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05 मार्च 2017

चक्कर-भर्ती सम्राट चुनमुन परदेसी


इस तस्वीर को देखकर मुझे कई हज़ार वर्ष पुरानी एक कहानी याद आ गयी और साथ ही याद आ गयी वही स्वर्ग के कपड़े पहन कर राज्य की सैर करने निकले राजा की कहानी जो बचपन में सुनी थी | स्वर्ग के कपड़े पहनकर घुमने वाले राजा की कहानी तो आपको याद ही होगी...लेकिन यह बिलकुल ताज़ी नई कहानी जो मैंने अभी अभी लिखी है, वह आपने पहले कभी नहीं सुनी होगी... लीजिये कहानी सुनिए:

कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | चुनमुन परदेसी नामक एक महान चक्कर-भर्ती सम्राट हुआ करते थे | उनको देश-विदेश घुमने और महँगे महँगे कपडे पहनने का शौक था | यूँ भी कह सकते हैं कि पर्यटन व वस्त्रों में उनकी बहुत रूचि थी |

तो वे देश विदेश घूमते नए नए कपड़े पहनकर | अपने खुद के देश में वे तभी घुमने जाते, जब लगान वसूलना होता था या कड़की आ जाती थी | ऐसे ही घूमते घूमते वे शंघाई, टोक्यो, पेरिस आदि शहर पहुँचे | अपने मंत्रियों से पूछा कि क्या हम ऐसा ही सुंदर शहर अपने देश में भी बना सकते हैं ? मंत्रियों ने कहा कि बिलकुल क्यों नहीं बना सकते..आप आदेश करें आपके वापस लौटते ही आपको बिलकुल ऐसा ही शहर बना मिलेगा अपने देश में |

यह सुनकर सम्राट बहुत खुश हुआ और मंत्रियों को तीस हज़ार रूपये किलो वाली शाही कुकरमुत्ते का सूप एक एक चम्मच पिलाकर धन्य किया और बोले कि तुरंत शहर का निर्माण किया जाए |

मंत्रियों ने सम्राट से ऐसे शाही इनाम की कल्पना तक नहीं की थी | ख़ुशी के मारे सारे मंत्रियों ने तुरंत अपने अपने फोटोशोप एक्सपर्ट को फोन लगाया और सम्राट का आदेश सुनाया | मंत्रियों ने फोन रखा नहीं कि एक्सपर्ट्स ने नये शहर का निर्माण कर दिया और व्हाट्सएप से तुरंत भिजवा भी दिया नए शहर की तस्वीरें | मंत्री दौड़े दौड़े गये और सम्राट को दिखाया नया शहर व्हाट्सएप पर | सम्राट ने जब अपने नये शहर को देखा तो ख़ुशी के मारे झूम उठे....

जब राजा अपने देश लौटे तो शाही शानो शौकत के साथ सभी मंत्रियों और दरबारियों को लेकर रातों रात तैयार हुए देसी टोक्यो, शंघाई, पेरिस घुमने निकले | लेकिन रास्ते में उन्हें टूटी-फूटी झोंपड़ियाँ, फटेहाल गरीब लोग दिखाई दे रहे थे, तो सम्राट का माथा ठनका | अपने मंत्रियों से पूछा: "यह शहर तो वैसा नहीं दिख रहा जैसे कि तस्वीरों में दिख रहा है | यहाँ झुग्गी झोंपड़ी कहाँ से आ गयीं ?"

मंत्रियों ने समझाया, "दरअसल आप कई दिनों से बिना आराम किये ३६-३६ घंटे काम कर रहे हैं न ? इसीलिए दृष्टिभ्रम हो रहा है | फिर आप अपना कद भी देखें ! आप की ऊँचाई ही इतनी है कि सौ मंजिले इमारतें आपको झुग्गी झोंपड़ी दिखाई दे रहीं है..."

अपनी प्रशंसा सुनकर सम्राट का सीना ख़ुशी से चौड़ा हो गया और फिर पूरे दिन वे अपने नए देसी टोक्यो, शंघाई, पेरिस घूमते रहे गर्व के साथ |

~विशुद्ध चैतन्य

नोट: यह कहानी पुर्णतः काल्पनिक है, इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या स्थान आदि से कोई सम्बन्ध नहीं है |

11 जनवरी 2017

पर्दे को रहने दो पर्दा न उठाओ....



