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22 मार्च 2017

गृह-प्रवेश से पहले शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है ?

"गुरू जी एक बात बताइये ?
क्या उस स्थान का शुद्धिकरण करना उचित है, जहाँ हाल ही में कोई परिवार रह कर गया हो ?

विशुद्ध चैतन्य जी, अगर उचित है तो फिर अगर में नेता हु तो मुझे भी शुद्धिकरण कराना चाहिए ?

हाँ स्थान के बजाए वोटो का शुद्धिकरण कराना चाहिए, पता नही किस किस प्रजाति के मनुष्यों ने मुझे वोट दिया हो ?" -Asif Khan


योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री आवास में प्रवेश से पहले शुद्धिकरण करवाया तो उपरोक्त प्रश्न हर जगह से उठने लगे | जो भी खुद को पढ़ा-लिखा आधुनिक व वैज्ञानिक सोच का मानता है, वह इसी प्रश्न को अलग अलग रूपों में उछाल रहा है | कुछ इसे जातिवाद से जोड़ रहे हैं तो कुछ रूढ़ीवाद व अन्धविश्वास से | इसका कारण केवल इतना ही है, कि जैसे जैसे मनुष्य पढ़ा-लिखा व आधुनिक होता चला गया, उसकी ज्ञानेन्द्रिया कमजोर होतीं चलीं गयीं | वह मात्र एक मशीन बनकर रह गया और उतनी भी प्राकृतिक क्षमता नहीं बचा पाया, जितनी की पशु-पक्षियों में होती हैं | चलिए मैं आपको समझाता हूँ कि शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है नए या कई वर्षों तक दूसरों के द्वारा प्रयोग हुए घर में प्रवेश से पहले |

27 अगस्त 2016

इस ब्रहमांड में कई ऐसे रहस्य छुपे हुए हैं जिन्हें खोजना जानना अभी बाकी है



क्या कभी आपने सोचा है कि दुनिया का सबसे विद्वान व्यक्ति भी केवल उतना ही जानता है, जितना उसने पढ़ा, देखा या जाना है ? लेकिन उसे अहंकार हो जाता है कि वह सबकुछ जानता है और आश्चर्य तो उनपर मुझे अधिक होता है, जो केवल किताबों को रटकर मान लेते हैं कि उन्हें बहुत ज्ञान हो गया | वास्तव में यह ब्रह्माण्ड इतना विशाल है कि उसे पूरी तरह जान लेने में मानवों को अभी कई लाख वर्ष लग जायेंगे |

और ऐसी स्थिति में नास्तिकों पर मुझे तरस आता है, तरस आता है उन धार्मिकों पर जिनकी दुनिया सैंकड़ों वर्ष पहले लिखी गई किताबों पर सिमट कर रह गयी | ऐसे लोगों की संख्या सर्वाधिक है इसलिए यदि किसी को इनकी किताबों से अलग कोई ज्ञान प्राप्त हो जाये या कोई अनुभव हो, तो ये विद्वानों का समाज उसे मानसिक रोगी कह देता है या फिर भ्रमित या फिर मुर्ख कह देता है |

लेकिन इस ब्रहमांड में कई ऐसे रहस्य छुपे हुए हैं जिन्हें खोजना जानना अभी बाकी है जैसे;
  • अंतरिक्ष में 80 फीसदी से ज्यादा पदार्थ दिखाई नहीं देता और इसे डार्क मैटर कहते हैं. आज तक यह रहस्य बना हुआ है कि डार्क मैटर किस चीज से बना है. डार्क मैटर का पता 60 साल पहले चला था लेकिन आज तक इसके होने की पुष्टि नहीं हो पाई है.
  • माना जाता है कि अंतरिक्ष की कुल ऊर्जा का 70 फीसदी हिस्सा डार्क ऊर्जा है. यह अंतरिक्ष के फैलाव के फलस्वरूप पैदा हुई. यह ऊर्जा स्थिर या परिवर्तनशील है, यह अब तक ज्ञात नहीं.

25 अगस्त 2016

In most cases, the sole motivation for going to work, is the next paycheck


वास्तव में वह व्यक्ति सबसे खतरनाक है जो जागृत है, चैतन्य है, होश में है | ऐसे व्यक्ति से समाज, सत्ता को सर्वाधिक खतरा रहता है क्योंकि उसे भेड़ों की तरह हाँका नहीं जा सकता, उसे जुमले/लोरी/लोलिपॉप से बहलाया नहीं जा सकता | उसे धर्म और जाति के कम्बलों में लपेटा नहीं जा सकता | उसे ईश्वर/मोक्ष/स्वर्ग/जन्नत/अप्सरा/हूरों का लालच देकर बहकाया नहीं जा सकता.... क्योंकि वह जो जागा हुआ है, होश में उसे मूर्ख बनाना कोई आसान काम नहीं है |

ऐसे में समाज उसके विरुद्ध षड्यंत्र करता है और दुनिया से विदा करने की तयारी कर दी जाती है, जैसे कि सुकरात के साथ हुआ, जैसे कि जीसस के साथ हुआ, जैसे कि लक्ष्मीबाई के साथ हुआ....लेकिन समाज यह भूल जाता है कि केवल उन्होंने शरीर को क्षति पहुँचाई है और वह फिर वापस लौट आएगा नए शरीर के साथ क्योंकि उसका काम अभी अधुरा है |

04 अगस्त 2016

स्वर्ग वहीं है, जहाँ मानवों के विकासशील आधुनिकता के कदम नहीं पड़े !

मानवों ने जहाँ जहाँ अपनी विकासशील आधुनिक मानसिकता के कदम नहीं रखे, वह जगह आज भी सुंदर व मनमोहक हैं | लेकिन जहाँ-जहाँ मानवों की भीड़ पहुँच जाती है वह विकास व आधुनिकता की वेदी पर स्वाहा हो जाता है | अभी भी भारत में कई जगह ऐसी हैं, जहाँ मानवों ने विकास नहीं किया जिसकी वजह से वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य आज भी आकर्षित करता है |

20 दिसंबर 2015

विश्वरूप और मूर्ति पूजा


जो विद्वान् व ज्ञानीजन अनदेखे, निराकार ईश्वर की अराधना करते हैं और मूर्ती पूजकों का मजाक उड़ाते हैं, वास्तव में उनकी स्थिति कुछ वैसी ही होती है, जैसे कोई सागर को स्वीकार करे पर वर्षा की बूंदों से इनकार करे | सागर के पानी को जल जल माने, लेकिन बूंदों को जल मानने से इनकार करे | लेकिन मैं उनका विरोधी नहीं हूँ क्योंकि मैं उनकी विवशता समझ सकता हूँ | मैं जानता हूँ कि उन्होंने ईश्वर को न जाना है, न देखा है, न समझा है... बस किताबों में पढ़ लिया कि ईश्वर निराकार है और उसे रटकर विद्वान् बन गये |

कई बार विद्वान नास्तिक जन यह प्रश्न करते हैं, "हिन्दू देवी-देवताओं के इतने सारे हाथ पैर सर आदि क्यों होते हैं ?" तब उन्हें कोई ऐसा उत्तर नहीं मिल पाता जिससे उन्हें संतुष्टि हो पाए |

मूर्ती पूजा भी ध्यान, कीर्तन, भजन, हवन आदि की तरह ही सनातन धर्म का ही अंग है | मूर्तियाँ किसी को मूर्ख बनाकर धन ऐंठने के लिये नहीं बनायीं गयीं थीं, बल्कि ईश्वर को समझाने के लिए ही की गयी थी | ठीक वैसे ही जैसे प्रतीकों का प्रयोग करते हैं, जैसे हम ब्लैकबोर्ड, नोटिसबोर्ड का प्रयोग करते हैं, जैसे हम अपने प्रियजनों के तस्वीरों का प्रयोग करते हैं, जैसे हम चित्रों, नक्शों आदि का प्रयोग करते हैं...

24 नवंबर 2015

सारे शंख अपनी-अपनी मौजूदगी की घोषणा करते हैं

कृष्ण का पांचजन्य, उनका शंख बड़े प्रतीक अर्थ रखता है। आदमी की पांच इंद्रियां हैं, आदमी के पांच द्वार हैं, आदमी अपने पांच द्वारों के माध्यम से उद्घोष करता है। उसके जीवन का सारा उद्घोष पांच द्वारों के किया गया उद्घोष है–उसकी आंख से, उसकी नाक से, उसके कान से, उसके मुंह से। पांच इंद्रियां पांच द्वार हैं जगत से हमारे संबंध के। और जब कथाकार कहते हैं कि कृष्ण ने पांचजन्य बजाया, उसका कुल मतलब इतना है कि युद्ध में वे अपनी पांचों इंद्रियों सहित समग्र रूप से मौजूद हुए। इससे ज्यादा कोई मतलब नहीं है। युद्ध उनके लिए कोई एक काम न था, उनके लिए कोई चीज काम न थी। कबीर जैसा कपड़ा बेचने बाजार चला गया था, पूरा-का-पूरा, ऐसे ही कृष्ण पांचजन्य बजाकर उद्घोष करते हैं कि मैं पूरा-का-पूरा युद्ध में आ गया हूं। कुछ पीछे छोड़ आया नहीं। वह पीछे छोड़कर चलते ही नहीं। वह पूरे-के-पूरे, जहां होते हैं पूरे होते हैं। इसलिए पांच इंद्रियों के प्रतीक पांचजन्य को वह बजाते हैं और वह कहते हैं कि मेरी समस्त इंद्रियों सहित मैं यहां मौजूद हूं। मेरी मौजूदगी की घोषणा है। वह सारे शंख अपनी-अपनी मौजूदगी की घोषणा करते हैं। सबके शंखों के अलग-अलग नाम हैं। और प्रत्येक अपना-अपना शंख बजाता है, वह उसकी घोषणा है। प्रत्येक शंख का अलग-अलग स्वर है। और प्रत्येक शंख का प्रत्येक व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व से संबंध है। लेकिन कृष्ण के शंख का मुकाबला कोई भी नहीं है। समग्र रूप से वहां कोई भी उपस्थित नहीं है, समग्र रूप से वह अकेले ही उपस्थित हैं। और मजे की बात है कि वही वहां युद्ध करने को उपस्थित नहीं है।


कृष्ण-स्मृति, ओशो

12 अक्टूबर 2015

रामायण जो पढ़े-लिखों के समझ के परे रह गयी



रामायण वास्तव में पढ़े-लिखों के लिए थी ही नहीं, वह तो बिलकुल निपट अनपढ़ गँवारों के लिए ही थी | पढ़े-लिखों को कहानियाँ कम ही समझ में आती हैं, जबकि अनपढ़ और गँवार कहानियों में खो जाते हैं | वे उसे बिलकुल आत्मसात कर सकते है लेकिन पढ़े-लिखों के लिए यह असंभव हो जाता है | क्योंकि वे लेफ्टब्रेन से प्रभावित होते हैं और राईट ब्रेन का प्रयोग करना बचपन में ही समाज व नंबरों के खेल में भूल चुके होते हैं |

