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04 अगस्त 2016

स्वर्ग वहीं है, जहाँ मानवों के विकासशील आधुनिकता के कदम नहीं पड़े !

मानवों ने जहाँ जहाँ अपनी विकासशील आधुनिक मानसिकता के कदम नहीं रखे, वह जगह आज भी सुंदर व मनमोहक हैं | लेकिन जहाँ-जहाँ मानवों की भीड़ पहुँच जाती है वह विकास व आधुनिकता की वेदी पर स्वाहा हो जाता है | अभी भी भारत में कई जगह ऐसी हैं, जहाँ मानवों ने विकास नहीं किया जिसकी वजह से वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य आज भी आकर्षित करता है |

31 दिसंबर 2014

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ



सभी के लिए नववर्ष मंगलमय हो !,

वर्ष २०१५ सम्पूर्ण विश्व के लिए धार्मिक उन्मादियों, आतंकियों व दंगाइयों से मुक्ति व आपसी प्रेम-विश्वास व सहयोगिता का वातावरण लेकर आये !! ~विशुद्ध चैतन्य

11 दिसंबर 2014

आध्यात्मिक उत्थान व श्रेष्ठ आचरणों के मार्गदर्शन करने वाला हमारा धर्म राजनीति की भेंट चढ़ गया |


सनातन धर्म सिमट कर हिन्दू धर्म हो गया और धर्म खतरे में पड़ने लगा.....



भारतीय धर्म को सनातन धर्म कहा जाता था क्योंकि यह इतना विराट व विस्तृत था कि कोई भी व्यक्ति किसी भी पंथ और मान्यता का सनातन के अंतर्गत आ जाता था | लेकिन फिर लोग विद्वान होने लगे और हिन्दू धर्म की स्थापना हुई | मानसिकता में संकीर्णता आने लगी और धर्म राजनैतिक और व्यापारिक महत्व की वस्तु बन कर रह गया | अब अध्यात्म और परामनोविज्ञान जैसे मूल स्वाभाविक विषयों का स्थान आडम्बर और दिखावों ने ले लिया | जो धर्म परमात्मा व आत्मा के बीच का व्यक्तिगत विषय था उसके लिए बिचौलिए तैयार हो गये | अब परमात्मा और आत्मा का मिलन बिचौलियों के बिना असम्भव हो गया.....

29 नवंबर 2014

कहते हैं कि इज्ज़त कमाने में जीवन गुजर जाती है...

यह सुविचार किसी ज़माने में मुझे बहुत ही सार्थक लगता था, लेकिन समय के साथ जाना कि यह वाक्य भी अब प्रवचनों और पुस्तकों तक ही सीमित रह गये या फिर कंठस्थ करने वाले विद्यार्थियों के लिए गरारे करने के काम ही आते हैं |

आज इज्ज़त कमाई नहीं, ख़रीदी जाती है, कमाने का काम तो वे लोग करते हैं जिनके पास न तो दौलत है और न ही स्वाभिमान गिरवी रखने का साहस | ऐसे लोग पूरा जीवन लगा देते हैं इज्ज़त कमाने में लेकिन भेड़-बकरियों का जीवन जीते हैं | ये बेचारे इज्ज़तदार लोग उनके सामने बौने हो जाते हैं, जिन्होंने कीमत देकर इज्ज़त खरीदा है | चूँकि इनके पास ले देकर स्वाभिमान ही बचा होता है, उसे छीन लेने का भय दिखाकर ये इज्ज़तदार लोग मनचाहा काम करवा लेते हैं |

कभी किसी इज्ज़तदार स्वाभिमानी लड़की को किसी का बिस्तर गर्म करना पड़ता है इज्ज़त बचाने के खातिर तो किसी इमानदार अधिकारी को मुँह बंद रखना होता है इज्ज़त बचाने की खातिर | क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी हैसियत ही नहीं है इज्ज़त खरीदने की | मीडिया भी ऐसे इज्ज़तदार लोगों के आसपास ही घुमती रहती दाल-रोटी के चक्कर में | क्योंकि इज्ज़त की खरीद फरोख्त में इनको मोटी दलाली मिलती है और ख़बरें जनता की हित की दिखाने से अधिक जनता को भटकाने वाली ख़बरों के लिए कीमत अच्छी मिलती है | ये तो ये लोग नेताओं के दरवाजों पर पड़े रहेंगे या फिर अभिनेताओं के | जनता के पास पैसे नहीं हैं कीमत चुकाने की तो जनता की परवाह किसे है | मीडिया में आये हैं धंधा करने के लिए न कि जन सेवा या राष्ट्र सेवा | ये सारी तो किताबी बातें हैं, जिसके दरवाजे से दाम मिलता हो वही राष्ट्र-सेवक और जन सेवक है बाकी सब तो नौटंकी हैं |

