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25 जून 2018

न धर्म बचा है न इंसानियत, अब तो केवल ढोंग बचा है

मेरे एक पोस्ट पर दो महत्वपूर्ण कमेंट्स आये थे जिनका उत्तर मैं विस्तार से देना चाहता था...पहले पोस्ट पढ़ लीजिये, फिर वे दो महत्वूर्ण कमेंट्स और फिर मेरा उत्तर....

कोई मुस्लिम मारा जाए भीड़ द्वारा तो मुस्लिम समाज चिंतित हो जाएगा लेकिन कोई मुस्लिम भूख से मर रहा हो, उसके खेत की फसल नष्ट...
विशुद्ध चैतन्य द्वारा इस दिन पोस्ट की गई शनिवार, 23 जून 2018

"अप्राकृतिक मौत तो अत्यंत दुखद है। किन्तु गुरूजी मोब लिंचिंग व जैसा आपने इंगित किया, अन्य मौत में कुछ फर्क तो है ही। पहली समाज की क्रूरता प्रदर्शित करती है, जो कानूनन अपराध है जबकि दूसरी समाज की उदासीनता जिसे मोरल अपराध तो कहा जा सकता है किन्तु कानूनन अपराध नहीं है।" -Abdul Basit

"Sir with all due respect...
Mje aap ye bta do....
How a person dying from hunger and A person who is healthy, going to live a life,earnig well ..is killed by a anarchist mob is same...How?????
You are violently taking his life...he was capable of all thing...
Yahi to galat hai sir ji....
Aap jaise log iss inhuman crime ko justify karne ke lie aa jate hai......what to say i mean u all had justified kathua rape case..what else can be expected...

If cow are pious ...ask ur gov . To make a law prohibiting cow slaughter
Next time give BJP vote only when they will do that
Otherwise there will be anarchy if this kind of situation will go on
Ask BJP to make law
Stop killing people in name of religion
This is inhuman and cruel thing a man can do...And stop justifying it..plz"
-Arif Khan





उपरोक्त दोनों ही यह कहना चाहते हैं कि भीड़ द्वारा की गयी हत्या और समाज द्वारा किसी को मरता हुआ छोड़ देना, दोनों में भिन्नता है | एक जघन्य अपराध है और दूसरा अपराध की श्रेणी तो आता है लेकिन वह नैतिक अपराध है यानि वह अपराध जघन्य अपराध नहीं है | मुझपर यह भी आरोप लगाया गया कि मैं भीड़ द्वारा की गयी हत्या को जस्टीफाई कर रहा हूँ |

How a person dying from hunger and A person who is healthy, going to live a life,earnig well ..is killed by a anarchist mob is same...How?????


सबसे पहले तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं किताबी धार्मिक नहीं हूँ और न ही धार्मिकता या नैतिकता का ढोंग करना पसंद करता हूँ | मेरे लिए किसी भी भीड़ द्वारा की गयी किसी भी निर्दोष या दोषी की हत्या, बलात्कार....आदि सब अपराध ही है | मैं किसी एक अपराध को धार्मिकता के चश्में से और दूसरे अपराध को राष्ट्रीय कानून या संविधान की नजर से नहीं देखता | मेरे लिए धर्म, जाति या ईशनिंदा के नाम पर हत्या, बलात्कार, सार्वजनिक सम्पत्ति की क्षति, दंगा-फ़साद, लूट-पाट आदि सभी संवैधानिक, नैतिक व धार्मिक अपराध हैं | आप नैतिक अपराध और राष्ट्रीय संविधान की दृष्टि में किये गये अपराधों को अलग अलग रख सकते हैं, किसी को कम या या किसी को अधिक महत्व दे सकते हैं, लेकिन मैं नहीं |

किसी भी निर्दोष का मारा जाना मानवता पर कलंक है | हिंसक पशु भी किसी राह चलते निर्दोष को जान से नहीं मार देते यदि वे पागल या भूखे न हों | लेकिन मानव यदि नर-भक्षी हो जाए, नैतिकता या धार्मिकता के नाम पर तो शर्मनाक है | वह अपनी हवस, अपनी भूख मिटाने के लिए इंसानों का ही शिकार करने लग जाए तो यह शर्मनाक है |

कानून या संविधान


कानून या संविधान वह नियम हैं जो समाज को यह बताता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए | ये नियम तय करते हैं कि क्या पाप है क्या पुण्य, क्या नैतिक हैं और क्या अनैतिक, क्या अपराध है और क्या नहीं, क्या धर्म है और क्या अधर्म |  संविधान चाहे पारिवारिक हो, सामजिक हो, किसी संस्था का हो या किसी राज्य या देश का, सभी में यह सुनिश्चित किया जाता है कि अपराधियों सजा देने का अधिकार भीड़ को नहीं है | सजा केवल अधिकृत विशेषज्ञ ही दे सकते हैं और वह भी पूरी जांच परख करने के बाद |

आप पाप-पुण्य कहें या नैतिक-अनैतिक कहें या अपराध-निरपराध कहें या धर्म-अधर्म | केवल शब्दों का अंतर है, अर्थ एक ही है | धर्म वह जो समाज के लिए हितकर हो, सुखकर हो, सहयोगी हो और अधर्म है विपरीत | जब कोई समाज या भीड़ हिंसक हो जाए और वह किसी निर्दोष की हत्या पर उतारू हो जाए, तो निश्चित मानिए कि वे अपराधी हैं, अधर्मी हैं, अनैतिक हैं | फिर यह हत्या भीड़ की अनदेखी की वजह से हुई हो या जानबूझकर की गयी हो | फिर कोई भूख से मर गया हो, या कर्जों के बोझ से दबकर मर गया हो या दौड़ा दौड़ाकर, पीट पीट कर मार दिया गया हो, एक ही बात है | क्योंकि ये अधर्म है, अनैतिक है, पाप है, अपराध है |