प्राचीन काल में पर्दा-प्रथा नही थी भारत में | लेकिन विदेशियों के आगमन, स्त्रियों के हरण व कुत्सित मानसिकता के उत्थान के साथ पर्दा प्रथा आस्तित्व में आ गया | फिर कई जागृत आत्माओं के योगदान व बलिदानों के बाद पर्दा प्रथा से भारत को मुक्ति मिली |

मैं मानता हूँ कि पर्दे का अपना महत्व है, जैसे घरों में पर्दों का होना न केवल सुन्दरता बढ़ाता है, बल्कि अवांछनीय ताक-झाँक से भी बचाता है | विवाह मंडप में भी यदि दुल्हन घुंघट में हो तो वह न केवल सुंदर लगता है, बल्कि दुल्हन को विशिष्टता भी प्रदान करता है | यह और बात है कि आज के आधुनिक दौर में नग्नता को आधुनिकता की उपाधि मिल चुकी है, इसलिए भविष्य में दुल्हनें बिकनी में विवाह मंडप पर नजर आयें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | आखिर स्त्रियों को भी जिस्म दिखाने का उतना ही अधिकार है, जितना कि मर्दों को |

08 जनवरी 2017

स्वप्न तो केवल स्वप्न होता है



अक्सर आप लोगों ने पढ़े-लिखे और जमीने विद्वानों को यह कहते सुना होगा, “स्वप्न तो केवल स्वप्न होता है सत्य नहीं | स्वप्न मन की दबी हुई भावनाओं को ही दिखाता है या दिन में जो कुछ भी हम सोचते हैं, देखते हैं वही सब स्वप्न के रूप में उभर कर आता है |”

21 दिसंबर 2016

लोकतंत्र की प्रथा कैसे शुरू हुई ?


कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है, धन्नासेठ ने अपनी कंपनी का GM नियुक्त किया चुनमुन परदेसी को | चुनमुन को हज़ारों उम्मीदवारों का इंटरव्यू लेने के बाद चुना गया था | देश विदेश घूमना, महंगे महंगे कपड़े पहनना  और तीस हज़ार रूपये प्रतिकिलो के भाव वाला दुर्लभ कुकरमुत्ते का सूप पीकर अपनी जवानी व तंदुरुस्ती बनाये रखना उसका शौक था |

18 दिसंबर 2016

चक्कर-भर्ती सम्राट का स्वर्णयुग


कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | मोतीचूर नामक चक्करभर्ती सम्राट राज्य करता था किसी देश में | वह बहुत ही आधुनिक विचारों का था और नई खोज करने के लिए विश्वभ्रमण करता रहता था | उसका राजकाज उसके मंत्री और उनके परममित्र धन्नासेठ चलाया करते थे | राजा का बस एक ही शौक था, देशविदेश घूमना, महंगे कपड़े पहनना | एक दिन जब राजा स्वदेश लौटा विश्वभ्रमण से तो दरबारियों ने सोचा कि राजा को विदेशी नजर लग गयी होगी, इसलिए अखण्ड रामायण पाठ रखवाया जाए | पंडितजी आयेंगे तो भविष्य भी बता देंगे और राजा भी तब तक देश में ही रुके रहेंगे |

03 अक्टूबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक




कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | रामराज्य नामक एक देश में बहुत अराजकता फैली हुई थी | जनता 'मैं सुखी तो जग सुखी' के सिद्धांत को आत्मसात कर चुकी थी और यह भाव उनके खून में भी इस तरह जड़ें जमा चुकी थी कि बच्चे भी उसी भाव के साथ जन्म लेने लगे | लोग किसी को पानी भी पिलाते तो लाभ-हानि देखकर पिलाते, भलाई भी करते तो दस गुना अधिक लाभ होगा इस बात की गारंटी मिलने पर ही करते | शादी-ब्याह से लेकर माँ-बाप से रिश्ते तक व्यापारिक आधार पर तय होने लगे | परिणाम यह हुआ कि राजा भी उसी नस्ल का और राजकीय अधिकारी और मंत्रीगण भी उसी नस्ल के | तो कमजोरों की रक्षा व सहयोग करने की जिम्मेदारी किसी की भी नहीं थी सब अपनी अपनी चिंता करने में लगे हुए थे | व्यापारीगण मंत्रियों राजकीय अधिकारीयों को मोटा कमीशन देकर किसानों और आदिवासियों की जमीनों पर कब्ज़ा ज़माने लगे हुए थे विकास के नाम पर | जो विरोध करता उसे राजा के सैनिक गोलियों से छलनी कर देते क्योंकि कुछ हो न हो, विकास होना आवश्यक था |

02 अक्टूबर 2016

अब चूँकि लोग अशिक्षित थे अनपढ़ थे तो उन्हें क्या पता कि GOD किसे कहते हैं ?


