आध्यात्म और योग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आध्यात्म और योग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
25 अक्टूबर 2016
12 सितंबर 2016
विष्णु की तरह वैभव शाली होना ही ईश्वर की प्राप्ति है
मोह-माया सब मिथ्या है, जगत मिथ्या है.... आदि इत्यादि लगभग हर साधू-संत, ब्रह्मज्ञानियों से अक्सर सुनने को मिलता है | और आप देखेंगे कि इनमे से अधिकांश सारे ऐशो आराम भोग रहे होते हैं | हाँ कुछ लोग हैं जो भांगधतूरे के नशे में मस्त नंगे या लंगोट डाले घूमते पाए जाते हैं | कुछ साधू संत ऐसे भी हैं जो हिमालय में या किसी बियाबान जंगल में ईश्वर को खोज रहे हैं |
लेकिन जैसे ही कोई कहता है वह ईश्वर को खोज रहा है मोह-माया को त्याग कर, तो लोग उसे महान समझ लेते हैं | जबकि वह ईश्वर के रूप में ऐश्वर्य को खोज रहा होता है | बचपन से यह धारणा बैठा दी गयी होती है कि यह जगत मिथ्या है और जो कुछ यहाँ है उससे अधिक सुख व ऐश ईश्वर के पास ही मिल सकता है |
लेकिन जैसे ही कोई कहता है वह ईश्वर को खोज रहा है मोह-माया को त्याग कर, तो लोग उसे महान समझ लेते हैं | जबकि वह ईश्वर के रूप में ऐश्वर्य को खोज रहा होता है | बचपन से यह धारणा बैठा दी गयी होती है कि यह जगत मिथ्या है और जो कुछ यहाँ है उससे अधिक सुख व ऐश ईश्वर के पास ही मिल सकता है |
02 अगस्त 2016
क्या बातें करें अध्यात्म की हम ?
जीवन के अंतिम पड़ाव में अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा में बैठे लोग ही अध्यात्म में रूचि लेते हैं क्योंकि अब कुछ और करने लायक रह ही नहीं गये | नाती-पोते हो गये, गंभीरता दिखानी ज़रूरी हो गयी नहीं तो समाज क्या कहेगा... आदि इत्यादि |
युवाओं के पास अपना दुःख है | नौकरी के लिए पढाई की थी, लेकिन नौकरी है कि मिल नहीं रही | मनपसन्द नौकरी तो दूर, चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल पा रही इंजीनियरिंग करने के बाद भी | तो उनका गुस्सा अपनी जगह है क्योंकि उनको लगता है कि उनको गलत दिशा में दौड़ा दिया गया और अब लौटने का कोई रास्ता ही नहीं है | अब वे बचपन में वापस नहीं लौट सकते और समाज और सरकार अपनी ही दुनिया में खोई हुई है | उनकी समझ में नहीं आता कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए |
कई युवा मुझे बताते हैं जिनमें लड़कियां अधिक हैं कि पढ़ाई पूरी कर ली लेकिन अब समझ में नहीं आ रहा कुछ भी | सरकारी नौकरी चाहिए लेकिन कब मिलेगी कैसे मिलेगी समझ में नहीं आ रहा... डिप्रेशन बढ़ता जा रहा है और कई बार आत्महत्या करने का मन करता है.......
18 जून 2015
भीतर से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न प्रेम, सेवा का भाव बिना कहे भी सामने वाले को छू लेती है
अब आदत बहुत बिगड़ गयी है या दुनिया समझ में आ गयी है | अब कोई फर्क नहीं पड़ता यदि कोई मुझ पर बहुत ही प्रेम बरसाने का दिखावा करे या बहुत मेहनती व सेवा भाव का | अब सब एक तमाशा ही लगता है | अब प्रेम का कोई भाव आता, और न ही कोई दिल को छूता है | शायद ये नकली प्रेम, नकली सेवा, स्वार्थ से भरे परोपकार आसानी से पहचनने लगा हूँ मैं |
कुछ लोग बहुत ही सेवा भाव दिखाते हैं, शायद वह अपनी तरफ से श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे होते हैं, लेकिन न जाने मेरे भीतर जो है, उसे कोई असर नहीं पड़ता | कई बार ऐसा भी होता है कि मेरा मन पिघल जाता है लेकिन मैं नहीं पिघलता | दोनों में तर्क होता है, दोनों अपना अपना पक्ष रखते हैं और फिर एक दिन पता चलता है कि जो सेवा भाव दिखा रहा था, प्रेम उड़ेल रहा था, वह नकली था | वह केवल अपने स्वार्थ वश ही यह सब कर रहा था और शहरी था, इसलिए एक अच्छा एक्टर भी था | लेकिन इन शहरियों को नहीं पता कि कि मैं जंगली हूँ और परखने की सीमा मेरी उनकी एक्टिंग की क्षमता से अधिक है | जहाँ उनकी एक्टिंग उनका साथ छोड़ देती है, वहाँ से मैं उसे परखना शुरू करता हूँ |
कुछ लोग बहुत ही सेवा भाव दिखाते हैं, शायद वह अपनी तरफ से श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे होते हैं, लेकिन न जाने मेरे भीतर जो है, उसे कोई असर नहीं पड़ता | कई बार ऐसा भी होता है कि मेरा मन पिघल जाता है लेकिन मैं नहीं पिघलता | दोनों में तर्क होता है, दोनों अपना अपना पक्ष रखते हैं और फिर एक दिन पता चलता है कि जो सेवा भाव दिखा रहा था, प्रेम उड़ेल रहा था, वह नकली था | वह केवल अपने स्वार्थ वश ही यह सब कर रहा था और शहरी था, इसलिए एक अच्छा एक्टर भी था | लेकिन इन शहरियों को नहीं पता कि कि मैं जंगली हूँ और परखने की सीमा मेरी उनकी एक्टिंग की क्षमता से अधिक है | जहाँ उनकी एक्टिंग उनका साथ छोड़ देती है, वहाँ से मैं उसे परखना शुरू करता हूँ |
20 जनवरी 2015
यदि तुम पैसों के लालच में यह काम कर रहे थे, तो तुम्हारी पूजा व्यर्थ हो गयी
कल रात मेरे कमरे में एक गहन मीटिंग बैठी जिसमें फरार पंडित की तनखा के ऊपर चर्चा चली | हमारे रसोइया जो कि पंडा भी हैं और पंडित जी की गैरहाजिरी में पूजा पाठ वही देखता है..... तो पंडित के ना आने पर उसकी तनखा पर अपना दावा ठोंक दिया |
वैसे भी तीन-चार दिन से वह पंडित की तनखा पर कुछ अधिक ही ध्यान रखे हुए था | कई बार कह चुका था कि पंडित की तनखा अलग निकाल कर रख लीजिये नहीं तो मेरे हाथ में दे दीजिये मैं हिसाब करूँगा उसका.......
वैसे भी तीन-चार दिन से वह पंडित की तनखा पर कुछ अधिक ही ध्यान रखे हुए था | कई बार कह चुका था कि पंडित की तनखा अलग निकाल कर रख लीजिये नहीं तो मेरे हाथ में दे दीजिये मैं हिसाब करूँगा उसका.......
