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05 मार्च 2017

मैं सुखी तो जग सुखी


एक बहुत ही बड़ा भ्रम पाल लिया है पढ़े-लिखों ने कि भौतिक सुख ही वास्तविक सुख है और बाकी सभी कुछ भ्रम है मिथ्या है | इनको लगता है कि इंसानों ने जो आविष्कार किये वे ही जीवन दायिनी हैं, बाकि सभी कुछ व्यर्थ | और यह भ्रम इतनी गहराई तक लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा दिया गया है कि इनकी स्थिति उन धार्मिक कूपमंडूकों सी हो गयी है, जो यह मानते हैं कि ईश्वर ने उनके लिए कोई पुस्तक आसमान से उतारी थी और उसमें जो कुछ भी लिखा है वही सत्य है, बाकी सब झूठ | कुछ तो ऐसे धार्मिक कूपमंडूक हैं जो चाय भी पीने जायेंगे तो देखेंगे कि उनकी किताब में इसकी परमिशन है कि नहीं | लेकिन वही धार्मिक लोग यह नहीं देखेंगे कि बलात्कार, लूटपाट, निर्दोषों की हत्या, अपराधी प्रवृति के नेताओं को वोट देना.... आदि इत्यादि उनकी ईश्वरीय किताबों, वेद-पुराणों में वर्जित है या नहीं |

इसी प्रकार कुछ अध्यात्मिक कहे जाने वाले वाले विद्वानों का मानना है कि "मैं सुखी तो जग सुखी" के सिद्धांत पर चलना ही आध्यात्म है | और हम देखते ही हैं कि अध्यात्मिक गुरु लोग केवल अपने में मस्त रहते हैं | उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पड़ोस में कोई दुखी है या नहीं | मंदिर-मस्जिदों के सामने भीख माँगते लोगों को देखकर मुझे बहुत ही आश्चर्य होता है कि जो मंदिर-मस्जिद उन भिखारियों की दरिद्रता दूर नहीं कर पाता, वह भला दूर से आने वालों की मनोकामना कैसे पूरी कर सकता है ?

लेकिन मेरी नजर में आध्यात्मिक ज्ञान यानि अधि + आत्मा यानि वह सर्वशक्तिमान जिसके हम अंश हैं और वह आत्मा जो इस शरीर को चला रही है, उसका ज्ञान | अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए आजीवन न तो तपस्या करनी पड़ती है और न ही आजीवन कोई एक किताब, मन्त्र, आयत या श्लोक रटते रहना पड़ता है | न ही कोई कर्मकाण्ड आजीवन करते रहना पड़ता है | हाँ ध्यान आवश्यक है क्योंकि ध्यान से आप अपने मस्तिष्क व शरीर को रिफ्रेश कर पाते हैं | ध्यान कोई चमत्कार नहीं है, केवल अपने आपको न्यूट्रल मोड में डाल देना मात्र है | जब आप ध्यान की अवस्था में होते हैं, तब आपके मस्तिष्क के सेल्स रिलेक्स मोड में आ जाते हैं और साथ ही आपके शरीर की सभी कोशिकाएं भी | आपके बीस मिनट के ध्यान से आपको इतनी उर्जा मिलती है, जितनी कि आठ घंटे की नींद से मिलती है | आपके शरीर की चमक बढ़ जाती है, सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है, एकाग्रता बढ़ जाती है....व अन्य कई भौतिक व अध्यात्मिक लाभ मिलते हैं |

तो ध्यान करना आध्यात्मिक उत्थान का सरल मार्ग है | अध्यात्मिक उत्थान होने के बाद फिर आप किसी दड़बे में कैद नहीं रह पायेंगे, आपको बेचैनी होने लगेगी | क्योंकि तब आप मानव निर्मित सभी सीमाओं से स्वयं को मुक्त पायेंगे | आपको समझ में आ जायेगा कि दुनिया इतनी छोटी नहीं है, जितनी कि मानव समाज ने बना रखा है | दुनिया तो इतनी विशाल है कि उसका छोर ही ज्ञात नहीं हो पा रहा | फिर आपको यह भी समझ में आ जाएगा कि पढ़े-लिखे लोगों ने कितनी बड़ी बड़ी गलतियाँ कर रखी हैं.. जैसे कि प्लास्टिक का अविष्कार व उसका अनियंत्रित दुरुपयोग |

