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25 जून 2018

आनंद और उत्सव है धर्म, घृणा और द्वेष नहीं



बचपन में फ़कीर या संन्यासी की रूपरेखा जो मेरे मन बस गयी थी, वह कुछ वैसा था जो सदैव प्रसन्नचित रहता है, हँसता, गाता, नाचता अपनी धुन में मगन रहता है | जब भी उनकी कोई तस्वीरें देखता तो ऐसा लगता था कि उनके जीवन में सुख ही सुख है और दुःख का उन्हें कोई अनुभव ही नहीं |

तब नहीं जानता था कि संन्यास क्या होता है और उनका जीवन कैसा होता है | माँ या पिताजी से बस यही पता चला कि संन्यासी वह होता है जो सामाजिक बंधनों से मुक्त होता है और केवल ईश्वर की आराधना व चिन्तन में लिप्त रहता है | चूँकि उन्हें समाज के सुख दुःख से कोई लेना देना नही होता, किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती, किसी से कोई अपेक्षा नहीं रहती, इसीलिए वे लोग हमेशा खुश रहते हैं | जबकि हम जैसे सामाजिक दायित्वों से बंधे लोगों के लिए सुख के भी पल होते हैं और दुःख के भी |

मुझे अपने जीवन में निश्चिंतता और सुख का अनुभव अपनी माँ के देहांत के बाद शायद कभी नहीं हुआ | अब हँसता भी हूँ तो लगता है दिखावा कर रहा हूँ, अब खुश भी होता हूँ, तो मन में कोई हलचल नहीं होती | बस बाहरी ओढ़ी हुई सी ख़ुशी होती है | कभी समझ नहीं पाया कि माँ के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ कि मैं फिर दोबारा वह सुख व ख़ुशी नहीं प्राप्त कर पाया | मुझे याद है वह अंतिम ख़ुशी जो मैंने नौ वर्ष की आयु में पायी थी वह है दिवाली मनाना | उस दिवाली के बाद फिर कभी कोई दिवाली नहीं आयी जो मुझे ख़ुशी दे पायी | क्योंकि दिवाली के बाद आयी जनवरी ने माँ को हमेशा के लिए मुझसे दूर कर दिया था | माँ के बाद कोई मेरा अपना नहीं बन पाया, माँ के बाद कोई इतना विश्वसनीय नहीं बन पाया जिससे में खुलकर मिल सकूं |

कई नौकरियाँ बदली, कई तरह के काम किये, कई मित्र बनाए...समय के साथ सब छूटते चले गये | मतलब की नौकरी, मतलब के मित्र, मतलब के सम्बन्ध स्थाई नहीं होते यह बहुत देर से समझ में आया | माँ से बेहतर अपना और कोई नहीं यह भी समझ में आया |

बचपन में सोचा करता था कि जब मैं विवाह योग्य हो जाऊँगा तो शायद दुबारा कोई मुझे अपना मिल जायेगा...लेकिन नहीं मिला | समझ में आया विवाह प्रेम पर नहीं, दौलत और शोहरत पर आधारित होता या फिर स्वार्थ पर | स्वार्थी तो मैं भी हूँ लेकिन इतना स्वार्थी नहीं बन पाया कि विवाह योग्य कोई साथी खोज पाऊँ | या फिर शायद इतनी दौलत नहीं इकट्ठी कर पाया कि विवाहित हो पाऊँ | फिर बरसों बाद समझ में आया कि विवाह शुद्ध व्यापार है | प्रेम खरीदने की योग्यता होनी चाहिए प्रेमिका मिल जायेगी | पत्नी खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पत्नी मिल जायेगी, पति खरीदने की योग्यता होनी चाहिए पति मिल जाएगा.....यानी हर चीज बिकाऊ है और हर चीज खरीदी और बेचीं जा सकती हैं, व्यक्तिगत सम्बन्धी तक | और जो मेरे साथी विवाहित हुए, उनके मुरझाये चेहरे देखकर विवाह से मन घबरा गया |

