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25 जून 2018

आनंद और उत्सव है धर्म, घृणा और द्वेष नहीं



बचपन में फ़कीर या संन्यासी की रूपरेखा जो मेरे मन बस गयी थी, वह कुछ वैसा था जो सदैव प्रसन्नचित रहता है, हँसता, गाता, नाचता अपनी धुन में मगन रहता है | जब भी उनकी कोई तस्वीरें देखता तो ऐसा लगता था कि उनके जीवन में सुख ही सुख है और दुःख का उन्हें कोई अनुभव ही नहीं |

तब नहीं जानता था कि संन्यास क्या होता है और उनका जीवन कैसा होता है | माँ या पिताजी से बस यही पता चला कि संन्यासी वह होता है जो सामाजिक बंधनों से मुक्त होता है और केवल ईश्वर की आराधना व चिन्तन में लिप्त रहता है | चूँकि उन्हें समाज के सुख दुःख से कोई लेना देना नही होता, किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती, किसी से कोई अपेक्षा नहीं रहती, इसीलिए वे लोग हमेशा खुश रहते हैं | जबकि हम जैसे सामाजिक दायित्वों से बंधे लोगों के लिए सुख के भी पल होते हैं और दुःख के भी |

मुझे अपने जीवन में निश्चिंतता और सुख का अनुभव अपनी माँ के देहांत के बाद शायद कभी नहीं हुआ | अब हँसता भी हूँ तो लगता है दिखावा कर रहा हूँ, अब खुश भी होता हूँ, तो मन में कोई हलचल नहीं होती | बस बाहरी ओढ़ी हुई सी ख़ुशी होती है | कभी समझ नहीं पाया कि माँ के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ कि मैं फिर दोबारा वह सुख व ख़ुशी नहीं प्राप्त कर पाया | मुझे याद है वह अंतिम ख़ुशी जो मैंने नौ वर्ष की आयु में पायी थी वह है दिवाली मनाना | उस दिवाली के बाद फिर कभी कोई दिवाली नहीं आयी जो मुझे ख़ुशी दे पायी | क्योंकि दिवाली के बाद आयी जनवरी ने माँ को हमेशा के लिए मुझसे दूर कर दिया था | माँ के बाद कोई मेरा अपना नहीं बन पाया, माँ के बाद कोई इतना विश्वसनीय नहीं बन पाया जिससे में खुलकर मिल सकूं |

कई नौकरियाँ बदली, कई तरह के काम किये, कई मित्र बनाए...समय के साथ सब छूटते चले गये | मतलब की नौकरी, मतलब के मित्र, मतलब के सम्बन्ध स्थाई नहीं होते यह बहुत देर से समझ में आया | माँ से बेहतर अपना और कोई नहीं यह भी समझ में आया |

बचपन में सोचा करता था कि जब मैं विवाह योग्य हो जाऊँगा तो शायद दुबारा कोई मुझे अपना मिल जायेगा...लेकिन नहीं मिला | समझ में आया विवाह प्रेम पर नहीं, दौलत और शोहरत पर आधारित होता या फिर स्वार्थ पर | स्वार्थी तो मैं भी हूँ लेकिन इतना स्वार्थी नहीं बन पाया कि विवाह योग्य कोई साथी खोज पाऊँ | या फिर शायद इतनी दौलत नहीं इकट्ठी कर पाया कि विवाहित हो पाऊँ | फिर बरसों बाद समझ में आया कि विवाह शुद्ध व्यापार है | प्रेम खरीदने की योग्यता होनी चाहिए प्रेमिका मिल जायेगी | पत्नी खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पत्नी मिल जायेगी, पति खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पति मिल जाएगा.....यानी हर चीज बिकाऊ है और हर चीज खरीदी और बेचीं जा सकती हैं, व्यक्तिगत सम्बन्धी तक | और जो मेरे साथी विवाहित हुए, उनके मुरझाये चेहरे देखकर विवाह से मन घबरा गया |

फिर संन्यास लिया सोचा था कि संन्यासियों के बीच रहूँगा शायद मैं बदल जाऊँ | लेकिन नहीं बदल पाया क्योंकि आज भी मैं वही हूँ जो कल था | मैं संन्यासियों की तरह समाज के दुखों को भूलकर खुश नहीं हो पाया | 'मैं सुखी तो जग सुखी' के सिद्धांत को नहीं अपना पाया | लेकिन समझ में आया कि सबका दुःख उनका अपना है दूसरों का नहीं | कोई अमीर किसी गरीब की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई हिन्दू किसी मुस्लिम की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई मुस्लिम किसी हिन्दू की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई कांग्रेसी कभी भाजपाइयों की चिंता नहीं करता और कोई भाजपाई कभी कांग्रेसियों की चिंता नहीं करता |

कोई मुस्लिम मारा जाए भीड़ द्वारा तो मुस्लिम समाज चिंतित हो जाएगा लेकिन कोई मुस्लिम भूख से मर रहा हो, उसके खेत की फसल नष्ट हो जाने का कारण दुनिया भर के कर्जों में दब गया हो, तब मुस्लिम समाज आँखे मूँद लेगा | इसी प्रकार कोई हिन्दू मारा जाए मुस्लिम भीड़ के हाथों तो हिंदुत्व ही खतरे में पड़ जाएगा | सारे हिन्दू संगठन दिन भर उस हिन्दू का शोक मनाएंगे मुस्लिमों को कोसेंगे | लेकिन जब कोई हिन्दू भूख से मर जाये, गरीबी से मर जाए, उसकी जमीन कोई भूमाफिया छीन ले, किसान आत्महत्या कर ले, आदिवासी बेघर हो जाएँ....तब हिंदुत्व खतरे में नहीं पड़ेगा, तब किसी हिन्दू संगठन की सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ेगा | उनका व्यव्हार कुछ ऐसा होगा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं |

यानि ये शोक मानना, ये विरोध जताना भी साम्प्रदायिक है मानवीय नहीं | मौका मिलना चाहिए दुसरे सम्प्रदायों को बुरा दिखाने का, लेकिन अपनी बुराइयाँ दिखाई नहीं देगी इन्हें | इन्हें दिखाई नहीं देगा कि इनके अपने दड़बे में ही इनके अपनों के कारण ही कितने लोग शोषित पीड़ित व दुखी हैं....लेकिन दूसरे दड़बे के हाथों किसी पर अत्याचार हो जाये तो आसमान सर पर उठाये फिरने लगेंगे | और ढोंग करेंगे मानवता का, इन्सनियता का | वास्तविकता यह है कि न तो धर्म बचा है और न इंसानियत | अब तो केवल ढोंग ही बचा है |