19 जनवरी 2015
हम भेंट वही चीज करते हैं, जो हमें प्रिय हो
सुविचार: "मूढ़-अज्ञानी मनुष्य निन्दा सुनकर दुःखी और स्तुति सुनकर सुखी हुआ करते हैं, सात्विक पुरुष निन्दा सुनकर सावधान और स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं, पर जीवनमुक्त का अन्तःकरण तो इन दोनों भावों से शून्य रहता है; क्योंकि उसकी दृष्टि में एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा के अतिरिक्त अपनी भी भिन्न सत्ता नही रहती, तब निन्दा-स्तुति में उसकी भेद-बुद्धि कैसे हो सकती है? वह तो सबको एक परमात्मा का ही स्वरूप समझता है।"
कुविचार: जो व्यक्ति निंदा सुनकर दुखी न होता हो, जो व्यक्ति स्तुति सुनकर प्रसन्न न होता हो, वह राजनेता, ढोंगी संत-महंत या बहरा ही हो सकता है |
जो व्यक्ति निंदा सुनकर सावधान व स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं, वे स्वयं से अपरिचित व हीनभावना से ग्रस्त होते हैं |
क्या हम यह मान लें कि आज तक जितनी भी स्तुतियों की रचना हुई वह परमात्मा को लज्जित या अप्रसन्न करने के लिए की गयीं ? जो सच्चिदानंद परमात्मा से स्वयं को भिन्न नहीं मानता और सभी को परमात्मा का स्वरुप मानता है, वह वही काम कैसे कर सकता है, जिससे स्वयं प्रसन्न न होता हो या लज्जित होता हो ?
हम भेंट वही चीज करते हैं, जो हमें प्रिय हो | जो निंदा और स्तुति से प्रभावित नहीं होता वह न किसी से प्रभावित होगा और न ही किसी को प्रभावित कर पायेगा, यहाँ तक कि ईश्वर को भी नहीं | ~विशुद्ध चैतन्य
कुविचार: जो व्यक्ति निंदा सुनकर दुखी न होता हो, जो व्यक्ति स्तुति सुनकर प्रसन्न न होता हो, वह राजनेता, ढोंगी संत-महंत या बहरा ही हो सकता है |
जो व्यक्ति निंदा सुनकर सावधान व स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं, वे स्वयं से अपरिचित व हीनभावना से ग्रस्त होते हैं |
क्या हम यह मान लें कि आज तक जितनी भी स्तुतियों की रचना हुई वह परमात्मा को लज्जित या अप्रसन्न करने के लिए की गयीं ? जो सच्चिदानंद परमात्मा से स्वयं को भिन्न नहीं मानता और सभी को परमात्मा का स्वरुप मानता है, वह वही काम कैसे कर सकता है, जिससे स्वयं प्रसन्न न होता हो या लज्जित होता हो ?
हम भेंट वही चीज करते हैं, जो हमें प्रिय हो | जो निंदा और स्तुति से प्रभावित नहीं होता वह न किसी से प्रभावित होगा और न ही किसी को प्रभावित कर पायेगा, यहाँ तक कि ईश्वर को भी नहीं | ~विशुद्ध चैतन्य
18 जनवरी 2015
अब मुझे लगता है कि मै आध्यात्म (स्वयं) मे जाऊँ....
मै अब आध्यात्म मे उतरना चाहता हुँ विद्यार्थी जीवन से ही.. मुझे क्या करनी चाहिए .. अब मुझे लगता है कि मै आध्यात्म (स्वयं) मे जाऊँ , झाँकु, पुछूँ , जानुँ और महसुस करुँ... मुझे तरीका बताएँ? कैसे करुँ ध्यान? उपाय बताईए मुझे.. मुझे इधर उधर जाने का वक्त तो नही मिल रहा.. कभी सोचता हुँ कुप्पाघाट (भागलपुर) जाकर गुरुदेव से दीक्षा ले लुँ? शायद चार स्टेप है इसमेँ मानस जप , मानस ध्यान , सुरत शब्द योग इत्यादि.. माँ दीक्षित है पर मुझे जँच नही रहा..कभी सोचता हुँ कि बुद्ध, महावीर और परमहंस गुरुजी का आध्यात्म अलग तो नही क्युँकि कोई न आत्मा को मानता न इश्वर , कोई आत्मा को मानता लेकिन ईश्वर को नहीँ , कोई दोनो को मानता है ... मै तो कंफुयजन मे हुँ गुरुजी... आप एक पोस्ट पे शिव को जानने की बात की थी.. क्या मै भी जान सकता हुँ..अगर हाँ तो किसके आध्यात्म से आपके या बुद्ध या महर्षिमेही के आध्यात्म से..जहाँ बुद्ध और महावीर शिव के बारे मेँ कभी बताए नही लोगोँ को?... बहुत संकट है गुरुजी.. या फिर कहिए मै देवघर आऊँ दीक्षा लेने.. जब धनबाद से गोड्ढा(घर) जाउँगा जसीडीह के रास्ते... मार्गदर्शन करे कृप्या..अगर आप यहाँ उत्तर दे सकते है तो दीजिए समय मिलते ही... और मुझे भी आध्यात्म की राह मे उतारेँ.... | -एक मित्र का प्रश्न
06 जनवरी 2015
ज्योतिषी ने यह भविष्यवाणी मेरे बचपन में कर दी थी
आजकल देख रहा हूँ कि लोग ज्योतिष का कुछ आवश्यकता से अधिक ही मजाक उड़ाने लगे हैं | और उसका कारण भी है क्योंकि ज्योतिष केवल गणित नहीं आध्यात्म भी है | और वर्तमान ज्योतिष उसे आध्यात्म की जगह सामान्य गणित की तरह सीख व समझ रहे हैं | कई लोगों ने तो पत्राचार से ज्योतिषी सिखाने के स्कूल खोल रखे हैं क्योंकि ज्योतिष का स्तर गिरते गिरते अब डिग्रियों पर निर्भर हो गया |
04 जनवरी 2015
मन + नियंत्रण = मन्त्र
मन्त्र अर्थात मन का नियंत्रण | जब हम कोई मन्त्र का जाप करते हैं तो मन इधर उधर नहीं भटकता और मन का संतुलन बना रहता है | बीस मिनट से अधिक जाप करने की स्थिति में ध्यान की अवस्था प्राप्त होने लगती है और धीरे धीरे ध्यान से आगे बढ़ कर कुछ लोग समाधि की अवस्था था पहुँच जाते हैं |
अब मन्त्र आप किसी भी भाषा में कहें, लेकिन यदि अर्थ समझ में न आये तो व्यर्थ है मन्त्र | यदि आप केवल एक मन्त्र "मैं कौन हूँ ? इस धरा में क्यों आया हूँ ?" का जाप नियमित सोने से ठीक पहले शुरू करें और मंत्रोचार करते हुए नींद की आगोश में समा जाएँ, तो कुछ ही दिनों में आप को आश्चर्यजनक परिणाम मिलने शुरू हो जायेंगे |
नोट: यह मेरा स्वयं का अजमाया व सिद्ध किया हुआ विशेष मन्त्र है और आज मैं कई वर्षो के प्रयोग के बाद सार्वजनिक कर रहा हूँ | यह एक मात्र ऐसा मन्त्र है जो जाति, धर्म, वर्ण, सम्प्रदाय, भाषा के बंधनों से मुक्त है और किसी भी भाषा में अनुवाद करके प्रयोग किया जा सकता है किसी भी मान्यता या जाति के स्त्री या पुरुष द्वारा | ~विशुद्ध चैतन्य
31 दिसंबर 2014
आज साल का अंतिम दिन है | क्यों न एक प्रयोग करके देखें आप ?