फिर संन्यास लिया सोचा था कि संन्यासियों के बीच रहूँगा शायद मैं बदल जाऊँ | लेकिन नहीं बदल पाया क्योंकि आज भी मैं वही हूँ जो कल था | मैं संन्यासियों की तरह समाज के दुखों को भूलकर खुश नहीं हो पाया | 'मैं सुखी तो जग सुखी' के सिद्धांत को नहीं अपना पाया | लेकिन समझ में आया कि सबका दुःख उनका अपना है दूसरों का नहीं | कोई अमीर किसी गरीब की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई हिन्दू किसी मुस्लिम की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई मुस्लिम किसी हिन्दू की चिंता नहीं कर रहा होता | कोई कांग्रेसी कभी भाजपाइयों की चिंता नहीं करता और कोई भाजपाई कभी कांग्रेसियों की चिंता नहीं करता |

कोई मुस्लिम मारा जाए भीड़ द्वारा तो मुस्लिम समाज चिंतित हो जाएगा लेकिन कोई मुस्लिम भूख से मर रहा हो, उसके खेत की फसल नष्ट हो जाने का कारण दुनिया भर के कर्जों में दब गया हो, तब मुस्लिम समाज आँखे मूँद लेगा | इसी प्रकार कोई हिन्दू मारा जाए मुस्लिम भीड़ के हाथों तो हिंदुत्व ही खतरे में पड़ जाएगा | सारे हिन्दू संगठन दिन भर उस हिन्दू का शोक मनाएंगे मुस्लिमों को कोसेंगे | लेकिन जब कोई हिन्दू भूख से मर जाये, गरीबी से मर जाए, उसकी जमीन कोई भूमाफिया छीन ले, किसान आत्महत्या कर ले, आदिवासी बेघर हो जाएँ....तब हिंदुत्व खतरे में नहीं पड़ेगा, तब किसी हिन्दू संगठन की सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ेगा | उनका व्यव्हार कुछ ऐसा होगा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं |

यानि ये शोक मानना, ये विरोध जताना भी साम्प्रदायिक है मानवीय नहीं | मौका मिलना चाहिए दुसरे सम्प्रदायों को बुरा दिखाने का, लेकिन अपनी बुराइयाँ दिखाई नहीं देगी इन्हें | इन्हें दिखाई नहीं देगा कि इनके अपने दड़बे में ही इनके अपनों के कारण ही कितने लोग शोषित पीड़ित व दुखी हैं....लेकिन दूसरे दड़बे के हाथों किसी पर अत्याचार हो जाये तो आसमान सर पर उठाये फिरने लगेंगे | और ढोंग करेंगे मानवता का, इन्सनियता का | वास्तविकता यह है कि न तो धर्म बचा है और न इंसानियत | अब तो केवल ढोंग ही बचा है |

यह सब देखकर मैं खुश नहीं हो पाता कभी भी | यह सब देखकर नाच नहीं पाता कभी भी, या सब देखकर गा नहीं पाता कभी भी | लेकिन कहते हैं न, सुख और दुःख सब अपने ही भीतर है ? तो भीतर जाने पर पाता हूँ कि मैं सबसे सुखी इंसान हूँ | मुझे दूसरों के दुखों को देखकर दुखी होने की आवश्यकता नहीं है | जो समाज खुद दुखों को गले लगाए रखना चाहता हो, जो समाज खुद को दुखों से मुक्त न करना चाहता हो, उनके दुखों को लेकर मैं भला क्यों दुखी होता हूँ ? जानबूझकर सोये हुए को नहीं जगाया जा सकता, जानबुझकर दुखी हुए लोगों को सुख नहीं पहुँचाया जा सकता...इसलिए अब बदलूँगा स्वयं को | अब अपने ही सुखों में सुखी रहूँगा, दूसरों के दुखों में दुखी रहने का मुझे कोई अधिकार नहीं |

वास्तव में संन्यासी होने का अर्थ ही समाज के ढोंग, पाखण्ड आडम्बरों से अलग करके स्वयं को सुखी व प्रसन्न रखें का उपाय खोजना | और जो ऊपर उठने का अभिलाषी हो उसे सही राह दिखाना | न कि उन समस्याओं को लेकर दुखी होना, जिसे आप सुलझा नहीं सकते, जिसके लिए आप जिम्मेदार नहीं, जिसका आप्स्से कोई सम्बन्ध नहीं |

~विशुद्ध चैतन्य

23 जून 2018

सावधान ! धर्म खतरे में है !!!