धार्मिकों का दोगला समाज


समाज दोगला होता है विशेषकर धार्मिकों का समाज | वह अपने पाप की सजा के लिए कयामत के दिन की प्रतीक्षा करता है लेकिन दूसरों के पापों की सजा तुरंत देना चाहता है | उदाहरण के लिए ईशनिंदा के नाम पर हत्या या सजा | ईश्वर की निंदा की किसी ने, उसके लिखे किताब को क्षत्ति पहुँचाई तो सारा समाज दौड़ पड़ेगा उसे सजा देने के लिए | तब कयामत की प्रतीक्षा नहीं करेगा | तब नहीं कहेगा कि ईश्वर की निंदा की है, ईश्वर की किताब को क्षति पहुँचाई है, ईश्वर खुद उसे सजा देगा | यानि ईश्वर से ऊपर हो गया समाज जो ईश्वर का अनादर करने वाले को सजा देने निकल पड़ता है ??

दूसरा दोगलापन देखिये समाज का कि यदि अपराधी गरीब है, असहाय है, किसी राजनेता से संरक्षण प्राप्त नहीं है, तो उसे दौड़ा-दौड़ा कर पीट पीट कर मार देंगे | लेकिन यदि अपराधी आर्थिक रूप से समृद्ध है, ऊँचे पदों पर आसीन है, अच्छे रुतबे वाला है, तो वह देश भी बेचकर खा जाये तो यही न्यायप्रिय समाज उसके पीछे दुम हिलाता घूमेगा | यदि अपराधी ने सार्वजनिक रूप से घोषणा भी कर दी अपने अपराधों की, अपने ऊपर चल रहे केसों की, तब भी समाज उसकी जय जयजयकार करते हुए घूमेगा | और ऐसे लोगों में वे भी लोग होंगे, जो खुद को धर्म व नैतिकता का ठेकेदार समझते हैं, जो खुद को धर्मशास्त्रों, कानून व नैतिकता का जानकार समझते हैं |

कोई गरीब चोरी करता पकड़ा जाए तो भीड़ उसे मौत दे देगी, लेकिन यदि कोई नेता चोरी करता पकड़ा जाए तो कानून उसे सजा देगा | देगा भी या नहीं देगा उससे भी समाज को कोई सरोकार नहीं होता, वह जेल में बैठा बैठा ही चुनाव लडेगा और जीत जाएगा | और आप मुझ पर दोष लगा रहे हैं कि मैं अपराध को जस्टिफाई कर रहा हूँ ???

भीड़ द्वारा की गयी हत्या और भूख, बेरोजगारी व कर्ज से हुई आत्महत्या दोनों के लिए भीड़ ही जिम्मेदार है | भीड़ धार्मिकों की, भीड़ नैतिकता के ठेकेदारों की, भीड़ खुद को सभ्य वह शिक्षित मानने वालों की, भीड़ आर्थिक रूप से संपन्न लोगों की और भीड़ धर्म व जाति के नाम पर हत्या करने वालों की....भीड़ ही होती है | भीड़ के पास विवेक नहीं होता, भीड़ के पास अक्ल नहीं होती, वह तो केवल भीड़ है अपनी बुद्धि, सोचने समझने की शक्ति खो चुकी, मानसिक् रूप से विक्षिप्त हो चुकी भीड़ है वह बस और कुछ नहीं | फिर वह खुद को कितना ही धार्मिक दिखाने की कोशिश करे, कितना ही नैतिक दिखाने की कोशिश करे, सब व्यर्थ | क्योंकि कोई निर्दोष मारा गया भीड़ की लापरवाही या उन्माद में वह पाप ही होगा, वह अधर्म होगा |

कठुआ रेप केस धार्मिकता के आढ़ में किया गया था | वह धार्मिक ही नहीं, मानवीय रूप से भी अपराध ही था | किसी को ईशनिंदा के नाम पर मार दिया गया, किसी को कार्टून बनाने पर मार दिया, किसी को फिल्म बनाने पर मार दिया, किसी को आलोचनात्मक लेख लिखने पर मार दिया....ये सब अपराध ही हैं, अधर्म ही हैं | मैं इनमें से किसी भी हत्या को धर्मसंगत नहीं समझता और न ही धार्मिक पुस्तकों या मान्यताओं के आधार पर जस्टिफाई करूँगा |

पहले धर्म को समझ लें, पहले नैतिकता को समझ लें, पहले संविधान को समझ लें...फिर मुझपर कोई आरोप लगायें | कोई लड़की या लड़का आपस में प्रेम करें, वे अकेले में मिलें तो आपका धर्म, नैतिकता खतरे में पड़ जाते है | लेकिन कोई बैंक ही लूटकर फरार हो जाये, कोई दुनिया भर के टैक्स लगाकर आपको लुटे और उसका साथ देते समय आपका धर्म और नैतिकता खतरे में नहीं पड़ता | कोई भीड़ किसी को पीट पीट कर मार दे और मारने वाला और मरने वाला अलग अगल मजहब के हुए तो आपका धर्म और नैतिकता जाग जाता है | लेकिन आपके ही लापरवाही के कारण कोई भूख से तड़प तड़प कर मर जाता है, कोई किसान आत्महत्या कर लेता है, कोई निर्दोष बेघर हो जाता है...तब न तो आपकी नैतिकता जागती है और नहीं धर्म | न तब आपका खुदा नाराज होता है और न ही आपके समाज की नजर में कोई अपराध होता है |

मैं दोगला नहीं हूँ, मैं किसी भी कमजोर, निर्दोष, निहत्थे पर हुए अपराधों को अलग अलग नजरों से नहीं देखता | फिर अपराध असभ्यों की भीड़ करे या सभ्य धार्मिकों की भीड़....मेरे लिए दोनों ही भीड़ हैं और दोनों ही अपराधी हैं |