पानी या कोल्ड-ड्रिंक बेचने वाली कम्पनियाँ प्लास्टिक की बोतल में पानी या कोल्डड्रिंक आप तक पहुँचाती है | आप पानी की बोतल खरीदते हैं, पानी पीते हैं और बोतल फेंक देते हैं | न तो कम्पनी को इस बात की कोई फ़िक्र है कि वे प्लास्टिक की बोतलें कितने अन्य जीवों की जान लेंगी, कितने वनस्पति व जलचरों की जान लेंगीं...बस कंपनी को कुछ कागज के नोट चाहिए और आपको अपनी सुविधा | फिर आप लोग तो दुनिया से उठ जाओगे एक दिन, आने वालों के लिए नरक बनाकर | जैसे कि किसी टूरिस्ट प्लेस जाकर आप लोग करते हैं | साफ़ सुथरी झील देखी और प्लास्टिक की बोतलें उसमे फेंकनी शुरू कर दी, समुद्र देखा और प्लास्टिक की बोतलें फेंक दी... क्योंकि आप लोग पढ़े-लिखे हैं खुद को बुद्धिमान समझते हैं और ऐसा करना आधुनिकता मानते हैं |

लेकिन क्या कभी सोचा है आपने कि ऐसा करके आप लोगों ने दुनिया को नरक बना दिया ? केवल अपनी भौतिक सुखो के लिए न जाने कितने उन जीवों की जिन्दगी खतरे में डाल दी और कितने जीवों को लुप्त होने पर विवश कर दिया, जिनको न तो आपने देखा है और न ही उन्होंने आपको ? आप में से कई होंगे शाकाहारी... जो जीव हत्या पाप है का नारा लगाते घूम रहे हैं | लेकिन आपके द्वारा प्रयोग किये जा रहे भौतिक संसाधनों से न जाने कितने जीव हर रोज काल का ग्रास बन रहे हैं |

तो यह है आप लोगों का विकास और आधुनिकता | मजाक उड़ाते हैं आप लोग हम जैसे लोगों का क्योंकि हम आपको कुछ करते दिखाई नहीं देते | आप लोग जिसे कुछ करना कहते हैं, जरा सोचिये उस करने में आपको लाभ कम हानि अधिक हो रही है | आप केवल स्लेव बनकर रह गये हैं कुछ व्यापारियों, कुछ पूंजीपतियों और मुर्ख सरकारों के |

प्रकृति तो स्वयं इतनी व्यवस्थित व सुनियोजित है कि कुछ भी व्यर्थ नहीं है | मनुष्य कोई यंत्र बनाता है तो वह बेकार होने के बाद केवल कबाड़ सिद्ध होता है | जबकि प्रकृति ने जो भी स्वचालित यंत्र जिसमें मानव शरीर भी शामिल है, वह व्यर्थ नहीं होता | जमीन में छोड़ तो शरीर के भीतर से स्वयं ही उस शरीर को नष्ट करने के लिए कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं | साथ ही साथ कई पशु-पक्षी के भोजन के काम में आ जाता है | और यह भी न हुआ तो, मिटटी में मिलकर खाद बन जाता है जो कि वनस्पतियों के भोजन के काम आता है |

आप स्वयं कल्पना करके देखिये कि मानव तो आज तक जल नहीं बना पाया.. आपको मिनरल वाटर भी बेच रहा है कोई तो जमीन से निकालकर ही बेच रहा है, न कि सागर से जल लेकर | सरकार को भी केवल कागज के नोटों से मतलब है, इसलिए कोकाकोला जैसे कंपनियों को जल बेच देती है.. जबकि सरकार स्वयं जल का निर्माण नहीं कर सकती | वह जल जो सभी जीव जंतुओं के लिए सामान रूप से ईश्वर द्वारा उपलब्ध करवाया गया है वह भी निःशुल्क, उसे वे लोग अपने अधिकार में ले रहे हैं, जिनकी इतनी भी हैसियत नहीं कि सागर का जल ही साफ़ करके पीने योग्य बना लें | और हम लोग खुद अपने हाथों से अपने ही देश के प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने के लिए ऐसी सरकारों को चुनते हैं जो मानसिक रूप से रुग्ण व मुर्ख होती है |