अक्सर हम सुनते हैं कि धर्म खतरे में हैं | गली मोहल्लों से लेकर विश्वस्तर पर धर्म रक्षक बने लुच्चे लफंगों की सेनाएं तैनात हो रहीं हैं | हर किताबी रट्टामार धार्मिक इस बात पर बहुत ही गंभीरता से विश्वास करता है कि धर्म खतरे में हैं और उसकी रक्षा करने के लिए लठैतों, छुरेबाजों, तलवारबाजों, कट्टेबाजों और असाल्ट राइफलधारकों की सेनाओं की आवश्यकता है | इसलिए वह इन सड़क छाप लफंगों की सेनाओं को दोनों टाँगे उठा नतमस्तक होकर नमन करता है |

आये दिन गुंडे बदमाश और बेरोजगार लफंगे धर्म की रक्षा के नाम पर किसी न किसी निर्दोष निहत्थे की हत्या कर देते हैं या उसे बुरी तरह घायल कर देते हैं | कहीं गौ रक्षा के नाम पर हत्याएं हो रहीं हैं तो कहीं इस्लाम और हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर | कहीं धर्म की रक्षा के लिए लडकियाँ उठा ली जाती हैं तो कहीं बलात्कार करके मार दिया दिया जाता है.....और ये सारे काम धार्मिक काम धर्म के रक्षकों द्वारा बड़ी श्रृद्धा से किया जा रहा है |

यह और बात है कि मेरे जैसे मंदबुद्धि लोगों की समझ में यह बात नहीं आती और कभी भी नहीं मानते कि धर्म खतरे में हैं....लेकिन मैं भी अब मानने लगा हूँ | क्योंकि अब स्पष्ट दिखने लगा है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं | अब प्रमाणित हो चुका है कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं |

 

क्या धर्म खतरे में है ?

 

बिलकुल धर्म खतरे में है अब कोई संदेह नहीं रह गया | बस कुछ लोग समझ नहीं पा रहे कि धर्म खतरे में है, लेकिन धर्म वास्तव में खतरे में है | केवल भारत में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में धर्म खतरे में है |

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन....जैसे सम्प्रदायों, रिलीजन्स की बात नहीं कर रहा |  मैं केवल धर्म की ही बात कर रहा हूँ और उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे मैं सनातन धर्म कहता हूँ, जिसे मैं प्राकृतिक व ईश्वर प्रदत्त धर्म कहता हूँ | मैं किसी मानव निर्मित या किसी व्यक्ति-विशेष या किताब-विशेष पर आधारित धर्म की बात नहीं कर रहा | मैं तो उस धर्म की बात कर रहा हूँ जिसे लोग मानवता कहते हैं, इंसानियत कहते हैं, Humanism कहते हैं |

 

जो सनातन है वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?


पड़ सकता है नहीं, पड़ चुका है | अब समाज, परिवार व माता-पिता अपने बच्चों को इंसान नहीं बनाते, बल्कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, कांग्रेसी, भाजपाई, सपाई, बसपाई बनाना पसंद करते हैं | अब माता-पिता स्वप्न नहीं देखते कि उनके बच्चे बड़े होकर इन्सान बन जाएँ, बल्कि अब सपने देखते हैं कि उनके बच्चे बड़े होकर डॉक्टर बने, इंजिनियर बनें, आईएएस बने, आइपीएस बने | अब माता पिता को बुरा नहीं लगता कि उनके बच्चे डिग्री लेकर लुच्चों लफंगों की सेना में शामिल होकर गुंडा-गर्दी करता फिरे, मोब-लिंचिंग करता फिरे, धूर्त-लम्पट नेताओं के तलुए चाटता फिरे, छुरा-कट्टा लेकर सड़कों पर आवारगर्दी करता फिरे...बल्कि अब उन्हें गर्व होता है कि उनका बच्चा यह सब करके धर्म की रक्षा कर रहा है |