हाँ मैं परिस्थिति जन्य अपराधों के लिए भी समाज, धर्म व नैतिकता के ठेकेदार व सरकारों को ही दोषी मानता हूँ | किसी को अपने बच्चे या परिवार की जान बचाने के लिए चोरी करनी पड़ी या हथियार उठाने पड़े या हत्या करनी पड़ी तो मैं उसे अपराधी नहीं मानूंगा, बल्कि उस समाज को अपराधी मानूँगा जिसका वह सदस्य है | वह इस अवस्था में पहुँचा क्योंकि समाज ने उसकी सहायता नहीं की | क्योंकि सरकार ने उसकी सहायता नहीं की, उसे न्याय नहीं मिला, इसीलिए ही उसे अपराध करना पड़ा, इसीलिए वह व्यक्ति दोषी नहीं, बल्कि समाज व सरकार ही दोषी माने जायेंगे | मैं ऐसे व्यक्ति को कभी भी सजा देना पसंद नहीं करूँगा |

~विशुद्ध चैतन्य

18 जून 2018

साम्प्रदायिकता नहीं, परस्पर सहयोगिता है वास्तविक धर्म

बीबीसी हिंदी समाचार की एक हेडलाइन 'नौ देशों में विलुप्त हो सकता है धर्म' पर नजर पड़ी | समाचार में लिखा था;

अमेरिकन फ़िज़िकल सोसाइटी' में छपे शोध के नतीजे इशारा करते हैं कि इन देशों में धर्म का लगभग अंत हो जाएगा. डॉक्टर रिचर्ड वीनर कहते हैं कि पेरु में लोग विलुप्त होती जा रही स्थानीय भाषा 'क्यूचुआन' के बजाय स्पेनी भाषा बोलने को कारगर समझ सकते हैं, और यही धर्म के साथ भी हो सकता है.

शोधकर्त्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चेक गणराज्य, फ़िनलैंड, आयरलैंड, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैंड और स्विटज़रलैंड के एक सदी के जनगणना आंकड़ों का अध्ययन किया. रिसर्च कॉरपोरेशन फ़ॉर साइंस एडवांसमेंट' के डॉक्टर रिचर्ड वीनर बीबीसी को बताया, "ये एक सीधा-सा विचार है. जिस सामाजिक समूह में अधिक लोग होंगे, उसकी ओर और अधिक लोग आकर्षित होंगे. बहुत से आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रों में लोग ख़ुद को धर्म से अलग करते जा रहे हैं. नीदरलैंड्स में ये आंकड़ा 40 फ़ीसदी है लेकिन चेक गणराज्य में 60 फ़ीसदी लोग किसी भी धर्म से प्रतिबद्धता नहीं दिखाते."






खबर पढ़ने के बाद मन में प्रश्न उठा कि क्या वास्तव में धर्म खतरे में हैं ? क्या वास्तव में एक दिन धर्म लुप्त हो जाएगा ?

फिर उत्तर भीतर से ही आया कि बिलकुल सच है | आसमानी, हवाई किताबों पर आधारित धर्म एक दिन लुप्त हो ही जाएगा और लोग हिन्दू, मुस्लिम सिख इसाई बनने की बजाये इंसान बना करेंगे | लोग धार्मिक कर्मकाण्ड और परमपराओं को निभाने से बेहतर समझेंगे मानवीय कर्मकांडों को निभाना, मानवता को निभाना |


लेकिन प्रश्न फिर उठा कि धर्म मानवता के विरुद्ध कैसे हो सकता है ? धर्म के प्रति लोगों की विरक्ति कैसे हो सकती है ? धर्म तो मानव के कल्याण के लिए लिए ही है, धर्म तो आपसी सद्भाव व सौहार्द के लिए ही है ?

तो उत्तर आया कि बिलकुल धर्म मानवता के कल्याण के लिए ही है, धर्म आपसी सद्भाव व सौहार्द के लिए ही है | लेकिन जिन धर्मों के लुप्त होने की बात कही जा रही है, वे सब किताबी धर्म हैं | वे सब आसमानी, हवाई किताबों पर आधारित धर्म हैं | यानि जो अव्यवहारिक हैं जो केवल प्रवचनों और उपदेशों में सीमित होकर रह गया, इंसानों के आचरण में नहीं उतर पाया | जो केवल कर्मकांडों, दिखावों, बाह्य आडम्बरों, कपड़ों, रंगों, तिलक, टोपी, जनेऊ में सिमट कर रह गया वही धर्म खतरे में है | और यही कारण है कि वे लोग चिल्ला रहे हैं धर्म खतरे में हैं |

वस्तुतः वे सभी धर्म हैं ही नहीं, बल्कि सम्प्रदाय विशेष के पूर्वजों द्वारा निर्धारित नियम कानून व परम्पराएं हैं जिन्हें अब कोई व्यव्हार में नहीं लाता | और जो भी चीजें अव्यवहारिक हो जातीं हैं, वे लुप्त हो जाती हैं |


क्या वास्तव में धर्म खतरे में हैं ?