तो यह सब इसलिए क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है | भौतिक ज्ञान को सर्वोच्च मानने वाले मूर्ख पढ़े-लिखे विद्वानों ने पृथ्वी ही नहीं, सम्पूर्ण वायुमंडल व अंतरिक्ष तक को दूषित कर दिया...लेकिन भ्रम पाले बैठे हैं कि भौतिकता जीव सबसे बुद्धि मान हैं | बिगड़ा तो अब भी कुछ नहीं है यदि समय रहते लोग होश में आ जाएँ |

~विशुद्ध चैतन्य

 


04 सितंबर 2016

Hello 911


कभी कभी ऐसी परिस्थित में हम फंस जाते हैं कि हम सच नहीं बोल पाते लेकिन यह अपेक्षा सामने वाले से रहती है कि वह सच को समझ पाए | ऐसी ही परिस्थिति में एक लड़की ने पुलिस कण्ट्रोल रूम में फोन किया और फिर क्या हुआ वह वह आप स्वयं पढ़ लें...

12 अगस्त 2016

फेसबुक के बारे में रोचक तथ्य – Interesting Facts about Facebook

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1. फेसबुक की शुरुआत 4 फ़रवरी 2004 में हुई थी

2. आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन मार्क जुकरबर्ग(फेसबुक के फाउंडर) को सैलरी के तौर हर साल एक डॉलर मिलता है।

3. आपको शायद ही पता होंगा की फेसबुक पेज को आप 70 अलग-अलग भाषाओं में ट्रांसलेट कर सकते है।

4. Facebook पर हर महीने लगभग 2.5 अरब पिक्चर अपलोड होती है। और यह आंकड़ा दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है।

5. आप सावधान हो जाइये क्योकि फेसबुक पर हर रोज़ 6,00,000 अकाउंट को हैक करने का प्रयास होता है।

6. अमेरिका का हर व्यक्ति हर रोज़ करीब 40 मिनट फेसबुक पर बिताता है।

7. फेसबुक पर आज अरबो चेहरे है लेकिन पहला चेहरा “Al Pacino” का था।

8. फेसबुक का पहला लोगो Andrew McCollum ने डिजाइन किया था।

9. एक सर्वे के अनुसार एक स्मार्टफोन यूजर दिन में 14 बार फेसबुक चेक करता है।

10. आपने कभी सोचा है कि फेसबुक के नीले रंग में रंगे होने का क्या कारण है? हम बताते है दरअसल मार्क जुकरबर्ग को कलर ब्लाइंडनेस की बीमारी है। उन्हें हरे और लाल रंग में अंतर पता नही लगता।

11. आप चाहें तो भी Facebook पर मार्क जुकरबर्ग को ब्लॉक नहीं कर सकते हैं। अगर आप ऐसा करने की कोशिश करेंगे तो Facebook की तरफ से एक Error मैसेज दिखेगा।

12. फेसबुक पर 83 प्रतिशत वेश्याओं के फैन पेज बने हुए हैं।

13. अगर आप फेसबुक अकाउंट पर लाॅग इन करके Internet पर कोई और काम करते है तो फेसबुक आपकी सभी गतिविधी रिकार्ड करता है।

14. मार्क ज़ुकरबर्ग Facebook के “Like” बटन का नाम पहले “Awesome” रखना चाहते थे।

15. फेसबुक के एक फीचर्स “Poke” के बारे में अगर आप किसी से पूछेंगे तो शायद ही कोई इसका मतलब बता पाएंगा। क्योंकि खुद फेसबुक ने भी इसका कोई मतलब या इसका काम तय नहीं किया है।

16. पूरी दुनिया में जितने भी लोग इंटरनेट पर हैं उनमें से 50% लोग कही न कही फेसबुक से जुड़े हुए हैं।

17. अगर फेसबुक का सर्वर कभी डाउन हो जाए तो इसे हर मिनट 25000 डॉलर का नुकसान होगा।