और ऐसी मानसिकता का विस्तार होना सनातन धर्म को भी खतरे में डाल देता है | क्योंकि जब मानव ही सनातन धर्म से विमुख हो जायेगा और दड़बों को धर्म समझने लगेगा, तो धर्म का पतन निश्चित है | अब आपको न तो इस्लामिक समाज में धर्म दिखाई देगा और न ही हिन्दू समाज में, न ही साधू-समाज में, न ही बाल्मीकि, अम्बेडकर, मोदी या किसी और समाज में या दड़बे में धर्म दिखेगा | न तो मंदिरों में आपको धर्म दिखेगा, न ही मस्जिदों में आपको धर्म दिखेगा, न स्कूलों में, न कॉलेजों में.....यानि धर्म पुर्णतः बहिष्कृत हो चुका है समाज में और साम्प्रादायिकता को धर्म का नाम दे दिया गया |

अब केवल दिखावे के धार्मिक दिखेंगे, अब केवल दिखावे के धार्मिक कर्मकांड जैसे कि दान, सेवा, परोपकार, कमजोर व असहायों की निःस्वार्थ सहायता, शालीनता, सभ्य शालीनता पूर्वक बात करने की कला, अशिष्टता से परहेज, खुद खाने से पहले भूखे को खिलाना.....आदि इत्यादि सब व्यावहारिकता में लुप्त ही चुके हैं और जो थोड़ा बहुत दिख भी कही रहा है, तो वह भी दिखावा ही है | बिलकुल वैसे ही जैसे बड़े तोंद वाले बेडौल महापुरुषों का योग के प्रचार के लिए कैमरे के सामने योग करना | यानि जो कुछ भी किया जा रहा है वह भीतरी आवेग से नहीं, धार्मिक परम्परा मानकर किया जा रहा है |

यही कारण है कि अब धर्म की शिक्षा सभ्य व शालीन विद्वान नहीं देते, न ही स्कूलों, विश्वविद्यालयों में सिखाया जाता है | बल्कि सड़क छाप लुच्चे लफंगों को कट्टा, तमंचा, लाठी, बन्दूक थमाकर धर्म की रक्षा की जिम्मेदारी सौंप देते हैं | इन लुच्चे लफंगों द्वारा किसी निर्दोष की हत्या कर देने पर न उनके माता-पिता शर्मिंदा होते हैं और न ही समाज या धार्मिक लोग शमिन्दा होते हैं | क्योंकि उनका धर्म तो किताबों में सुरक्षित है तो वे जानते हैं कि उनका धर्म खतरे में नहीं है | सारे देश में लोग आपस में मार काट-करने लगें, तब भी ये धार्मिक यही मानेंगे कि उनका धर्म खतरे में नहीं है...वे सही हैं | क्योंकि उनका धर्म किताबी है जो कभी व्यावहारिक नहीं हो सकता और जो व्यवहारिक ही नहीं है, वह खतरे में भला कैसे पड़ सकता है ? जो योद्धा अपने घर से बाहर ही न निकले, जो तलवार अपने म्यान से ही न निकले, भला वह खतरे में कैसे पड़ सकता है ?

 

धर्म क्या है और अधर्म क्या है ?