एक शीशा लीजिये और किसी एकांत में ऐसी जगह चले जाएँ, जहाँ आप जोर से चिल्लाकर कुछ भी कहें कोई परिचित न हो सुनने वाला | अब आप शीशे को ध्यान से देखें और उसकी जितनी भी बुराई आपको पता हो वह जोर जोर से बोलकर उसकी जितनी निंदा हो कीजिये | उसके बाद आँखें बंद कर लें दस मिनट के लिए और सारा ध्यान अपनी साँसों की गति पर केन्द्रित रखें |
फिर आँखें खोलें और अपने अनुभव को लिख लें | फिर दोबारा शीशा उठायें और फिर शीशे में दिखने वाले व्यक्ति की जितनी भी प्रशंसा (वास्तविक) कर सकते हों करें | फिर आँखें बंद कर लें और साँसों की गति पर ध्यान केन्द्रित करें | जो अनुभव हों लिख लें |
यह ध्यान की एक ऐसी विधि है जो सुनने में बहुत ही आसान लगती है, लेकिन जब करने बैठते हैं तो पसीने छूट जाते हैं | पहले के एक दो दिन तो चलो किसी तरह कोई कर भी ले..... लेकिन हफ्ता गुजरते गुजरते वह जब अपने भीतर के वास्तविक व्यक्ति को सामने शीशे में देखना शुरू कर देता है, तो..... आप प्रयोग करके देखिये पता चल जाएगा | :) ~विशुद्ध चैतन्य
फिर आँखें खोलें और अपने अनुभव को लिख लें | फिर दोबारा शीशा उठायें और फिर शीशे में दिखने वाले व्यक्ति की जितनी भी प्रशंसा (वास्तविक) कर सकते हों करें | फिर आँखें बंद कर लें और साँसों की गति पर ध्यान केन्द्रित करें | जो अनुभव हों लिख लें |
यह ध्यान की एक ऐसी विधि है जो सुनने में बहुत ही आसान लगती है, लेकिन जब करने बैठते हैं तो पसीने छूट जाते हैं | पहले के एक दो दिन तो चलो किसी तरह कोई कर भी ले..... लेकिन हफ्ता गुजरते गुजरते वह जब अपने भीतर के वास्तविक व्यक्ति को सामने शीशे में देखना शुरू कर देता है, तो..... आप प्रयोग करके देखिये पता चल जाएगा | :) ~विशुद्ध चैतन्य
28 दिसंबर 2014
जब आप स्वयं को महत्व देने लगेंगे तो स्वाभाविक है कि आप दूसरों को दिखावटी सम्मान नहीं, वास्तविक सम्मान दे पायेंगे
और मैं अपना नाम लिखता हूँ अपनी पोस्ट के नीचे तो बुराई ही क्या है ?
16 नवंबर 2014
मानव जीवन का उद्देश्य
कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | मैं, मेरी तन्हाई और दारु की मटकी भटकते हुए एक संत-सम्मलेन में पहुँच गये | वहाँ दुनिया भर से संत-महंत और धर्मों के ठेकेदार आये हुए थे | लाखों धार्मिक भी वहाँ पर एकत्रित थे | विषय था, 'मानव जीवन का उद्देश्य' |
मैंने दो घूँट लगाए और वहीँ एक पेड़ के नीचे लुढ़क गया | सोचा कि जीवन में कभी कोई पुन्य तो किया नहीं, आज इतने महान आत्माएं एकत्रित हुईं हैं तो इनके कुछ अमृत-वचन सुन लूँगा तो शायद कुछ पुण्य प्राप्त हो जाए |
सभी विद्वान् अपने अपने विचार रख रहे थे और धार्मिक लोग भाव-विभोर हो रहे थे | कोई गीता के श्लोक सुना रहा था तो कोई रामायण के, कोई क़ुरान की आयतें सुना रहा था तो कोई बाइबल के अंश | शाम तक वहीँ बैठा रहा मैं और मुझे यह जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि सभी धर्म तो एक ही बात कहते हैं, बस कहने का ढंग अलग अलग है | सभी ईश्वर से प्रेम करना ही सिखाते हैं, सभी समर्पण करने के लिए ही कहते हैं और सभी मोह-माया के विरुद्ध ही हैं | सभी नशे को गलत बताते हैं, सभी हिंसा के विरोध में हैं..... कुल मिलाकर भीतर कोई भेद नहीं है | केवल मानव से प्रेम करना पाप है, केवल सुख की अभिलाषा करना पाप है....जो कुछ पाना है वह मरने के बाद ही पाना | जो कुछ भी मिलेगा वह स्वर्ग, जन्नत और हेवन में ही मिलेगा | हूरें, अप्सराएँ, परी सभी कुछ.... लेकिन जीते जी नहीं, क्योंकि जीते जी इनकी कामना करना पाप है |
सभा के अंत में मंच में बैठे संतों में से एक की नजर मुझपर पड़ी और मुझे बुलाया; "आपको शर्म नहीं आती इतने बड़े धार्मिक अनुष्ठान में आकर भी नहीं सुधरे ? यहीं बैठ कर शराब पी रहे हो ?" उन्होंने मुझे बड़े प्यार से कहा |
"जी मैं तो सांसारिक व्यक्ति हूँ, आप लोगों की तरह महान आत्मा तो हूँ नहीं, इसलिए शर्म आदि से मेरा कभी परिचय हुआ नहीं | सोचा था कि आप लोगों की अमृतवाणी से कोई लाभ हो जाएगा...." मैंने भोलेपन से उत्तर दिया और दो घूँट लगा लिया | "वैसे आप सभी की बातें सुनने के बाद यही समझ में आया कि मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर की अराधना करना और उनका नाम जपते रहना मात्र ही है | हमें केवल ईश्वर को पाने का प्रयत्न करना चाहिए... है न ?" मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा |
"बिलकुल बिलकुल ऐसा ही है | वाह तुमने कुछ तो सीखा कम से कम !" वे खुश होते हुए बोले |
"यदि ईश्वर को केवल अपने भक्ति ही करवानी होती, जयकारे ही लगवाने होते, तो वे हमें दुनिया में भेजते ही क्यों ? क्या उनके पास जगह की कमी थी जो उन्होंने हमें पृथ्वी पर भेजा ? क्या उनके पास घंटे, घड़ियाल आदि नहीं थे ? क्या मानव को मानव का सहयोगी होना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए ?" मैंने कई प्रश्न कर दिए उनसे |
वे आँखे बड़ी बड़ी करके देखने लगे और बोले, "इस बेवड़े को उठाकर बाहर फेंक दो क्योंकि इस पापी को धर्म की बातें समझ में कभी नहीं आ सकती |" और मुझे उठाकर धार्मिकों की दुनिया से बाहर फेंक दिया गया | तब से आज तक फिर कभी धार्मिक नहीं हो पाया | -विशुद्ध चैतन्य
मैंने दो घूँट लगाए और वहीँ एक पेड़ के नीचे लुढ़क गया | सोचा कि जीवन में कभी कोई पुन्य तो किया नहीं, आज इतने महान आत्माएं एकत्रित हुईं हैं तो इनके कुछ अमृत-वचन सुन लूँगा तो शायद कुछ पुण्य प्राप्त हो जाए |