यह सब देखकर मैं खुश नहीं हो पाता कभी भी | यह सब देखकर नाच नहीं पाता कभी भी, या सब देखकर गा नहीं पाता कभी भी | लेकिन कहते हैं न, सुख और दुःख सब अपने ही भीतर है ? तो भीतर जाने पर पाता हूँ कि मैं सबसे सुखी इंसान हूँ | मुझे दूसरों के दुखों को देखकर दुखी होने की आवश्यकता नहीं है | जो समाज खुद दुखों को गले लगाए रखना चाहता हो, जो समाज खुद को दुखों से मुक्त न करना चाहता हो, उनके दुखों को लेकर मैं भला क्यों दुखी होता हूँ ? जानबूझकर सोये हुए को नहीं जगाया जा सकता, जानबुझकर दुखी हुए लोगों को सुख नहीं पहुँचाया जा सकता...इसलिए अब बदलूँगा स्वयं को | अब अपने ही सुखों में सुखी रहूँगा, दूसरों के दुखों में दुखी रहने का मुझे कोई अधिकार नहीं |

वास्तव में संन्यासी होने का अर्थ ही समाज के ढोंग, पाखण्ड आडम्बरों से अलग करके स्वयं को सुखी व प्रसन्न रखें का उपाय खोजना | और जो ऊपर उठने का अभिलाषी हो उसे सही राह दिखाना | न कि उन समस्याओं को लेकर दुखी होना, जिसे आप सुलझा नहीं सकते, जिसके लिए आप जिम्मेदार नहीं, जिसका आप्स्से कोई सम्बन्ध नहीं |

~विशुद्ध चैतन्य

23 जून 2018

सावधान ! धर्म खतरे में है !!!



अक्सर हम सुनते हैं कि धर्म खतरे में हैं | गली मोहल्लों से लेकर विश्वस्तर पर धर्म रक्षक बने लुच्चे लफंगों की सेनाएं तैनात हो रहीं हैं | हर किताबी रट्टामार धार्मिक इस बात पर बहुत ही गंभीरता से विश्वास करता है कि धर्म खतरे में हैं और उसकी रक्षा करने के लिए लठैतों, छुरेबाजों, तलवारबाजों, कट्टेबाजों और असाल्ट राइफलधारकों की सेनाओं की आवश्यकता है | इसलिए वह इन सड़क छाप लफंगों की सेनाओं को दोनों टाँगे उठा नतमस्तक होकर नमन करता है |

आये दिन गुंडे बदमाश और बेरोजगार लफंगे धर्म की रक्षा के नाम पर किसी न किसी निर्दोष निहत्थे की हत्या कर देते हैं या उसे बुरी तरह घायल कर देते हैं | कहीं गौ रक्षा के नाम पर हत्याएं हो रहीं हैं तो कहीं इस्लाम और हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर | कहीं धर्म की रक्षा के लिए लडकियाँ उठा ली जाती हैं तो कहीं बलात्कार करके मार दिया दिया जाता है.....और ये सारे काम धार्मिक काम धर्म के रक्षकों द्वारा बड़ी श्रृद्धा से किया जा रहा है |

यह और बात है कि मेरे जैसे मंदबुद्धि लोगों की समझ में यह बात नहीं आती और कभी भी नहीं मानते कि धर्म खतरे में हैं....लेकिन मैं भी अब मानने लगा हूँ | क्योंकि अब स्पष्ट दिखने लगा है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं | अब प्रमाणित हो चुका है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं |

 

क्या धर्म खतरे में है ?

 

बिलकुल धर्म खतरे में है अब कोई संदेह नहीं रह गया | बस कुछ लोग समझ नहीं पा रहे कि धर्म खतरे में है, लेकिन धर्म वास्तव में खतरे में है | केवल भारत में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में धर्म खतरे में है |

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन....जैसे सम्प्रदायों, रिलीजन्स की बात नहीं कर रहा |  मैं केवल धर्म की ही बात कर रहा हूँ और उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे मैं सनातन धर्म कहता हूँ, जिसे मैं प्राकृतिक व ईश्वर प्रदत्त धर्म कहता हूँ | मैं किसी मानव निर्मित या किसी व्यक्ति-विशेष या किताब-विशेष पर आधारित धर्म की बात नहीं कर रहा | मैं तो उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे लोग मानवता कहते हैं, इंसानियत कहते हैं, Humanism कहते हैं |

 

जो सनातन है वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?


पड़ सकता है नहीं, पड़ चुका है | अब समाज, परिवार व माता-पिता अपने बच्चों को इंसान नहीं बनाते, बल्कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, कांग्रेसी, भाजपाई, सपाई, बसपाई बनाना पसंद करते हैं | अब माता-पिता स्वप्न नहीं देखते कि उनके बच्चे बड़े होकर इन्सान बन जाएँ, बल्कि अब सपने देखते हैं कि उनके बच्चे बड़े होकर डॉक्टर बने, इंजिनियर बनें, आईएएस बने, आइपीएस बने | अब माता पिता को बुरा नहीं लगता कि उनके बच्चे डिग्री लेकर लुच्चों लफंगों की सेना में शामिल होकर गुंडा-गर्दी करता फिरे, मोब-लिंचिंग करता फिरे, धूर्त-लम्पट नेताओं के तलुए चाटता फिरे, छुरा-कट्टा लेकर सड़कों पर आवारगर्दी करता फिरे...बल्कि अब उन्हें गर्व होता है कि उनका बच्चा यह सब करके धर्म की रक्षा कर रहा है |

और ऐसी मानसिकता का विस्तार होना सनातन धर्म को भी खतरे में डाल देता है | क्योंकि जब मानव ही सनातन धर्म से विमुख हो जायेगा और दड़बों को धर्म समझने लगेगा, तो धर्म का पतन निश्चित है | अब आपको न तो इस्लामिक समाज में धर्म दिखाई देगा और न ही हिन्दू समाज में, न ही साधू-समाज में, न ही बाल्मीकि, अम्बेडकर, मोदी या किसी और समाज में या दड़बे में धर्म दिखेगा | न तो मंदिरों में आपको धर्म दिखेगा, न ही मस्जिदों में आपको धर्म दिखेगा, न स्कूलों में, न कॉलेजों में.....यानि धर्म पुर्णतः बहिष्कृत हो चुका है समाज में और साम्प्रादायिकता को धर्म का नाम दे दिया गया |