कुछ लोगों को लगता है कि इज्ज़तदार लोगों के पीछे दुमछल्ला बने रहने में ही भलाई है, वे लोग तो थोक के भाव में इज्ज़त खरीदते हैं, तो छटांक भर इज्ज़त इनके झोली में भी छलक जाती है | बस उस छटांक भर इज्ज़त का नशा ही इतना हो जाता है इनको, जितना किसी को पूरी बोतल पीने के बाद भी नहीं होता | फिर ये दुमछल्ले निकलते हैं नशे में चूर, दूसरों की इज्ज़त लूटने | किसी से गाली-गलौज कर रहे होते हैं, तो किसी के साथ मार-पीट | किसी की बहु-बेटी उठा रहे होते हैं तो किसी को धमका रहे होते हैं |

एक बार इज्ज़त खरीद ली किसी ने तो कोई फिर उसको बुरा नहीं कह सकता और सारी दुनिया उसके क़दमों में झुकी हुई होती है | न ही कोई अदालत उसे जेल में रख सकती है और न ही उसे चुनाव लड़ने से रोक सकती है | फिर चाहे उसने कितने ही बड़े अपराध क्यों न कर रखें हों | चाहे सारी दुनिया को पता हो उसके अपराधों के विषय में, लेकिन वह भगवान् से भी अधिक महान हो जाता है | वह शान से आपके सामने से निकल जाएगा लेकिन आप उसको कुछ नहीं कह सकते क्योंकि मानहानि हो जायेगी उसकी | लेकिन वहीँ एक गरीब अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए झूठ ही बोल दे, या एक रोटी ही चुरा ले तो जघन्य अपराधियों की श्रेणी में खड़ा हो जाता है |

वाह रे धार्मिकों और इज्ज़तदार लोगों | जब किसी लड़की की इज्ज़त सरे बाजार नीलाम होती है, तब तुम लोग अपने धर्म की कम्बलों में दुबक जाते हो, जब एक भूमाफिया किसी कमजोर की भूमि पर कब्ज़ा करता है, तब तुम लोग दुबक जाते हो, जब एक माँ अपने बच्चों की खातिर आपना जिस्म बेचती है, तब तुम लोग दुबक जाते हो, जब एक पिता अपने बच्चे के इलाज करवाने के लिए चोरी करता है, तब तुम लोग दुबक जाते हो, जब एक किसान आत्महत्या करता है तब तुम लोग दुबक जाते हो......

लेकिन शान से बाहर निकलते हो छटांक भर इज्ज़त के नशे में धर्म-रक्षक बनकर ! शोर मचाते हो नशे में खड़े होकर धर्म खतरे में है ! नफरत के बीज छिड़कते हो राष्ट्र में, एकता स्थापित करने के लिए.... और खुद को कट्टर धार्मिक, इज्ज़तदार मानते हो | लेकिन मनुभवः और वसुधैव कुटुम्बकम जैसे मूल भारतीय सिद्धांत को सेकुलरिज्म कहकर गाली देते हो ? -विशुद्ध चैतन्य

16 नवंबर 2014

मानव जीवन का उद्देश्य

कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | मैं, मेरी तन्हाई और दारु की मटकी भटकते हुए एक संत-सम्मलेन में पहुँच गये | वहाँ दुनिया भर से संत-महंत और धर्मों के ठेकेदार आये हुए थे | लाखों धार्मिक भी वहाँ पर एकत्रित थे | विषय था, 'मानव जीवन का उद्देश्य' |

मैंने दो घूँट लगाए और वहीँ एक पेड़ के नीचे लुढ़क गया | सोचा कि जीवन में कभी कोई पुन्य तो किया नहीं, आज इतने महान आत्माएं एकत्रित हुईं हैं तो इनके कुछ अमृत-वचन सुन लूँगा तो शायद कुछ पुण्य प्राप्त हो जाए |