समाज ने सम्प्रदायों को धर्म घोषित कर दिया, जिसके कारण यह कहा जाने लगा कि धर्म खतरे में हैं | वास्तव में धर्म कभी भी खतरे में नहीं हो सकता, क्योंकि जिस दिन धर्म खतरे में पड़ जाएगा, मानवों का ही नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का ही आस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा | जिस दिन गुर्त्वाकर्षण बल धर्म विमुख जाएगा, हम सब हवा में तैरते दिखाई देंगे और जल्द ही हवा भी पृथ्वी को छोड़ देगा | क्योंकि हवा भी पृथ्वी पर टिका है तो गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही और जो कुछ भी पृथ्वी पर टिका है वह गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही |


जिस दिन माँ अपने धर्म से विमुख हो जायेगी, जिस दिन पिता अपने धर्म से विमुख हो जाएगा, जिस दिन जल अपने धर्म से विमुख हो जाएगा, जिस दिन अग्नि अपने धर्म से विमुख हो जायेगी.....उस दिन सब कुछ ध्वस्त हो जाएगा, यह सृष्टि ही ध्वस्त हो जायेगी |


चूँकि सृष्टि का कोई भी पदार्थ, तत्व या प्राणी धर्म विहीन नहीं रह सकता, इसीलिए धर्म खतरे में है ही नहीं, बल्कि सम्प्रादयिकता खतरे में हैं | सम्प्रदायों को धर्म मानने की मुर्खता के कारण ही धर्म खतरे में दिखाई दे रहा है | और चूँकि धर्म की समझ नहीं किसी को, इसीलिए शोर मचाते फिर रहे हैं कि धर्म खतरे में हैं |

साम्प्रदायिकता खतरे में क्यों पड़ा ?


खतरे में इसलिए पड़ गया क्योंकि सम्प्रदाय अब हाईजेक कर लिए गये, सड़क छाप गुंडों मवालियों द्वारा | सम्प्रदाय हाईजेक कर लिए गये धूर्त, कपटी, देशद्रोही नेताओं और उनके चाटुकारों द्वारा | सम्प्रदाय हाईजेक कर लिए गये धूर्त, धंधेबाज धर्म के ठेकेदारों द्वारा | और खुद को धार्मिक कहने वाले लोग वास्तव में धर्म से दूर और साम्प्रदायिकता के नशे में धुत्त होने लगे | जब सारा समाज ही साम्प्रदायिकता के नशे में धुत्त हो जाये या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से साम्प्रदायिकता का समर्थन करने लगे, तब जिन्हें धर्म की समझ है, वे खुद को उन मानसिक रोगियों के समूह से अलग करने लगते हैं | कुछ खुद् को नास्तिक कहने लगते हैं तो कोई नए पंथ की ओर रुख करने लगते हैं | कुछ लोग असमंजस में रह जाते हैं कि वे आस्तिक हैं या नास्तिक तो वे इस बहस से खुद को दूर कर लेते हैं और किसी अविष्कार में खो जाते हैं या फिर किसी अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं |


जो बेरोजगार हैं, जिनके पास कोई काम नहीं, जीवन का कोई उद्देश्य नहीं, वे धर्म रक्षक सेनाएं बनाते हैं और सड़कों पर आवारागर्दी, गुंडागर्दी करते घूमते हैं | धार्मिकों का समाज उन्हें देखकर खुश होता रहता है कि हमारी नालायक औलादें कम से कम कुछ कर तो रहीं हैं | देश की सेना के लायक न सही, सड़क छाप गुंडों मवालियों की सेना में शामिल हो गये यही बहुत है | कम से कम उनकी तस्वीरें तो मिडिया में छपती हैं, चाहे तोड़फोड़, मारपीट करते हुए ही छपे | कम से कम पुलिस उन्हें पकड़ कर जेल तो ले जाती है, इतनी इज्जत क्या कम है ? जेल में तो बड़े बड़े लोग जाते हैं, श्री कृष्ण तो जेल में ही पैदा हुए थे...हमारी नालायक औलादें कम से कम इस लायक तो हुए कि कृष्ण की जन्मभूमि में आते जाते रहते हैं ?


और चूँकि धार्मिक की समाज मानसिक् रूप से इतना नीचे गिर चुका है, तो स्वाभाविक है कि धर्म नाम के सम्प्रदायों से सभ्य लोगों की विरक्ति होगी ही | और इसी लिए धर्म नाम के सभी सम्प्रदाय खतरे में पड़ गये |


दूसरा कारण यह भी कि जितने भी धार्मिक सम्प्रदाय हैं, उनमें अब इतनी भी क्षमता नहीं रह गयी कि वे नालायक, गुंडे बदमाश, आवारा, लुच्चे लफंगों को पैदा होने से रोक सकें | उनकी सारी धार्मिक शिक्षाएं बेअसर साबित हुईं और वे अपने समाज में इनकी बढ़ती जनसँख्या पर लगाम लगा पाने में पूरी तरह विफल हो गये | धार्मिकों का समाज भ्रष्टाचारियों को पैदा होने से रोक पाने में असफल हुआ, धार्मिकों का समाज धूर्त मक्कार नेताओं को उभरने से रोक पाने में असफल हुआ | और परिणाम यह हुआ कि धर्म का सुन्दर नाम लिए, साम्प्रदायिकता अब बोझ बन गयी | सभ्य लोग अब इस बोझ से मुक्त होना चाहते हैं | सभ्य लोगों को समझ में आ गया कि ये धर्मों के बाजार जीवन का आधार नहीं है | न ही ये ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है और न ही आत्मिक, आर्थिक और भौतिक उत्थान का मार्ग | ये केवल धार्मिक उन्मादियों, लुच्चों लफंगों की महफ़िल बनकर रह गयी है |


और लुच्चे लफंगों ने कभी भी किसी का भला नहीं किया, तो स्वाभाविक है धर्म का भी भला नहीं करेंगे और न ही समाज व देश का भला करेंगे |


साम्प्रदायिकता नहीं, परस्पर सहयोगिता है वास्तविक धर्म


पहली गलती तो यह की समाज ने कि साम्प्रदायिकता को धर्म समझ लिया | और दूसरी गलती यह की समाज ने कि सम्प्रादयिकता के नाम पर धार्मिक उन्माद, उत्पात को रोकने की बजाये, उन्हें हवा देते रहे, उन्हें सुलगाते रहे | अपने अपने समाज की कुरीतियों को दूर करने की बजाए, अपने समाज के शोषित पीड़ित वर्गों को न्याय व रोजगार दिलाने की बजाये मूर्ख बनाते रहे कि मंदिर जाओ तो भला होगा, मस्जिद जाओ तो भला होगा, धर्म परिवर्तन कर लो तो भला होगा....और ये मूर्ख बनाने का काम सदियों से चला आ रहा है और आज तक जारी है |