सभी विद्वान् अपने अपने विचार रख रहे थे और धार्मिक लोग भाव-विभोर हो रहे थे | कोई गीता के श्लोक सुना रहा था तो कोई रामायण के, कोई क़ुरान की आयतें सुना रहा था तो कोई बाइबल के अंश | शाम तक वहीँ बैठा रहा मैं और मुझे यह जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि सभी धर्म तो एक ही बात कहते हैं, बस कहने का ढंग अलग अलग है | सभी ईश्वर से प्रेम करना ही सिखाते हैं, सभी समर्पण करने के लिए ही कहते हैं और सभी मोह-माया के विरुद्ध ही हैं | सभी नशे को गलत बताते हैं, सभी हिंसा के विरोध में हैं..... कुल मिलाकर भीतर कोई भेद नहीं है | केवल मानव से प्रेम करना पाप है, केवल सुख की अभिलाषा करना पाप है....जो कुछ पाना है वह मरने के बाद ही पाना | जो कुछ भी मिलेगा वह स्वर्ग, जन्नत और हेवन में ही मिलेगा | हूरें, अप्सराएँ, परी सभी कुछ.... लेकिन जीते जी नहीं, क्योंकि जीते जी इनकी कामना करना पाप है |
सभा के अंत में मंच में बैठे संतों में से एक की नजर मुझपर पड़ी और मुझे बुलाया; "आपको शर्म नहीं आती इतने बड़े धार्मिक अनुष्ठान में आकर भी नहीं सुधरे ? यहीं बैठ कर शराब पी रहे हो ?" उन्होंने मुझे बड़े प्यार से कहा |
"जी मैं तो सांसारिक व्यक्ति हूँ, आप लोगों की तरह महान आत्मा तो हूँ नहीं, इसलिए शर्म आदि से मेरा कभी परिचय हुआ नहीं | सोचा था कि आप लोगों की अमृतवाणी से कोई लाभ हो जाएगा...." मैंने भोलेपन से उत्तर दिया और दो घूँट लगा लिया | "वैसे आप सभी की बातें सुनने के बाद यही समझ में आया कि मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर की अराधना करना और उनका नाम जपते रहना मात्र ही है | हमें केवल ईश्वर को पाने का प्रयत्न करना चाहिए... है न ?" मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा |
"बिलकुल बिलकुल ऐसा ही है | वाह तुमने कुछ तो सीखा कम से कम !" वे खुश होते हुए बोले |
"यदि ईश्वर को केवल अपने भक्ति ही करवानी होती, जयकारे ही लगवाने होते, तो वे हमें दुनिया में भेजते ही क्यों ? क्या उनके पास जगह की कमी थी जो उन्होंने हमें पृथ्वी पर भेजा ? क्या उनके पास घंटे, घड़ियाल आदि नहीं थे ? क्या मानव को मानव का सहयोगी होना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए ?" मैंने कई प्रश्न कर दिए उनसे |
वे आँखे बड़ी बड़ी करके देखने लगे और बोले, "इस बेवड़े को उठाकर बाहर फेंक दो क्योंकि इस पापी को धर्म की बातें समझ में कभी नहीं आ सकती |" और मुझे उठाकर धार्मिकों की दुनिया से बाहर फेंक दिया गया | तब से आज तक फिर कभी धार्मिक नहीं हो पाया | -विशुद्ध चैतन्य
11 जुलाई 2014
अब भीड़ होगी, भक्त होंगे, भजन होंगे, संकीर्तन होंगे.... लेकिन...
बीस वर्ष पुरानी एक घटना याद आ गयी | मैं तब कई तरह के साधना व प्रयोगों में रत था जिनमें रेकी, हिप्नोसिस, व अन्य ध्यान आदि | मैं सभी तरह के ध्यान शिविरों में जाना पसंद करता था चाहे ओशो हो या आर्ट ऑफ़ लिविंग या ब्रम्हकुमारी...आदि |
मैंने आर्ट ऑफ़ लिविंग का तीन दिवसीय शिविर अटैंड किया | मुझे बहुत ही अच्छा लगा विशेषकर सुदर्शन क्रिया | फिर उसके बाद भी कई किये और शिविर के संयोजक भी मुझसे बहुत घुल मिल गए और वे चाहते थे कि मैं रविशंकर जी से एक बार मिल लूं और शिविर का सञ्चालन करने की ट्रेनिंग लेकर ग्रुप में शामिल हो जाऊं | मैंने भी काफी हद तक मन बना लिया था क्योंकि मैं आध्यात्मिक क्षेत्र में आना चाहता था |
लेकिन एक शिविर में ऐसा हुआ कि पूरे दिन भर ध्यान और सुदर्शन क्रिया में वह आनंद नहीं आया जो कि हमेशा आता था | शाम को एक नया कार्यक्रम जोड़ा गया संकीर्तन का और उसमें रविशंकर जी की तस्वीर के सामने सभी बैठ कर संकीर्तन करने लगे | जबकि पहले ऐसा नहीं होता था | मुझे बैचैनी शुरू हो गयी और मुझे लगा मैं गलत जगह आ गया |
मैंने संचालक से बात की कि यह सब क्या हो रहा है | तो उन्होंने मुझे संकीर्तन के फायदे गिनवाने शुरू कर दिए | मैंने कहा कि रविशंकर जी का मैं सम्मान करता हूँ लेकिन गुरु के रूप में ईश्वर के रूप में नहीं और यहाँ तो उन्हें ईश्वर बनाकर पूजा अर्चना होने लगी ?
मैं उसी समय वहाँ से उठा और चला आया और फिर कभी नहीं गया आर्ट ऑफ़ लिविंग | जाने आज कैसा होता होगा आर्ट ऑफ लिविंग का शिविर | तब तो त्रिदिवसीय शिविर के लिए पाँच सौ रूपये लिए जाते थे आज कल सुना है कि शायद हज़ार रूपये लिए जाते हैं |
लेकिन मैं मानता हूँ कि अब वह आध्यात्मिक उर्जा और वातावरण नहीं होगा वहाँ जो मैंने देखा था कभी | अब भीड़ होगी, भक्त होंगे, भजन होंगे, संकीर्तन होंगे.... लेकिन वह विशिष्ट वातावरण नहीं होगा जो मैंने अनुभव किया था कभी | -विशुद्ध चैतन्य
मैंने आर्ट ऑफ़ लिविंग का तीन दिवसीय शिविर अटैंड किया | मुझे बहुत ही अच्छा लगा विशेषकर सुदर्शन क्रिया | फिर उसके बाद भी कई किये और शिविर के संयोजक भी मुझसे बहुत घुल मिल गए और वे चाहते थे कि मैं रविशंकर जी से एक बार मिल लूं और शिविर का सञ्चालन करने की ट्रेनिंग लेकर ग्रुप में शामिल हो जाऊं | मैंने भी काफी हद तक मन बना लिया था क्योंकि मैं आध्यात्मिक क्षेत्र में आना चाहता था |
लेकिन एक शिविर में ऐसा हुआ कि पूरे दिन भर ध्यान और सुदर्शन क्रिया में वह आनंद नहीं आया जो कि हमेशा आता था | शाम को एक नया कार्यक्रम जोड़ा गया संकीर्तन का और उसमें रविशंकर जी की तस्वीर के सामने सभी बैठ कर संकीर्तन करने लगे | जबकि पहले ऐसा नहीं होता था | मुझे बैचैनी शुरू हो गयी और मुझे लगा मैं गलत जगह आ गया |
मैंने संचालक से बात की कि यह सब क्या हो रहा है | तो उन्होंने मुझे संकीर्तन के फायदे गिनवाने शुरू कर दिए | मैंने कहा कि रविशंकर जी का मैं सम्मान करता हूँ लेकिन गुरु के रूप में ईश्वर के रूप में नहीं और यहाँ तो उन्हें ईश्वर बनाकर पूजा अर्चना होने लगी ?