अब केवल दिखावे के धार्मिक दिखेंगे, अब केवल दिखावे के धार्मिक कर्मकांड जैसे कि दान, सेवा, परोपकार, कमजोर व असहायों की निःस्वार्थ सहायता, शालीनता, सभ्य शालीनता पूर्वक बात करने की कला, अशिष्टता से परहेज, खुद खाने से पहले भूखे को खिलाना.....आदि इत्यादि सब व्यावहारिकता में लुप्त ही चुके हैं और जो थोड़ा बहुत दिख भी कही रहा है, तो वह भी दिखावा ही है | बिलकुल वैसे ही जैसे बड़े तोंद वाले बेडौल महापुरुषों का योग के प्रचार के लिए कैमरे के सामने योग करना | यानि जो कुछ भी किया जा रहा है वह भीतरी आवेग से नहीं, धार्मिक परम्परा मानकर किया जा रहा है |

यही कारण है कि अब धर्म की शिक्षा सभ्य व शालीन विद्वान नहीं देते, न ही स्कूलों, विश्वविद्यालयों में सिखाया जाता है | बल्कि सड़क छाप लुच्चे लफंगों को कट्टा, तमंचा, लाठी, बन्दूक थमाकर धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी सौंप देते हैं | इन लुच्चे लफंगों द्वारा किसी निर्दोष की हत्या कर देने पर न उनके माता-पिता शर्मिंदा होते हैं और न ही समाज या धार्मिक लोग शमिन्दा होते हैं | क्योंकि उनका धर्म तो किताबों में सुरक्षित है तो वे जानते हैं कि उनका धर्म खतरे में नहीं है | सारे देश में लोग आपस में मार काट-करने लगें, तब भी ये धार्मिक यही मानेंगे कि उनका धर्म खतरे में नहीं है...वे सही हैं | क्योंकि उनका धर्म किताबी है जो कभी व्यावहारिक नहीं हो सकता और जो व्यवहारिक ही नहीं है, वह खतरे में भला कैसे पड़ सकता है ? जो योद्धा अपने घर से बाहर ही न निकले, जो तलवार अपने म्यान से ही न निकले, भला वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?

 

धर्म क्या है और अधर्म क्या है ?


लेकिन मैं मानने लगा हूँ कि धर्म खतरे में है | क्योंकि धर्म पारम्परिक कर्मकाण्ड नहीं है | पूजा-पाठ, नमाज, तिलक, टोपी, घंटे-घड़ियाल, आरती-कीर्तन धर्म नहीं हैं | धर्म है परोपकार, सेवा, सहयोग, आपसी सद्भाव, प्रेम, करुणा, समाज के हितार्थ कार्य करना, अपने गाँव, मोहल्ले के हितार्थ कार्य करना, राष्ट्र व नागरिकों के हितार्थ कार्य करना | और यह सब करते हुए, स्वयं को प्रसन्न व स्वस्थ रखने के समस्त उपाय करना, अपने सामर्थ्यानुसार उपलब्ध भोगों का उपभोग करना, नाचना, गाना...उत्सव मनाना ये सब धर्म हैं |

दूसरों को कष्ट देना, दूसरों की सम्पत्ति छीनना, दूसरों पर अत्याचार करना, दूसरों के सुख में बाधा डालना, दूसरों के प्रेम में विष घोलना, समाज में सांप्रदायिक वैमनस्यता पैदा करना, निहत्थे, निर्दोषों की हत्याएं करना, गाली-गलौज करना, अशिष्टता से बात करना....ये सब अधर्म हैं |

 

सप्रमाण समझिये कि धर्म कैसे खतरे में हैं


भारत में शायद ही कोई होगा जो खुद को अधार्मिक कहता हो | नास्तिक भी खुद को अधार्मिक नहीं कह सकता क्योंकि नास्तिक भी कहीं न कहीं कोई न कोई परोपकार के कार्य कर ही देता है| और परोपकार धर्म है | तो जब सवा अरब से अधिक की आबादी धार्मिक है चाहे वह किसी भी पंथ, मत, संप्रदाय से सम्बंधित हो, लेकिन स्वयं को धार्मिक तो मानता ही | इनमें से कई लोग ऐसे भी होंगे जो खुद को हिन्दू नहीं मानता, मुस्लिम नहीं मानता, सिख नहीं मानता लेकिन इन्सान तो मानता ही है | और इंसानियत धर्म है क्योंकि इसका विपरीत हैवानियत अधर्म है |

लेकिन इतनी बड़ी संख्या में धार्मिकों के रहते हुए भी भारत में धर्म लुप्त होने के कागार पर पहुँच जाना गंभीर चिंता का विषय है

 

प्रथम प्रमाण:


एक खबर पढ़ी मैंने; 'तेजी से महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत में तकरीबन 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैंं और प्रतिदिन 3000 बच्चे भूख से मर जाते हैं। यह जानकारी ग्लोबल हंगर इंडैक्स के आंकड़ों से मिली है। हालांकि भारत का स्थान पिछले साल के मुकाबले ग्लोबल हंगर इंडैक्स में 63 के मुकाबले 53वां है। मंगल पर अपना यान भेजने वाले देश भारत में भूख के खिलाफ जंग सबसे बड़ी चुनौती है। बच्चों में कुपोषण और उनकी मृत्यु दर का स्तर बेहद चिंताजनक है। यहां तक कि नेपाल और श्रीलंका की स्थिति भारत से बेहतर है जबकि पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे पिछड़े देशों में स्थिति और भी बुरी है।' साभार: भोपाल समाचार

क्या कभी आपने सोचा कि लगभग हर सम्प्रदाय यह मानता है कि उनका सम्प्रदाय धर्म को महत्व देता है, लेकिन फिर भारत में ही 19 करोड़ लोग भूखे पेट क्यों सोते हैं ? क्यों प्रतिदिन तीन हज़ार बच्चे भूख से मर जाते हैं ?

चलिए मान भी लें कि ये आँकड़े झूठे हो सकते हैं...तीन हज़ार नहीं, हज़ार बच्चे ही रोज मरते हैं...तो भी क्यों मरते हैं ? क्या किताबी धार्मिकों की किताबों में यह नहीं लिखा है कि कोई पड़ोसी भूखा रह जाए और आपके गले से निवाला उतर जाए तो इससे बड़ा अधर्म और कुछ नहीं ? क्या सभी धार्मिकों के समाज में भूखे को भोजन, प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य नहीं माना गया ?