धर्मगुरुओं ने कभी भी लोगों को आत्मनिर्भर होने में सहयोग नहीं किया, केवल शोषण किया समाज का | राजनेताओं ने भी समाज को आत्मनिर्भर होने में सहयोग करने की बजाये केवल कुछ चुनिन्दा पूंजीपतियों को समृद्ध करने में सारा जोर लगा दिया | इसलिए धर्म नाम के सम्प्रदायों का महत्व अब समाप्त होने लगा |


धार्मिक विद्वानों ने भौतिक सुखों को माया बताया, इससे दूर रहना सिखाया, परिणाम यह हुआ कि समाज आत्मनिर्भर होने की बजाये भगवानों, बाबाओं और नेताओं पर निर्भर हो गया | और जो दूसरों पर निर्भर हो जाता है, वह अपाहिज हो जाता है |


यहाँ नीचे विडियो दे रहा हूँ, ध्यान से देखिये कि कैसे एक गाँव पानी के लिए सरकार भरोसे बैठा रहा और उनके खेत बंजर हो गये | लेकिन जब उन्हें अक्ल आ गयी कि दूसरों पर निर्भर रहने पर केवल मौत ही मिलने वाली है, तब उन्होंने आपसी सहयोग की योजना बनायी और आज वे जल के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं | हो सके तो इनसे प्रेरणा लें ताकि धर्म को सही रूप में समझ सकें |


~विशुद्ध चैतन्य


बुंदेलखंड के गांव ने दिखाई राह

बुंदेलखंड में लोग पानी के आकाल से लंबे अर्से से परेशान हैं. हजारों करोड़ के पैकेज दिए गए लेकिन जमीन पर फर्क नहीं पड़ा. फर्क पड़ा तो सिर्फ एक गांव में. एनडीएवी ने इस पूरे इलाके की हकीकत जानने की कोशिश की. यहां आज भी लोग पानी की किल्लत से दो चार हो रहे हैं.

NDTVKhabar.com द्वारा इस दिन पोस्ट की गई 16 जून 2018 


17 फ़रवरी 2017

असली और नकली हर क्षेत्र में, हर समाज में, हर देश में होते हैं




कल रात किसी से चैट हो रही थी | उनके कहने का भाव जो मेरी समझ में आया वह यह कि भारत की राजनीति और यहाँ की जनता में कोई सुधार संभव नहीं है | आप इनको जागृत करना चाहते हैं, इनको चैतन्य करना चाहते हैं, यह मुर्खता ही है | बड़े बड़े महात्मा, जैसे कि स्वामी विवेकानंद, ओशो, और न जाने कितने, सभी विदेशियों को चैतन्य करने में अपनी भलाई समझीं, क्योंकि वे समझ चुके थे कि ये लोग न तो खुद सुधरेंगे, न दूसरों को सुधरने देंगे उलटे ओशो की तरह धक्के मारकर बाहर निकालेंगे | फिर एक प्रश्न भी पूछा कि साधू-संतों में किसी के पास कोई शक्ति होती भी या सभी केवल ढोंग करते हैं ?

16 फ़रवरी 2017

जहाँ देखो ढोंगी-पाखंडियों का बोलबाला है


बचपन में ही मुझे अपने माता-पिता से व्यवहारिक ज्ञान ही मिला, न कि किताबी ज्ञान | वे यदि ध्यान, पूजा-पाठ के विषय में भी समझाते तो उसे तर्कपूर्ण तरीके से समझाते, न कि यह कहते कि किताबों में लिखा है इसलिए करना है |


लेकिन २४ जनवरी १९८० में अपनी माँ की मृत्यु के बाद मैं नास्तिक हो गया | विश्वास ही उठ गया था ईश्वर से क्योंकि जो माँ कभी कोई व्रत नहीं छोडती थी, जो माँ कभी किसी का दिल नहीं दुखातीं थीं यहाँ तक कि अपने गहने जेवर भी अपनी ननदों को बाँट देती थीं, अपनी सारी अच्छी साड़ियाँ उनको दे देती थीं और खुद फटी हुई साड़ियों को हाथ से सिल सिल कर पहनती थीं...उनको इतने कष्ट सहने पड़े और अंत में कष्ट सहते हुए ही दुनिया से विदा हो गयीं |

सोचा करता था तब, "यदि ईश्वर कभी मिलेंगे तो पूछूँगा कि धूर्त और मक्कारों पर आप इतने कृपावान क्यों रहते हैं, जबकि निःस्वार्थ जीने वालों की खुशियाँ भी छीन लेते हैं ?"

13 जनवरी 2017

क्षत्रियों में भी कायर होते हैं और ब्राहमणों में भी शूद्र होते हैं



भाषा की खबर के अनुसार, प्रदर्शनकारियों में से एक ने कहा, ‘हम डायरी और कैलेंडर में मोदीजी की तस्वीर शामिल करने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन गांधीजी की तस्वीर नहीं पाकर हम दुखी हैं। हम सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि क्यों गांधीजी को यहां स्थान नहीं दिया गया है। क्या गांधीजी खादी उद्योग के लिए अब प्रासंगिक नहीं रहे।’