18. दुनियाभर में हर उम्र के लोग फेसबुक एडिक्शन डिसऑर्डर यानी फेसबुक की लत से जूझ रहे हैं। इस बीमारी को FAD भी कहते है। इस वक्त दुनिया में लगभग 35 करोड़ लोग FAD से ग्रसित हैं।

19. यदि फेसबुक एक देश होता तो दुनिया में यह पांचवां सबसे बड़ा देश होता।

20. फेसबुक हर महीने 3 करोड़ डॉलर सिर्फ होस्टिंग(hosting) पर ही खर्च करता है।

21. सन् 2009 में व्हाट्सएप के को-फाउंडर ब्रायन ऐक्टन को फेसबुक ने जॉब देने से मना कर दिया था।

22. अमेरिका में हर 5 में से 1 तलाक की वजह कहीं ना कहीं फेसबुक से जुड़ी रहती है।

23. सन् 2011 में फेसबुक की मदद से ही Iceland का संविधान लिखा गया था।

24. अगर आप फेसबुक की किसी भी गलती को पकड़ लेते हैं या फेसबुक को हैक कर लेते है, तो आपको इनाम में $500 मिल सकते है।

25. फेसबुक पर 3,00,00,000 अकाउंट मरे हुए लोगो के है।

26. सन् 2009 से फेसबुक चीन में बैन है।

27. फेसबुक पर करीब 9% अकाउंट फेक(Fake) है।

28. फेसबुक पर किसी को “Unfriend” करने की वजह से कई लोगो का मर्डर भी हो चूका है। तो अगली बार किसी को भी Unfriend करने से पहले एक बार जरूर सोचिएगा।

29. फेसबुक के एक एवरेज यूजर के फेसबुक पर कम से कम 155 फ्रेंड है।

04 मई 2016

धरती पर खतरा बढ़ रहा है, कहीं और बसेरा तलाशें : स्टीफन हॉकिन्स




पृथ्वी से लगभग चालीस प्रकाश वर्ष दूर दो ऐसे ग्रहों का पता लगा है, जिसमें जीवन होने का अनुमान है |

अब आप लोग यह बताइये कि आप में से कितने लोग उनमें से किसी एक में जाने के योग्य हैं ?

जमीन, खेत, जंगल, पहाड़, नदी, नाले, पीने का पानी... सब तो आप लोग बेच ही चुके हैं, तो अब पृथ्वी में रहने का अधिकार ही कहाँ रहा आप लोगों के पास ? और किराया भी कब तक और कितना चुकायेंगे ?


हर साल तो किराया बढ़ ही रहा है |

जरा कल्पना कीजिये.. !!!

आप लोगों के आका यानि नेतागण, धन्नासेठ और फिरंगी मालिक, सब दूसरे ग्रहों में चले जाएँ, तब आप लोगों का क्या होगा ?

कौन आप लोगों को नौकरी देगा और कौन आप लोगों आरक्षण देगा ?

कौन आप लोगों को धर्म और जाति के नाम पर आपस में लड़वा कर आप लोगों का मन बहलायेगा ?

पानी होगा नहीं पृथ्वी पर क्योंकि वह तो आपने बेच दिया मिनरल वाटर, सोडा और दारु वालों को | खेत आप लोगों के पास होगी नहीं कि दो वक्त की रोटी ही उगा लें | जब अनाज ही नहीं उगेगा, तो फिर पिज़्ज़ा और बर्गर भी कहाँ से आयेंगे और मैगी और चाउमीन भी कैसे मिलेगा ?

फिर शाकाहारी लोग जिन्दा कैसे रहेंगे ?

माँसाहारी तो मुर्दों को खाकर भी जी लेंगे, लेकिन शाकाहारी क्या खायेंगे ? और कैसे जियेंगे ?