सभी विद्वान् अपने अपने विचार रख रहे थे और धार्मिक लोग भाव-विभोर हो रहे थे | कोई गीता के श्लोक सुना रहा था तो कोई रामायण के, कोई क़ुरान की आयतें सुना रहा था तो कोई बाइबल के अंश | शाम तक वहीँ बैठा रहा मैं और मुझे यह जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि सभी धर्म तो एक ही बात कहते हैं, बस कहने का ढंग अलग अलग है | सभी ईश्वर से प्रेम करना ही सिखाते हैं, सभी समर्पण करने के लिए ही कहते हैं और सभी मोह-माया के विरुद्ध ही हैं | सभी नशे को गलत बताते हैं, सभी हिंसा के विरोध में हैं..... कुल मिलाकर भीतर कोई भेद नहीं है | केवल मानव से प्रेम करना पाप है, केवल सुख की अभिलाषा करना पाप है....जो कुछ पाना है वह मरने के बाद ही पाना | जो कुछ भी मिलेगा वह स्वर्ग, जन्नत और हेवन में ही मिलेगा | हूरें, अप्सराएँ, परी सभी कुछ.... लेकिन जीते जी नहीं, क्योंकि जीते जी इनकी कामना करना पाप है |

सभा के अंत में मंच में बैठे संतों में से एक की नजर मुझपर पड़ी और मुझे बुलाया; "आपको शर्म नहीं आती इतने बड़े धार्मिक अनुष्ठान में आकर भी नहीं सुधरे ? यहीं बैठ कर शराब पी रहे हो ?" उन्होंने मुझे बड़े प्यार से कहा |

"जी मैं तो सांसारिक व्यक्ति हूँ, आप लोगों की तरह महान आत्मा तो हूँ नहीं, इसलिए शर्म आदि से मेरा कभी परिचय हुआ नहीं | सोचा था कि आप लोगों की अमृतवाणी से कोई लाभ हो जाएगा...." मैंने भोलेपन से उत्तर दिया और दो घूँट लगा लिया | "वैसे आप सभी की बातें सुनने के बाद यही समझ में आया कि मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर की अराधना करना और उनका नाम जपते रहना मात्र ही है | हमें केवल ईश्वर को पाने का प्रयत्न करना चाहिए... है न ?" मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा |

"बिलकुल बिलकुल ऐसा ही है | वाह तुमने कुछ तो सीखा कम से कम !" वे खुश होते हुए बोले |

"यदि ईश्वर को केवल अपने भक्ति ही करवानी होती, जयकारे ही लगवाने होते, तो वे हमें दुनिया में भेजते ही क्यों ? क्या उनके पास जगह की कमी थी जो उन्होंने हमें पृथ्वी पर भेजा ? क्या उनके पास घंटे, घड़ियाल आदि नहीं थे ? क्या मानव को मानव का सहयोगी होना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए ?" मैंने कई प्रश्न कर दिए उनसे |

वे आँखे बड़ी बड़ी करके देखने लगे और बोले, "इस बेवड़े को उठाकर बाहर फेंक दो क्योंकि इस पापी को धर्म की बातें समझ में कभी नहीं आ सकती |" और मुझे उठाकर धार्मिकों की दुनिया से बाहर फेंक दिया गया | तब से आज तक फिर कभी धार्मिक नहीं हो पाया | -विशुद्ध चैतन्य

21 अगस्त 2014

‘सर्वधर्म समभाव मदरसा’


जनं विभ्रति बहुधा, विवाचसम्, नाना धर्माणंम् पृथ्वी यथौकसम्।सहस्र धारा द्रवीणस्यमेदूहाम, ध्रिवेन धेनुंरनप्रस्फरत्नी।।
अर्थात विभिन्न भाषा, धर्म, मत आदि जनों को परिवार के समान धारण करने वली यह हमारी मातृभूमि कामधेनु के समान धन की हजारों धारायें हमें प्रदान करें | (अथर्व वेद, 12वें मण्डल, प्रथम अध्याय)