बहुत पुरानी बात है मैं अपने नौकर को एक दिन एक अंग्रेजी पिक्चर दिखाने ले गया | वह नेपाल से आया था और हिंदी फिल्म ही देखने का शौक़ीन था, लेकिन उस दिन मेरे साथ अंग्रेजी पिक्चर देखने की जिद करने लगा | वह फिल्म थी अनाकोंडा | नई नई आई रिलीज़ हुई थी और मुझे होलीवूड फिल्मों में साउंडइफेक्ट्स और बैकग्राउंड म्यूजिक का जादू देखने में ही सबसे आनंद आता है | बाकी अंग्रेजी तो कुछ पल्ले पड़ती नहीं थी |

तो इंटरवल तक तो लगभग सब ठीक ठाक ही रहा... उसके बाद पॉपकॉर्न और कोक लेकर हम फिर बैठे | अनाकोंडा का प्रभाव अब नौकर के चेहरे में दिखने लगा था | कभी वह मेरा हाथ पकड़ ले कभी चेहरा अजीब से बनाने लगे.... अब मेरा ध्यान फिल्म से ज्यादा उसपार था | फिर साउंडइफेक्ट इतना जबरदस्त था कि लगता था कि अनाकोंडा अब सीट के आसपास ही कहीं है...... वह बेचारा दोनों पैर उठाकर कुर्सी पर जम गया | मैंने पूछा कि क्या हुआ... कुछ नहीं बोला... शायद मेरी आवाज भी उसे नहीं सुनाई दी... वह बिलकुल ट्रान्स पर जा चुका था और अनाकोंडा से ही अपने आप को बचाने की जुगत में लगा हुआ था......

तो यह सब मुझे अभी याद आ गया क्योंकि मैं जो बताने जा रहा हूँ वह ऐसे ही लोगों के विषय में है | पढ़े-लिखों के लिए इस स्थिति को समझ पाना बहुत ही कठिन हो जाएगा |

रामायण लिखी गयी सुबह शाम पढ़ने और माथे पर लगाने के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति को कहानी के माध्यम से समझाने का ही उद्देश्य रहा होगा | जरा सोचिये आज कोई शोले,कुछ कुछ होता है, डीडीएलजे.... आदि फिल्मों की स्क्रिप्ट को दोहे या चौपाई में रूपांतरित करके दे दे और कहे कि इसे रोज सुबह शाम पढ़ो तो कैसा लगेगा ?

जानता हूँ छूटते ही मुँह से निकला होगा आप लोगों के कि यह क्या बकवास कर रहा है ??? हमारी धर्मग्रन्थ और पूजनीय ग्रन्थ की तुलना फिल्मों से कर रहा है ???? घोर नरक में जाएगा..... आदि इत्यादि | लेकिन मैं जो कह रहा हूँ उसे ध्यान से पढ़िए |

तो रामायण लिखी गयी कृषि और भूसंपदा के महत्व को समझाने के लिए | उसे इतना गौरवमय व महान बताया गया कि हर किसान अपने खेतों, अपनी जमीन को उतना ही महत्व दे, जितना सीता माँ का महत्व है | जितना राम ने सीता से प्रेम किया उतना ही प्रेम चाहता था लेखक रामायण के माध्यम से भूसंपदा के प्रति |

कहा जाता है कि सीता का जन्म खेत में हल जोतते समय हल का नोक एक कलश में टकराया और जब उस कलश को निकाला गया तो उसमें से एक नवजात कन्या थी, जिसका नाम सीता रखा गया | सीता का अर्थ होता है हल से जोती हुई रेखा | तो अब हम इस आधार पर पूरी रामायण को समझने का प्रयास करते हैं |

हल से जोतने पर जो उत्पन्न होता है वह किसान के लिए वरदान ही होता है | उसकी कड़ी मेहनत का फल होता है वह फसल जो उसके खेत में उत्पन्न होता है | सीता का दूसरा नाम भूमिजा भी है और कृषि की अधिष्ठात्री देवी भी हैं | तो सीता यानि किसानों की देवी और देवी इसलिए क्योंकि भूमि से उत्पन्न अनाज उनके जीवन में खुशहाली लाती है | भूमि से तो खनिज और रत्न से लेकर तेल और जल तक सभी कुछ जीवन में समृद्धि लाने वाली होती है, इसलिए हर वह पदार्थ व अन्न पूजनीय हैं जो किसान अपनी मेहनत से भूमि में हल जोतकर उत्पन्न करता है |

तो स्वयंवर में राम ने जिस सीता को जीता वह भूमि से उत्पन्न भूसंपदा थी | इसलिए उसे जीतने रावण भी आया था लेकिन शिव जी के धनुष को उठा भी नहीं पाया था | यानि वह उतना योग्य नहीं था, जितना कि एक किसान होता है | वह एक व्यापारी, व्यभिचारी था, छल कपट करने वाला, अत्याचार करने वाला, अहंकार में डूबा रहने वाला, और साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग कर दूसरों की सम्पति, स्त्रियों का हरण करने वाला | वहीँ किसान इन सब से पूरी तरह मुक्त होता है | वह सीधा साधा, अपने ही धुन में मगन, अपनी मेहनत पर विश्वास करने वाला होता है | इसलिए उसने सहजता से धनुष यानि लक्ष्य को भेदने का सामर्थ्य उठा लिया और उस पर प्रत्यन्चा भी चढ़ाने में सफल हो गया लेकिन धनुष ही टूट गया | लक्ष्य को भेदने के लिए जो धैर्य व स्थिरता चाहिए वही प्रत्यन्चा है | धनुष टूटने का अर्थ यह निकाला जा सकता है कि जो साधन है वह चाहे कमजोर पड़ जाए, चाहे टूट जाये, लेकिन धैर्य व साहस में कोई कमी नहीं आ सकती |

राम को जब वनवास मिला तो सीता भी सारे वैभव छोड़कर उसके साथ हो चली | अर्थात एक किसान कितनी ही कठिन परिस्थिति में आ जाये, भूसंपदा सदैव उसके दुःख को कम करने का प्रयास ही करेगी | वह हमेशा उसे सुखी ही रखना चाहेगी | एक किसान कितना ही गरीब क्यों न हो, जमीन यदि उसकी अपनी है तो वह यदि राम की तरह धैर्यवान, विवेकी, व परिश्रमी हुआ तो सीता की तरह वह उसे सुख ही देगी | तो इसलिए भी भूमिजा किसानों कि अधिष्ठात्री देवी हैं, पूजनीय हैं, वन्दनीय हैं |

वन में स्वर्णमृग का मिलना यानि भूमाफियाओं और व्यापारियों द्वारा भेजा गया दलाल जो, लालच देता है किसानों को, भटकाता है उसका मन...... भेसबदल कर आया रावण और कोई नहीं | भूमाफिया ही होता है जो उस समय साधू संत के भेस में घूमा करते रहे होंगे और आज नेताओं सरकारी अधिकारीयों के रूप में | अब यहाँ देखें तो हर बार चुनाव में यही कहा जाता है कि हम किसानों के शुभचिंतक हैं... लेकिन जीतने के बाद वे नेता अपने पुष्पक विमान में विदेश निकल जाते हैं | किसानों कि स्थिति बाद से बदतर होती जाती है, जैसे राम और लक्ष्मण की हो गयी थी सीता हरण के बाद |

राम ने तो छल से चुराई सीता वापस ले ली... लेकिन क्या किसान अपनी सीता यानि भूसंपदा वापस ले सकते हैं ? जब किसान स्वयं ही राम बनने को तैयार नहीं हैं तो सीता कैसे वापस मिलेगी ?

कभी समय मिले तो इस पर चिन्तन-मनन अवश्य करियेगा | यह मेरा अपना तर्क है और किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने का कोई उद्देश्य नहीं है | मैं चाहूँगा कि रामायण को यदि पढ़ते हैं, तो अब इस नजरिये से पढ़िए | रोचक भी लगेगा और अपने भीतर ही राम और सीता का अनुभव वैसे ही करेंगे, जैसे हनुमानजी करते थे | दोनों की शक्ति ही थी जो हनुमान को इतना पराक्रमी व निडर बना दिया था | एक किसान भी इतना ही निडर व पराक्रमी हो सकता है यदि वह राम यानि ब्रम्ह और सीता यानि भूसम्पदा को स्वयं से अलग न होने दे | निरंतर हनुमान की तरह उनकी सेवा में लगा रहे... तो वह खेत ही उसे समृद्धि और ऐश्वर्य के साथ मानसिक शांति भी प्रदान करेगा | ~विशुद्ध चैतन्य

22 सितंबर 2015

मुझे छूआ-छूत की बीमारी है यह मैं स्वीकार करता हूँ


आज फिर दिमाग कुंद है और कुछ समझ में ही नहीं आ रहा कि क्या लिखूं । अब तो ऐसा भी लग रहा है कि लिखना बहुत ही मुश्किल काम है । कई बार ऐसा भी लगता है कि मैंने पहले कभी लिखा ही नहीं । और ऊपर से आज ब्रॉडबैंड भी नहीं चल रहा बारिश के कारण ।

हाँ एक बार अवश्य अनुभव किया है मैंने कि जब भी डेस्कटॉप पर होता हूँ तो न जाने कैसे लिखने लगता हूँ और कई बार तो अपने ही लेख पढ़कर डर जाता हूँ कि इतना कुछ मैंने कैसे लिख दिया ? यह भी नहीं कि हर बार मैं किसी विषय पर पहले से सोचकर लिखता हूँ । बस अचानक कुछ दिमाग में आया और लिखना शुरू किया कि दो चार लाइन ही तो लिखना है, लेकिन पता ही नहीं चलता कि कब 'चार लाइना' उपन्यास में रूपांतरित हो जाती है । और मेरा डेस्कटॉप साउथ फेसिंग है । यानि उत्तर दिशा की दीवार की तरफ रखा है टेबल । तो टाइप करते समय मेरा मुँह उत्तर की तरफ रहता है । वास्तुशास्त्र में रूचि थी बचपन से इसलिए उसी के अनुसार मैं हमेशा उत्तर या पूर्व की तरफ ही मुँह करके बैठना पसंद करता हूँ । हालांकि मैंने सबसे अधिक नाम और पैसा कमाया पश्चिम की तरफ मुँह करके बैठने पर । (पढ़े-लिखे व वैज्ञानिक सोच के विद्वान् अपने मंस्तिष्क के बाएँ भाग की ऊर्जा व्यर्थ न करें )

16 जून 2015

...यानी भाग्य न हुआ आपका नौकर हो गया


आप भाग्य को नहीं मानते क्योंकि कर्मवादी हैं | आपका तर्क होता है कि, क्या भाग्य के भरोसे रहेंगे तो ट्रेन चल जाएगी ? क्या नौकरी मिल जाएगी ? क्या छोकरी पट जायेगी ? क्या बैंक बैलेंस बढ़ जाएगा......?" यानी भाग्य न हुआ आपका नौकर हो गया | आपको जो कुछ चाहिए वह सब भौतिक है, वहां आध्यात्मिक या भाग्य या ईश्वर कहाँ से आ गये ?