कितने धार्मिक संगठनों ने भूखे को भोजन देने के लिए आन्दोलन किये और भूखों तक भोजन पहुँचाया ? कितने धर्मरक्षक तलवार की बजाय, भोजन की थाल और पानी की बोतल थामें भूखों के घर तक पहुँचे ? कितने धार्मिकों ने राजनैतिक दबाव बनाया कि भूखों को पहले भोजन दो, अच्छी चिकित्सीय सेवायें उपलब्ध करवाओ, उन्हें आत्मनिर्भर होने में सहयोग करो उसके बाद जीडीपी का ग्राफ दिखाना ? क्या कभी तनिक भी शर्म आयी खुद को धार्मिक कहते हुए जबकि धार्मिक कोई कार्य नहीं कर रहे केवल दिखावा कर रहे हो ?

जो कट्टा-तमंचा लिए धर्म की रक्षा के लिए निकले हैं, क्या उन मूर्खों को किसी ने बताया कि कट्टे तमंचों से नहीं सेवाभाव व सहयोग से धर्म की रक्षा होती है | दड़बा हिन्दू हो या मुस्लिम या कोई और, सभी में बेबस और लाचार मिल जाते हैं...लेकिन क्यों ? जब आप खुद धार्मिक नहीं हो पाए तो फिर ये धार्मिकता का ढोंग क्यों ?

दो चार लोग हर समाज में ऐसे मिल जाते हैं, जो गरीबों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं, उन्हीं की सहायता क्यों नहीं कर देते यदि खुद नहीं पहुँच पाते किसी गरीब के पास तो ??? चलिए माना कि आप कट्टर धार्मिक हैं अपने धर्म के अलावा किसी और धर्म को बर्दाश्त नहीं कर सकते...अरे तो कम से कम अपने ही धर्म नाम के दड़बे में जो बेबस और लाचार भरे पड़े हैं उनकी ही सहायता कर दो और मरने दो दूसरे दडबों के बेबस और लाचारों को | अरे कम से कम अपने ही समुदाय, सम्प्रदाय की सहायता तो करो ??

 

द्वितीय प्रमाण:


सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अधर्मियों का साथ मत दो, अत्याचारियों का साथ मत दो, अशिष्ट व असभ्य लोगों को सही राह दिखाओ या उनका बहिष्कार करो | लेकिन क्या धार्मिक लोग ऐसा कर रहे हैं ?

यदि अधर्मियों, अत्याचारियों का सहयोग नहीं कर रहे होते धार्मिक लोग, तो क्या अधर्मी आज सड़कों से लेकर ससंद तक उत्पात कर रहे होते ? क्या जनता को लूटकर कोई विदेश भाग सकता था ? क्या कोई जनता पर दुनिया भर के टैक्स थोपकर चैन से रह सकता था ? क्या कोई जनता को असहाय और लाचार बनाने के अपने उद्देश्य में सफल हो सकता था ? क्या धर्म की रक्षा के नाम पर लुच्चे-लफंगों का गिरोह किसी निर्दोष की हत्या कर सकता था ?

लेकिन ऐसा हो रहा है क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया है | अब दडबों को धर्म समझ बैठा है समाज, अब नेताओं, बाबाओं, राजनैतिक व सांप्रदायिक, जातिवादी पार्टियों को धर्म समझ बैठा है | अब इंसान होना महत्वपूर्ण नहीं रह गया, अब हिन्दू होना, मुसलमान होना, काँग्रेसी होना, भाजपाई होना, संघी होना, बजरंगी होना धर्म हो गया | और चूँकि दड़बों को धर्म मान लिया गया, इसीलिए इन दडबों की सुरक्षा के लिए लुच्चे लफंगों की सेनाओं की आवश्यकता पड़ गयी | वरना सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन लुच्चे लफंगों से निपटने के लिए ? क्या सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन धूर्त, जुमलेबाज, लुटेरे नेताओं को उनकी औकात बता देने के लिए ???

लेकिन दुर्भाग्य से जनता ही धर्म से विमुख हो गयी और यही कारण है कि कुछ मुट्ठीभर बदमाश पुरे देश को गुलाम बना कर बैठ गये | कुछ मुट्ठीभर लुटेरे पुरे देश को लूटकर मालामाल हो गये और जनता अपनी किस्मत को कोस रही है |

 

तृतीय प्रमाण:


क्या सभी सम्प्रदायों की धार्मिक पुस्तकों में शिक्षा के महत्व को नहीं स्वीकारा गया है ? क्या शिक्षा का प्रसार प्रसार करना सभी धार्मिकों के प्रमुख कर्तव्यों में से एक नहीं है ?

फिर शैक्षणिक संस्थानों की दुर्गति क्यों हो रही है ?

एनडीटीवी ने एक सर्वे में यह खुलासा किया है कि भारत में अधिकांश सरकारी स्कूलों में शौचालयों और पीने के पानी की बुनियादी सुविधाओं की कमी है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के कार्यान्वयन पर एनडीटीवी ने भारत के 13 राज्यों में 780 सरकारी स्कूलों का सर्वेक्षण किया। परिणाम बहुत शर्मनाक था उनमें से 63 प्रतिशत स्कूलों में कोई खेल का मैदान नहीं था। सर्वे किए गए स्कूलों में से एक तिहाई से अधिक स्कूलों की स्थिति बेहद खराब थी। ऐसी स्थित में अगर कोई छात्र शौचालय जाना चाहता है तो वह घर वापस चला जाता है। एनडीटीवी चैनल ने शौचालय की कमी को छात्राओं द्वारा अधिक मात्रा में स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण बताया। स्थित इतनी खराब थी की 80% से अधिक स्कूलों में उम्र के अनुसार छात्रों का प्रवेश नहीं था।

शिक्षा का अधिकार, अधिनियम (आरटीई) प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चों को मुफ्त और आवश्यक शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम छात्र शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के साथ-साथ स्कूलों की इमारतों, बुनियादी ढाचों, स्कूल के कामकाज के दिनों, शिक्षकों के काम करने के घंटों, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति को भी निर्दिष्ट करता है।

बहुत से सरकारी स्कूलों को लंबे समय से पुनःनिर्मित नहीं किया गया है। कभी-कभी छात्रों को कक्षा के बाहर फर्श पर बैठने के लिए कहा जाता है क्योंकि स्कूल की छत किसी भी समय गिर सकती है। साभार: Maps of India

क्या धार्मिकों ने कभी शिक्षा पर प्रश्न उठाया ? क्या कभी धार्मिकों ने सरकार पर दबाव बनाया कि उनके बच्चों को उचित शिक्षा मिले वह भी बच्चों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाये बिना ?

