रम की परम्परा निभाना कहा जाता है | लेकिन शब्दों से खेलने की तो हमें बचपन से ही बीमारी लग चुकी थी, तो कौन किस उद्देश्य से कौन सी कहानी सूना रहा है, तुरंत समझ में आ जाता है | मुझसे कहा जाता है कि ठाकुर का स्नान करवाने से परमसुख की अनुभूति होती है, अध्यात्म की महान उपलब्धी होती है....और मेरा प्रश्न होता है कि कोई एक व्यक्ति ऐसा दिखा दीजिये जिसने ठाकुर को स्नान करवाया और उसे परम की उपलब्धि हो गयी ?

26 अक्टूबर 2016

वे जो कुछ भी कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं


 तब हम बहुत छोटे थे करीब नौ दस वर्ष के जब हम दिल्ली पहुँचे | वहाँ जो हमारे लिए सबसे बड़ा आकर्षण बना वह था टेलीविजन | सन्डे सुबह बापा-पापा, और बच्चों के कई विभिन्न कार्टून फिल्म और शाम को फीचर फिल्म | फिर शुक्रवार को भी कोई न कोई फिल्म दिखाई जाती थी |

तो हम चारों भाई-बहन जब भी कोई फिल्म देख लेते, तो हफ्ते भर तक उसके डायलॉग, गाने, सीन आदि एक दूसरे को सुनाते रहते | बड़ा रोमांच होता था कि कैसे धर्मेन्द्र जलती हुई ट्रेन में हेमामालिनी और यात्रियों को बचाया, कैसे बसंती तांगा दौड़ा कर भागी.... फिर हीरो और विलेन की लड़ाई का रोमांच... पूरा हफ्ता निकल जाता इन सब पर चर्चा करते हुए | तो हमारी दुनिया उतने में ही सीमित रही कुछ समय तक, फिर पिताजी तोलोस्तोय, पुश्किन, प्रेमचंद आदि की किताबें लाने लगे तो हम उस पर व्यस्त हो गये |

25 अक्टूबर 2016

गुरु-विपत्ति एक समाना


गुरु और विपत्ति में यही एक समानता है कि गुरु भी विपत्ति की तरह अवांछित व्यवहार करता है | गुरु आपसे वह करने को नहीं कहेगा जो आपको पसंद हो, अपितु वह करने को कहेगा, जिससे आपका उत्थान हो | गुरु आपको कुछ सिखायेगा नहीं, बल्कि आपके भीतर जो गुण छुपा हुआ, जो ज्ञान छुपा हुआ है, उसे उभारेगा | गुरु कुछ थोपेगा नहीं, बल्कि आपको उभरने का अवसर देगा | गुरु बिलकुल लापरवाह दिख सकता है, लेकिन आपकी हर गतिविधि पर उसकी नजर रहेगी | गुरु आपसे दूर भी होंगे तो भी उन्हें आपकी चिंता रहेगी..... लेकिन गुरु को शिष्य मिलना और शिष्य को गुरु मिलना उतना ही कठिन है वर्तमान युग में, जितना कि किसी को उसका जीवन साथी मिलना |

जिनका विवेक जागृत नहीं है, वे घोड़ों से भयभीत हैं


काम, क्रोध, लोभ मोह से हर धार्मिक, ब्राह्मण-पुरोहित, साधू-संत इतने भयभीत क्यों रहते हैं, इतनी घृणा क्यों करते हैं, कभी सोचा आप लोगों ने ?



मैं बताता हूँ;

20 अक्टूबर 2016

मैं बहुत ही स्वार्थी व्यक्ति हूँ


पच्चीस वर्ष की आयु तक इस आशा में दौड़ा कि खूब धन कमाऊंगा, परिवार बसाऊंगा, शोहरत कमाऊंगा, ऑस्कर जीतूँगा......लेकिन पच्चीसवें वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते समझ में आया कि मैं भेड़चाल में दौड़ रहा हूँ | जो कुछ कमाने की बात सोच रहा था, वह सब तो मेरा है ही नहीं दूसरों का है | धन कमाऊंगा तो वह भी पराया ही है, नाम कमाऊंगा तो वह भी पराया ही है, शोहरत, परिवार.. सभी गैर ही हैं, मेरा अपना तो कभी होना नहीं है | एक बार इन जंजालों में फंस गया तो आजीवन कोल्हू का बैल बनकर रह जाऊँगा, आजीवन गुलाम बन जाऊंगा दूसरों का |