कर्मवाद शुद्ध भौतिक है, पढ़े-लिखों की भाषा में वैज्ञानिक पद्धति है | और भाग्यवाद आध्यात्मिक पद्धति है | भाग्यवाद का अर्थ निकम्मा निठल्ला होना नहीं होता, बल्कि जो प्राप्त हुआ उसका मैं अधिकारी था और जो नहीं मिला उसके योग्य नहीं था इस सिद्धांत पर चलना ही भाग्यवाद है | मुझे उसे पाने का प्रयत्न नहीं करना है जो मुझे नहीं मिला, बल्कि मुझे वह पाना है जो मेरे व मेरे परिवार के लिए आवश्यक है, जैसे कि जीविकोपार्जन के लिए प्रयास करना | यहाँ भाग्य का कोई लेना-देना नहीं है | आप मेहनत करेंगे परिणाम मिलेंगे यहाँ भाग्यवाद लागू नहीं होता | भाग्य उसे माना जाएगा जब आप इंटरव्यू के लिए जाएँ और गाड़ियों की हड़ताल हो जाए उस दिन और आपके लिए ऑफिस पहुँचाना असंभव दिखे, तभी अचानक कोई अजनबी आपके सामने गाड़ी रोके और आपको अपनी मंजिल तक सही सलामत पहुँचा दे | आप कर्मवादी होने के कारण दौड़ लगाकर भी ऑफिस पहुँच सकते हैं... लेकिन मेरे जैसे कामचोरों के लिए यह असंभव हो जाएगा :(

27 मई 2015

यह शुरुआत है अर्थात स्वप्न का पहला भाग...


लोग कहते हैं कि स्वप्न का कोई अर्थ नहीं होता | लेकिन मेरे जीवन में स्वप्न ने हमेशा आने वाले खतरों के प्रति सचेत किया है | पंद्रह मई को जो स्वप्न देखा था, उसका परिणाम आज सामने आ गया |

स्वप्न का लिंक नीचे दे रहा हूँ और अर्थ इस प्रकार हैं...

1- To see a wild alligator or a crocodile in your dream foretells a new beginning or changes in your waking life. This dream can also indicate danger in some way. If you do not kill the alligator, then this dream may not be favorable, but it is rather a caution. The alligator or crocodile within your dream can also highlight your intuition, your spiritual insights, and the spiritual steps you need to take in the forthcoming future. Because of its association with religion, the alligator can mean that negative aspects signify a danger which will shortly come into your life.

2. .यदि सपने में पानी में मगरमच्छ दिखाई दें तो समझना चाहिए की आपके जीवन में कोई आपका गुप्त शत्रु आपके विरुद्ध षड़यंत्र रच रहा है जिसमें आप बुरी तरह फंस जायेंगे परन्तु वह शत्रु सुरक्षित रहेगा। यह धर्म के मार्ग पर आपकी कठिन परीक्षा का भी संकेत है।

मेरी अपनी व्याख्या: स्वप्न की यदि व्याख्या किया जाए तो यह मगर हो है वह हम दोनों भाइयों पर हमला नहीं करता, बल्कि हमसे तो उसको कोई मतलब ही नहीं था.... वह स्त्री अर्थात लक्ष्मी अर्थ मान सम्मान को चोट पहुँचाना चाहता था | जिसे हमें बाद में बांध दिया अर्थात वह अपने प्रयास में असफल हुआ |

रोहिणी नक्षत्र और मकर लग्न की जो बात कही गयी है वह इसी पखवाड़े शुरू हो जायेगी | इसी समय आश्रम में उत्सव भी है जिसमें आश्रम से सम्बंधित सभी लोग जुड़े होंगे | और वही समय रहेगा मेरे विरोधी कोई चाल चलेंगे |
इस स्वप्न में जो बात मुझे महत्वपूर्ण दिख रही है वह है.... रोहिणी नक्षत्र और मकर लग्न....कुछ बातें स्पष्ट हो रही हैं जैसे की मेरा नाम रोहिणी नक्षत्र से जुड़ा हुआ है

रोहिणी नक्षत्र आकाश मंडल में चौथा नक्षत्र है। यह वृषभ राशि में चारों चरणों में रहता है। उसके चारों चरणों में बनने वाले नाम ओ, वा, वी, व है। राशि स्वामी शुक्र है और नक्षत्र स्वामी चंद्रमा है। रोहिणी चंद्रमा की सुंदर पत्नी का नाम है। रोहिणी नक्षत्र को वृष राशि का मस्तक कहा गया है। इस नक्षत्र में तारों की संख्या पाँच है। किसी भी वर्ष की 26 मई से 8 जून तक के 14 दिनों में इस नक्षत्र से सूर्य गुजरता है। इस प्रकार रोहिणी के प्रत्येक चरण में सूर्य लगभग साढ़े तीन दिन रहता है।

फलीभूत हुआ इस प्रकार:

26 तारिख तक सभी मेहमान और ट्रस्टी वगैरह चले गये थे और इस बीच मैं उनमें से किसी से भी मिलने नहीं गया | क्योंकि मेरे लिए वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थे, केवल एक टूरिस्ट थे जो साल में एक या दो बार पूजा के नाम पर पिकनिक मनाने आते हैं | वे खुद को आश्रम नाम के इस पर्सनल फार्म हाउस का मालिक समझते हैं और यहाँ सन्यासी के नाम पर अपने लिए नौकर रखते हैं | मैंने वह परम्परा तोड़ दी थी | और इस बार भी जब वे आये और मैं उनकी खातिर दारी के लिए नहीं पहुँचा तब उन्हें बुरा लगा कि एक नौकर कि मालिक के आने पर भी नहीं आया.... तो उनहोंने आश्रम एक अध्यक्ष को कहा कि मुझे तुरंत आश्रम से बाहर निकाल दो.. इतने सारे लोग आये और वे मुझसे सीधे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए आश्चर्य की बात थी |

तो अभी अध्यक्ष महोदय ने मुझे बुलाया और कहा कि तुम पूरी वाले आश्रम में चले जाओ, तुम्हारे कारण मुझे बहुत भला-बुरा सुनना पड़ा | मैंने कहा कि वे हैं कौन जो आपको भला बुरा कहा गए ? मुझे बुलाया क्यों नहीं, वहीँ उनको समझा देता ढंग से... अब वे चले गये तो आप मुझे बता रहे हो ? खैर आप क्या चाहते हैं चला जाऊं ?

वे बोले देखो हमको किसी से लड़ाई झगड़ा नहीं करना है.... मैंने कहा कि पहले आप मुझे यह बताये कि वे किस अधिकार से कह रहे हैं मुझे निकालने के लिए ? इतने साल में तो उनकी आवाज नहीं निकली और अब.... खैर ठीक है मैं चला जाता हूँ लेकिन आपके पूरी वाले आश्रम में नहीं | मैं स्वतंत्र व्यक्तित्व हूँ और ईश्वर आज तक मेरी देख रेख करता आया है, आगे भी करेगा | हरिद्वार से निकलना था तो आपको भेजा था, और मेरा आपसे परिचय केवल एक दिन का ही हुआ था उस समय | इसी प्रकार अब यदि ईश्वर ने चाहा तो मेरे व्यवस्था हो जाएगी लेकिन मैं आप लोगों से हमेशा के लिए सम्बन्ध समाप्त कर लूँगा, जैसा कि मैं आज तक करता आया हूँ | मैं जिस जगह को छोड़ देता हूँ, फिर उस जगह से सम्बन्ध नहीं रखता |

तो इस प्रकार आपने देखा कि कैसे स्वप्न का महत्व है मेरे जीवन में | लेकिन यह शुरुआत है अर्थात स्वप्न का पहला भाग... आगे क्या होता है वह भी आपको बताऊंगा | ~विशुद्ध
चैतन्य

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12 मई 2015

शरीर और भावनाओं को अपनी आँखों की पलकों की तरह सहज सरल हो जाने दीजिये

कहते हैं कि कर्म कर फल की चिंता न कर |

लेकिन कर्म होगा तो फल तो होगा ही, अच्छा हो या बुरा हो | बिना फल के कोई कर्म नहीं होता और न ही बिना फल की इच्छा के कोई कर्म होता है | ये दोनों एक दूसरे से जुड़े ही हुए हैं |

किसान अच्छी फसल की कामना के लिए कर्म करता है खेतों पर, यदि उसे फसल न उगानी हो तो खेती ही क्यों करेगा ?

लोग नौकरी करते हैं तनखा के लिए, तनखा ही न मिले तो कोई नौकरी करेगा ही क्यों ?

लोग सेवा करते हैं पुण्य, धन या सम्मान पाने के लिए, यदि ये सब नहीं मिलेंगे तो कोई सेवा करेगा ही क्यों ?

लेकिन जब हम कर्म और फल के बंधन से स्वयं को मुक्त कर लेते हैं, तब सजगता का मार्ग शुरू हो जाता है | तब हम कर्म नहीं करते, कर्म होते हैं स्वतः ही, जैसे आप कहीं जा रहे हों और कोई बच्चा राह में गिरता हुआ दिखे तो आप स्वतः ही उसे बढ़कर सम्भाल लेंगे | यह हुआ कर्म लेकिन आप करता नहीं हुए केवल आपका शरीर माध्यम हुआ उस अज्ञात का जिसने वह कर्म करवाया | आप तो किसी और ध्यान में खोये हुए थे तब आपको तो बाद में पता चला जब सब कुछ हो गया | यदि आप स्वयं करते तो आपका दिमाग मोल भाव करता, आपका दिमाग लाभ हानि देखता |

इसी प्रकार जब आप पर अचानक कोई आक्रमण कर दे, तब आपका शरीर तुरंत प्रतिक्रिया करता है आत्मरक्षार्थ | यहाँ भी आप करता नहीं है, केवल आपके शरीर का प्रयोग हुआ ठीक वैसे ही जैसे, आँखों की पलकें आपकी आखों कि सुरक्षा करती हैं आपके जाने बिना ही | आप में से कितने हैं जो अपनी पलकों को अपनी इच्छा से आकस्मिक परिस्थतियों में बंद कर पाते हैं ? शायद एक भी नहीं, आपको पता चलने से पहले ही आपकी आँखें स्वतः बंद हो जाती हैं कोई चीज आपकी आँखों की तरफ अचानक आये |

तो अपने शरीर और भावनाओं को अपनी आँखों की पलकों की तरह सहज सरल हो जाने दीजिये | यह कर्म और फल के झंझट में जब तक रहेंगे, उलझन बनी ही रहेंगी | अपने आस पास ही देख लीजिये या स्वयं को ही देख लीजिये.. आज से दस साल पहले आपकी आय कितनी थी और आज कितनी है.... शायद आज अधिक ही होगी, लेकिन समस्या वहीँ की वहीँ हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

15 फ़रवरी 2015

प्राचीन ऋषि-मुनि और कर्मकांडी पुरोहितों में बहुत अंतर था

पृथ्वी को विष्णु ने समुद्र से बाहर निकाला.... यह किसी भी पढ़े-लिखे की समझ से बाहर है | पृथ्वी में ही समुद्र है तो पृथ्वी को समुद्र से बाहर कैसे निकाला जा सकता है ?