मैं उसी समय वहाँ से उठा और चला आया और फिर कभी नहीं गया आर्ट ऑफ़ लिविंग | जाने आज कैसा होता होगा आर्ट ऑफ लिविंग का शिविर | तब तो त्रिदिवसीय शिविर के लिए पाँच सौ रूपये लिए जाते थे आज कल सुना है कि शायद हज़ार रूपये लिए जाते हैं |
लेकिन मैं मानता हूँ कि अब वह आध्यात्मिक उर्जा और वातावरण नहीं होगा वहाँ जो मैंने देखा था कभी | अब भीड़ होगी, भक्त होंगे, भजन होंगे, संकीर्तन होंगे.... लेकिन वह विशिष्ट वातावरण नहीं होगा जो मैंने अनुभव किया था कभी | -विशुद्ध चैतन्य
09 जुलाई 2014
सन्यासी कौन ?
अक्सर लोग कहते हैं कि सन्यासी को ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए | उसे यह करना चाहिए व वह करना चाहिए या यह खाना चाहिए या वह नहीं खाना चाहिए….यदि देखा जाए तो यह उन लोगों की समस्या है जो स्वयं से असंतुष्ट हैं और संन्यास का मूल अर्थ ही नहीं पता | यदि सन्यासी को सामाजिक तौर तरीके से ही रहना है तो फिर सन्यास लिया ही क्यों जाए ? फिर तो वह किसी भी संस्था में चला जाए और उनके नियम कानून को अपना ले जिनके नियम उसे अच्छे लगते हैं ? सन्यास स्वमर्यादित मुक्ति है, न कि कोई बंधन |
मेरी समस्या यह है कि सन्यासी को क्या खाना चाहिए और कैसे रहना चाहिए अब वे लोग सिखायेंगे, जो स्वयं अपनी मर्यादा नहीं जानते ? जो दूसरों की संपत्ति पर निगाह गड़ाए रहते हैं ? जो दूसरों के आय और बैंक पर लार टपकाते घूमते हैं ? जो अपनी ही संस्कृति और भाषा को विदेशियों से कम करके आँकते हैं ? जिनके बच्चों को राष्ट्रीय भाषा नहीं आती इस बात से शर्मिंदा नहीं होते, लेकिन इस बात से शर्मिंदा होते हैं कि अंग्रेजी, फ्रेंच या जर्मन नहीं आती ? आज अधिकांश आश्रम कान्वेंट स्कूलों में परिवर्तित हो चुके हैं | भारतीय संस्कृति व शिक्षा तो केवल स्वाद के लिए आचार की तरह ही परोसे जाते हैं | जिसे खाना या न खाना थाली लेने वाले पर निर्भर करता है |
एक सन्यासी होने का अर्थ है आत्म चिंतन के लिए पर्याप्त अवसर को पाना और फिर तय करना कि उसे क्या करना है | लेकिन लोग सन्यास लेते हैं झूठी जयकारा, श्रद्धा व भौतिक सुख के लिए | ये लोग वही होते हैं जो यह कहते हैं कि मैं तो उस आश्रम से सन्यास लूँगा जो अपनी जाति या वर्ण का होगा | ये लोग संसार त्यागने का नाटक करते हैं लेकिन सारी मेहनत सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए ही करते हैं | इसलिए आज मौलिक सन्यासी लुप्त होते जा रहें हैं और सांसारिक सन्यासियों का ही वर्चस्व छाता जा रहा है |
सन्यास का अर्थ कभी भी यह नहीं रहा कि यह कोई समाज का रूप ले या जिसने सन्यास लिया वह गृहस्थ नहीं हो सकता या कोई गृहस्थ सन्यासी नहीं हो सकता | ठाकुर दयानंद देव जी ने कहा था, “मैं आध्यात्मिक जगत और भौतिक जगत के बीच सेतु (ब्रिज) बनाना चाहता हूँ |” और वे सही ही कह रहे थे | हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं | नीचे के तीन चक्र भौतिक जगत को प्रभावित करते हैं और ऊपर के तीन चक्र आध्यत्मिक जगत को | जिनके ऊपर के चक्र अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं उनका भौतिक जगत से विरक्ति होने लगती है | यहाँ तक कि उनके अपने शरीर से भी विरक्ति होने लगती है और कुछ तो शरीर के रख रखाव के प्रति भी लापरवाह हो जाते हैं | जबकि जिनका नीचे के तीन चक्र ही सक्रिय हो पाते हैं वे भोग विलास को महत्व देते हैं |
ठाकुर दयानंद देव जी के कहने का तात्पर्य यह था कि वे चाहते थे कि व्यक्ति केंद्र में रह कर दोनों जगत के आनंद की अनुभूति करे | जब सातों चक्र या लोक का आनंद कोई प्राप्त करता है तो स्वतः ही मोक्ष उपलब्ध हो जाता है | किसी और कर्म-काण्ड या बिचौलियों की आवश्यकता ही नहीं रह जाती | लेकिन अधिकांश लोग केवल मूलाधार चक्र तक ही सीमित रह जाते हैं जीवन पर्यन्त | उनका जीवन बाहर से देखने में निसंदेह बहुत आकर्षक लगता हैं, लेकिन वास्तव में उनमें और पशुओं के जीवन शैली में कोई अंतर नहीं रह जाता | पशु पक्षी भी स्वयं को संवारने में समय लगाते हैं, भोजन की व्यवस्था करने में, रहने व जनन के लिए व्यवस्था करने में और अपने संगी साथियों के साथ समय बिताने में जीवन व्यतीत कर देते हैं | यही काम तो एक आम व्यक्ति भी करता है |
लेकिन मैं मानता हूँ कि संत वे लोग होते हैं जिनके कारण समाज को एक नई दिशा मिलती है या वे प्रयासरत रहते हैं जैसे; एडिसन, सुकरात, ब्रूसली, विवेकानंद, वातस्यायन, चाणक्य, मंगल पांडे, शंकराचार्य, ओशो, रामदेव, व्यास, वैलेंटाइन, वाल्मीकि, शहीद भगत सिंह…..आदि | ये सभी लोग अलग अलग क्षेत्र में अपना योगदान दिया क्योंकि ये लोग वास्तविक संत थे | इन लोगों ने अपने जन्म का उद्देश्य को जाना | लेकिन हर किसी को संत बनने की आवश्यकता नहीं है | यदि ठाकुर दयानंद देव जी के मार्ग को चुनते तो व्यक्ति केंद्रीय चक्र पर स्थिर रहकर भौतिक व आध्यात्मिक सुखों को पूर्णता से भोगते हुए भी एक महान संत बन सकता है | दुर्भाग्य यह रहा कि स्वयं ठाकुर दयानंद के शिष्य व अनुयाई यह बात नहीं समझ पाए और बिना समझे भक्ति मार्ग पर उतर गए और भुखमरी और दरिद्रता को आध्यात्म मान कर न तो स्वयं की सहायता कर पाए और न ही किसी और की |