बात कई हज़ार साल पुरानी है | उन दिनों लोग इतने अशिक्षित होते थे कि अंग्रेजी लिखना तो दूर, बोलना भी नहीं जानते थे | यहाँ ...
Posted by विशुद्ध चैतन्य on 2 अक्टूबर 2013

29 सितंबर 2016

किले की सुरक्षा घंटी बजाकर

शिक्षक, धर्मगुरुओं संत-महंतों और विद्वानों का कार्य व कर्तव्य था कि समाज व राष्ट्र के हित व समृद्धि के लिए मार्गदर्शन करते नयी पीढ़ी का | लेकिन वे अपने कर्तव्यों से भटक गए और कठपुतली बन गए राजनेताओं, अपराधियों और देश के सौदागरों के | जो धर्म राष्ट्र को संगठित करने व आत्मनिर्भर होने में सहायक होता है, वही हमारे विनाश का कारक बन गये | वही माध्यम बन गए नागरिकों में फूट डालने में |

09 सितंबर 2016

एक मच्छर का एक्सक्लूजिव इंटरव्यु

👨 रिपोर्टर -आपका प्रकोप दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है,  क्यों ?

🐜 मच्छर : सही शब्द इस्तेमाल कीजिये, इसे प्रकोप नहीं फलना-फूलना कहते हैं. पर तुम इंसान लोग तो दूसरों को फलते-फूलते देख ही नहीं सकते न ? आदत से मजबूर जो ठहरे.


👨 रिपोर्टर -हमें आपके फलने-फूलने से कोई ऐतराज़ नहीं है पर आपके काटने से लोग जान गँवा रहे हैं, जनता में भय व्याप्त हो गया है ?

🐜 मच्छर : हम सिर्फ अपना काम कर रहे हैं. श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि  ‘कर्म ही पूजा है’. अब विधाता ने तो हमें काटने के लिए ही बनाया है, हल में जोतने के लिए नहीं ! जहाँ तक लोगों के जान गँवाने का प्रश्न है तो आपको मालूम होना चाहिए कि “हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ’ …!

👨 रिपोर्टर -लोगों की जान पर बनी हुई है और आप हमें दार्शनिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं ?

🐜 मच्छर : आप तस्वीर का सिर्फ एक पहलू देख रहे हैं. हमारी वजह से कई लोगों को लाभ भी होता है, ये शायद आपको पता नहीं ! जाइये इन दिनों किसी डॉक्टर, केमिस्ट या पैथोलॉजी लैब वाले के पास, उसे आपसे बात करने की फ़ुर्सत नहीं होगी. अरे भैया, उनके बीवी-बच्चे हमारा ‘सीजन’ आने की राह देखते हैं, ताकि उनकी साल भर से पेंडिंग पड़ी माँगे पूरी हो सकें. क्या समझे आप ? हम देश की इकॉनोमी बढाने में महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं, ये मत भूलिएगा !

👨 रिपोर्टर -परन्तु मर तो गरीब रहा है न, जो इलाज करवाने में सक्षम ही नहीं है ?

🐜 मच्छर : हाँ तो गरीब जी कर भी क्या करेगा ? जिस गरीब को आप अपना घर तो छोडो, कॉलोनी तक में घुसने नहीं देना चाहते, उसके साथ किसी तरह का संपर्क नहीं रखना चाहते, उसके मरने पर तकलीफ होने का ढोंग करना बंद कीजिये आप लोग.

👨 रिपोर्टर -आपने दिल्ली में कुछ ज्यादा ही कहर बरपा रखा है ?

🐜 मच्छर : देखिये हम पॉलिटिशियन नहीं हैं जो भेदभाव करें … हम सभी जगह अपना काम पूरी मेहनत और लगन से करते हैं. दिल्ली में हमारी अच्छी परफॉरमेंस की वजह सिर्फ इतनी है कि यहाँ हमारे काम करने के लिए अनुकूल माहौल है. केंद्र और राज्य सरकार की आपसी जंग का भी हमें भरपूर फायदा मिला है.

👨 रिपोर्टर -खैर, अब आखिर में आप ये बताइये कि आपके इस प्रकोप से बचने का उपाय क्या है ?

🐜 मच्छर : उपाय तो है अगर कोई कर सके तो … लगातार सात शनिवार तक काले-सफ़ेद धब्बों वाले कुत्ते की पूँछ का बाल लेकर बबूल के पेड़ की जड़ में बकरी के दूध के साथ चढाने से हम प्रसन्न हो जायेंगे और उस व्यक्ति को नहीं काटेंगे !

👨 रिपोर्टर -आप उपाय बता रहे हैं या अंधविश्वास फैला रहे हैं ?