धर्मों के ठेकेदार भी चूँकि पढ़े-लिखे ही होते हैं और अधिकाँश तो रट्टू तोते ही होते हैं तो वे ऐसे विषयों पर स्थिति को स्पष्ट करने के स्थान पर गाली-गलौज करने लगते हैं या हिन्दू धर्म खतरे में है का शोर मचाने लगते हैं ताकि कोई उन पर यह आरोप न लगा दे कि उसे कुछ पता नहीं है |

प्राचीन ऋषि-मुनि और कर्मकांडी पुरोहितों में बहुत अंतर था | ऋषि-मुनि प्रयोग करते थे और वे पंडितों और वर्तमान धर्मों के ठेकेदारों की तरह किसी पर कुछ थोपते नहीं थे और न ही किसी मत या मान्यताओं का विरोध या निंदा करते थे | वे सभी के प्रति उदारता रखते थे और स्वयं समझते थे, प्रयोग करके देखते थे और फिर जो सार्थक होते थे उन्हें वे कथाओं और काव्यों में आम जन तक पहुँचाते थे | इस प्रकार वे जन सामान्य तक अपनी बात पहुंचाने में सफल होते थे और लोगों को याद रखने में भी कठिनाई नहीं होती थी |

28 दिसंबर 2014

उसके नौकर ने दूध में जहर देकर उसकी हत्या कर दी थी

दिल्ली जहांगीरपुरी की रहने वाली 9 साल की निशा ने अपने पुनर्जन्म की बात करके सबको चौंका दिया।

उसका कहना है कि वह मुजफ्फरनगर के खतौली की रहने वाली थी। उसने दावा किया कि जब वह सोलह साल की थी, तब उसके नौकर ने दूध में जहर देकर उसकी हत्या कर दी थी और शव को खतौली की गंगनहर में फेंक दिया था।

07 दिसंबर 2014

फर्रे बाज विद्वान


अकसर ऐसे महान विद्वानों से मेरी भेंट हो जाती है, जो बात-बात पर श्रीकृष्ण ने कहा था...श्री राम ने कहा था..... कहकर ही अपनी बात कहते हैं | मेरी समझ में यह नहीं आता कि राम और कृष्ण जो कुछ कहा अपने अनुभव व ज्ञान से कहा, लेकिन अब उनको दोहराने का क्या अर्थ ?

इसका अर्थ तो यही हुआ कि उनके बाद किसी ने भी आध्यत्मिक उन्नति नहीं की | सभी की स्थिति उन बच्चों सी हो गयी जो किसी होनहार मेहनती पढ़ाकू बच्चे से दोस्ती कर लेते थे और हर परीक्षा में उसी के दिए फर्रे से पास होते रहे | कभी खुद कोई पढ़ाई नहीं करते थे | अब जब उस पढ़ाकू छात्र को स्कूल छोड़े कई पीढ़ियाँ बीत गयी..... स्कूलों के मास्टर और विषय बदले भी कई सदियाँ बीत गईं.... लेकिन फर्रे वही चला रहें आज तक क्योंकि उस समय उसी फर्रे से पास हुए थे | उसी की फोटो कापियाँ बांटी जा रहीं हैं, बिना यह जाने की विषय कौन सा है और माध्यम अंग्रेजी है, हिंदी हैं या संस्कृत है |

अब कोई कभी पकड़ा जाता या फेल हो जाता है, तो लड़ने मरने पर आ जाते हैं कि हमारे इतने होनहार विद्वान् छात्र की निंदा की | या फिर सुविचार सुना देते हैं, "जिस इंसान को बुराई ढूँढने की आदत हो, उसे हर किसी में बुराई ही नजर आती है.....बस नजरिये का फर्क है |" चोर भी यही कहता फिर रहा है, घोटाले बाज भी यही कहते फिर रहें हैं, लुटेरे और ठग भी यही कहते फिर रहें हैं..... और बेचारे ईमानदार और सभ्य लोग शर्म से गड़कर उन्हें यह कहते हुए खुले आम उपद्रव की छूट दे रहें है, "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय....!" जबकि दोनों ही यह नहीं कहते कि हम उस लायक छात्र के पैरों की धुल के बराबर भी नहीं पहुँचे | लेकिन फर्रे चलाने की खानदानी दक्षता के चलते धर्म, न्याय और नैतिकता के ठेकेदार बने हुए हैं |

श्री कृष्ण ने कहा था, जो हुआ अच्छा हुआ..... लेकिन राम और कृष्ण की दुहाई देने वाले ही इतिहास खोद खोद कर जख्मों को कुरेदने में लगे हुए हैं | कारण केवल इतना कि जो वे गीता के उपदेश बाँचते फिरते हैं, अर्थ ही उनके कभी समझ में नहीं आया |

यहाँ यदि मैं अपनी समझ की बात करूँ तो गीता में जो कहा गया की जो हुआ अच्छा हुआ.... उसका बहुत स्पष्ट अर्थ यह है कि भूतकाल में जो भी गलतियाँ हुईं उनसे आपने कुछ सीखा, यदि आपने दुःख पाया तब तो दुःख को समझा और अब स्वयं ऐसा कोई कार्य नहीं करोगे जिससे किसी और को दुःख पहुँचे | लेकिन यहाँ तो लोग दुःख पहुँचाना तो किसी गिनती में गिनते ही नहीं हैं, बल्कि लाशें कैसे बिछाई जाएँ उसके उपाय करने में लगे हुए हैं | कैसे गीता और रामायण के नाम पर राष्ट्र को फिर खंडित किया जाए, इसके उपाय में लगे हुए हैं | कैसे फिर से नरसंहार हो इस देश में इसी उधेड़बुन में लगे हुए रात-दिन |

ये तथाकथित धार्मिक मुर्ख यह नहीं जानते कि श्रीकृष्ण से अधिक ज्ञानी वे कभी नहीं हो सकते क्योंकि वे फर्रे चलाकर विद्वान् नहीं बने थे | और यदि उनकी विद्वता का सम्मान करते हो तो ये धर्म के नाम पर द्वेष व अराजकता का प्रचार बंद कर दो | क्योंकि यदि हम आपस में लड़ते रहेंगे तो कभी भी विकसित नहीं हो पाएंगे | ना आध्यात्मिक उन्नति होगी कभी और न ही भौतिक | -विशुद्ध चैतन्य




गीता - सार

क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सक्ता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।

जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।

तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।

खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।

परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।

न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है - फिर तुम क्या हो?

तुम अपने आपको भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।

जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आन्दन अनुभव करेगा।

01 नवंबर 2014

जब तक आप स्वयं से परिचित नहीं होते, तब तक आप भटकते रहते हैं स्वयं की खोज में....

Since age seven, fifth-grader Shyanne Roberts has had one passion - firing guns.

Now aged 10 she has become a sensation in competitive shooting tournaments across the United States, using a weapon painted in her favorite colors, purple and black. And despite the perceived dangers, the Franklinville, New Jersey, girl believes: 'Kids and guns don't always mean bad things happen.'

बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं, जिनके माँ-बाप समझदार होते हैं | या फिर वे सौभाग्यशाली लोग होते हैं, जो अपने लक्ष्य के प्रति सचेत रहते हैं और अपने माँ-बाप को चुनने का अवसर ईश्वर उन्हें देता है | कुछ लोगों को माँ-बाप सहयोगी न भी मिले तो परिवार या वातावरण ऐसा मिल जाता है, जिससे उन्हें अपने पूर्वजन्म के अधूरे सपने को पूरा करने में सहयोग मिलता है | ऐसे लोग बचपन से ही अपने लक्ष्य के प्रति सजग रहते हैं और किसी प्रकार की दुविधा में नहीं रहते | फिर चाहे वह सचिन तेंदुलकर हो, या सुनिधि चौहान या मोज़ार्ट, या जीसस या गौतम बुद्ध या विवेकानंद या ओशो..... |

जब हम मृत्यु के समय होशपूर्ण रहते हैं तब अगले जन्म के उद्देश्य के प्रति भी सजग रहते हैं | कई बार आपने देखा होगा कि बच्चे किसी विशेष विषय या उपकरणों में अधिक रूचि रखता है | अधिकाँश माँ-बाप उस पर ध्यान नहीं देते क्योंकि उन्हें तो स्वयं का भी कोई भान नहीं होता कि वे दुनिया में क्यों आयें हैं | बच्चों के रूचि के प्रति जो माँ-बाप जागरूक रहते हैं और सजगता से उनकी गतिविधियों पर ध्यान देते हैं, वे आसानी से समझ सकते हैं कि उनके बच्चे दुनिया में क्यों आयें हैं और उनके जीवन का उद्देश्य क्या है |

बचपन में एक फिल्म देखी थी 'कच्चे धागे', उसमें डाकुओं के सरदार के घर बच्चा जन्म लेता है | बच्चा जब घुटनों के बल चलाना शुरू कर देता है, तब उसके पास भिन्न भिन्न खिलौने रख देते हैं | बच्चा धीरे धीरे उन खिलौनों के तरफ बढ़ता है और बन्दुकनुमा खिलौना उठा लेता है | इसी प्रकार मेरी माँ भी करती थीं और हम चार भाई बहनों में जिसकी जो रूचि थी उसे ही प्रोत्साहित करती थीं | कभी दूसरे से हमारी तुलना नहीं करतीं थीं | मुझे तो दो तीन वर्ष ही मिले अपने माँ से परिचय का क्योंकि जब मैं मात्र नौ वर्ष का था, तब उनका देहांत हो गया था |शायद यही कारण है कि थोड़ी देर से ही सही, भटकते हुए है सही, मुझे अपने आपको पहचानने में पूरा जीवन नहीं बीता |