तो संत वे नहीं जो केवल अच्छे ग्रन्थ लिख लेते हैं या कोई भौतिक जगत की निंदा करते फिरते हैं, या नंगे घूमते हैं, या कोई जादूगरी दिखाते हैं…. वास्तविक संत वे ही हैं जिन्होंने सारे चक्रों को साधा और उनपर पूर्ण नियंत्रण है | जैसे एक सारथि का अपने घोड़ों पर होता है, ड्राइवर का अपनी गाड़ी में होता है… लेकिन क्या आप उसे अच्छा सारथि मानेंगे, जो यह कहे कि घोड़ों का त्याग करने से ही रथ सही दिशा में चलेगी ? या उस ड्राइवर को अच्छा ड्राइवर मानेंगे, जो कहे कि यह कार तो नश्वर है इसका मोह छोड़ दो और पैदल चलो यदि अपनी मंजिल तक पहुँचाना है ? ~विशुद्ध चैतन्य
ठाकुर दयानंद देव जी के कहने का तात्पर्य यह था कि वे चाहते थे कि व्यक्ति केंद्र में रह कर दोनों जगत के आनंद की अनुभूति करे | जब सातों चक्र या लोक का आनंद कोई प्राप्त करता है तो स्वतः ही मोक्ष उपलब्ध हो जाता है | किसी और कर्म-काण्ड या बिचौलियों की आवश्यकता ही नहीं रह जाती | लेकिन अधिकांश लोग केवल मूलाधार चक्र तक ही सीमित रह जाते हैं जीवन पर्यन्त | उनका जीवन बाहर से देखने में निसंदेह बहुत आकर्षक लगता हैं, लेकिन वास्तव में उनमें और पशुओं के जीवन शैली में कोई अंतर नहीं रह जाता | पशु पक्षी भी स्वयं को संवारने में समय लगाते हैं, भोजन की व्यवस्था करने में, रहने व जनन के लिए व्यवस्था करने में और अपने संगी साथियों के साथ समय बिताने में जीवन व्यतीत कर देते हैं | यही काम तो एक आम व्यक्ति भी करता है |
लेकिन मैं मानता हूँ कि संत वे लोग होते हैं जिनके कारण समाज को एक नई दिशा मिलती है या वे प्रयासरत रहते हैं जैसे; एडिसन, सुकरात, ब्रूसली, विवेकानंद, वातस्यायन, चाणक्य, मंगल पांडे, शंकराचार्य, ओशो, रामदेव, व्यास, वैलेंटाइन, वाल्मीकि, शहीद भगत सिंह…..आदि | ये सभी लोग अलग अलग क्षेत्र में अपना योगदान दिया क्योंकि ये लोग वास्तविक संत थे | इन लोगों ने अपने जन्म का उद्देश्य को जाना | लेकिन हर किसी को संत बनने की आवश्यकता नहीं है | यदि ठाकुर दयानंद देव जी के मार्ग को चुनते तो व्यक्ति केंद्रीय चक्र पर स्थिर रहकर भौतिक व आध्यात्मिक सुखों को पूर्णता से भोगते हुए भी एक महान संत बन सकता है | दुर्भाग्य यह रहा कि स्वयं ठाकुर दयानंद के शिष्य व अनुयाई यह बात नहीं समझ पाए और बिना समझे भक्ति मार्ग पर उतर गए और भुखमरी और दरिद्रता को आध्यात्म मान कर न तो स्वयं की सहायता कर पाए और न ही किसी और की |
तो संत वे नहीं जो केवल अच्छे ग्रन्थ लिख लेते हैं या कोई भौतिक जगत की निंदा करते फिरते हैं, या नंगे घूमते हैं, या कोई जादूगरी दिखाते हैं…. वास्तविक संत वे ही हैं जिन्होंने सारे चक्रों को साधा और उनपर पूर्ण नियंत्रण है | जैसे एक सारथि का अपने घोड़ों पर होता है, ड्राइवर का अपनी गाड़ी में होता है… लेकिन क्या आप उसे अच्छा सारथि मानेंगे, जो यह कहे कि घोड़ों का त्याग करने से ही रथ सही दिशा में चलेगी ? या उस ड्राइवर को अच्छा ड्राइवर मानेंगे, जो कहे कि यह कार तो नश्वर है इसका मोह छोड़ दो और पैदल चलो यदि अपनी मंजिल तक पहुँचाना है ? ~विशुद्ध चैतन्य

03 जुलाई 2014
सहआस्तित्व में सहयोगी होना ही सृष्टि का मूल धर्म है |
हमारे पास दो विधि हैं किसी को सहयोगी बनाने के लिए; प्रेम और निंदा | प्रेम पशु को भी मित्र बना सकता है और निंदा मित्र को भी शत्रु बना सकता है | चुनाव आपको करना है कि कौन सी विधि अपनानी है | ~विशुद्ध चैतन्य
24 जनवरी 2014
Love is nothing without forgiveness and forgiveness is nothing without love.
किसी को किसी की भूल के लिए क्षमा करना और आत्मग्लानि से मुक्ति दिलाना एक बहुत बड़ा परोपकार है. क्षमा करने की प्रक्रिया मेंक्षमा करने वाला क्षमा पाने वाले से कहीं अधिक सुख पाता है. अगर सोचा जाये तोछोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी ग़लती को कभी भी past में जा कर संवारा नहीं जासकता , उसके लिए क्षमा से अधिक कुछ नहीं माँगा जा सकता है.
अगर आप किसी की भूल को माफ़ करते हैं तो उस व्यक्ति की सहायता तो करते ही हैं साथ ही साथ स्वयं की सहायता भी करते हैं. क्षमा करने के लिए व्यक्ति को अपनी Ego से ऊपर उठ कर सोचना पड़ता है जो कि एक कठिन काम है और सिर्फ एक सहनशील व्यक्ति ही इसे कर सकता है.
कभी आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि अपनी रोज़ की ज़िन्दगी में हम कितनो को क्षमा करते हैं और कितनो से क्षमा पाते हैं. कितना आसान है किसी से एक शब्द Sorry कह कर आगे निकल जाना और बदले में अपने आप ही ये सोच लेना कि उस व्यक्ति ने हमे माफ़ भी कर दिया होगा.
क्या होता अगर हमारे माता- पिता हमारी भूलों के लिए हमें क्षमा नहीं करते? क्या हो अगर ईश्वर हमें हमारे अपराधों के लिए क्षमा करना छोड़ दे . इसलिए अगर हम किसी को क्षमा नहीं कर सकते तो हम ईश्वर से अपने लिए माफ़ी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं.