कभी फुर्सत मिले तो चिंतन मनन कीजियेगा, क्योंकि भविष्य यही है पृथ्वी का | या तो अभी से कृषि व जल संरक्ष्ण पर ध्यान दें, वरना ये पूंजीपति और नेता आपकी शक्ल पहचानने से भी इंकार कर देंगे | वैसे भी चुनाव जीतने के बाद इनकी याददाश्त अगले चुनाव तक के लिए चली जाती है...तो सोचियेगा | ऐसा न हो कि आप लोगों की याददाश्त भी चली जाये |

अब यहाँ यह भी विचार करने वाली बात है कि इतने बड़े बड़े वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, भू-वैज्ञानिक, कृषि-वैज्ञानिक और दुनिया भर के विख्यात विश्वविद्यालयों से निकलने वाले गोल्डमेडलिस्ट डिग्रीधारियों, नास्तिकों, आस्तिकों, धार्मिकों के होते हुए भी, हम अपनी ही पृथ्वी को इस तरह तहस-नहस कर चुके कि अब वैज्ञानिकों ने भी हाथ खड़े कर लिए कि पृथ्वी का अब कुछ नहीं हो सकता | इसकी स्थिति भी बिलकुल किताबी धर्मों की तरह जर्जर हो चुकी है | अब इसमें सुधार की कोई संभावना नहीं बची |

क्यों ? ऐसा क्यों हुआ ?

लोग तो वैज्ञानिक सोच के बच्चे ही पैदा करते हैं | पैदा होते हैं अंग्रेजी बोलने लगते हैं और हिंदी को अटपटी भाषा बताने लगते हैं | अध्यात्म को ढोंग और भौतिकतावाद व उपभोक्तावाद को सार्थक मानते हैं | उत्पादक किसानों को विवश कर रहे हैं अपने खेत छोड़ने के लिए और कंक्रीट के जंगल खड़े करने को विकास बता रहे हैं | फिर भी पृथ्वी रहने लायक नहीं रही, ऐसा क्यों ? इतनी अंग्रेजी सीखने और बोलने का लाभ क्या हुआ ?



हम भारतीय तो जब तक अंग्रेजी नहीं जानते थे, भारत में पर्यावरण प्रदूषित नहीं था | यहाँ के लोग हट्टे-कट्टे योद्धा हुआ करते थे | कृषिप्रधान देश के रूप में जाना जाता था और पुरे विश्व को अनाज उपलब्ध करवाता था | लेकिन जब से अंग्रेजी सीख ली, किसान ही भूखे मरने लगे | लोग खेत छोड़कर नौकरी करने लगे | पूरे विषय को वस्त्र उपलब्ध करवाने वाले भारतीय खुद चीथड़ों में घुमने लगे... क्यों ? इतनी सारी डिग्रियाँ, इतनी महँगी-महँगी पढ़ाई का लाभ क्या हुआ ? क्यों हम भारतीय अपने ही देश की भूमि और पानी बचा पाने में असफल हो गये ?

अपना देश हमसे संभला नहीं, विश्व को क्या दिशा दिखायेंगे हम ? खुद को विश्वगुरु कहने वाले हम भारतीय विदेशियों की नकल करने के चक्कर में धोबी का गधा बन कर रह गये | चिंतन करिए आपकी डिग्रियों से क्या मानवजाति का कोई कल्याण हो सकता है ? क्या वन, कृषि, जल, पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है ? ~विशुद्ध चैतन्य

29 सितंबर 2015

Earth-शास्त्र

मेरी अनपढ़ बुद्धि फिर से आज इस विषय पर विचार कर रही थी कि अर्थ-शास्त्र, अर्थ-शास्त्री, आर्थिक उत्थान आदि हैं क्या ? विकास क्या है ? आत्मनिर्भरता क्या है ? समृद्धि क्या ?



जानता हूँ कि पढ़े-लिखों के पास दुनिया भर के तर्क और प्रमाण मिल जायेंगे यह सिद्ध करने कल लिए आर्थिक उत्थान का अर्थ है विदेशियों को अपनी भूमि का मालिक बनाकर उनकी नौकरी करना ही आरती उत्थान व विकास है | पढ़े-लिखे लोग सिद्ध कर देंगे कि आत्मनिर्भरता का अर्थ है महँगी डिग्री लेकर अच्छी नौकरी पाना और लोन लेकर ब्याज चुकाना | गाँव की जमीन बेचकर शहर में लोन लेकर मल्टीस्टोरी छत्तों में से एक फ्लैट लेना समृद्धि है | पढ़े-लिखे लोग मानते है कि सुख का अर्थ है पैसे कमाना आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और आवश्यकताएँ बढाते जाना | पढ़े-लिखे मानते है कि शिक्षा का अर्थ है अच्छे नंबरों से पास होना और उन नंबरों को रुपयों में कन्वर्ट करना..... लेकिन मेरी अनपढ़ बुद्धि इन सबसे सहमत नहीं है |

विस्तार से.....