शायद नहीं ! क्योंकि आप लोगों के लिए ये धर्म नहीं है | धर्म तो है हिन्दू-मुस्लिम खेलना, ब्राह्मण-दलित खेलना.....और मेरी नजर में ये केवल साम्प्रदायिकता है धर्म नहीं | धर्म हिन्दू-मुस्लिम में नहीं बटा हुआ है, धर्म केवल धर्म ही होता है और सार्वभौमिक होता है | हिन्दू हो या मुस्लिम  या कोई और सम्प्रदाय, सभी के बच्चों को शिक्षा दिलाना धर्म है | सभी के बच्चों के स्वास्थ्य व सुरक्षा का ध्यान रखना धर्म है |

तो समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म मान बैठा, इसीलिए ही मैं कह रहा हूँ कि धर्म खतरे में हैं | धर्म वह नहीं जो ये लुच्छे लफंगों के नेता और ठेकेदार समझा रहे हैं | ये छुरेबाज, कट्टेबाज, बेरोजगार लफंगे और उनके ठेकेदार सिखायेंगे हमें धर्म ???

यदि ऐसी स्थिति आ गयी है कि अब इन लुच्चे लफंगों से धर्म सीखना पड़े, तो बेहतर है कि सारा समाज ही आत्महत्या कर ले | यदि इनके बहकावे में आकर पढ़े-लिखे भी गुंडागर्दी करने लगें, साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने लगें, तो बेहतर है कि समाज खुद को धार्मिक कहना ही छोड़ दे |

तो शायद अब आप समझ गये होंगे कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म के रूप में धारण कर चुका है | और यही स्थिति रही, तो बहुत ही जल्द धर्म लुप्त जाएगा और उसके साथ ही लुप्त हो जाएगा इंसान और इन्सानियत |

~विशुद्ध चैतन्य

19 जून 2018

समर्थ को सहायता एक अकाट्य सत्य




संन्यास एक ऐसी अवस्था होती है, जहाँ पहुंचकर आप वह सब देख व समझ पाते हैं, जो समान्य जीवन जीते हुए नहीं समझ पाते | हम यह कभी चिन्तन नहीं कर पाते अपनी दैनिक जीवन के उलझनों में कि समाज हमेशा समर्थ की सहायता को तत्पर क्यों रहता है ? हम यह कभी चिंतन-मनन नहीं कर पाते कि जिनके पेट भरे हुए होते हैं, उन्हें खिलाने पिलाने के लिए हर कोई आतुर रहता है, लेकिन जो भूख से मर रहे होते हैं, उन्हें पूछने कोई नहीं जाता | हम यह नहीं देख पाते कि बड़े बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों को खरबों का कर्ज माफ़ कर दिया जाता है, लेकिन किसी विवश लाचार व्यक्ति का घर नीलाम करके भी कर्ज वसूल लिया जाता है |

अभी हाल ही में पुण्य प्रसुन्न बाजपेयी ने अपने किसी टीवी शो में बताया कि 17 हज़ार करोड़ रूपये की कर्ज माफ़ी पिछले तीन वर्षों में उद्योगपतियों को दी गयी | एक और शो में उन्होंने बताया कि उद्योपतियों को दिए गये 48 खरब रूपये सरकार ने बट्टे खाते में डाल दिए, यानि वे कर्ज माफ़ कर दिए गये | लेकिन किसानो के लिए उनके पास पैसा नहीं है | किसानो को कर्ज माफ़ी के रूप में चेक दिए भी गये तो अस्सी पैसे से अट्ठारह रूपये तक के |



सभी धार्मिक, आसमानी, हवाई किताबों में यही पढ़ने को मिलता है कि दीन-दुखियो की सहायता करो, गरीबों की सहायता करो, असहायों की सहायता करो लेकिन सहायता हमेशा अमीरों की ही होती है, समर्थ व समृद्धों की ही होती | लाखों समाजसेवी संस्थाएं होंगी इस दुनिया में, लेकिन लाख लोगों की भी सहायता नहीं हो पाती | अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी बेघर भिखारियों को देखा जा सकता है जो फुटपाथों पर जीवन गुजारते हैं |

लेकिन ऐसा होता क्यों हैं, जिन्हें आवश्यकता है उनकी सहायता करने की बजाये उनकी सहायता क्यों की जाती है जो समर्थ हैं ? समाज ने कभी भी इस बात पर चिंतन नहीं किया | जिन्होंने चिंतन मनन किया, समझा जाना, वे समाज को समझा नहीं पाए या समाज ने उन्हें सुना ही नहीं |

समाज समर्थ का सहयोगी क्यों ?


समाज समर्थ का सहयोगी इसीलिए होता है क्योंकि सहयोग की सार्थकता उन्हें दिखाई देती है | उन्हें ऐसा लगता है कि हम जिसका सहयोग कर रहे हैं वह चूँकि अपने आप में समर्थ है, आत्मनिर्भर है, समृद्ध है, इसीलिए वह धन का दुरूपयोग नहीं करेगा |

दूसरा प्रमुख कारण है किसी भी समृद्ध, ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की सहायता करके वास्तव में व्यक्ति अपने ही अहंकार को तृप्त करता है | वह उस समृद्ध व्यक्ति से स्वयम को जुड़ा हुआ पाता है और स्वयं को यह सांत्वना दे पाता है कि वह उतना अमीर या प्रसिद्द न सही, पर इस योग्य तो हुआ कि वह उस अमीर की योजनाओं में सहयोगी हुआ |

शेयर में पैसे लगाना, व्यापार में पैसे लगाना, राजनैतिक पार्टियों को चंदा देना, राजनेताओं को चंदा देना आदि सब व्यापारिक सहयोग हैं परमार्थ या परोपकार नहीं | बदले में उन्हें कुछ न कुछ चाहिए होता है | लेकिन यदि किसी गरीब की सहायता करते हैं, किसी असफल व्यक्ति की सहायता करते हैं तो पैसे बट्टे खाते में जाते हुए दिखाई देते हैं | उससे कोई लाभ नहीं होता उन्हें | यही कारण है कि समर्थ व समृद्ध व्यक्तियों को हर कोई सहायता देने के लिए तत्पर रहता है |