किसी महान व्यक्ति ने कहा है कि किसी को किसी की भूल के लिए माफ़ ना करना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे ज़हर खुद पीना और उम्मीद करना कि उसका असर दूसरे पर हो. सोचिये कि अगर क्षमा नाम का परोपकार इस दुनिया में ना हो तो कोई किसी से कभी प्रेम ही नहीं कर पायेगा
05 जनवरी 2014
मूलमंत्र यह कि जो आप पाना चाहते हैं उसपर ध्यान केन्द्रित न कर उस पर ध्यान लगाइए जो आपको अच्छा लगता है | आपका वही शौक आपको आपकी मंजिल पर पहुँचा देगा |
जो महत्वपूर्ण बात इन सभी में देखी मैंने वह यह कि सभी अपने अपने धुन में मगन थे | अपने काम को बेहतर से बेहतर करना चाहते थे और उसके लिए कई कई टेक देने को तैयार रहते थे | मुझे याद है एक गाने की रिकॉर्डिंग में मैंने शुभा जी से एज ही गाने १५ टेक लिए और १५वें टेक के बाद शुभा जी नाराज होकर सिंगिंग बूथ से बाहर आ गयीं | लेकिन जब मैंने उन पंद्रह टेकों को एक साथ सुनाया और एक राजस्थानी लड़कियों के ग्रुप सोंग की तरह वह गीत उभर कर आया तब वे भी खुश हुईं |
जब सुनिधि चौहान मेरे पास पहली और आखरी बार आई थी तब उसके पिताजी धनञ्जय जी एक डेमो बनवाना चाहते थे और वह तब १०-११ साल की थीं | जब रिकार्डिंग हो रही थी तो हर गाने के रिकार्डिंग के बाद वह आती और सुनती थी और फिर पूछती थी कि कहीं कोई सुर गलत तो नहीं लगा न ? और मैं कहता था कि ठीक ही है तो वह कहती नहीं, फिर से गाऊँगी और फिर वही गाना दोबारा गाती थी | जब तक उसे यह नहीं कह देता कि वाह !!! परफेक्ट...!!! और जब वह जाते समय पैर छू कर आशीर्वाद लेने आई तब मेरे मुँह से निकला था, "बहुत ही जल्द तुम बहुत ही ऊँचाई पर पहुँचोगी |"
तो एक बात तो तय है कि जब आप की आत्मा और मन एक ही सुर-ताल पर बंधे हों तो सफलता निश्चित है | आपको अपने काम को स्वयं ही जाँचना और मीन-मेख निकालना आना चाहिए | आप एक ही धुन पर २४ घंटे खोये रहते हो यही तपस्या है और यही साधना है | आपका काम क्या है और कैसा है यह महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होता है कि आप अपने काम को कितना महत्व देते हैं |
कई सन्यासियों और साधकों को देखता हूँ कि निकले तो ईश्वर की प्राप्ति के लिए हैं, लेकिन उनका ईश्वर केवल मूर्ति में ही सिमट कर रह गया है | वे मूर्ति के सामने तो सच्चे भक्त बने होते हैं और मूर्ति या मंदिर के पीछे जाकर गोल्ड फ्लेक या नेविकट फूंक रहे होते हैं, शायद उन्हें लगता है कि भगवान की आँखे पीछे तो हैं नहीं तो देखेंगे कैसे | कई संत तो भक्तों को देखते ही संत हो जाते हैं और बाकी समय.....!!!
कई मित्र कहते हैं कि जब वे लोग इतनी ऊँचाई पर पहुँच गए तो आप क्यों पीछे रह गए ? आप क्यों पैसे पैसे को मोहताज़ भटक रहे हो ?
भौतिक दृष्टि से देखूं तो मैंने कोई उपलब्धि हासिल नहीं की, लेकिन आध्यात्मिक क्षेत्र में जो उपलब्धि मुझे प्राप्त हुई है उससे मैं संतुष्ट हूँ | इस लम्बी और नीरस एकांकी यात्रा में कई बार अपने साथियों के चर्चे अखबारों में पढ़कर सोचता था कि क्या मैंने रास्ता गलत चुना है ? लेकिन फिर कहता कि यह रास्ता तो मैंने स्वयम नहीं चुना है, यह तो परिस्थितियों ने मुझे धकेल दिया है | शायद तब मैं दुनिया को समझ रहा था और अब आध्यात्म को | भौतिक दृष्टि से मुझे कोई सुख या उपलब्धि प्राप्त हो न हो, पर यह जो ज्ञान मैंने अब तक प्राप्त किया उसका चाहे इस जीवन में कोई योगदान हो न हो, अगले जीवन में अवश्य ही काम आएगा | इसलिए मैं किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं हूँ |
वर्जिन ग्रुप के मालिक Richard Branson ने एक बार कहा था, "मैंने कभी पैसे कमाने के लिए काम नहीं किया, मैंने वही किया जो मुझे अच्छा लगा या जो उस समय मैं कर सकता था" | और मैंने जितने उस समय के साथियों के नाम बताये वे सभी इसी सिद्धांत पर थे | उन्हें अपना काम पसंद था और वे यह नहीं सोचते थे कि उन्हें पारिश्रमिक कम मिला या अधिक, बस उन्हें तो स्टूडियो में आकर परफोर्म करना अच्छा लगता था | लेकिन मैं अपने इस जीवन यात्रा में ऐसे लोगों से भी मिला, जो बहुत ही अच्छे कलाकार थे, लेकिन वे पारिश्रमिक को लेकर बहुत ही परेशान रहते थे और आज भी वे परेशान हैं और वहीँ हैं | उनकी असफलता का कारण था कि वे पैसों के लालच में आये थे न कि कला उनकी आराधना या साधना थी | उनहोंने सीखा केवल यह देखकर कि एक शिफ्ट में एक आर्टिस्ट को इतने मिल जाते हैं तो अगर मुझे महीने के दस शिफ्ट मिल गई तो एक मोटी तनख्वाह बन जाती है |
तो आप सभी से निवेदन है कि आज यदि आप बेरोजगार हैं या किसी ऐसे कामों में फंसे हुए हैं जो आपको पसंद नहीं है लेकिन मजबूरी में कर रहें हैं, तो उस पर पुनर्विचार कीजिये कि इस परिस्थति में आप कौन सा ऐसा काम कर सकते हैं जो आपको संतुष्टि देता है | चाहे थोड़ा सा समय ही दें, लेकिन दें अवश्य | फिर चाहे वह काम किसी पेड़ के नीचे जाकर सोने का ही क्यों न हो, वह भी व्यर्थ नहीं है यदि आप को उससे संतुष्टि मिलती है तो | रही दुनिया की बात तो दुनिया का काम है बोलना और बोलती रहेगी, चाहे आप कुछ करो या न करो | लेकिन आपका दुःख-दर्द बाँटने नहीं आने वाली |
मूलमंत्र यह कि जो आप पाना चाहते हैं उसपर ध्यान केन्द्रित न कर उस पर ध्यान लगाइए जो आपको अच्छा लगता है | आपका वही शौक आपको आपकी मंजिल पर पहुँचा देगा | -विशुद्ध चैतन्य
18 दिसंबर 2013
जब ईश्वर की मर्जी से ही सब कुछ होता है तो....?
कई हज़ार साल पहले मैं भी घनघोर नास्तिक था | मैं भी अत्याधुनिक नास्तिकों की तरह अकड़ कर चलता था और हर पंडित विद्वान् आचार्यों से प्रश्न करता था कि जब ईश्वर की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिल सकता तो दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है वह ईश्वर की मर्जी से ही हो रहा है ? ईश्वर ही अत्याचार करवा रहा है, ईश्वर ही बलात्कार करवा रहा है, ईश्वर ही आतंकवाद फैला रहा है....?