लेकिन मैं मानने लगा हूँ कि धर्म खतरे में है | क्योंकि धर्म पारम्परिक कर्मकाण्ड नहीं है | पूजा-पाठ, नमाज, तिलक, टोपी, घंटे-घड़ियाल, आरती-कीर्तन धर्म नहीं हैं | धर्म है परोपकार, सेवा, सहयोग, आपसी सद्भाव, प्रेम, करुणा, समाज के हितार्थ कार्य करना, अपने गाँव, मोहल्ले के हितार्थ कार्य करना, राष्ट्र व नागरिकों के हितार्थ कार्य करना | और यह सब करते हुए, स्वयं को प्रसन्न व स्वस्थ रखने के समस्त उपाय करना, अपने सामर्थ्यानुसार उपलब्ध भोगों का उपभोग करना, नाचना, गाना...उत्सव मनाना ये सब धर्म हैं |

दूसरों को कष्ट देना, दूसरों की सम्पत्ति छीनना, दूसरों पर अत्याचार करना, दूसरों के सुख में बाधा डालना, दूसरों के प्रेम में विष घोलना, समाज में सांप्रदायिक वैमनस्यता पैदा करना, निहत्थे, निर्दोषों की हत्याएं करना, गाली-गलौज करना, अशिष्टता से बात करना....ये सब अधर्म हैं |

 

सप्रमाण समझिये कि धर्म कैसे खतरे में हैं


भारत में शायद ही कोई होगा जो खुद को अधार्मिक कहता हो | नास्तिक भी खुद को अधार्मिक नहीं कह सकता क्योंकि नास्तिक भी कहीं न कहीं कोई न कोई परोपकार के कार्य कर ही देता है| और परोपकार धर्म है | तो जब सवा अरब से अधिक की आबादी धार्मिक है चाहे वह किसी भी पंथ, मत, संप्रदाय से सम्बंधित हो, लेकिन स्वयं को धार्मिक तो मानता ही | इनमें से कई लोग ऐसे भी होंगे जो खुद को हिन्दू नहीं मानता, मुस्लिम नहीं मानता, सिख नहीं मानता लेकिन इन्सान तो मानता ही है | और इंसानियत धर्म है क्योंकि इसका विपरीत हैवानियत अधर्म है |

लेकिन इतनी बड़ी संख्या में धार्मिकों के रहते हुए भी भारत में धर्म लुप्त होने के कागार पर पहुँच जाना गंभीर चिंता का विषय है

 

प्रथम प्रमाण:


एक खबर पढ़ी मैंने; 'तेजी से महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत में तकरीबन 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैंं और प्रतिदिन 3000 बच्चे भूख से मर जाते हैं। यह जानकारी ग्लोबल हंगर इंडैक्स के आंकड़ों से मिली है। हालांकि भारत का स्थान पिछले साल के मुकाबले ग्लोबल हंगर इंडैक्स में 63 के मुकाबले 53वां है। मंगल पर अपना यान भेजने वाले देश भारत में भूख के खिलाफ जंग सबसे बड़ी चुनौती है। बच्चों में कुपोषण और उनकी मृत्यु दर का स्तर बेहद चिंताजनक है। यहां तक कि नेपाल और श्रीलंका की स्थिति भारत से बेहतर है जबकि पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे पिछड़े देशों में स्थिति और भी बुरी है।' साभार: भोपाल समाचार

क्या कभी आपने सोचा कि लगभग हर सम्प्रदाय यह मानता है कि उनका सम्प्रदाय धर्म को महत्व देता है, लेकिन फिर भारत में ही 19 करोड़ लोग भूखे पेट क्यों सोते हैं ? क्यों प्रतिदिन तीन हज़ार बच्चे भूख से मर जाते हैं ?

चलिए मान भी लें कि ये आँकड़े झूठे हो सकते हैं...तीन हज़ार नहीं, हज़ार बच्चे ही रोज मरते हैं...तो भी क्यों मरते हैं ? क्या किताबी धार्मिकों की किताबों में यह नहीं लिखा है कि कोई पड़ोसी भूखा रह जाए और आपके गले से निवाला उतर जाए तो इससे बड़ा अधर्म और कुछ नहीं ? क्या सभी धार्मिकों के समाज में भूखे को भोजन, प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य नहीं माना गया ?