माँ-बाप अक्सर दूसरे बच्चों से अपने बच्चों की तुलना करते हैं और उनकी ही तरह बनाना चाहते हैं, बहुत ही कम माँ-बाप ऐसे होते हैं जो बच्चे को वही बनता हुआ देखना चाहते हैं जो वह बनने के लिए आया है | यूफोरिया के मुख्य गायक पलाश सेन से एक दिन मेरी बात हो रही थी तब उन्होंने बताया कि उनके माता पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें इसलिए डॉक्टर की पढ़ाई की लेकिन मुझे गाने का शौक था बचपन से और मैं सिंगर बनना चाहता था | मैंने माता-पिता की इच्छा पूरी की और अब अपनी इच्छा पूरी कर रहा हूँ और जब भी कहीं गाने का अवसर मिलता है मैं नहीं चूकता | यह बात तब की है जब वे कोई जाना माना नाम नहीं थे | सुनिधि चौहान से मेरी भेंट तब हुई थी, जब वह मात्र दस-ग्यारह वर्ष की थीं |

हम कहते हैं कि समाज ही आज बिगड़ गया है, लड़के आवारागर्दी करते फिरते हैं, या दंगा या बलात्कार के आरोपों में जेल में पड़े हुए हैं | कुछ लोग पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और बेरोजगारों की कतार में खड़ें हैं | क्योंकि माँ-बाप और रिश्तेदारों ने उनको उनके उस लक्ष्य से भटका दिया, जिनके लिए वे आये थे | पाँच से सात वर्ष की आयु तक ही किसी को अपने पूर्व जन्म की हल्की याद रह पाती है, लेकिन उसके बाद वह भी भूल जाता है | कई बार नौकरी मिल भी जाती है तो भी मन बेचैन रहता है कि कहीं कुछ कमी रह गयी है और उस कमी को पूरी करने के लिए वह दिन रात एक कर देता है | न ठीक से सो पाता है और न ही अपने बच्चों और परिवार के साथ समय बिता पाता है | शराब और पार्टियों में ही अधिकाँश समय बिताने का प्रयास करता है | परिणाम यह होता है कि उनके बच्चे भी भटक जाते हैं और इसी प्रकार समाज विकृत होता चला जाता है |

जो स्वयं से परिचित हो जाते हैं समय पर, वे तो सहयोगी हो जाते हैं परिवार व समाज के | लेकिन जो नहीं हो पाते, वे दुमछल्ले बन जाते हैं या ईश्वर की खोज में जंगल और आश्रमों में निकल जाते हैं | जो अपनी उलझन किसी को समझा नहीं पाते या कोई ऐसा नहीं मिलता जो उसे समझ सके तो वह नशे का आदि बन जाता है या समाज से इतनी घृणा करने लगता है कि असामाजिक तत्वों के रूप में जाना जाना ही पसंद करता है |

यदि आप भी ऐसा मानते हैं कि आप भी भटक गए हैं परिस्थिति वश तो अपने बचपन में वापस लौटिये और स्वयं को खोजिये | हो सकता है कि जो मुखौटा लगाकर आप अभी जी रहें हैं, और जिसे अब अपना ही रूप मान रहें हैं वह निकाल फेंकने में आपको सफलता मिल जाये | आप भी अपने आदर्श व्यक्तित्व से हाथ मिला पाने में सफल हो सकें, लेकिन एक दुमछल्ले की तरह नहीं, बल्कि अपने स्वयं के आस्तित्व व व्यक्तित्व के साथ | जैसे सुभाष चन्द्र बोस ने हाथ मिलाया था हिटलर से |


"जब तक आप स्वयं से परिचित नहीं हो जाते, तब तक आप भटकते हैं स्वयं की खोज में और कहते हैं कि ईश्वर की ख़ोज में भटक रहें हैं |"-विशुद्ध चैतन्य

07 अक्टूबर 2014

कई बार ऐसी घटना को coincidence या संयोग कह कर हम टाल देते हैं |


Miracle या चमत्कार एक ऐसी घटना है, जो पढ़े-लिखों और डिग्रीधारियों के लिए वहम या अन्धविश्वास से अधिक कुछ नहीं है | अभी मैं जो कुछ लिखने जा रहा हूँ, वह केवल अनपढ़ों की ही समझ में आ सकता है, इसलिए पढ़े-लिखे और किताबी ज्ञान का कबाड़ समेटे विद्वान इस पोस्ट को समझने में अपनी उर्जा व्यर्थ न करें |
अधिकाँश लोगों को का मानना है कि चमत्कार कोई जादूगर या कोई सिद्ध बाबा या ईश्वर ही दिखा सकता है, या उनके ही जीवन में घटित होता है | जबकि चमत्कार तो प्रत्येक के जीवन में सामान्य रूप में घटित होता है, लेकिन हम अपनी ही उलझनों में इस कदर उलझे हुए रहते हैं कि कभी इस और ध्यान देते ही नहीं है | कई बार ऐसी घटना को coincidence या संयोग कह कर हम टाल देते हैं | उदाहरण के लिए आप को कहीं किसी आवश्यक काम से बाहर जाना है, और कोई साधन उपलब्ध न हो पा रहा हो, ठीक उसी समय कोई कार या स्कूटर आकर आपके पास रूकती है, और एक पता पूछती है... आप पता बता देते हैं...और वह कहता है कि चलिए आपको आगे तक छोड़ देता हूँ.... आप यह सोच कर आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि उसने जो पता पूछा था, उसी जगह के आसपास का था, जहाँ आपको जाना था | लेकिन आप चूँकि पढ़े-लिखे हैं इसलिए इसे अनदेखा कर देते हैं और कई लोग तो ईश्वर को धन्यवाद भी नहीं कहते |

मैं यही प्रयोग कई वर्षों से कर रहा हूँ और समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि क्या वास्तव में मिरेकल सामान्य घटना है या कोई विशेष व्यक्ति ही इसका सुख भोग पाता है | मैं तो साधारण सा अनपढ़ सन्यासी हूँ और रिद्धि सिद्धि भी नहीं है मेरे पास | न कोई जादू जानता हूँ और न ही कोई चमत्कार | मुझसे तो अच्छे वे पंडित हैं, जो चेहरा देखकर आपके मन की बात बता देते हैं, मैं तो वह भी नहीं जानता | लेकिन मेरे साथ ऐसा हमेशा होता रहा जिसे चमत्कार कह सकता हूँ | जैसे मैंने अपने एक पोस्ट में अपने साथ घटी एक घटना लिखी थी कि कैसे मैं भूखा एक स्टेशन में घूम रहा था और कोई आकर मुझे खाना खिला गया और भी ऐसी कई घटनाएं मैंने अपने पोस्ट में समय समय पर बतायीं हैं |

कहते हैं कि ऐसी घटनाएँ घटने पर न बताया करें क्योंकि ये अलौकिक शक्तियां हैं और बताने से घटने लगती हैं | बात तो सही है, लेकिन मैं तो सन्यासी हूँ इन शक्तियों के घटने से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला मुझे | अधिक से अधिक मैं फिर फूटपाथ में आ जाऊंगा और कुछ नहीं होगा | लेकिन मैं अभी हाल ही की घटना बताने जा रहा हूँ, कल मैं यही कहानी सुनाऊंगा तो आप कहेंगे कि मनगढ़ंत कहानी सुना रहा है बुड्ढा (तब तक मैं बूढ़ा हो चुका होऊंगा) | इसलिए वर्तमान की ही घटना बताता हूँ |

जिन लोगों ने उस पोस्ट को पढ़ा है, जिसमें मैंने कहा था कि आश्रम में एक निश्चित आय है और वह भी इतनी कम कि राशन के सिवा और कुछ नहीं लिया जा सकता और न ही किसी की कोई सहायता की जा सकती है उसमें से पैसे बचा कर | कोई ऐसा भक्त भी नहीं है कि आश्रम को नियमित दान देता हो......तो मैंने इस महीने का राशन न खरीदने का निर्णय लिया और हमारे सेवक को कुछ रूपये दे दिए ताकि उसकी समस्या हल हो सके | सभी को मेरा यह निर्णय बहुत ही बुरा लगा क्योंकि भजन पूजन हो न हो, ध्यान साधना हो न हो, लेकिन खाने में कटौती किसी को पसंद नहीं आई | लेकिन मैंने निर्णय ले लिया था सो वे अब कुछ कह भी नहीं सकते थे | तो हुआ यह कि जो थोड़े से पैसे बचे थे, वे भी मैंने स्वामी जी (आश्रम के अधिकृत प्रबंधक) को दे दिए | तय यह हुआ कि इससे चावल ले आयेंगे और आलू ले आएंगे | इससे महीने भर एक वक्त का खाना बन जाएगा और रात में चिउड़ा और मूरी खा कर काम चला लेंगे | स्वामी जी की एक समस्या यह भी थी कि रसोइया भी छुट्टी पर चला जायेगा तो खाना कौन बनाएगा |

अब देखिये कि रसोइया के जाने के दूसरे दिन ही कुछ श्रृद्धालू परिवार सहित आश्रम में ठहरने आ गये | उनके साथ आयी स्त्रियों ने रसोई संभाल लिया और सब्जियां आदि वे लेकर आने लगे | वर्षो के बाद मुझे किसी स्त्री के हाथ का बना खाने को मिला, नहीं तो ढाबे में भी पुरुष ही खाना बनाते है... तो जो समस्या थी खाने पीने की वह सुलझ गयी | मेरे लिए तो कोई अधिक अंतर नहीं पड़ा क्योंकि मैं तो २४ घंटे में केवल एक बार ही भोजन ले रहा हूँ आजकल | लेकिन बाकी लोग जो खाने पीने की कटौती से घबरा गए थे, उनके लिए तो वे लोग भगवान् हो गये, क्योंकि दोनों समय खाना मिल रहा है अब और कोई कटौती भी नहीं हुई | वही तीन चार सब्जियाँ और वह सब कुछ....