🐜 मच्छर : दरअसल आम हिन्दुस्तानी लोग ऐसे ही उपायों के साथ comfortable फील करते हैं ! उन्हें विज्ञानं से ज्यादा किरपा में यकीन होता है…. वैसे सही उपाय तो साफ़-सफाई रखना है, जो रोज ही टीवी चैनलों और अखबारों के जरिये बताया जाता है, पर उसे मानता कौन है ? अगर उसे मान लिया होता तो आज आपको मेरा interview लेने नहीं आना पड़ता … !!!

Courtesy: WhatsApp Group

28 अगस्त 2016

हमारे दड़बे में आइये, प्रेम और भाईचारे की मिसाल है यह दड़बा, कोई भेदभाव नहीं है...


मेरा दड़बा सबसे महान का नारा लगाने वाले जब भाईचारा और सौहार्द की बातें करें तो उनका तात्पर्य केवल अपने दड़बे के लोगों की आपसी भाईचारा और सौहार्द तक ही होता है, यह और बात है कि यह एकता केवल राजनैतिक या धार्मिक रैलियों में ही देखने को मिलती है |

22 अगस्त 2016

विज्ञान और प्रकृति में बस वही अंतर है जो जीडीपी और भुखमरी में हैं


 गाँव और शहर में सबसे बड़ा अंतर यह है कि शहर में मानसून का पता तब चलता है जब वैज्ञानिक बताते हैं | जबकि गाँव में तेज हवाएं और घनेकाले बादल मानसून की सुचना देते हैं | विज्ञान और प्रकृति में बस वही अंतर है जो जीडीपी और भुखमरी में हैं |

जीडीपी कहती है कि महँगाई दर घटी है जबकि भुखमरी कहती है कि महँगाई दर बढ़ी है | जीडीपी कहती है कि आज से दो वर्ष पहले बहुत गरीबी थी और लोग पचपन रूपये किलो वाली सस्ती दाल खाने को विवश थे, जबकि आज लोग इतने अमीर हो गये कि दो सौ रूपये किलो की दाल भी हँसते हँसते खाते हैं और मोदी जी की जयकारा गाते हैं |

10 अगस्त 2016

स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों ज़ोर पकड़ती है ?

एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए। ऊँचे, गोरे और तगड़े साधु थे। चेहरा लाल। गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे। साथ एक छोटे साइज़ का किशोर संन्यासी था। उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफ़ी के गाने के सुनवा रहा था।

मैंने पूछा – स्वामी जी, कहाँ जाना हो रहा है?

स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!

स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे। मैं उनके पास बैठ गया। वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए। सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा।

कहने लगे – बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया। गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है। दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे।

06 अगस्त 2016

अरी निर्लज्ज अपनी बेटी को सम्भाल नहीं सकती तो पैदा क्यों किया ?

कई हज़ार साल पुरानी बात है एक महान देश के महान सम्राट का महान दरबार लगा हुआ था | पूरे देश के महान लोग वहाँ मंत्रणा कर रहे थे | विषय बहुत ही गंभीर था, एक मौलवी ने एक हिन्दू लड़की का बलात्कार करके उसका धर्म परिवर्तन कर दिया था और सभी हिन्दू चाहते थे कि मुस्लिमों के विरुद्ध जंग छेड़ दिया जाए और चुन चुन कर मुस्लिमों का कत्ले आम किया जाए ताकि देश में एक भी मुस्लिम न बच पायें |

सम्राट ने सभी से सारी रिपोर्ट देखी और देश के श्रेष्ठ विलायती डॉक्टरों व विशेषज्ञों से समझा | यह सब चल ही रहा था कि एक औरत खून से लतपथ अपनी छः साल की बेटी को लेकर उपस्थित हुई |

30 जुलाई 2016

विलायत रिटर्न चुनमुन परदेसी

Chunmun Pardesi
जो मेरे पोस्ट पढ़ते हैं उनमें से अधिकाँश चुनमुन परदेसी से तो परिचित ही होंगे, क्योंकि इनकी कई बड़े बड़े कारनामे आपने मेरे पोस्ट में पढ़े होंगे |