धर्म व आध्यात्म में निःस्वार्थ दान का महत्व


सभी सम्प्रदायों में दान या जकात का बहुत महत्व बताया गया है | इसका प्रमुख कारण था कि जो समर्थ नहीं हैं, असफल हैं, गरीब हैं, अयोग्य हैं, उनकी सहायता हो सके | लेकिन ऐसा होता नहीं | क्योंकि साल में एक बार या किसी धार्मिक पर्व में सौ पचास रूपये दान करके लोग समझते हैं कि उन्होंने अपना धर्म निभा लिया | वास्तव में इन्होंने दान किया ही नहीं होता, केवल ढोंग कर रहे होते हैं दान का |

यदि समाज वास्तव में दान कर रहा होता, वास्तव में जकात दे रहा होता, तो समाज में गरीबी देखने नहीं मिलती | कोई भूखा न मर रहा होता और कोई किसान धनाभाव में आत्महत्या नहीं कर रहा होता |

फिर किसी को धन छुपाने के लिए गोदामों, पनामा या स्विसबैंक न खोजना पड़ता और न ही किसी को काला धन सफ़ेद करने वाले नेताओं और बाबाओं की आवश्यकता पड़ती |

दान पुण्य का महत्व समाप्त हुआ भी तो उन मुफ्तखोरों की वजह से, जिन्होंने दान बटोरना ही धंधा बना लिया | कभी समाज सेवी संस्थाओं के नाम पर दान वसूलते हैं, लेकिन जिनकी सेवा का दावा करते हैं, उन तक पैसा पहुँचता ही नहीं | कई लोग भीख मांगने को ही धंधा बना रखे हैं | बड़ी बड़ी कोठियाँ बना लेते हैं, उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे होते हैं, लेकिन पेशा भीख मांगने का अपना रखे हैं |इसीलिए दान धर्म गर्त में चला गया |


मेरी अपनी समझ कहती है कि दान या जकात का मुख्य उद्देश्य किसी को सहयोग देकर आत्मनिर्भर बनाना होता है, किसी को सहयोग देकर उसे समस्याओं से बाहर निकालना होता है, न कि भिखारियों की तरह सौ पचास रूपये का चंदा देकर टरका देना |

दान भी लेना है तो पहले स्वयं को समर्थ करो


दुनिया में जितने भी महान दार्शनिक आये, जितने भी लोगों ने सत्य को जाना, जितने लोगों ने आध्यात्मिक या भौतिक उन्नति पायी, सभी के उपदेशों व सूत्रों में एक मूल सन्देश अवश्य छुपा मिलता है और वह है 'स्वयं को जानो, स्वयं को पहचानो !' गौतम बुद्ध ने भी कहा था, “अप्प दीपो भव:” अर्थात स्वयं का प्रकाश बनो !

इन्होने सत्य को जाना कि जब तक आप स्वयं को समर्थ, सबल नहीं बनाते, कोई भी आपकी सहायता करने को उत्सुक नहीं होगा | एक दो बार कोई सहायता कर भी देगा, लेकिन बाद में वह भी अपने हाथ खींच लेगा | चूँकि आप आलसी हैं या अयोग्य हैं, इसीलिए आप उन सहायता का सदुपयोग नहीं कर पाते, आपकी स्थिति वैसी ही दयनीय बनी रहती है | और अंत में आप दुनिया को कोसते हुए इस दुनिया से विदा ले लेते हैं भुखमरी और तंगी में जीते हुए | आपकी सारी महत्वाकांक्षाएँ भीतर ही दफन होकर रह जाती है | आप समाज सेवा भी करना चाहते हों, आप देश के लिए कुछ महत्वपूर्ण भी करना चाहते हों, तब भी लोग आपकी सहायता को आगे नहीं आएंगे | क्योंकि आप अयोग्य हैं, असमर्थ हैं, असफल हैं | और सदैव स्मरण रखें, खुद का पेट भरने या परिवार पालने की योग्यता न हो और सपने दूसरों की सेवा या सहायता की देख रहे हैं, तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं | पहले स्वयं को व स्वयं के परिवार को पालने योग्य बनिए, स्वयं  व स्वयं के परिवार को इतना समर्थ व समृद्ध बना लीजिये कि विपरीत परिस्थितियों में भी आपकी मानसिक स्थिति डाँवाडोल न हो सके |

इसीलिए पहले स्वयं को समर्थ व सफल बनाइये, दूसरों के सामने हाथ फैलाना बंद कर दीजिये | जब आप दूसरों की तरफ देखना बंद कर देते हैं, तब आप स्वयं की ओर मुड़ते हैं स्वयं की शक्तियों व योग्य्ताताओं को पहचान पाते हैं |

बुरा वक्त क्या वास्तव में बुरा होता है ?


बुरा वक्त कभी भी बुरा नहीं होता | बुरा वक्त वास्तव में वह समय होता है, जो प्रकृति आपको उपलब्ध करवाती है, स्वयं को जानने व समझने के लिए | जब तक व्यक्ति के जीवन में बुरा वक्त नहीं आता, वह इंसान नहीं बन पाता | उसे दूसरों के दुःख-दर्द समझ में नहीं आते | और जिन्हें दूसरों के दुःख-दर्द नहीं समझ में आते, उनमें दूसरों की सहायता के लिए बढ़ने की भावना विकसित नहीं हो पाती, वह मनुष्य नहीं बन पाता | वास्तव में मनुष्य योनी में जन्म लेने का मुख्य कारण यही होता है कि हम पशु योनी में कुछ ऐसा काम कर जाते हैं जो उस योनी के सामान्य व्यवहारों से अलग होता है | आपने कई बार पढ़ा होगा कि किसी मछली ने या किस हिंसक पशु ने किसी की जान बचाई | तो ये उनके सामान्य व्यव्हार के विरुद्ध होता है, और जब कोई पशु अपनी जाति से अलग किसी और जाति या प्रजाति के जीव के प्रति सद्भावना से भरने लगता है, तब वह मनुष्य योनी के अनुकूल होने लगता है | क्योंकि मनुष्यता का अर्थ ही है परस्पर सहयोगिता, दया, करुणा, प्रेम, सेवा का मिश्रित भाव से भरा होता है मनुष्य |

दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति के भीतर भी ये भाव होते हैं, लेकिन वे सब बचपन में मिले अनुभवों, परवरिश, व विश्वासघातों के परिणाम स्वरुप भीतर ही दफन होकर रह जाते हैं | वे अब चाहकर भी उन भावों को नहीं खोज पाते क्योंकि अनुभव ही उनका बुरा रहा | इसीलिए ही क्षमा शब्द का महत्व हो गया | विद्वानों ने कहा कि जो बीत गया उसे भुला दो, क्षमा कर दो उन्हें जिन्होंने तुम पर अत्याचार किया | तुम उस समय इतने ताकतवर नहीं थे कि तुम अत्याचारियों का सामना कर पाते, इसीलिए उस विषय पर अब चिन्तन करने उसके आधार पर वर्तमान में दूसरों से नफरत करने का कोई लाभ नहीं | क्षमा कर दो उन्हें और क्षमा कर दो स्वयं को और आगे बढ़ो | स्वयं को खोजो, स्वयं को जानो और स्वयं को समृद्ध, शक्तिशाली बनाओ |

दूसरों से सहायता की आस लगाए बैठे रहने वाले लोग कभी भी सफल नहीं हो पाते | और जब आप स्वयं समर्थ, शक्तिशाली हो जायेंगे, तो दुनिया स्वतः ही आपकी सहायता करने वैसे ही आगे बढ़ेगी, जैसे कि आज बड़े बड़े धूर्त नेताओं, व्यापारियों, ठगों, देश व जनता के लुटेरों की सहायता के लिए पलकें बिछाए बैठे रहती है |

~विशुद्ध चैतन्य

यहाँ नीचे नितिन खुराफाती का एक विडियो दे रहा हूँ, उसे अवश्य देखें |

15 जून 2018

निराकार का भी होता है आकार




साकार की उपासना तो समझ में आती है मुझे | क्योंकि जो प्रत्यक्ष आपकी सहायता करता है उसकी उपासना या सम्मान स्वाभाविक है | जैसे कि सूर्य की उपासना, चन्द्र की उपासना, नदी, वृक्ष, पहाड़, खेतों की उपासना | ये सभी जीवन दायी हैं | कुछ लोग नेताओं, अभिनेताओं, क्रिकेटरों की उपासना करते हैं वह भी समझ में आता है क्योंकि वे उनकी तरह होना चाहते हैं न कि अपनी तरह | कुछ लोगों की दाल रोटी ही उनकी चापलूसी से चलती है इसलिए वे उनकी उपासना करते है, वह भी समझ में आता है लेकिन….

23 फ़रवरी 2017

कभी किसी का बुरा मत सोचो


यदि आप सुख चाहते हैं और सुख को समृद्ध करना चाहते हैं, तो कभी भी किसी भी पोजिटिव वाक्य के बाद कुछ भी निगेटिव शब्द न जोड़ें | उदाहरण के लिए, "मैं परीक्षा में सफल होऊँगा"

इस वाक्य के बाद यदि आपने जोड़ा, "ईश्वर ने चाहा तो" या इंशाअल्लाह आदि | यह वाक्य को कमजोर कर देता है | क्योंकि सब्कांशियास माइंड यह अर्थ निकालता है कि आप ने तैयारी पूरी नहीं की है और किसी और के भरोसे बैठे हैं |

इसी प्रकार यदि कोई नकारात्मक वाक्य मुँह से निकल जाये तो तुरंत सकारत्मक शब्द या वाक्य जोडिए | उदाहरण के लिए, "मैं शायद फेल हो जाउँगा"

ऐसे किसी भी नकारात्मक वाक्य के तुरंत बाद जोड़िये, "लेकिन मैं अगली बार अवश्य पास हो जाउँगा" या "यह मेरा वहम मात्र है लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं पास हो जाउँगा" |

यह वह प्रयोग हैं जो मैंने स्वयं अपनाए हैं और आज तक अपनाता हूँ | इसलिए कठिन से कठिन परिस्थितयों से बाहर निकलता चला गया और वह सब पाया जो कोई और कल्पना भी नहीं कर सकता था | विश्व के महान संगीतकारों, फिल्म निर्माताओं, गायक, गायिकाओं के साथ काम करने का अवसर मिला, वह सम्मान मिला जो एक बाईस तेईस वर्ष के लड़के के लिय उस उम्र में मात्र सपना ही था | अपनी शर्तों पर काम किया अपनी शर्तों पर जीया और आज तक जी रहा हूँ |

यह मैंने बहुत ही कम उम्र में सीख लिया था क्योंकि मेरे पिताजी की आदत थी हर अच्छे शुभकार्य या दिवस पर कुछ भी करते थे तो नकारात्मक वाक्य या शब्द जरुर जोड़ते थे | जैसे कि हम सब को बाहर घुमाने ले गये कहीं तो बड़ी ख़ुशी ख़ुशी ले जाते, बहुत खर्च भी करते.. लेकिन शाम जब लौटते तो कहते, "आज तो सारा पैसा खर्च हो गया, न जाने कल ऑफिस कैसे जाउँगा ?" और उसके साथ ही हम सभी की ख़ुशी कपूर हो जाती | हमारे लिए कपड़े लेकर आयेंगे हम सब खुश होंगे और इसी बीच पता चलता कि वे कमरे में सर पकड़ कर बैठे हैं कि जितना सोचा था उससे ज्यादा खर्च हो गया अब महीने भर का खर्चा कैसे चलेगा | तो वे हम सबको खुश रखना चाहते थे, लेकिन उस ख़ुशी में ग्रहण भी लगा देते थे | इसका परिणाम यह हुआ कि पिताजी को आजीवन दुःख भोगना पड़ा | उनके दोनों बेटे उनसे अलग हो गये क्योंकि बेटों ने कभी नहीं कहा कि उनको महँगी चीजें खरीद कर दो, लेकिन वे खुद खर्च करते और फिर जब सर पकड़ते तो हम अपने आप को गुनाहगार मानते थे | उनको कई बार समझाया भी, लेकिन अंत में यही हुआ कि प्रकृति ने हम सबको अलग अलग कर दिया |

तो नकारात्मक शब्द और वाक्य सकारात्मक शब्द और वाक्य से अधिक प्रभावी होते हैं | इसलिए ही कहते है कि कभी किसी का बुरा मत सोचो, कभी किसी के लिए बद्दुआ मत निकालो | ~विशुद्ध चैतन्य