तो यह घटना क्या यह सिद्ध नहीं करती कि यदि आप निःस्वार्थ भाव से किसी का सहयोग करते हैं (जैसा कि मैंने एक सेवक का सहयोग किया) तो प्रकृति स्वयं आपकी सहयोगी हो जाती है ? ऐसे कई घटनाएँ आश्रम में घटीं और लोगों को समझाने का भी प्रयास किया, लेकिन ये मुर्ख लोग नहीं समझते | इनको तो बस खाने से मतलब है | न तो ये ध्यान आदि के प्रयोग में कोई साथ देते हैं और न ही ध्यान आदि को समझने के लिए कभी प्रयास करते हैं | ऊपर से मुझे ही समझा रहे हैं कि ध्यान आदि बकवास चीज है, घंटे घडियाल लेकर संकीर्तन करना ही सत्य है | ठाकुर की प्रतिमा को भोग लगाओ खुद खाओ या न खाओ | किसी और की चिंता मत करो अपनी भलाई पर ध्यान दो... खैर.. ये इनकी धारणा है और सौ साल से ऐसे ही जी रहें हैं तो इतनी आसानी से बदलने वाली तो है नहीं | यदि ये लोग ध्यान आदि करते तो आज यह आश्रम और ठाकुर दयानंद जी के मिशन का समाधिस्थल न बन गया होता |

अब यहाँ जो घटना मैंने आपको बताई वह सिद्ध कर रही है कि यदि आप स्वयं से परिचित हैं, तो आप की समस्या आसानी से प्रकृति को समझ में आ जाती है | क्योंकि प्रकृति आपके साथ समन्वय रखती है | इसलिए प्रकृति के साथ रहिये चिंता यह मत कीजिए कि आपको क्या लाभ मिला, चिंता यह करिए कि आपके माध्यम से दूसरों को कितना लाभ मिला | चाहे वह अलौकिक शक्ति हो, या अध्यात्मिक... या कुछ और | यदि आप उन शक्तियों को जनकल्याण में लगाते हैं तो हो सकता है इस जन्म में आपको कोई लाभ न दिखे... (जैसे मैं कह सकता हूँ कि मुझे तो कोई लाभ (आर्थिक) नहीं मिल रहा).. लेकिन भविष्य में या अगले जन्म में दूसरों के सहयोगी होने के कारण आपको भी मुसीबत में सहयोगी मिल जायेंगे |

यदि अभी भी आप मानते हैं कि मिरेकल आपके जीवन में नहीं घटता तो, जरा फलैशबैक में जाइए और आपको पता चलेगा कि आपके जीवन में भी कितनी ही ऐसी घटनाएं घटीं, जो आशचर्य से कम नहीं रहीं | -विशुद्ध चैतन्य

उन सभी को धन्यवाद जो इतनी लम्बी पोस्ट पढने का साहस जुटा पाए | :)

06 अक्टूबर 2014

यदि आप भी अपने भाग्य को अपने अनुसार चलाना चाहते हैं, तो नकल मत कीजिये



भाग्य वास्तव में है क्या, यह हमेशा मेरे लिए एक रहस्य रहा था | क्योंकि जैसा मेरी कुंडली के अनुसार बताया गया, वैसा तो कुछ हुआ नहीं | या तो लोगों को कुंडली पढ़ना नहीं आया या फिर मेरे जैसे सरफिरों की कुण्डली समझना किसी सामान्य ज्योतिषी के बस की बात नहीं थी.... जो भी हो, कुण्डली देखने वालों ने जो बताया वैसा कुछ नहीं हुआ | न तो धन समृद्धि मिली और न ही अच्छी पत्नी... पत्नी तो छोडिये, कोई ऐसा भी नहीं मिला जो मुझे समझ पाया या जिसको मैं अपनी बात समझा पाया | तो फिर भाग्य वास्तव में क्या है ?

अब यदि मैं कहता हूँ कि जो कुंडली के अनुसार होना चाहिए था वह नहीं हुआ, लेकिन जो कुछ मैंने चाहा वह वह सब हुआ, तो फिर क्या भाग्य मेरे ही हाथ में था ? यदि मेरे ही हाथ में था तो मैं अपने लिए जीवन साथी क्यों नहीं ढूंढ पाया ? फिर प्रश्न वहीँ कि क्या जीवन साथी की तलाश ही मेरे जीवन का उद्देश्य था, क्या यही मैं चाहता था ? शायद नहीं | यदि यही मेरा उद्देश्य होता तो जैसे सबकुछ पाया वैसे ही उसे भी पा लेता |

तो फिर भाग्य क्या है ? जब मेरे चाहने और न चाहने से कोई चीज मिलती है तो भाग्य का योगदान कहाँ रहा ?

कई ऐसे लोगों को देखता हूँ, जिनकी शिकायत होती है कि भाग्य ने उन्हें कुछ नहीं दिया या उनका भाग्य खराब है | अभी कल ही किसी ने मुझे फोन किया और पूछा स्वामीजी जिस नौकरी को पाने की मैं तैयारी कर रहा हूँ वह मुझे मिल जाएगी न ? मेरे सर पर बहुत कर्ज हो गया है, क्या वह उतर जाएगा ?

मुझे हँसी आ गयी क्योंकि कर्जा तो अपने सर के ऊपर से टाटा, अम्बानी, माल्या और सुब्रोतो नहीं उतार पाए, भारत और अमेरिका स्वयं कर्जों में दबे हुए हैं, जब वे नहीं उतार पाए तो आम आदमी कैसे उतार लेगा भला ? अब कर्जा लो आप और आ जाओ मेरे पास कि स्वामी जी कर्जा उतारने का उपाय बताइये... तो यह तो ठीक नहीं है भाई | इसमें भाग्य को काहे कोसते हो ? भाग्य का मतलब यह तो नहीं कि किसी ने कहा कि भविष्य बहुत उज्जवल है, तो आप कर्जा उठाना शुरू कर दो ?

आप पढ़ाई कर रहें हैं अच्छी नौकरी के लिए तो संशय क्यों है कि मिलेगी या नहीं ? पहले स्वयं से पूछिये कि क्या आपके जीवन का उद्देश्य नौकरी करना ही है क्या ? आप पैदा हुए नौकर बनने के लिए ? आप पढाई भी कर रहें हैं ज्ञान पाने के लिए नहीं, बल्कि नौकरी पाने के लिए | तो जब आपका जीवन का उद्देश्य ही है नौकरी तो संशय नहीं होना चाहिए कि मिलेगी या नहीं, क्योंकि नौकरी तो मिलेगी ही जो आपकी योग्यता होगी उसके अनुसार | इसमें भाग्य का कोई लेना देना नहीं है...इसलिए भाग्य को इन विषयों में बीच में लाना ठीक नहीं है |

मैंने जो अनुभव से जाना वह यह कि भाग्य वास्तव में आपके ही कर्मों का फल होता है और कुछ नहीं | जैसे आपने आम का पेड़ लगाया और उसमें आम के फल आ जाएँ तो यह आपका भाग्य है और यदि उसमें बैंगन आ जाए तो आपका दुर्भाग्य | लेकिन हो सकता है आप अक्लमंद हों और बेंगन बेचने लगें तो वही आपका सौभाग्य बन जाएगा |

फिर प्रश्न उठता है कि कई लोग बहुत मेहनत करने के बाद भी सफल नहीं हो पाते तो दोष तो भाग्य का ही है ?

मैं कहूँगा कि नहीं दोष भाग्य का नहीं है, दोष है आपके भीतर बैठी उस अवधारणा का कि आप योग्य नहीं हैं | यदि आप दूसरों की देखा देखी पढ़ाई के लिए कोई विषय चुनते हैं क्योंकि किसीने उसी विषय में पढ़ाई करके अच्छी नौकरी प्राप्त की थी, तो आप दूसरे के जूते में पैर रखकर मंजिल को पाना चाहते हैं | जबकि आपकी मंजिल कुछ और है | जैसे किसी को मुंबई जाना हो और चेन्नई जाने वाले किसी यात्री का टिकट हथिया लिया और बैठ गये चेन्नई की ट्रेन में, तो आप वाया चेन्नई ही मुंबई जायेंगे | इसमें दोगुना समय और पैसा बर्बाद हो जाएगा | अब आप भाग्य को दोष देंगे तो सही नहीं है | और हम सभी यही करते रहते हैं अपनी आधी जिंदगी तक | क्योंकि हम अपने स्वयं के दिशानिर्देश को महत्व नहीं देते, बल्कि दूसरों पर अधिक निर्भर रहते हैं | कारण यही है कि माँ बाप बचपन से आपको स्वयं से परिचित होने नहीं देते और हमेशा दूसरों का उदाहरण देते रहते हैं और तब तक देते रहते हैं, जब तक आप दूसरों की नकल करना नहीं शुरू कर देते | एक दिन ऐसा आ जाता है कि आपको स्वयं के आस्तित्व पर ही विश्वास नहीं रहता और आप किसी नेता या अभिनेता या बाबा आदि को अपने चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं | कई लोग हैं जो अपनी स्वयं की तस्वीर से अधिक किसी नेता-अभिनेता या संत-महंत की तस्वीर को महत्व देते हैं, अपनी प्रोफाइल में भी वही तस्वीर लगाते हैं | क्योंकि वे अपना अस्तित्व खो चुके होते हैं | ये वे लोग होते हैं जो दूसरों के जूतों में पैर डालकर चलने के आदि हो चुके होते हैं और इन्हें पता ही नहीं होता कि उनके अपने पैर का वास्तविक साइज़ क्या है | मैं ऐसे लोगों को दुमछल्ला कहता हूँ |

इस प्रकार के लोग कितनी ही मेहनत कर लें, वह नहीं पा सकते जिसके लिए उनका जन्म हुआ क्योंकि ये तो यही भूल चुके होते हैं कि ये वास्तव में हैं कौन | इनमें से कुछ स्वयं को आमिरखान समझते हैं तो कुछ शाहरुख़, कुछ मोदी समझते हैं तो कुछ मन्नू, कुछ तेंदुलकर समझते हैं, तो कुछ गावस्कर... लेकिन स्वयं को नहीं समझते कि ये स्वयं वास्तव में हैं कौन |

तो भाग्य कर्म पर आधारित है और कर्म वह जो दिल से किया गया हो न कि केवल दिमाग से | जैसे आपकी रूचि चित्रकारी की है या संगीत में है, तो आप उसे सीखते हैं, कई कई घंटे उसपर अभ्यास करते हैं, तो एक दिन आप उसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेंगे आसानी से | यहाँ भाग्य आपके ही पक्ष में रहेगा | लेकिन आप संगीत सीख तो रहें हैं, लेकिन लोग आपको कह रहें हैं कि इंजिनीरिंग करने से बहुत फायदा है तो आप इंजीनियरिंग भी करने लगते हैं, ऐसे में आप अपने सबकॉन्शियस को दुविधा में डाल देते हैं है और आप न घर के रहते हैं और न घाट के | आप नौकरी करते हैं हैं लेकिन नौकरी में मन नहीं लगता | आप संगीत बजाते हैं, लेकिन वह भाव नहीं निकलता, चित्रकारी करते हैं तो चित्रों में जान नहीं पड़ती.... सब कुछ बिखरा सा हुआ लगने लगता है | हाँ यह हो जाता है कि आपकी दाल रोटी चल पड़ती है, लेकिन फिर आप कोल्हू के बैल सा जीवन जीते हैं | (जरा अपने आप से प्रश्न कीजिये कि क्या मैं गलत कह रहा हूँ, क्या यही स्थिति आपकी इस समय नहीं है ?)