27 दिसंबर 2014

वैदिक युग में भारत में ऐसे विमान थे जिनमें रिवर्स गियर था यानी वे उलटे भी उड़ सकते थे।

3 जनवरी से मुंबई में इंडियन साइंस कांग्रेस शुरू हो रही है जिसमें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दो वैज्ञानिकों समेत दुनियाभर के बुद्धिजीवी हिस्सा लेंगे। इन्हीं में एक होंगे कैप्टन आनंद जे बोडास जो मानते हैं कि 'आधुनिक विज्ञान दरअसल वैज्ञानिक नहीं' है।

मुंबई मिरर अखबार को बोडास ने बताया कि जो चीजें आधुनिक विज्ञान को समझ नहीं आतीं, यह उसका अस्तित्व ही नकार देता है। बोडास कहते हैं, 'वैदिक बल्कि प्राचीन भारतीय परिभाषा के अनुसार विमान एक ऐसा वाहन था, जो वायु में एक देश से दूसरे देश तक, एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक और एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जा सकता था। उन दिनों विमान विशालकाय होते थे। वे आज के विमानों जैसे एक सीध में चलने वाले नहीं थे, बल्कि दाएं-बाएं और यहां तक कि रिवर्स भी उड़ सकते थे।'

कैप्टन बोडास 'प्राचीन भारतीय वैमानिकी तकनीक' विषय पर बोलेंगे। वह केरल में एक पायलट ट्रेनिंग सेंटर के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए हैं। उनके साथ इस विषय पर एक और वक्ता होंगे जो स्वामी विवेकानंद इंटरनैशनल स्कूल में एक लेक्चरर हैं।

कैप्टन बोडास भारतवर्ष में हजारों साल पहले हासिल की गईं जिन तकनीकी उपलब्धियों का दावा करते हैं, उनका स्रोत वह वैमानिका प्रक्रणम नामक एक ग्रंथ को बताते हैं, जो उनके मुताबिक ऋषि भारद्वाज ने लिखा था। वह कहते हैं, 'इस ग्रंथ में जो 500 दिशानिर्देश बताए गए थे उनमें से अब 100-200 ही बचे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बहुत वक्त गुजर गया, फिर विदेशियों ने हम पर राज किया और देश की बहुत सी चीजें चुरा ली गईं।'

इंडियन साइंस कांग्रेस में यह विषय इसलिए रखा गया है ताकि 'संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखा जा सके'। इस विषय पर होने वाले कार्यक्रम में संचालक की भूमिका मुंबई यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रफेसर गौरी माहूलीकर निभाएंगी। वह कैप्टन बोडास की बात को सही ठहराने की कोशिश करती हैं।

वह कहती हैं, 'ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारतीय विज्ञान कांग्रेस में एक सत्र में संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखने की कोशिश होगी। इस साहित्य में वैमानिकी, विमान बनाने की जानकारी, पायलटों के पहनावे, खाने-पीने और यहां तक कि सात तरह ईंधन की भी बात है। अगर हम इन चीजों के बारे में बोलने के लिए संस्कृत के विद्वानों को बुलाते तो लोग हमें खारिज कर देते लेकिन कैप्टन बोडास और उनके साथी वक्ता अमीय जाधव संस्कृत में एमए के साथ-साथ एमटेक भी कर चुके हैं।'

वैसे, इस भारतीय विज्ञान कांग्रेस में इस विषय पर चर्चा का कई जाने-माने वैज्ञानिक समर्थन कर रहे हैं, जिनमें आईआईटी बेंगलुरु में एयरोस्पेस इंजिनियरिंग के प्रफेसर डॉ. एसडी शर्मा भी शामिल हैं।