कितने धार्मिक संगठनों ने भूखे को भोजन देने के लिए आन्दोलन किये और भूखों तक भोजन पहुँचाया ? कितने धर्मरक्षक तलवार की बजाय, भोजन की थाल और पानी की बोतल थामें भूखों के घर तक पहुँचे ? कितने धार्मिकों ने राजनैतिक दबाव बनाया कि भूखों को पहले भोजन दो, अच्छी चिकित्सीय सेवायें उपलब्ध करवाओ, उन्हें आत्मनिर्भर होने में सहयोग करो उसके बाद जीडीपी का ग्राफ दिखाना ? क्या कभी तनिक भी शर्म आयी खुद को धार्मिक कहते हुए जबकि धार्मिक कोई कार्य नहीं कर रहे केवल दिखावा कर रहे हो ?

जो कट्टा-तमंचा लिए धर्म की रक्षा के लिए निकले हैं, क्या उन मूर्खों को किसी ने बताया कि कट्टे तमंचों से नहीं सेवाभाव व सहयोग से धर्म की रक्षा होती है | दड़बा हिन्दू हो या मुस्लिम या कोई और, सभी में बेबस और लाचार मिल जाते हैं...लेकिन क्यों ? जब आप खुद धार्मिक नहीं हो पाए तो फिर ये धार्मिकता का ढोंग क्यों ?

दो चार लोग हर समाज में ऐसे मिल जाते हैं, जो गरीबों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं, उन्हीं की सहायता क्यों नहीं कर देते यदि खुद नहीं पहुँच पाते किसी गरीब के पास तो ??? चलिए माना कि आप कट्टर धार्मिक हैं अपने धर्म के अलावा किसी और धर्म को बर्दाश्त नहीं कर सकते...अरे तो कम से कम अपने ही धर्म नाम के दड़बे में जो बेबस और लाचार भरे पड़े हैं उनकी ही सहायता कर दो और मरने दो दूसरे दडबों के बेबस और लाचारों को | अरे कम से कम अपने ही समुदाय, सम्प्रदाय की सहायता तो करो ??

 

द्वितीय प्रमाण:


सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अधर्मियों का साथ मत दो, अत्याचारियों का साथ मत दो, अशिष्ट व असभ्य लोगों को सही राह दिखाओ या उनका बहिष्कार करो | लेकिन क्या धार्मिक लोग ऐसा कर रहे हैं ?

यदि अधर्मियों, अत्याचारियों का सहयोग नहीं कर रहे होते धार्मिक लोग, तो क्या अधर्मी आज सड़कों से लेकर ससंद तक उत्पात कर रहे होते ? क्या जनता को लूटकर कोई विदेश भाग सकता था ? क्या कोई जनता पर दुनिया भर के टैक्स थोपकर चैन से रह सकता था ? क्या कोई जनता को असहाय और लाचार बनाने के अपने उद्देश्य में सफल हो सकता था ? क्या धर्म की रक्षा के नाम पर लुच्चे-लफंगों का गिरोह किसी निर्दोष की हत्या कर सकता था ?

लेकिन ऐसा हो रहा है क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया है | अब दडबों को धर्म समझ बैठा है समाज, अब नेताओं, बाबाओं, राजनैतिक व सांप्रदायिक, जातिवादी पार्टियों को धर्म समझ बैठा है | अब इंसान होना महत्वपूर्ण नहीं रह गया, अब हिन्दू होना, मुसलमान होना, काँग्रेसी होना, भाजपाई होना, संघी होना, बजरंगी होना धर्म हो गया | और चूँकि दड़बों को धर्म मान लिया गया, इसीलिए इन दडबों की सुरक्षा के लिए लुच्चे लफंगों की सेनाओं की आवश्यकता पड़ गयी | वरना सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन लुच्चे लफंगों से निपटने के लिए ? क्या सवा सौ करोड़ की जनसँख्या क्या कम है इन धूर्त, जुमलेबाज, लुटेरे नेताओं को उनकी औकात बता देने के लिए ???