10 जनवरी 2017

बहुमत जिसे मिला हो, वह सही ही होगा इस बात की कोई गारन्टी नहीं है



माना जाता है कि बहुमत जिसके पास हो, वही विजेता है | लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि बहुमत सत्यता का मानक कभी नहीं बन सकता और न ही कभी ऐसा हो सकता है कि सभी एकमत हो सकें | कुछ रिश्वतखोरी, घोटाले, भ्रष्टाचार के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में, कुछ अधर्म के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में....और यही देखा गया है कि अधर्म, असत्य व अपराध के पक्ष में ही अधिक लोग रहे हैं हमेशा |

08 जनवरी 2017

स्वप्न तो केवल स्वप्न होता है



अक्सर आप लोगों ने पढ़े-लिखे और जमीने विद्वानों को यह कहते सुना होगा, “स्वप्न तो केवल स्वप्न होता है सत्य नहीं | स्वप्न मन की दबी हुई भावनाओं को ही दिखाता है या दिन में जो कुछ भी हम सोचते हैं, देखते हैं वही सब स्वप्न के रूप में उभर कर आता है |”

18 दिसंबर 2016

चक्कर-भर्ती सम्राट का स्वर्णयुग


कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | मोतीचूर नामक चक्करभर्ती सम्राट राज्य करता था किसी देश में | वह बहुत ही आधुनिक विचारों का था और नई खोज करने के लिए विश्वभ्रमण करता रहता था | उसका राजकाज उसके मंत्री और उनके परममित्र धन्नासेठ चलाया करते थे | राजा का बस एक ही शौक था, देशविदेश घूमना, महंगे कपड़े पहनना | एक दिन जब राजा स्वदेश लौटा विश्वभ्रमण से तो दरबारियों ने सोचा कि राजा को विदेशी नजर लग गयी होगी, इसलिए अखण्ड रामायण पाठ रखवाया जाए | पंडितजी आयेंगे तो भविष्य भी बता देंगे और राजा भी तब तक देश में ही रुके रहेंगे |

10 दिसंबर 2016

क्या हम वास्तव में राष्ट्रभक्त हैं ?



बरसाती राष्ट्रभक्ति का दौर शुरू हुए लगभग तीनवर्ष बीत चुके हैं | इस दौर में हमने कई दोगले राष्ट्रभक्त और उनकी दोगली राष्ट्रभक्ति देखी | हमने देखा कि मिडिया में जो लोग बैठे है, जिनको आज के युवावर्ग विद्वान, समझदार और सुलझा हुआ समझती थी, वे भी वास्तव में बिन पेंदे के राष्ट्रभक्त हैं | उनकी राष्ट्रभक्ति सत्ता और पैसे से संचालित होती है, आत्मा, स्वाभिमान और स्वविवेक से नहीं | हमने देखा कि कैसे आधुनिक अर्थशास्त्री अर्थ का अनर्थ करते हैं, हमने देखा कि कैसे देश की जनता को मुर्ख बनाया जाता है | हमने यह भी देखा कि पढ़े-लिखे कहे जाने वाले डिग्रीधारी भी कैसे राष्ट्रभक्ति के नाम पर मूर्ख बनते और बनाते हैं | हमने यह भी देखा कि कैसे देश को विदेशियों के हाथो गिरवी रखने में देश के नेताओं और उद्योगपतियों को शर्म नहीं आती और हमने यह भी देखा कि उनके चमचे और चापलूस कैसे अपनी अपनी सेना बनाकर जनता के बीच घुसकर जनता को गुमराह करती है |

30 नवंबर 2016

हमारी राजनीती किसी नेता या पार्टी पर आधारित नहीं है


यह ध्यान रहे,

  • बहुत से नागरिक ईश्वर भक्ति के नाम पर समाज व राष्ट्रीय समस्याओं से मुँह चुरा कर आश्रमों में भजगोविन्दम जप रहे हैं |
  • बहुत से भक्त नए भक्तों को फाँसने के लिए जगह जगह भजनमण्डली ले कर घूम रहे हैं |
  • बहुत नागरिक अपने बीवी बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी की चिंता में ही घुले जा रहे हैं |
  • बहुत से नागरिक नौकरी-छोकरी-गाड़ी-कोठी की चिंता मे ही दुबले हुए चले जा रहे हैं |
  • बहुत से नागरिक अपने अपने नेताओं के जयकारे लगाने में ही व्यस्त हैं |
  • बहुत से नागरिक चुटकुलों, शेरो-शायरी में मस्त हैं
  • बहुत से नागरिक अभिनेताओं और क्रिकेटरों की भक्ति में डूबे हुए हैं |

28 अक्टूबर 2016

मुझे वर्तमान सैनिक शहीद नहीं जान पड़ते


जब भी किसी सैनिक के शहीद होने की खबर आती है, दुःख तो होता ही है क्योंकि सैनिकों से हम सभी का गहरा लगाव रहता है | और यह लगाव कोई आज का नहीं, तभी से है, जब से मानव जाति शत्रुओं से अपनी भूमि, स्त्री व धन-संपत्ति की सुरक्षा के लिए युद्धरत हुआ | लेकिन तब और अब में बहुत अंतर है यह भी हमें समझ लेना चाहिए |

26 अक्टूबर 2016

वे जो कुछ भी कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं


 तब हम बहुत छोटे थे करीब नौ दस वर्ष के जब हम दिल्ली पहुँचे | वहाँ जो हमारे लिए सबसे बड़ा आकर्षण बना वह था टेलीविजन | सन्डे सुबह बापा-पापा, और बच्चों के कई विभिन्न कार्टून फिल्म और शाम को फीचर फिल्म | फिर शुक्रवार को भी कोई न कोई फिल्म दिखाई जाती थी |