चुनमुन परदेसी जब विलायत से लौट कर आये विलायती डिग्री लेकर, तो कोई नौकरी इन्हें जमी ही नहीं | तो सड़क में आवारागर्दी करने लगे जैसे कि हमारे यह का कल्चर है | डिग्री हो या न हो, यदि बेरोजगार है तो कोई स्वरोजगार नहीं करना, बल्कि रोजगार दफ्तर में अपना नाम लिखा कर, रोज सुबह अखबार में नौकरी खोजना और फिर दिन भर दोस्तों के साथ लडकियाँ ताड़ने के लिए पान या चाय की दूकान में बैठे रहना या फिर बस स्टैंड या पार्क में भटकना | ऐसे में यदि कोई सड़कछाप नेता का हाथ उनके सर पर पड़ जाए तो गौरक्षा और धर्मरक्षा के लिए लाठीयां, तलवार, त्रिशूल लिए माथे पर तिलक लगाए जय श्री राम का नारा लगाकर निकल पड़ना | गली मोहल्लों में कुत्तों की तरह गौमाँस सूंघते फिरेंगे, लेकिन कभी किसी बड़े नेता या व्यापारी के पशुवधशाला में झाँकने की भी हिम्मत नहीं करेंगे |

तो चुनमुन भी ऐसे ही राष्ट्रभक्त, राष्ट्रवादी बेरोजगारों की तरह सड़कों पर भटकते रहता था | धीरे धीरे उसे समझ में आने लगा कि अगर बड़ा आदमी, नेता या धन्ना सेठ बनना है तो समाजसेवा करके तो कोई बात नहीं बनेगी और न ही ये डिग्री ही किसी काम में आएगी | भारतीयों की जो संस्कृति है यानि गुंडागर्दी, छिछोरे बयान बाजी करने वालों को ही सम्मान और वोट मिलता है, उसी के अनुरूप चला जाए | बस फिर क्या था ! निकल पड़ा चुनमुन एक नए मिशन के साथ !

आज चुनमुन सड़क पर खड़े होकर गौमांस के साथ साथ सड़क से गुजरनी वाली खुबसूरत कन्याओं को भी दूर से ही सूंघ रहा है | एक बड़े नेता ने चुनमुन के सर पर हाथ रखा हुआ है, इसलिए पुलिस और कानून इन्हें देख कर दूर से ही सलाम करते हैं | ये कह दें बकरी को गाय तो कानून हाँ में हाँ मिलाएगा, ये कह दें, पनीर को गौमांस तो फोरेंसिक लेब प्रमाणपत्र दे देगा कि चुनमुन की योग्यता पर संदेह नहीं किया जा सकता | ये जब चाहें किसी को पीट दें, जब चाहें किसी की जान लें... सब कानूनी रूप से वैध... क्योंकि ये खुद ही कानून हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

13 जून 2016

सनातनी (सेक्युलर) राष्ट्र के बजाय हिन्दू या मुस्लिम, राष्ट्र ही क्यों चाहिए ?

क्योंकि ईश्वरीय किताबों पर आधारित राष्ट्र होने से ईश्वर स्वयं नागरिकों के हित का ध्यान रखते हैं और सरकारों को जनता की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती | जिनको समस्या हो, वह सरकार से शिकायत या सहायता माँगने की बजाय सीधे मंदिर या मस्जिद जाकर मांग लेता है | इससे देश में सुख शान्ति बनी रहती है और सरकार पर कोई आरोप भी नहीं लगता कि वह जनता का ध्यान नहीं रख रही |



लेकिन जब मिश्रित (मार्क्सवादी, नास्तिक) या सनातनी (सर्वधर्म समभाव, सेक्युलर) राष्ट्र हो तो बहुत समस्या हो जाती है | सारी जवाबदेही सरकार पर आ जाती है | कहीं सूखा पड़ जाए और लोग मरने लगें तो सरकार को कोसने लगते हैं | कहीं किसान आत्महत्या कर ले, तो सरकार को कोसने लगते है, कहीं घोटाला हो जाए तो सरकार को कोसने लगते हैं, विजय माल्या भाग जाए तो सरकार को कोसने लगते हैं, महँगाई बढ़ जाए तो सरकार को कोसने लगते हैं, दंगा भड़क जाए तो सरकार को कोसने लगते हैं.....अरे सरकार ये सब देखेगी या सरकारी कामकाज देखेगी ? सरकार चलाना क्या कोई आसान काम है ? रात को ठीक से नींद नहीं आती कि कहीं झपकी लग गई तो कोई कुर्सी ही न ले उड़े | सबके सो जाने के बाद सोना पड़ता है और किसी के भी उठने से पहले उठना पड़ता फिर किसी के भी दफ्तर पहुँचने से पहले पहुँचना पड़ता है और सबके जाने के बाद जाना पड़ता है कि कहीं कोई कुर्सी पर कब्ज़ा न जमा ले....विपक्ष गिद्ध दृष्टि लगाए बैठा रहता है कब मौका मिले और कुर्सी छीन लें | फिर पूरी दुनिया का भ्रमण भी करना होता है, बड़े बड़े लोगों से मिलना होता है, बड़े बड़े बिजनेस डील साइन करने होते हैं, बड़े बड़े लोगों से हाथ मिलाना पड़ता है...... उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ़ अब क्या समझाएं कि कितनी सरदर्दी है सरकार चलाना.....