साभार: नभाटा Dec 27, 2014, 04.20PM IST

19 जून 2013

मध्य प्रदेश के डॉक्टर ने बनाया सूइसाइड प्रूफ सीलिंग फैन

 जब जर्मन इंजिनियर फिलिप एच डियल ने 1892 में सीलिंग फैन का आविष्कार किया था, तब उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि गर्मी से राहत पाने के अलावा इसे सूइसाइड करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाएगा। मगर अब इस समस्या का इलाज भी मिल गया है। मध्य प्रदेश के एक कार्डियॉलजिस्ट ने सूइसाइड-प्रूफ सीलिंग फैन बनाया है।

जबलपुर गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में प्रेफेसर आर.एस. शर्मा ने बड़ी ही सिंपल टेकनीक यूज करते हुए यह सूइसाइड प्रूफ फैन तैयार किया है। उन्होंने बताया कि उनके पड़ोस में रहने वाले एक टीनेजर ने 12वीं के एग्ज़ाम में फेल होने के बाद सीलिंग फैन से लटककर सूइसाइढ कर लिया था। शर्मा बताते हैं कि बच्चे की मौत के बाद उसकी मां कई दिनों तक उस मनहूस दिन को कोसती रही थीं, जब उन्होंने टेबल फैन की जगह सीलिंग फैन लगाया था। इस वजह से डॉक्टर ने एक ऐसा सीलिंग फैन बनाने के बारे में सोचा, जिसे आत्महत्या के लिए इस्तेमाल न किया जा सके।

एक हफ्ते तक डिजाइन पर विचार करने के बाद उन्होंने मकैनिक और वेल्डिंग करने वाले की दुकान के कई चक्कर काटे और आखिरकार उन्हें हल मिल ही गया। उनके तैयार किए इस डिवाइस मोटर और ब्लेड को छत से जोड़ने वाली मेटल की खोखली ट्यूब लगी है। इस शाफ्ट में 4 हेवी स्प्रिंग्स लगाए गए हैं, जो कि मोटर और ब्लेड्स के अलावा 25 किलो का एक्स्ट्रा वजन झेल सकते हैं। अगर कोई सूइसाइड के इरादे से इस फैन से लटकता है, तो वजन पड़ते ही स्प्रिंग खिंच जाएंगे। इस तरह से सूइसाइड के लिए लटकने वाले के पैर आराम से जमीन पर लग जाएंगे।

फांसी लगाने पर स्पाइनल कॉर्ड का ऊपरी हिस्सा और गले की हड्डियां अपनी जगह से हिल जाती हैं, जिससे कि सांस रुख जाती है और दिल भी काम करना बंद कर देता है। लेकिन ज्यादातर मौकों पर देखा जाता है कि गले के पास से होते हुए दिमाग तक खून ले जाने वाली धमनियां जकड़न की वजह से ब्लॉक हो जाती हैं। इन हालात में फांसी लगाकर सूइसाइड करने वाले की मौत बड़ी ही दर्दनाक होती है। आखिरी पलों तक वह हवा में लटका तड़पता रहता है। स्ट्रेच होने वाली शाफ्ट से सूइसाइड अटेंप्ट करने वाला हवा में नहीं लटकेगा। उसे थोड़ी-बहुत खरोंचें आ सकती हैं, लेकिन उसकी मौत नहीं होगी।

प्रफेसर ने अपने इस डिवाइस के पेटेंट के लिए अप्लाई किया है। उन्हें उम्मीद है कि इन पंखों को हॉस्टल और घरों में यूज करके सैकड़ों जिंदगियां बचाई जा सकेंगी। शर्मा ने कहा, 'आईआईटी की चार मेंबर्स वाली कमिटी ने स्टूडेंट्स में बढ़ रहे सूइसाइड को रोकने के लिए सजेस्ट किया है कि सीलिंग फैन के बजाए टेबल फैन लगाए जाएं। मगर ऐसा करने के बजाए बेहतर होगा कि इस टेकनीक वाले पंखे लगाए जाएं।' शर्मा फिलहाल इस फैन के बेहतर और टिकाऊ डिजाइन पर काम कर रहे हैं।