कई हज़ार साल पुरानी बात है | एक राज्य में एक प्रकाण्ड पंडित रहा करते थे | वे बहुत ही मिलनसार थे और कभी भी किसी से किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते थे | उनसे सलाह लेने शुद्र भी आ सकते थे और ब्राह्मण भी, हिन्दू भी आ सकते थे मुस्लिम भी..... दक्षिणा लेने में भी कोई भेद-भाव नहीं करते थे चाहे अमीर हो चाहे ग़रीब | उनकी ख्याति इतनी फैली हुई थी कि सात समुन्दर पार से भी लोग आते थे सलाह लेने के लिए |

इसी प्रकार समय बीतता गया | कई बार कई शुभचिंतकों ने सलाह दी कि पंडित जी आप जैसे धर्मपरायण पंडित यदि एक आश्रम या गुरुकुल खोल ले तो कितना अच्छा हो जाता ? ऋषि मुनि तो आश्रम और गुरुकुल चला ही रहें हैं, लेकिन यदि एक पंडित भी गुरुकुल खोल ले तो जय जयकार हो जायेगी |

पंडित जी को बात जँच गयी और उन्होंने तुरंत एक गुरुकुल खोलने की घोषणा कर दी | धन की तो कोई कमी थी नहीं पंडित जी के पास लक्ष्मी जी की कृपा से तो काम भी तुरंत आरम्भ हो गया | बहुत ही सोच विचार कर गुरुकुल का नाम रखा गया, ‘वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल’ | जब पंडित जी ने घोषणा की कि यह विश्व एक पहला ऐसा गुरुकुल होगा जो पंडित द्वारा स्थापित व संचालित लेकिन सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ के लोगों के लिए होगा और सभी के बच्चों को यहाँ भेदभाव किये बिना दाखिला दिया जाएगा | ब्राह्मण और शुद्र में भी कोई भेद नहीं किया जाएगा... तो चारों ओर उनकी जय जयकार गूंजने लगी | चाहे आजतक हो या कलतक टीवी, चाहे स्टार हो या मून टीवी, चाहे टाइम्स हो या ऑफटाइम्स....सभी मीडिया में उनके गुरुकुल का प्रचार होने लगा | यह और बात है कि पंडित जी से भी मीडिया हर खबर की कीमत वसूल रही थी... खैर.. यह सब तो चलता रहता है....

आइये गुरुकुल चलते हैं | वहाँ एडमिशन के फार्म लेने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी और इतनी भीड़ देखकर सारे ऋषि मुनि आश्चर्य चकित थे कि ऐसा क्या हो गया उस गुरुकुल में कि लोग मक्खियों की तरह टूट पड़े वहाँ पर अपने बच्चों का दाखिला करवाने के लिए ? ऋषि मुनि भी अपने गुरुकुल में कोई भेदभाव नहीं रखते थे किसी से, लेकिन लोग उनके गुरुकुल में अपने बच्चों को भेजने से अच्छा कान्वेंट स्कूल या मिशनरी स्कूल में भेजना पसंद करते थे | लेकिन यहाँ तो बिलकुल उल्टा ही हिसाब हो गया था |

जब फ़ार्म बंट गये तो भीड़ छंटनी शुरू हो गयी | फ़ार्म में कुछ नियम थे जो वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल के सिद्धांत भी थे और नियम भी:

१. वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल सभी धर्म, सम्प्रदाय, जाति, प्रजाति का सम्मान करता है और मानता है कि विश्व के सभी प्राणी एक परिवार के समान है |
२. वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल में कोई भेद भाव न हो, इसलिए सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा |
३. गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी छात्रों को चोटी, जनेऊ, धोती, लंगोटी धारण करना होगा | तिलक लगाना होगा और रामनामी वस्त्र धारण करना होगा |
४. गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी छात्रों और उनके माता-पिता को लहसुन, प्याज, टमाटर (जो बच्चे टमाटर नहीं छोड़ सकते उन्हें टमाटर के पैसे अलग से जमा करवाने होंगे क्योंकि टमाटर राजसी प्रवृति की सब्जी है और केवल राजघराने के लोग ही इसका खर्च वहन कर सकते हैं), माँस-मच्छी का त्याग करना होगा |
५. गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी छात्रों को आपस में राम राम बोलकर अभिवादन करना होगा.....