07 अप्रैल 2016

बस उसके बाद ईश्वर ने कान पकड़े कि अब कभी कोई नई कलाकृति नहीं बनाऊंगा

 कई हज़ार वर्ष पहले ईश्वर जब अनपढ़ हुआ करते थे, तब उनकी रूचि कला और संगीत में हुआ करती थी | वे हमेशा कुछ न कुछ कलात्मक चीजें बनाया करते रहते थे और नई नई संगीत भी उनमें समाहित कर देते थे | जैसे कि झरना बनाया और कल-कल की मधुर संगीत साथ में दे दी | चिड़िया बनाया और मधुर गीत उनको दे दिया | स्त्री बनाया तो सुमधुर स्वर उनको दिया.... तो जब तक ईश्वर और मानव अनपढ़ थे, दोनों में बहुत ही अच्छा तालमेल था | प्रकृति की उपासना करते थे मानव और उसकी रक्षा भी करते थे | जितने पेड़ काटते उतने ही लगाते भी थे अनजाने ही | इस प्रकार न तो जल की समस्या होती थी और न ही पर्यावरण प्रदूषित होता था | न ईश्वर को मानवों से कोई शिकायत थी और न ही मानवों को ईश्वर से |

लेकिन कुछ वर्षों बाद मनुष्यों ने समस्या खड़ी करनी शुरू कर दी | उन्होंने पढ़ने लिखने की कला का अविष्कार कर लिया और फिर अंग्रेजी भी सीख ली | ईश्वर के तो होश ही उड़ गये कि अब इनसे बात करें तो करें कैसे ? जब ईश्वर ने देखा कि ये मनुष्य जाति हाथ से ही निकली जा रही है... तो फिर उसने भी पढ़ना लिखना सीखा और फिर संविधान लिख दिया | और साथ में घोषणा कर दी कि जो इस किताब को नहीं पढ़ेगा और उसमें दिए नियमों के विरुद्ध चलेगा उसे नरक भेजदूंगा |

बस उसके बाद ईश्वर ने कान पकड़े कि अब कभी कोई नई कलाकृति नहीं बनाऊंगा | इन मानवों को झेलना ही भारी पड़ रहा है | अब वे ईश्वरीय किताबें ही अंतिम सत्य हो गईं और जो उसमें लिखा है उससे जरा भी कोई इधर से उधर हो जाता, वह अधर्मी मान लिया जाता |

ईश्वरीय किताब लिखे जाने से पहले तक धार्मिक गुरु भी नहीं हुआ करते थे केवल अध्यात्मिक गुरु ही हुआ करते थे, क्योंकि धार्मिक गुरु बनने के लिए किताबी ज्ञान का होना आवश्यक होता है और ईश्वर तो स्वयं अनपढ़ थे तो लिखते कैसे ईश्वरीय किताब ?

उस समय शिष्य गुरु के पास आध्यात्मिक ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करने जाते थे | शिष्य का गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण व आदर का भाव हुआ करता था और गुरु की हर प्रकार से सेवा करता...... तो उस समय रट्टा मार पढ़ाई जैसी कोई सुविधा नहीं थी | न ही फर्रे चलाने का फैशन होता था | नम्बर लाने की भी कोई होड़ नहीं थी और न ही डिग्री बटोरने की चिंता थी | भारी भरकम फीस का भी कोई झंझट नहीं था | शिष्य को गुरु के आश्रम में काम करना होता था और बदले में गुरु से शिक्षा प्राप्त होती थी | शिक्षा में वह युद्ध कौशल के साथ साथ कृषि विज्ञान भी सीखता और शिक्षा पूरी करने के बाद उसे आज की तरह कोई प्रोफेशनल कोर्स भी नहीं करना पड़ता था | गुरुकुल से निकलते ही वह सर्वगुण संपन्न माना जाता था | वह न केवल स्वयं की रक्षा में सक्षम होता था, बल्कि दूसरों की रक्षा भी करता था | वह आत्मनिर्भर हो जाता बहुत ही जल्दी क्योंकि खेत उसके पास अपनी होती और उस खेत से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर लिया करता था या फिर शिकार करके परिवार का भरण पोषण कर लिया करता था |