तो हम चारों भाई-बहन जब भी कोई फिल्म देख लेते, तो हफ्ते भर तक उसके डायलॉग, गाने, सीन आदि एक दूसरे को सुनाते रहते | बड़ा रोमांच होता था कि कैसे धर्मेन्द्र जलती हुई ट्रेन में हेमामालिनी और यात्रियों को बचाया, कैसे बसंती तांगा दौड़ा कर भागी.... फिर हीरो और विलेन की लड़ाई का रोमांच... पूरा हफ्ता निकल जाता इन सब पर चर्चा करते हुए | तो हमारी दुनिया उतने में ही सीमित रही कुछ समय तक, फिर पिताजी तोलोस्तोय, पुश्किन, प्रेमचंद आदि की किताबें लाने लगे तो हम उस पर व्यस्त हो गये |

22 अक्टूबर 2016

चाइनीज़ वस्तुओं का बहिष्कार एक नौटंकी

 

बेहतर है यह नौटंकी बंद कर दें, क्योंकि आपके आका चाइना को घर पर बुलाकर मेट्रो बनवा रहे हैं और आप लोग सड़कों में नौटंकी कर रहे हैं | यह नौटंकी बिलकुल वैसी ही नौटंकी है, जैसे २०१३ में महँगाई और एफडीआई के विरोध में की गयी थी, जैसे गौरक्षा के नाम पर की जा रही है, जैसे सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर की जा रही है... ये केवल उत्पात है, न तो कोई राष्ट्रभक्ति है और न ही कोई राष्ट्रहित से सम्बंधित कार्य  |

18 अक्टूबर 2016

हम आज भी गुलाम हैं साम्राज्यवादियों के


जिन देशों में कृषियोग्य भूमि, खनिज आदि की कमी थी, उन्होंने उपनिवेश बनाने आरम्भ किये | ब्रिटेन, जर्मन, फ़्रांस, पुर्तगाल आदि प्रमुख देश रहे जो प्राकृतिक संसाधनों व खनिजों से भरपूर देशों पर आक्रमण करते या छल-कपट से उस देश के नागरिकों को गुलाम बना लेते, ऐसे ही देशों में भारतीय व अफ़्रीकी देश प्रमुख रहे | औपनिवेशिक देशों के नागरिकों का मौलिक अधिकार छीन लिया गया, और उनकी स्थिति पशुओं से भी बुरी हो गयी | कुछ मुट्ठीभर फ्रिरंगी, जर्मन, फ़्रांसिसी, पुर्तगाली करोड़ों कि बड़ी जनसँख्या वाले देशों को अपना गुलाम बना पाने में सफल हो गये | जो विरोध करते, स्वतंत्रता से जीना चाहते वे मारे दिए जाते | उनके लिए औपनिवेशिक नागरिकों की हत्या करना बिलकुल वैसा ही था, जैसे कि फ्लू की बिमारी फैलने के डर से मुर्गों-मुर्गियों की सामूहिक हत्या करना |

धर्म-निरपेक्षता का अर्थ यह कदापि नहीं रहा कि लोग धर्म से विमुख हो जाएँ

 भारत एकमात्र ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश है, जहाँ कोई धर्मनिरपेक्ष नहीं है | न मीडिया, न सरकार, न न्यायव्यवस्था, न पुलिसप्रशासन, न वकील, न शिक्षक, न धार्मिक संस्थाएं, न राजनैतिक पार्टियाँ.....

केले में कई पौष्टिक तत्व होते हैं, उसके विषय में जानकारी देना गुरु का धर्म है
कूपमंडूकों के देश में धर्मनिरपेक्षता की नींव शायद इसीलिए रखी गयी थी आज से सत्तर वर्ष पहले क्योंकि भारत एक सनातन धर्मी देश था हज़ारों वर्ष पहले | यहाँ धर्म कोई विवाद नहीं था, विवाद था तो केवल जमीन, भोजन, स्त्री व सत्ता को लेकर | लेकिन कालान्तर में जब सम्प्रदायों को धर्म की उपाधि दे दी गयी, तब भारत को धर्मनिरपेक्षता की नींव रखने कि पहल करनी पड़ी |

धर्म-निरपेक्षता का अर्थ यह कदापि नहीं रहा कि लोग धर्म से विमुख हो जाएँ, बल्कि यह केवल प्रशानिक कार्यों व कार्यपालकों के लिए अपनाया गया था | इसका उद्देश्य था कि कोई भी प्रशानिक, न्यायिक या शासकीय अधिकारी, मंत्री या नेता धर्म (किसी भी मत-मान्यताओं व पूर्वाग्रहों) से आसक्त, प्रभावित होकर कोई निर्णय न करे | एक शासक को सभी के प्रति सामान भाव रखना चाहिए यह मनु-संहिता कहती है, उसी के आधार पर भारत के संविधान को धर्म-निरपेक्षता पर आधारित किया गया |

लेकिन दुष्टों ने न केवल संविधान की धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं, बल्कि धर्म का भी नामों निशान मिटाकर रख दिया | अब हिन्दू मान्यताएं, मुस्लिम मान्यताएं, इसाई, बौद्ध, जैन, सिख.... आदि मान्यताएं धर्म हो गयीं और मूल वास्तविक सनातन धर्म (सत्य, प्रेम, सहयोगिता, सद्भाव, सर्व-धर्म समभाव, दया, करुणा, निर्बल व असहाय पर हिंसा या अत्याचार न करना, अपने से कमजोर की सहायता व रक्षा करना... आदि) तिरोहित कर दिया गया | अब धर्म का अर्थ साम्प्रदायिकता, उन्माद, हिंसा, निंदा, अत्याचार व शोषण मात्र बनकर रह गया | कोई तिलक जनेऊ डाल ले तो धार्मिक हो न हो, हिन्दू अवश्य हो जाएगा | कोई जालीदार टोपी लगा ले, पांच वक्त की नमाज अदा कर ले,वह धार्मिक हो न हो मुसलमान अवश्य हो जाएगा |

तो भारत कभी धार्मिक देश हुआ करता था इसलिए उस समय धर्मनिरपेक्षता अलिखित लेकिन व्यवहारिक था | लेकिन आज धर्मनिरपेक्षता लिखित लेकिन अव्यवहारिक है | ~विशुद्ध चैतन्य