मैं अपने जीवन में ऐसा कोई भी काम नहीं किया, जो मुझे मन मारकर करना पड़ा और यदि करना भी चाहा तो हो नहीं पाया | मैंने वही किया जो मैंने करना चाहा, चाहे वह संगीत हो, चाहे तांत्रिक क्रिया हो, चाहे नौकरी हो..... सभी अपनी ही शर्तों पर | मैं चौबीस साल तक इतना सहिष्णु था कि दूसरों की सलाह मान भी लेता था लेकिन उसके बाद मैंने वह सलाह कभी नहीं मानी जो मेरी आत्मा ने नकार दिया | क्योंकि मैंने तय किया था कि मैं २४ साल की उम्र तक हर हाल में शादी कर लूँगा ...लेकिन परिवार ने ऐसा होने नहीं दिया | उनका मानना था कि मेरे जैसे योग्य व्यक्ति के लिए रिश्ता किसी ऊँचे (धनी) घराने से होना चाहिए और उन्होंने वह रिश्ता तुडवा दिया जो मैंने खोजा था | मेरी गलती केवल यह रही कि मैंने यह समझा कि अपने हैं, मेरे शुभचिंतक हैं मेरा भला चाहते हैं | लेकिन मैं गलत था | मेरा भला मेरे सिवा और कोई नहीं समझ सकता इसलिए अब दूसरों की सलाह लेना बंद कर दिया | मैंने फुटपाथों पर जीवन बिताया, भिखारियों के साथ खाना खाया... लेकिन मुझे यह मंजूर था | स्वयं को जानने के लिए ठोकरें खाना मंजूर था | लेकिन भीख नहीं मांग पाया चाहे भूखा रहना पड़ा कई कई दिन | परिणाम यह हुआ कि आज भी मैं अपनी ही शर्तों पर जीता हूँ और लोग मेरा अनुकरण करने का प्रयास करते हैं | मैं सारे दिन अपने कमरे में पड़ा रहता हूँ तो यहाँ वर्षो से सन्यासी बने लोग भी मेरी ही तरह कमरे में पड़े रहने को सन्यासधर्म समझने लगे :)

वे ये नहीं जानते कि मैं कमरे में बैठे बैठे भी वह काम कर रहा हूँ जो एक सन्यासी को करना चाहिए | मैं लोगों को जागरूक करने का प्रयास तो कर ही रहा हूँ अपने बेसर-पैर के लेखों से ? यही काम एक संयासी पहले करते थे घर घर जाकर | मैं भी घर घर पहुँचाता हूँ और कई तो विदेश में भी मुझे पढ़ते हैं और समय समय पर सहयोग राशि भेजते रहते हैं, ताकि मैं इसी प्रकार लिखता रहूँ | तो क्या यह हर किसी के लिए संभव है कि वह इतनी शांत वातावरण प्राप्त कर पाए और वही करे जो उसे करना है ? बिलकुल संभव है, यदि वह स्वयं से परिचित है तब | लेकिन यदि मेरे नक़ल करने की कोशिश में पड़े तो हो सकता है सब कुछ गड़बड़ हो जाए | जैसे कि हमारे आश्रम के सन्यासी जो भोजन भजन और शयन के सिद्धांत पर सौ वर्षों से चलते आये और आज भजन करना आवश्यक नहीं समझते क्योंकि मैं भजन में नहीं बैठता | लेकिन मुझे हर वह सुख सुविधा प्राप्त हो जाती है जो इनको कभी नहीं मिली | इनको लगता है कि मेरी ही तरह ये भी पूजा पाठ, भजन कीर्तन नहीं करेंगे तो गाँव के लोग इनका भी वैसे ही सम्मान करेंगे जैसा मेरा करते हैं, तो ये भ्रम में हैं | इन्होने मेरे जूते में अपने पैर रखकर चलना शुरू किया है, इसका अर्थ यही है कि ये भी इतने वर्षों से भजन कीर्तन करने के बाद भी न तो ईश्वर को खोज पाए और न ही स्वयं को | तभी तो ये अपने पथ को छोड़कर मेरे पथ पर उतरने का प्रयास कर रहें है ? बिना यह जाने कि मैं भीतर क्या हूँ और बाहर दिखा क्या रहा हूँ |

इसलिए यदि आप भी अपने भाग्य को अपने अनुसार चलाना चाहते हैं, तो नकल मत कीजिये, स्वयं को समझिये और स्वयं के दिशानिर्देश पर ही चलिए | फिर चाहे दुनिया गालियाँ दे, फिर चाहे दुनिया आपसे आपका शरीर ही क्यों न छीन ले, चिंता मत कीजिये | यह शरीर भी एक दिन आपको वैसे भी छोड़ ही देना है | खोने या छिन जाने का भय मत कीजिये क्योंकि जो कुछ खोएगा या छीना जाएगा, वह सब आपका नहीं है | इसी जगत से लिया है आपने | लेकिन जो आपका है वह आपसे कोई छीन नहीं पायेगा | -विशुद्ध चैतन्य

07 सितंबर 2014

पूर्वजन्म पुनर्जन्म पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की धारणा है कि धर्म और देश इंसानों के बनाए हैं और कुदरत इनको कतई नहीं मानती।

भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले जन्म में कट्टर मुस्लिम थे। उनका नाम था सर सैय्यद अहमद खान। जी हां, वहीं सर सैय्यद अहमद जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी।

पिछले जन्म के सर सैय्यद अहमद और इस जन्म के नरेंद्र मोदी की शक्त सूरत, दाढी और आंखें ही एक जैसी नहीं हैं बल्कि उनके जीवन की घटनाएं भी चौंकाने वाली हद तक एक जैसी हैं। यह दावा किसी सिरफिले ने नहीं किया है बल्कि अमरीका में सानफ्रांसिस्को स्थित इंस्टीट्यूट फॉर दी इंटीग्रेशन आफ साइंस, इन्ट्यूशन एण्ड रिसर्च (आइआइएसआइएस) ने किया है।

इस संस्था ने पूरी दुनिया में अब तक करीब 20 हजार पुरुषों, बच्चों और यहां तक पशुओं के पुनर्जन्म पर भी अनेक अमरीकी विश्वविद्यालयों की मदद से शोध अध्ययन किए हैं और अनेक पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं।

मोदी इस जन्म में अभूतपूर्व ढंग से पूरे भारत को अपने पक्ष में करने में कामयाब हुए और अगर पूर्व जन्म शोधवेत्ताओं का दावा सही माना जाए तो मुसलमानों में एकता की अलख जगाकर और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना करके उन्होंने पिछले जन्म में भी कुछ ऐसा ही काम किया था।

पूनर्जन्म के मामलों पर शोध के दौरान एक धर्म में दूसरे, एक देश से दूसरे देश में और  से पुरुष या पुरुष से बनने के हजारों मामले इन विषयों पर शोध करने वालों ने पाए हैं और सबसे ज्यादा हैरत की बात यह पाई कि कोई व्यक्ति पिछले जन्म में जिस स्तर की प्रसिद्धि हासिल किए था उसी स्तर की कामयाबी पा लेता था।

आइआइएसआइएस ने एक शोध में पिछले जन्म में नरेंद्र मोदी क्या थे। इस पर काम करने के लिए विश्वविख्यात पुनर्जन्म वैज्ञानिक केविन रियर्सन की सेवाएं ली। केविन ने मिस्र के अहतुन रे नामक माध्यम की सहायता से मालूम किया कि पिछले जन्म में नरेंद्र मोदी ने सर सैय्यद अहमद खान के रूप में दुनिया भर के मुसलमानों की एकता, शैक्षिक प्रगति और अधिकारों के लिए काफी काम किया। वह तब भी दाढी रखते थे और उनका स्वरूप आज जैसा ही हुआ करता था।

उल्लेखनीय है कि सर सैय्यद अहमद खान ने ही यह अभियान चलाया था कि मुसलमानों को आधुनिक तालीम दी जानी चाहिए और लड़कियों को भी पढ़ाना चाहिए। उन्होंने ही बाद में यह विचार दिया कि मुसलमानों का भला एक पृथक राष्ट्र के गठन के बाद ही मुमकिन है। यही विचार अंतत: पाकिस्तान के गठन का कारण बना।

आइआइएसआइएस अनेक नामचीन शोध वैज्ञानिकों और परा-मनोविश्लेषकों की मदद से विज्ञान, पूर्वाभास और पुनर्जन्म समेत अनेक विषयों पर पिछले 30 साल से काम कर रही है और पूरी दुनिया में इसके लाखों समर्थक हैं। यह जानकर हैरत नहीं होनी चाहिए कि हर देश, धर्म और काल खंड में मृत्यु के बाद की दुनिया, पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को मानने वाले करोड़ों लोग मौजूद हैं।

आइआइएसआइएस.नेट की अपनी वेबसाईट आइआइएसआइएस.नेट पर पुनर्जन्म, पूर्वाभास और इससे जुड़े अनेक रोचक रहस्यों पर सप्रमाण बेशुमार जानकारी उपलब्ध है। दुनिया भर के इन विषयों के जानकार लेखक और विशेषज्ञ इससे जुडे हैं।

सैकड़ों अन्य कामयाब लोगों के बारे में किये गए शोध अध्ययनों में ऐसा ही धर्मातरण पाया गया है। सिर्फ एक बात सामान्य रही है कि कुदरत ने किसी को कुछ भी बना कर इस दुनिया में वापस भेजा मगर उसकी पिछले जन्म की काबलियत नहीं छीनी।

पुनर्जन्म पर शोध के बाद अमरीकी मनोवैज्ञानिक और वर्जीनिया विश्वविद्यालय के विख्यात प्रोफेसर डा. इयान स्टीवेंसन ने लगभग 3000 पुनर्जन्मों की पुष्टि की।
उनके इन अध्ययनों पर भी पुस्तकें छपीं। पुनर्जन्म के बारे में स्थापित और विश्व स्तर पर मान्य सिद्धांतों के मुताबिक पुन: जन्म लेने वालों में पूर्वजन्म की यादें, पूर्वजन्म की आदतें और दिलचस्पियां, शरीर पर पूर्व जन्म जैसे निशान. खानपान की रुचियां और सबसे बढ़कर पूर्वजन्म जैसा ही चेहरा मोहरा हुआ करता है।

आइआइएसआइएस के डा. वाल्टर सेमकिव ने भी दुनिया भर के मशहूर लोगों की पूर्व जन्म पर काम किया है। उनके मुताबिक भारतीय फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन पूर्व जन्म में भी बेहद कामयाब अभिनेता ही थे। तब वे शेक्सपियर नाटकों के अभिनेता एडविन बूथ थे। उनके उस जन्म में भी नाक नक्श और आखें पिछले जन्म में भी वर्तमान अमिताभ बच्चन जैसे ही थे। उनका एकमात्र उपलब्ध फोटो युवा अमिताभ जैसा ही लगता है।

डा. वालटर सेमकिव की पुस्तक में हिन्दुस्तान की अनेक हस्तियों के पूर्व जन्म पर शोध नतीजे दिए गए हैं। उनके मुताबिक भारत के राष्ट्रपति रहे मिसाइल मैन डा. अब्दुल कलाम पूर्व जन्म में भारत के मशहूर सेनानी टीपू सुलतान थे। उस रूप में भी वह अपने मौजूदा स्वरूप की खासियत अपनी खास हेयर स्टाइल जैसी पगड़ी ही पहना करते थे। पूर्व जन्म में भी टीपू एक तरह से मिसाइल मैन ही थे। युद्धों में पहली बार टीपू ने ही राकेटों का इस्तेमाल किया था।