नियम पढ़ने के बाद कुछ लोग तो ख़ुशी से झूम उठे और जयकारा लगाने लगे | लेकिन कुछ लोग पंडित जी के पास गये और बोले कि यह कैसा वसुधैव कुटुम्बकम है ? आपने तो कहा था कि सभी धर्मों का सम्मान करेंगे लेकिन यहाँ तो....? हमने तो समझा था कि आप जैसा भेदभाव से मुक्त पण्डित के गुरुकुल में हमारे बच्चे पढ़ेंगे तो भारतीय सभ्यता से और अच्छी तरह से परिचित हो जायेंगे | उनमें भी भारतीयों की तरह शिष्ट व्यवहार करना, माता-पिता का आदर करना, बड़ों का आदर करना, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध का भाव आदि दुर्लभ भारतीय गुण आ जायेंगे | बाबा महाराजों के गुरुकुल तो अंग्रेजी मीडियम के स्कूल से अधिक कुछ नहीं होते | वहाँ भी वही अंग्रेजी सिखाते हैं और विदेश में नौकरी कैसे पायें सिखाते हैं | कुछ गुरुकुल तो योग भी सिखाते हैं और कुछ भजनकीर्तन |

इसलिए हम आपके गुरुकुल में आये थे अपने बच्चों का दाखिला करवाने क्योंकि आपने तो सभी के साथ समान व्यवहार रखा हुआ था....

पंडित जी ने समझाया; “देखिये आप लोगों के विचारों में दोष है | मैं आज भी आप सभी से समान भाव से ही मिलता हूँ और यही भाव सदैव रहेगा भी | लेकिन यह जो भी नियम है वह गुरुकुल का है और वह समानता का भाव लाने के लिए ही तो है | इस तरह से सभी समान हो जायेंगे और न कोई ब्राह्मण रहेगा और न ही कोई शुद्र रहेगा, न कोई मुस्लिम रहेगा और न ही कोई इसाई रहेगा | सभी हिन्दू कहलायेंगे और यही तो वसुधैव कुटुम्बकम का वास्तविक अर्थ है | कि हम सभी एक परिवार अर्थात हिन्दू परिवार हैं |”

कई माँ-बाप को समझ में नहीं आई पंडित जी की बात और वे ऋषि-मुनियों के आश्रम में अपने बच्चों को दाखिला करवा दिए और कुछ ने कान्वेंट और मिशनरी स्कूलों में |

पंडित जी के गुरुकुल की बात जब तालिबानी और आइसिस के पास पहुँची तो उन्होंने भी घोषणा कर दी ‘सर्वधर्म समभाव मदरसा’ खोलने की | अब आप समझ ही गए होंगे कि मदरसा पंडित जी के गुरुकुल से १९ तो हो नहीं सकता था | 


नोट: यदि हम दूसरों को मिटा कर या नीचा दिखाकर विश्व को जीतना चाहते हैं तो यह ध्यान रखें कि यह काम तो सिकंदर भी नहीं कर पाया था | यह काम तो अंग्रेज भी नहीं कर पाए और सिमट कर रह गये एक छोटे से देश में | तालिबानियों का अंजाम भी सभी के सामने है और आइसिस का अंजाम भी सामने आ जाएगा | आइसिस का समर्थन यदि सरकारें और कट्टरपंथी न करें तो उनका आस्तित्व तो २४ घंटे में मिट सकता है |

इसलिए आप हिन्दू हों या मुस्लिम, सिख हों या ईसाई, पहले मानवता अपनाइए फिर राष्ट्रीयता और उसके बाद आता है आपका सम्प्रदाय और आपकी मान्यताएं | जिस दिन भी आप पार्टी, नेता, जाति सम्प्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रीय और मानवीय भाव को पा लेंगे उस दिन भारत विश्वविजयी हो जाएगा और हर भारतीय होगा गरीबी से मुक्त, समृद्ध व ऐश्वर्यवान | बस उतनी ही दूरी है समृधि से, जितनी दूरी मानवता और राष्ट्रीयता से है आप लोगों की |

आपका धर्म और आपकी मान्यताएं आपका व्यक्तिगत विषय है उसे राष्ट्र व राजनीती के लिए प्रयोग न करें | क्योंकि हमारा राष्ट्र न तो सीरिया है और न ही ईराक.... यह भारतवर्ष है और श्रेष्ठ है विश्व में, क्योंकि संकीर्णता से मुक्त है |
-विशुद्ध चैतन्य