फिर जैसे ही ईश्वर ने किताब लिख दी... बस तब से अध्यात्मिक गुरुओं का अस्तित्व ही मिटने लगा क्योंकि धार्मिक गुरुओं का युग शुरू हो चुका था | अब सब कुछ ईश्वर ने लिख ही दिया था तो अध्यात्मिक गुरु से आत्मिक ज्ञान व शिक्षा की किसी को कोई आवश्यकता नहीं थी | अब तो बस किताब उठाओ, रट्टा मारो और बन जाओ धार्मिक या धर्मगुरु | अब चिन्तन-मनन, ध्यान साधना आदि सब आउटडेटेड सिस्टम हो चुका था | फिर शिष्यों के पास भी समय नहीं था और न ही इतना धैर्य | उनका तो सीधा सा हिसाब होता था कि फीस लो मुँह मांगी और हमें डिग्री दे दो |

इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वरीय किताबें व्यक्ति को आगे बढ़ने नहीं देतीं | वे संकुचित मानसिकता का व्यक्ति बना देती हैं और यह संकुचन इतना तनाव पैदा करने लगती है कि धर्म गुरु और धार्मिक लोग नफरत के ज़हर उगलने लगते हैं, दंगा-फसाद करने लगते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य


नोट: यह मेरा व्यक्ति विचार है कृपया इसे स्वयं पर या किसी और पर थोपने का प्रयास न करें |

18 नवंबर 2015

"हाथी चले अपनी चाल, कुत्ते भौंकते रहें हज़ार"



उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था | हर कोई उसकी एक झलक पाने को बेताब था | मुजरिम को कटघरे में लाया गया | उस पर कई संगीन आरोप थे जैसे बलात्कार, हत्या, डकैती, जालसाजी, करोड़ों का घोटाला, स्विस बैंक में अकाउंट.....आदि इत्यादि |

वकीलों की बहस शुरू हुई, आरोप प्रत्यारोप लगते रहे लेकिन वह चुप रहा | अंत में जज ने उससे पूछा, "अपनी सफाई में आपको कुछ कहना है ?"

"हाथी चले अपनी चाल, कुत्ते भौंकते रहें हज़ार |" उसने केवल इतना कहा और चुप हो गया |

कोर्ट ने उसे सबूतों के आभाव का लाभ देते हुए बाइज्ज़त बरी कर दिया | दरअसल जिस तिजोरी में सबूत रखे थे उसे चूहे चुरा कर ले गये थे अपने बिल में | लेकिन दिल्ली में तेज गर्मी पड़ने के कारण बिल में ही तिजोरी गल गया और....दोषी चूहों की तलाश जारी है |

एक प्रश्न आप सभी से:

  • क्यों कोर्ट के ख़िलाफ़ कोई कुछ नहीं कह सकता है जबकि कोर्ट भी पैसे लेकर सेवा प्रदान करने वाली संस्था है ? जज तनखा लेते हैं, सरकारी वकील तनखा लेते हैं जनता के खून पसीने की कमाई के टैक्स से | वकीलों को फीस भी जनता ही देती है | 
  • क्या न्याय व्यवस्था आज एक प्रोफेशन नहीं बन गया है, जो पैसों के लिए काम करता है ?
  • क्या आज अदालत धनी व समृद्ध लोगों के लिए खिलौना मात्र नहीं रह गया है ?
  • क्या सरकार न्यायालयों का प्रयोग अपने हित में नहीं कर रही है कि उनके मंत्री आरोपी होते हुए भी सत्ता सुख भोगते रहते हैं, जबकि उसी आरोप में एक आम आदमी सलाखों के पीछे पहुँचा दिया जाता है ? बाद में बेशक कोई बेगुनाह साबित हो जाए लेकिन जब तक केस चल रहा होता है वह सलाखों के पीछे ही रहता है |
  • क्या जजों और वकीलों को भगवान माना जा सकता है जो चंद रुपयों में बिक जाते हैं ?

नोट: अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं | अतः इस क्षेत्र में भी कोई ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ हो सकता है, लेकिन यह अपवाद ही है | जिस प्रकार किसी एक व्यक्ति के गलत होने से पूरी व्यवस्था को गलत नहीं कह सकते, वैसे ही किसी एक व्यक्ति के सही होने से भी पूरी व्यवस्था सही है यह नहीं माना जा सकता | ~विशुद्ध चैतन्य

09 नवंबर 2015

फिर ये नेता नये मुर्गे पालते हैं...