पूरे संसार में हर देश और धर्मो को मानने वालों में पूर्वजन्म और पुनर्जन्म के मामले पाए जाते हैं। तिब्बतियों में तो दलाई लामा की तलाश ही इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर की जाती रही है।

आइआइएसआइएस के संस्थापक तथा पेशे से एक चिकित्सक डा.वाल्टर सेमकिव, एमडी शिक्षा प्राप्त हैं और दुनिया के सबसे विख्यात पुनर्जन्म विशेषज्ञ प्रोफेसर डा. इयान स्टीवेंसन के शिष्य हैं।

डा. वाल्टर सेमकिव ने लगभग 4000 लोगों से सम्बंधित पुनर्जन्म के आंकडों का अध्ययन किया है और इस विषय पर अनेक किताबें लिखीं। उनकी पुस्तक ,बोर्न अगेन, की अब तक 40 लाख प्रतियां अनेक भाषाओं में बिक चुकी हैं।

आइआइएसआइएस के अनेक शोध वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पिछले जन्म के मुसलमानों की भलाई के लिए जद्दोजहद करने वाले सर सैय्यद अहमद खान भले ही नरेन्द्र मोदी के रूप में जन्म लें या देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले टीपू सुलतान डा. एपीजे अब्दुल कलाम के रूप में मगर कुदरत द्वारा उनके जीवन दर्शन और लक्ष्य पूर्व निर्धारित ही हैं।

पूर्वजन्म पुनर्जन्म पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की धारणा है कि धर्म और देश इंसानों के बनाए हैं और कुदरत इनको कतई नहीं मानती। इन्हीं शोध अध्ययनों के मुताबिक मशहूर पिछले जन्म में टीपू सुलतान के पिता सुलतान हैदर अली की मिलेट्री साज सामान और राकेटों में बहुत दिलचस्पी थी। उनके नाम नक्श, शैली और जीवन रुचियां भारत के अन्तरिक्ष वैज्ञानिक डा. विक्रम साराभाई से काफी
मिलती थी।

डा. साराभाई ने ही आरम्भ में पिछले जन्म के टीपू और इस जन्म में एक रक्षा वैज्ञानिक के रूप में जन्मे डा. कलाम की काबलियत को खूब बढ़ावा दिया। पुनर्जन्म शोध अध्ययनों में परा मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि अतिशय प्रतिभावान और कामयाब लोगों की पूर्वजन्म की क्षमताओं, कामयाबियों और जीवन स्तर में पुनर्जन्म में कमी नहीं आती।

पुनर्जन्म पर काम करने वाले वैज्ञानिक इसे भाग के कार्मिक सिद्धांत के जरिए समझाते हैं जिसके अनुसार पूर्व जन्म के कर्मो (प्रारब्ध) को वर्तमान कर्मो के गुणांक के रूप में हासिल किया जाता है। इसके अनुसार किसी भी जन्म में किया गया कर्म कभी भी नष्ट नहीं होता।

आइआइएसआइएस अध्ययनों के मुताबिक पिछले जन्म में लाल किले से अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाकर निर्वासित किए गए बहादुर शाह जफर ने ही भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू के रूप में उसी लाल किले पर तिरंगा फहराने की ख्वाहिश पूरी की जहां से पिछले जन्म में उनको अपमानित करके निकाला गया था। जवाहर लाल नेहरू और बहादुर शाह जफर दोनों की ही शकल सूरत बहुत मिलती थी।

आइआइएसआइएस ने अनेक विश्वस्तरीय राजनेताओं, उद्योगपतियों और फिल्म, साहित्य संगीत तथा खेल की दुनिया की हस्तियों के बारे में इसी प्रकार की दिलचस्प पूर्वजन्म सम्बन्धी खोजें की हैं।

कहीं भी यह नहीं पाया गया कि कोई भी विख्यात व्यक्ति इस जन्म में अपनी पिछले जन्म की भूमिकाओं से कोई अलग सोच रखता था। नरेंद्र मोदी यदि वाकई ही पिछले जन्म में सर सैय्यद अहमद खान थे तो क्या इस जन्म में मुसलमानों की तालीम और खुशहाली को बढ़ावा देने की कोई नयी कोशिश करेंगें। ये तो वक्त ही बताएगा।

16 अगस्त 2014

ऐसे लोगों का यदि साथ मिल जाए तो समझिए सुख-समृद्धि तो मिलती है

सामुद्रिक शास्त्र कहता है कि कुछ लोगों की शारीरिक रचना देखकर ही आप समझ लेंगे कि वह किस्मत के धनी हैं। ऐसे लोगों का यदि साथ मिल जाए तो समझिए सुख-समृद्धि तो मिलती ही है साथ ही आने वाली बलाओं से भी हमारी रक्षा होती है। आइए जानें, किसी को देखकर आप यह कैसे समझेंगे कि वह आपके लिए लकी है या नहीं...
  • जिस महिला के पैर की मध्यमा उंगली उसके अंगूठे से ज्यादा बड़ी हो, समझिए वह अपने घर वालों के लिए बेहद भाग्यशाली हैं। इनकी वजह से उनके अपनों की फूटी किस्मत तक चमक उठती है।
  • जिन महिलाओं के बाल कमर तक लंबे हो, वे अपने घर के लिए भाग्यशाली होती हैं। ऐसी महिलाओं का साथ मिलने से आपको अपने काम में सफलता की प्राप्ति हो सकती है।
  • वे महिलाएं, जिनकी आंखें काफी बड़ी और मृगनयनी होती हैं, वे भी किस्मत की धनी होती हैं। ऐसी महिला का साथ यदि मिल जाए तो अपने आपको खुशनसीब समझें, क्योंकि उनके साथ के कारण बस आपके काम बनते ही चले जाएंगे।
  • जिन पुरुष या महिला के पैर या हथेली में मछली या चक्र के निशान हों, वे भी दूसरों की किस्मत चमकाने वाले होते हैं। इनकी नसीब भी खूब बलवान होता है।
  • जिनकी आंखों के नीचे तिल मौजूद हो, उनका साथ आपके नसीब के बंद दरवाजे खोल सकता है।
  • जिन महिलाओं के कान गोल, बेहद छोटे अथवा ज्यादा लंबे हो, कहते हैं उन्हें धन-सम्पत्ति की कभी कोई कमी नहीं होती। ऐसी महिलाओं का साथ जिन्हें मिल जाए, उनकी किस्मत भी चमक उठती है।

16 जुलाई 2014

सेक्स के 10 पॉपुलर मिथ

सेक्स को लेकर हर औरत और पुरुष के अपने सवाल और मिथ होते है. डॉक्टर आरोन कैरोल ने ऐसे मिथ की धज्जियां उड़ा दी है. उन्होंने इस मुद्दे पर एक किताब भी लिखी हैं. यहां पढ़िए इन 10 मिथ के बारे में कैरोल के तर्क और तथ्य.

पहला मिथ - लिंग और मोजे/कान/हाथ की लंबाई में संबंध होता है.
कैरोल का तर्क है कि ऐसा कुछ भी नहीं है. इस पर बहुत सारे अध्ययन हो चुके हैं. और यह पूरी तरह तर्कहीन है.

दूसरा मिथ - पुरुषों के लिंग की लंबाई 7 इंच होती है.
कैरोल के मुताबिक ईमानदारी से कहा जाए तो औसत रूप से पुरुषों के लिंग की लंबाई 5 इंच होती है. इंडियाना के एक संस्थान द्वारा 1600 पुरुषों के बीच किए सर्वे में यह रिजल्ट 5.6 इंच रहा.

तीसरा मिथ - कंडोम पहनना, सेक्स की टाइमिंग को घटा देता है.
कैरोल का कहना है कि कंडोम पहनने से सेक्स के समय में कोई अंतर नहीं आता.

चौथा मिथ - ज्यादा सेक्स से स्पर्म बनने की प्रक्रिया पर असर पड़ता है.
कैरोल ने 2005 में हुए एक शोध का उदाहरण देते हुए कहा, 6 हजार लोगों से लिए गए 9500 सैंपल पर आधारित शोध के मुताबिक हफ्ते में एक बार सेक्स करने वाले लोगों का औसत रहा 3.7 मिलीलीटर, जबकि सेक्स करने से पहले दिन सेक्स किए हुए लोगों का औसत रहा 2.3 मिलीलीटर. जबकि सेक्स करने के बाद उसी दिन सेक्स करने वाले लोगों का औसत रहा 2.4 मिलीलीटर.

पांचवां मिथ - पुरुष ज्यादातर गोरी स्त्री को पसंद करते है, जिसके बाल काले हों, बजाय भूरे बालों वाली के.
कैरोल का तर्क है कि यह बिल्कुल क्षेत्र या इलाके पर निर्भर करता है. इस बारे में कोई स्पष्ट रुझान नहीं है.

छठा मिथ - ज्यादातर महिलाएं हेयरलेस नहीं होती.
कैरोल कहते हैं, '2 हजार से ज्यादा महिलाओं पर किए गए सर्वे के मुताबिक 11 प्रतिशत महिलाओं ने ज्यादातर समय अपने बाल साफ रखे. जबकि 20 प्रतिशत महिलाओं ने अपने बाल साफ नहीं किए. वहीं, 25 प्रतिशत ने कुछ समय अपने प्यूबिक बाल साफ किए. हालांकि ज्यादातर महिलाएं कुछ बाल रखती हैं.'

सातवां मिथ - छोटे की अपेक्षा बड़े स्तन कम संवेदनशील होते है.
कैरोल के मुताहिक ये गलत मिथ है. साइज से कोई फर्क नहीं पड़ता.

आठवां मिथ- सेक्स सबसे बढ़िया एक्सरसाइज है.
कैरोल कहते हैं कैलोरी जलाने के लिए ठीक है. लेकिन बहुत सारे लोग लंबी उम्र तक एक्टिव रहे. 30 मिनट के सेक्स में 85 से 250 कैलोरी जलती है और इसे सबसे बढ़िया एक्सरसाइज नहीं कहा जा सकता.

नौवां मिथ - महिलाओं के बारे में मिथ ये है कि वे ज्यादा धोखा देती हैं.
जी नहीं, कैरोल के मुताबिक पुरुषों के बराबर ही महिलाएं धोखा देती हैं और इसमें उम्र की कोई भूमिका नहीं होती. एक अध्ययन के मुताबिक 23 प्रतिशत पुरुषों ने अपनी वर्तमान रिलेशनशिप में चीट किया. वहीं, 19 प्रतिशत महिलाओं ने भी ऐसा ही किया.

दसवां मिथ - स्वप्नदोष केवल पुरुषों को होता है.
कैरोल का जवाब ये है कि स्वप्नदोष के शिकार महिला और पुरुष दोनों ही होते हैं.


Courtesy: Aajtak