यहाँ कोई न्यूज़ चैनल हिन्दू है तो कोई मुस्लिम कोई सेक्युलर...सनातनी कोई नहीं

भारत के पौराणिक ग्रंथो से जो महत्वपूर्ण बात मैंने समझीं, वह यह कि जो भी सद्पुरुष रहे, धर्मपथ पर रहे, उनका शोषण ही नहीं, नाश ही हुआ अधर्मियों के हाथों | पहले प्राण जाए पर वचन न जाए के सिद्धांत पर चलते थे वीर क्षत्रिय, लेकिन उन्हीं के इस सिद्धांतों से दुष्टों ने लाभ उठाया और कर्ण से लेकर भीष्म तक अपने ही दिए वचनों में बंधकर अपनी ही मूर्खता से कलंकित व दुष्टों के प्रति निष्ठावान रहने के लिए विवश हुए | ऐसी कई कहानियाँ पढ़ने मिल जाती है जिनसे यह पता चलता है कि विवेकहीनता की स्थिति में दिए गये वचनों का दुरूपयोग हुआ जैसे कि राम को वनवास भेजने के लिए कैकई ने दशरथ के दिए वचन का दुरूपयोग किया |

ठीक इसी प्रकार वर्तमान में भी भारत की 'धर्मनिरपेक्षता' व 'सर्वधर्म समभाव' (जिसे कोई मानता ही नहीं) का दुरूपयोग होता आ रहा है | जैसे मुस्लिमों के देश में दूसरों के लिए कोई स्थान नहीं है, जबकि भारत में सभी मिलजुल कर रह सकते हैं | लेकिन कट्टरपंथी इसी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं, फिर वह हिन्दू हों या मुस्लिम | यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, इसलिए हर किसी को अपना विरोध करने का अधिकार है... लेकिन इसी स्वतंत्रता का दुरपयोग होता है जब दूसरे सम्प्रदायों के प्रति न केवल ज़हर उगला जाता है, बल्कि सम्पत्ति में तोड़फोड़ से लेकर व्यक्ति की हत्या तक कर दी जा रही |

17 अक्टूबर 2016

वे इस बात की परवाह नहीं करते कि दुनिया क्या कहेगी

“Care about what other people think and you will always be their prisoner.” - Lao Tzu -

कोई क्या कहेगा, क्या सोचेगा....इन सबकी चिंता करने वाले कभी भी सफल नहीं हो पाते, क्योंकि वे मानसिक रूप से उनके गुलाम हो जाते हैं, जिनकी चिंता में वे वह नहीं कर पाते, जो उन्हें करना है |

यदि आप इतिहास उठाकर देख लो, तो आप पायेंगे कि इतिहास उन्होंने ही रचा, जिन्होंने दुनिया कि परवाह नहीं की | जैसे कि रानी लक्ष्मी बाई, रजिया सुलतान, सुकरात, जीसस, स्वामी विवेकानंद, ठाकुर दयानंद देव, ओशो आदि | वहीँ दूसरी तरफ रावण, हिटलर हैं जो अमर हो गये | और वर्तमान में मोदी जी हैं, राजनेता हैं जो दुनिया की परवाह नहीं करते, धंधा करने आये हैं कर रहे हैं, फिर लोग मरते हैं तो मरते रहें, दंगे होते हैं तो होते रहें, किसान मरते हैं तो मरते रहें, धर्म और जाति के नाम पर उत्पाती उत्पात मचाते हैं तो मचाते रहें, राष्ट्र में अराजकता फैलता है फैलता रहे... बस जो करने आये हैं वह कर रहे हैं, फिर दुनिया कुछ भी कहती है कहती रहे |

13 अक्टूबर 2016

युद्ध की जो अफवाहें फैलाई जा रहीं हैं, उनसे सावधान रहें



यह ध्यान रखें, जिस देश के साथ व्यापारिक सम्बन्ध हैं उनसे युद्ध होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है | जैसे कि चीन और पाकिस्तान से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध | यदि चीन से युद्ध होता है, तो भारत के नगरसेठ सरकार से नाराज हो जायेंगे और सरकार व अन्य राजनैतिक पार्टियों को चंदा मिलना बंद हो जाएगा | इससे सभी राजनैतिक पार्टियाँ भूखों मरने की स्थिति में पहुँच जायेगी |

राष्ट्रवाद है क्या ?



सामान्य मान्यता है कि राष्ट्रवाद अर्थात राष्ट्र के प्रति श्रृद्धा, समर्पण, कर्तव्यबोध... आदि | लेकिन यदि आप राष्ट्रवादियों को देखें तो वे ऐसा कोई कार्य नहीं कर रहे होते, जिससे राष्ट्र को किसी भी प्रकार का कोई लाभ होता हो, सिवाय दंगे-फसाद, अराजकता और आपसी वैमनस्यता के | राष्ट्रवादी हमेशा उन विषयों को अपने अधिकार में ले लेते हैं, जिनसे प्रजा का भावनात्मक लगाव होता है | जैसे कोई त्यौहार, कोई तीर्थ या धार्मिक स्थल, कोई सामजिक या राजनैतिक या धार्मिक विषय... और फिर उसके आधार पर प्रजा का आर्थिक व भावनात्मक शोषण करना शुरू कर देते हैं | कभी ये हिन्दुओं की शक्ल ले लेकर मुस्लिमों के विरुद्ध दिखाई देते हैं तो कभी मुस्लिमों की शक्ल में हिन्दुओं के विरुद्ध | कभी ये भाईचारा, सद्भाव के पक्ष में दिखाई देते हैं तो कभी ज़हर उगलते किसी सम्प्रदाय विशेष के विरुद्ध |