कट्टरपंथियों और मुर्गों में एक समानता यह होती है कि दोनों ही विवेकहीन* होते हैं और हमेशा लड़ने के बहाने खोजते रहते हैं | इनकी इसी विशेषता के कारण कुछ लोग इनको पालतू बना लेते हैं और फिर आपस में लड़ा कर सट्टा खेलते हैं सत्ता के लिए |

खिलाड़ियों के पास ऐसे लड़ने मरने वाले मुर्गों की कोई कमी नहीं होती इसलिए यदि लाख दस लाख मर भी गये तो कोई फर्क नहीं पड़ता | बीच बीच में घोषणा भी करते रहते हैं कि दस दस मुर्गे पैदा करो...ताकि सट्टे के खेल के लिए मुर्गे कम न पड़ जाएँ |

इन मुर्गों को रंगीन छल्ले पहना देते हैं, पंजों में ब्लेड बाँध देते हैं और छोड़ देते हैं दंगा करने के लिए, लेखकों, बुद्धिजीवियों की हत्याएं करने के लिए, अफवाह फैलाकर, धर्म और जाति के नाम पर निर्दोषों की हत्याएं करने के लिए | फिर कोर्ट और पुलिस का ड्रामा चलता है, गिरफ्तारियां होती हैं और कई वर्षो तक केस चलता है, फिर बाइज्जत बरी हो जाते हैं या जमानत पर रिहा हो जाते हैं, फिर चुनाव लड़ते हैं, फिर नेता बन जाते हैं, फिर जनता को सिखाते हैं कि कानून का पालन कैसे करना चाहिए |

फिर ये नेता नये मुर्गे पालते हैं... और इसी प्रकार से यह दुनिया चलती चली जाती है, सट्टे चलते रहते हैं सता के लिय, दौलत के लिए.... यह खेल न जाने कब से चली आ रही है और न जाने कब ख़त्म होगा !!! ~विशुद्ध चैतन्य

नोट: *मुर्गे स्वाभाविक व प्राकृतिक रूप विवेकहीन नहीं होते | लड़ाके होते हैं क्योंकि उसे अपने परिवार की रक्षा करनी होती है | अकारण वे नहीं लड़ते फिरते और न ही दूसरों के घरों में सूअर और गाय का माँस फेंककर लड़वाते फिरते हैं |

17 सितंबर 2015

अरे तुम क्या जानो क्या हुआ


कई हज़ार साल पुरानी बात है | चुनमुन परदेसी बहुत ही उदास था और बहुत ही गुस्से में भी | लोगों ने कारण पूछा कि क्या हुआ तो वह चिडचिडे अंदाज में बोला, "अरे तुम क्या जानो क्या हुआ, तुम लोग तो नाचो गाओ, ख़ुशी मनाओ...."

सभी चौंक गये कि कुछ ख़ास ही बात हो गयी है | सभी घेर कर बैठ गये जानने के लिए कि आखिर हुआ क्या है | बहुत मान मनुव्वल के बाद चुनमुन इस बात पर राजी हुआ कि गम भुलाने के लिए पहले एक अद्धा मंगवाया जाये तब वह कुछ बोलेगा | आखिर अद्धा मंगवाया गया और चुनमुन दो पैग पीने के बाद बोला, "जानते कुछ इतिहास के बारे में ? फारुक ने जो प्लाट खरीद कर आज से तीस साल पहले मकान बनाया था उस प्लाट में गाय को दफनाया गया था !"

"तो ?" अरे तो इतनी पुरानी बात लेकर क्यों बैठ गये... अभी दुखी क्यों हो वह बताओ ?" सभी बोल पड़े

18 जून 2015

हम तो खतरों के खिलाड़ी हैं,

मेरे जैसे आलसी के लिए मैगी एक वरदान बनकर आया था | लगभग बीस-बाईस वर्ष अपने ही हाथों से खाना बना कर खाना पड़ा था तब मैगी की महिमा समझ में आई थी |

दुनिया भर के मार्कों से पहचान करने के लिए कहा जाता था असली और नकली मैगी में अब सब भूल गया, बस इतना याद है कि मैगी लेना नहीं भूलता था जब भी मार्किट जाता था | फिर आज अचानक मैगी अभिशाप हो गया और सरकार भी तुरंत कार्यवाही करते हुए बैन भी लगा दिया | मुझे तो याद नहीं पड़ता कि मैगी खाकर कोई मरा, किसी ने फुटपाथ पर सोते हुए लोगों पर अपनी कार चढ़ा दी मैगी के नशे में | मुझे तो याद नहीं पड़ता कि मैगी खाकर कोई होश खो बैठा और किसी का बलात्कार कर दिया | मुझे तो याद नहीं पड़ता कि मैगी ने किसी की हत्या करवाई हो, किसी का लीवर डेमेज किया हो, किसी का घर बर्बाद किया हो | क्या आपके पास कोई ऐसी जानकारी है ?