24 अप्रैल 2014

दिखाने के लिए किये जा रहे कार्य दूसरों के कारण प्रभावित हो जाते हैं


कई हज़ार साल पुरानी बात है | टप्पू परदेसी ने आत्मसाक्षात्कार के लिए जंगल में जाकर तपस्या करने की ठानी | एक दिन घर-बार छोड़ कर जंगल में निकल गया तपस्या करने | कई वर्षों तक घनघोर तपस्या किया और जाना कि वह कौन है और क्यों आया है इस धरा में |

लौट कर वापस अपने गाँव आया तो गाँव वालों ने उसका बहुत ही आदर सत्कार किया | उसके टूटे फूटे मकान को सजा संवार कर बिलकुल नये जैसा बना दिया गया | अब टप्पू परदेसी का नाम बदल गया था और वह हो गये थे स्वामी टप्पू जी महाराज | दूर दूर से लोग उनसे मिलने आने लगे थे |

उनमें जो एक विशेषता थी जो आत्मसाक्षात्कार के बाद उनमें आई थी वह यह कि वे अपना हर काम स्वयं ही करते थे | उनके भक्तों को यह बहुत आकर्षित करता था और हर कोई उनका भक्त बनने के लिए लालायित रहता था | क्योंकि ये ऐसे महाराज थे जिनकी सेवा नहीं करनी पड़ती थी | देखते ही देखते कुछ ही दिनों में उनके सैंकड़ों भक्त बन गये | अधिकतर उनके इस नये आश्रम में ही रहने लगे थे | कोई अपने घर में शोर शराबे से परेशान था और आईएएस की तैयारी कर रहा था इसलिए आश्रम में रहकर शांति से पढ़ाई करना चाहता था, तो कोई बीवी की चिक-चिक से परेशान होकर आश्रम में भक्त भक्त बन गया था | कोई बोर्ड के पेपर की तैयारी कर रहा था, तो किसी के पास अपना मकान बनाने के पैसे नहीं होने व किराए के मकान में पैसे बर्बाद होने से बचाने के लिए आश्रम में रह रहा था | कोई मिसविलेज की तैयारी कर रही थी तो कोई डेविड धवन के किसी फिल्म से ऑफर आने तक वहाँ रुका हुआ था.... और इस प्रकार आश्रम में बहुत ही रौनक रहने लगी थी |

सभी सारे दिन बैठ कर क्रिकेट देखते रहते या फिर एमटीवी या एकता कपूर का सीरियल देखते रहते | न तो किसी को चिंता थी खेत में पानी देने की और न ही चिंता रहती अध्यात्मिक चर्चा करने की | स्वामी जी भी अपने कमरे में अकेले पड़े रहते या सुबह शाम खेत में अकेले काम करते रहते |

कुछ दिन तक तो सब ठीक ठाक रहा, लेकिन एक दिन टप्पू जी महाराज को दोबारा आत्मज्ञान हुआ | उन्होंने देखा कि वे तो अपना काम स्वयं करते हैं, लेकिन बाकी सभी अपने अपने काम के लिए नौकर रख रखें हैं | टप्पू महाराज को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने भी काम करना बंद कर दिया और नौकर से अपना भी सारा काम करवाने लगे | खेतों के लिए भी नौकर रख लिए थे | बस अब सारे दिन अपने कमरे में पड़े पड़े अंग्रेजी फिल्म देखते रहते | धीरे धीरे टप्पू महाराज के कमर में दर्द रहने लगा और हाथ पैरों में भी कमजोरी आ गयी | इलाज के लिए अमेरिका जाना पड़ा तो वहीं से चार पाँच इम्पोर्टेड भक्तिन ले आये सेवा के लिए.....

कथा सार यह कि स्वाभाविक रूप से किये जा रहे कार्यों में कोई प्रभाव नहीं होता दूसरों के कारण | लेकिन दिखाने के लिए किये जा रहे कार्य दूसरों के कारण प्रभावित हो जाते हैं | -विशुद्ध चैतन्य

अब इस कथा को यदि आपने ध्यान से पढ़ा होगा तो यह तीन प्रश्न हैं आपके लिए:

१. आत्मसाक्षात्कार का अर्थ क्या है ? क्या टप्पू महाराज को आत्मसाक्षात्कार हुआ था ?३. भक्त का अर्थ क्या है ? क्या आश्रम में ठहरे लोग भक्त थे ?३. आश्रमवास का मूल उद्देश्य क्या है ?