10 जनवरी 2017

बहुमत जिसे मिला हो, वह सही ही होगा इस बात की कोई गारन्टी नहीं है



माना जाता है कि बहुमत जिसके पास हो, वही विजेता है | लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि बहुमत सत्यता का मानक कभी नहीं बन सकता और न ही कभी ऐसा हो सकता है कि सभी एकमत हो सकें | कुछ रिश्वतखोरी, घोटाले, भ्रष्टाचार के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में, कुछ अधर्म के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में....और यही देखा गया है कि अधर्म, असत्य व अपराध के पक्ष में ही अधिक लोग रहे हैं हमेशा |

08 जनवरी 2017

स्वप्न तो केवल स्वप्न होता है



अक्सर आप लोगों ने पढ़े-लिखे और जमीने विद्वानों को यह कहते सुना होगा, “स्वप्न तो केवल स्वप्न होता है सत्य नहीं | स्वप्न मन की दबी हुई भावनाओं को ही दिखाता है या दिन में जो कुछ भी हम सोचते हैं, देखते हैं वही सब स्वप्न के रूप में उभर कर आता है |”

13 दिसंबर 2016

संन्यासी हरामखोर नहीं होता.....

भारत में वर्षा, वृक्ष, नदी और संत नि:स्वार्थ भाव के प्रतीक माने जाते हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में ही संतों को महत्व मिलता है, विदेशों में भी संतों को महत्व मिलता है, जैसे कि संत-वेलेंटाइन |

यह विषय आज इसलिए चुना क्योंकि वर्तमान समाज व शिक्षा कर्मयोग को महत्व देती है | उनके लिए बाकी के तीन योग कोई मायने नहीं रखते | और इसका प्रमुख कारण है, शिक्षा का उद्देश्य नौकर बनना या नौकरी करना | कोई इंजीयर बने, डॉक्टर बने या आईएएस या आईपीएस, उदेश्य केवल नौकरी करना ही होता है | अब चूँकि सारा समाज ही नौकरों का है, महँगी से महँगी प

कल ही एक व्यक्ति को ब्लॉक किया जिसे अपने लिस्ट में शामिल किये चार दिन भी नहीं हुए थे, लेकिन आते है उसने उल्टियाँ करनी शुरू कर दी | बहुत से लोग मैसेज बॉक्स में उल्टियाँ करते हैं, वह अलग बात है, लेकिन फ्रेंडरिक्वेस्ट भेजकर फ्रेंडलिस्ट में शामिल होने के बाद उल्टियाँ करना तो केवल संघी-मुसंघी-बजरंगियों के ही संस्कार हो सकते हैं, किसी भारतीय के नहीं | इनके संस्कार विदेशी हैं, इनके कर्मकांड, विचार, व्यव्हार सभी विदेशी हैं, भारतीय नहीं |

07 नवंबर 2016

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया

बचपन से द्वन्द रहता था मन में कि माँसाहार यदि पाप है तो फिर अंग्रेजों को पाप क्यों नहीं लगता, अरबियों को पाप क्यों नहीं लगता, आदिवासियों को पाप क्यों नहीं लगता ?

कई विद्वानों और पंडितों से प्रश्न किया कई से तर्क किये... लेकिन कोई ऐसा उत्तर नहीं मिल पाया जो मुझे संतुष्टि दे पाता | सारे वैज्ञानिक-अवैज्ञानिक तथ्यों को खंगाले लेकिन यह सिद्ध नहीं हो पाया कि माँसाहार करने से पाप लगता है |

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया, दोनों ही जीवनदाई है, दोनों ही वंशवृद्धि करते हैं, दोनों ही जीवित हैं, लेकिन एक को खाने से पाप नहीं लगता और दूसरे को खाने से पाप लगता है |
फिर यही नहीं समझ में आया कि झूठ बोलने से भी पाप लगता है, लेकिन मैंने किसी भी जुमलेबाज नेता को पाप लगते नहीं देखा, उलटे अदालतों से उसे बरी होते ही देखा है | दुनिया भर के घोटाले करने वाले, रिश्वतखोरों, अत्याचारियों, शोषकों को दुनिया भर के गंभीर अपराधों में आरोपी होते हुए भी सत्ता सुख भोगते देखा है | वहीँ अपने बच्चों को भूख से मरने से बचाने के लिए की गयी चोरी पर भी प्रताड़ित होते हुए, जेल भोगते हुए देखा है और वह भी बिना अदालत का फैसला आये | तो समझ में नहीं आया कि यह पाप किस बला का नाम है, होता कैसा है, दिखता कैसा है |

कई विद्वान कहते हैं कि माँसाहार अध्यात्मिक मार्ग में बाधक है, लेकिन मनुस्मृति कहती है,

19 अक्टूबर 2016

नास्तिक-आस्तिक

आधुनिक पढ़े-लिखे नास्तिकों में वेलेंटाइन डे सम्मानित है, लेकिन होली पाखंड |

Teacher's-Day सम्मानित है, लेकिन गुरु-पूर्णिमा पाखंड |

Women's-Day सम्मानित है, लेकिन करवा-चौथ पाखंड |

इसी प्रकार से ऐसी कई बातें हैं जो पाखंड, ढोंग दिखाई देती हैं उन्हें जो आत्मिक जगत से दूर हो जाते हैं, लेकिन उसी को नए रूप में अंग्रेजी नाम देकर स्वयं मनाते भी हैं | बस अंतर केवल इतना हो जाता है कि नास्तिकों के पर्व आस्तिकों के पर्व मनाने की विधि के बिलकुल विपरीत होती है | कल कोई ऐसे पर्व का विरोध करेंगे ये लोग जिसमें दान या जकात देना अनिवार्य होता है, तो इनका पर्व बन जाएगा उसी के विपरीत कि दान या जकात लेना अनिवार्य होगा |

04 अक्टूबर 2016

लिखी हुई सभी बातें अकाट्य सत्य नहीं हो सकतीं क्योंकि इनमें हेर-फेर हो सकते हैं


"मनुष्य न तो कोरी बुद्धि है, न स्थूल शरीर है, और न केवल हृदय या आत्मा ही है | सम्पूर्ण मनुष्य के निर्माण के लिए तीनों के उचित और एकरस मेल की आवश्यकता होती है और यही शिक्षा की सही व्यवस्था है |" -महात्मा गाँधी