वे बेचारे केवल इतना ही कहते कि तेरे से तो बात करना ही बेकार है | लेकिन किसी ने मुझे कभी भी सही उत्तर नहीं दिया क्योंकि उनका ज्ञान उधार का था | उन्होंने वही कहा जो सुना या पढ़ा, न कि समझा और जाना | यदि जानने की कोशिश की होती तो अवश्य जान जाते कि सत्य क्या है ? लेकिन भेड़-बुद्धि और तोता ज्ञान से ज्ञानी बने लोगों ने ऋषियों की इस महत्वपूर्ण तथ्य को समझने की कोशिश नहीं की |
मैंने कई हज़ार साल एकांत में रहकर तपस्या की और जाना कि तथ्य क्या है | वह आज आपको भी बता रहा हूँ |
यह सत्य है कि ईश्वर की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता | ठीक वैसे ही जैसे बिजली के बगैर कंप्यूटर नहीं चलता | अब आप कहेंगे कि कम्पुटर तो बैटरी से भी चलता है | लेकिन मैं फिर भी कहूँगा कि कंप्यूटर बिजली से ही चल रहा है | आप कहेंगे कि सोलर एनर्जी से कंप्यूटर चला सकते हैं, तो मैं कहूँगा कि तब भी बिजली से ही चल रहा है | क्योंकि कंप्यूटर को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि सोर्से क्या है, उसे तो बिजली चाहिए चलने के लिए चाहे सूरज से पैदा करो या बैटरी से |
अब दूसरा प्रश्न था कि जब ईश्वर की मर्जी से ही सब कुछ होता है तो....? बिजली से ही यदि कंप्यूटर चलता है तो...?
हर कंप्यूटर मैं अपने अपने प्रोग्राम होते हैं लेकिन मुख्य होता है कंप्यूटर का motherboard, प्रोसेसर, रेम, ग्राफिक कार्ड, डिस्प्ले और OS | ये सभी चीजें प्राणियों में भी होती हैं | जब कंप्यूटर आप घर लेकर आते हैं, यानी जब बच्चा पैदा होता है तो आप अपनी पसंद का प्रोग्राम उसमें डालते हैं | कोई अकाउंट का तो फोटोशोप तो कोई विडियो एडिटिंग तो कोई ऑडियो एडिटिंग... पसंद सबकी अपनी अपनी लेकिन बच्चा तो बच्चा है | जो आपने सिखाया वह समझ गया और उसी अनुरूप काम करना शुरू कर दिया |
बचपन में आपने उसे सिखाया दूसरे धर्मों से नफरत करना तो वह सीख गया और जब बड़ा हो गया तो बदलने का कोई उपाय नहीं | बचपन में उसे गालियाँ देते समय नहीं रोका तो बड़े होने पर कोई उपाय नहीं..... इस तरह प्रत्येक कम्पुटर एक ही बिजली से चलते हुए भी अलग अलग कार्यो को कर रहें हैं और परिणाम है कि हम एंटीवायरस (कानून) बनाकर समाधान ढूँढ रहें हैं | -विशुद्ध चैतन्य |
वे बेचारे केवल इतना ही कहते कि तेरे से तो बात करना ही बेकार है | लेकिन किसी ने मुझे कभी भी सही उत्तर नहीं दिया क्योंकि उनका ज्ञान उधार का था | उन्होंने वही कहा जो सुना या पढ़ा, न कि समझा और जाना | यदि जानने की कोशिश की होती तो अवश्य जान जाते कि सत्य क्या है ? लेकिन भेड़-बुद्धि और तोता ज्ञान से ज्ञानी बने लोगों ने ऋषियों की इस महत्वपूर्ण तथ्य को समझने की कोशिश नहीं की |
मैंने कई हज़ार साल एकांत में रहकर तपस्या की और जाना कि तथ्य क्या है | वह आज आपको भी बता रहा हूँ |
यह सत्य है कि ईश्वर की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता | ठीक वैसे ही जैसे बिजली के बगैर कंप्यूटर नहीं चलता | अब आप कहेंगे कि कम्पुटर तो बैटरी से भी चलता है | लेकिन मैं फिर भी कहूँगा कि कंप्यूटर बिजली से ही चल रहा है | आप कहेंगे कि सोलर एनर्जी से कंप्यूटर चला सकते हैं, तो मैं कहूँगा कि तब भी बिजली से ही चल रहा है | क्योंकि कंप्यूटर को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि सोर्से क्या है, उसे तो बिजली चाहिए चलने के लिए चाहे सूरज से पैदा करो या बैटरी से |
अब दूसरा प्रश्न था कि जब ईश्वर की मर्जी से ही सब कुछ होता है तो....? बिजली से ही यदि कंप्यूटर चलता है तो...?
हर कंप्यूटर मैं अपने अपने प्रोग्राम होते हैं लेकिन मुख्य होता है कंप्यूटर का motherboard, प्रोसेसर, रेम, ग्राफिक कार्ड, डिस्प्ले और OS | ये सभी चीजें प्राणियों में भी होती हैं | जब कंप्यूटर आप घर लेकर आते हैं, यानी जब बच्चा पैदा होता है तो आप अपनी पसंद का प्रोग्राम उसमें डालते हैं | कोई अकाउंट का तो फोटोशोप तो कोई विडियो एडिटिंग तो कोई ऑडियो एडिटिंग... पसंद सबकी अपनी अपनी लेकिन बच्चा तो बच्चा है | जो आपने सिखाया वह समझ गया और उसी अनुरूप काम करना शुरू कर दिया |
बचपन में आपने उसे सिखाया दूसरे धर्मों से नफरत करना तो वह सीख गया और जब बड़ा हो गया तो बदलने का कोई उपाय नहीं | बचपन में उसे गालियाँ देते समय नहीं रोका तो बड़े होने पर कोई उपाय नहीं..... इस तरह प्रत्येक कम्पुटर एक ही बिजली से चलते हुए भी अलग अलग कार्यो को कर रहें हैं और परिणाम है कि हम एंटीवायरस (कानून) बनाकर समाधान ढूँढ रहें हैं | -विशुद्ध चैतन्य |
साक्षी भाव का ध्यान

"...लेकिन मैं ठीक होना ही नहीं चाहता तो कोई भी विधि काम नहीं करेगी | मैं कई ऐसी चीजें जानता हूँ जिनसे में अपना उपचार कर सकता हूँ, लेकिन कुछ नहीं कर रहा हूँ |
कारण है कि मैं इस समय सभी प्रकार के जिम्मेदारियों से मुक्त हूँ | न मुझे किसी से मिलना है और न ही कोई मुझसे मिलने आने वाला है | तो यहाँ मैं अपने ऊपर ही प्रयोग कर सकता हूँ | मैं जान सकता हूँ वे बहुत सी बातें जो शायद पहले यहाँ किसी ने जानने की कोशिश नहीं की |
ओशो ने कहा था कि जब दुःख तुम्हें घेर लें, उदासी के गहरे अंधेरों में सामने लगो तब तुम साक्षी हो जाओ | भागो मत, बचने के उपाय मत करो, उनका स्वागत करो, एक आत्मीय मित्र की तरह उन्हें गले लगाओ | आपका अपना पन, आत्मीयता उन्हें रास न आएगी क्योंकि उन्होंने तो हमेशा लोगों को दूर भागते हुए देखा है और आज आप उनका स्वागत कर रहे हो | उनको यह आत्मीयता रास न आयगी और वे भाग खड़े होंगे | तो गहरे में डूब जाओ, जानने और समझने की कोशिश करो कि दुःख और उदासी हैं क्या ? उनका आकार-प्रकार और व्यवहार क्या है...?
तो मैं वही ध्यान कर रहा हूँ | साक्षी भाव का ध्यान |" -विशुद्ध चैतन्य
सदस्यता लें
संदेश (Atom)