17 अक्टूबर 2016

अजीब कशमकश है ये ज़िन्दगी

 व्हाट्सएप पर सिद्धार्थ ने प्रश्न किया,
"स्वामी जी मै एक 20-22 साल का नौजवान लड़का हु । मै आपसे पूछना चाहता हु की एक युवा आज के परिपेक्ष्य में किस प्रकार से अपना जीवन जिए की उसे किसी प्रकार का अफ़सोस ना हो एवं उसके जीवन की सार्थकता भी बनी रहे ।

क्योकि आज हर जगह competition है, मेरे जेसे युवा सिर्फ भाग रहे है, मंजिल क्या है पता नहीं......;
कभी कभी बहुत Nervous हो जाता हु, सिर्फ में ही नहीं सभी युवाओ का यही हाल है ।

क्या सफलता के पीछे भागू या फिर जो मिला है उसी से संतोष कर लू..?

भगवान को मानु या नहीं मानु....? देखता हु की जो अनीति करते है, भष्टाचार करते है, लोगो का दमन करते है वो आज बहुत ऊँचे पदों पर बेठे है..और हर काम में सफल हो रहे है इसके विपरीत जो ईमानदारी से काम कर रहे है उनको एक समय की दाल रोटी भी बड़ी मुश्किल से मिल पा रही है ।

एक समय मेरे पिताजी ने समाज के लिए ईमानदारी से काम करना चाहा तो कुछ ठेकेदारो ने उन्हें गुट बनाकर कर किनारे कर दिया । 
आज कोई समाज के लिए भी कोई कुछ योगदान करना चाह्ता है तो भी उसे नहीं करने दिया जाता या फिर झुटे आरोप लगाकर निष्कासित करवा दिया जाता है । और इस समाजसेवा के कारण इतने दुश्मन हो गए की जीना मुश्किल हो गया क्योकि ये ठेकेदार तो ग्रुप बनाकर झुण्ड में रहते है ।
आखिर कोई करे तो क्या करे ?

अजीब कशमकश है ये ज़िन्दगी !!! जीत जाओ तो अपने छुट जाते है और हार जाओ तो अपने ही छोड़ देते है"

11 अक्टूबर 2016

सनातनी को सनातन धर्मानुसार जीने क्यों नहीं देते आप लोग ?


कई जमीनी विद्वान हैं जो जमीन में काम करना पसंद करते हैं और कर भी रहे हैं | मैं उनके जमीनी कार्यों की हृदय से प्रशंसा करता हूँ और आशा करता हूँ कि वे इसी प्रकार जमीन पर कार्य करते रहेंगे |

परेशानी मुझे इनसे तब होती है, जब ये विद्वान जमीन से उड़कर फेसबुक में आ जाते हैं गलती से | तब उनको यह दुनिया बड़ी अजीब सी दिखाई देने लगती है | फिर वे कहते हैं कि फेसबुक में समय व्यर्थ करने से अच्छा है जमीन पर कार्य करो |

हज़ारों वर्षों से न जाने कितने लोगों ने जमीन पर कार्य किया और आज भी कर रहे हैं, सिवाय जंगलों, खेतों को नष्ट करने, वायु और जल प्रदुषण बढ़ाने के और कोई महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हों मुझे ऐसा नहीं लगता | कितने लोग वेदों, पुराणों, कुरान, गीता, बाइबिल... आदि रट और रटा रहे हैं, लेकिन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, हत्या, बलात्कार बढ़ते ही चले जा रहे हैं | इतने सारे विद्वानों के जमीन पर काम करने के बाद भी नेता हम उसे ही चुनते हैं जो, जुमलेबाज हो, व्यापारियों और उद्योगपतियों का हितैषी लेकिन आदिवासियों और किसानों का शत्रु हो | इतने सारे धार्मिक ग्रंथों, धर्मों, सम्प्रदायों, अवतारों, बाबाओं, पैगम्बरों... आने के बाद भी और न जाने कितने और आयेंगे भी.... जनता वोट उन्हें ही देती है जिन्होंने कई तरह के जघन्य अपराधों में अपना नाम रौशन किया हो |