लेकिन दुर्भाग्य से जनता ही धर्म से विमुख हो गयी और यही कारण है कि कुछ मुट्ठीभर बदमाश पुरे देश को गुलाम बना कर बैठ गये | कुछ मुट्ठीभर लुटेरे पुरे देश को लूटकर मालामाल हो गये और जनता अपनी किस्मत को कोस रही है |

 

तृतीय प्रमाण:


क्या सभी सम्प्रदायों की धार्मिक पुस्तकों में शिक्षा के महत्व को नहीं स्वीकारा गया है ? क्या शिक्षा का प्रसार प्रसार करना सभी धार्मिकों के प्रमुख कर्तव्यों में से एक नहीं है ?

फिर शैक्षणिक संस्थानों की दुर्गति क्यों हो रही है ?

एनडीटीवी ने एक सर्वे में यह खुलासा किया है कि भारत में अधिकांश सरकारी स्कूलों में शौचालयों और पीने के पानी की बुनियादी सुविधाओं की कमी है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के कार्यान्वयन पर एनडीटीवी ने भारत के 13 राज्यों में 780 सरकारी स्कूलों का सर्वेक्षण किया। परिणाम बहुत शर्मनाक था उनमें से 63 प्रतिशत स्कूलों में कोई खेल का मैदान नहीं था। सर्वे किए गए स्कूलों में से एक तिहाई से अधिक स्कूलों की स्थिति बेहद खराब थी। ऐसी स्थित में अगर कोई छात्र शौचालय जाना चाहता है तो वह घर वापस चला जाता है। एनडीटीवी चैनल ने शौचालय की कमी को छात्राओं द्वारा अधिक मात्रा में स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण बताया। स्थित इतनी खराब थी की 80% से अधिक स्कूलों में उम्र के अनुसार छात्रों का प्रवेश नहीं था।

शिक्षा का अधिकार, अधिनियम (आरटीई) प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चों को मुफ्त और आवश्यक शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम छात्र शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के साथ-साथ स्कूलों की इमारतों, बुनियादी ढाचों, स्कूल के कामकाज के दिनों, शिक्षकों के काम करने के घंटों, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति को भी निर्दिष्ट करता है।

बहुत से सरकारी स्कूलों को लंबे समय से पुनःनिर्मित नहीं किया गया है। कभी-कभी छात्रों को कक्षा के बाहर फर्श पर बैठने के लिए कहा जाता है क्योंकि स्कूल की छत किसी भी समय गिर सकती है। साभार: Maps of India

क्या धार्मिकों ने कभी शिक्षा पर प्रश्न उठाया ? क्या कभी धार्मिकों ने सरकार पर दबाव बनाया कि उनके बच्चों को उचित शिक्षा मिले वह भी बच्चों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाये बिना ?

शायद नहीं ! क्योंकि आप लोगों के लिए ये धर्म नहीं है | धर्म तो है हिन्दू-मुस्लिम खेलना, ब्राह्मण-दलित खेलना.....और मेरी नजर में ये केवल साम्प्रदायिकता है धर्म नहीं | धर्म हिन्दू-मुस्लिम में नहीं बटा हुआ है, धर्म केवल धर्म ही होता है और सार्वभौमिक होता है | हिन्दू हो या मुस्लिम  या कोई और सम्प्रदाय, सभी के बच्चों को शिक्षा दिलाना धर्म है | सभी के बच्चों के स्वास्थ्य व सुरक्षा का ध्यान रखना धर्म है |

तो समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म मान बैठा, इसीलिए ही मैं कह रहा हूँ कि धर्म खतरे में हैं | धर्म वह नहीं जो ये लुच्छे लफंगों के नेता और ठेकेदार समझा रहे हैं | ये छुरेबाज, कट्टेबाज, बेरोजगार लफंगे और उनके ठेकेदार सिखायेंगे हमें धर्म ???

यदि ऐसी स्थिति आ गयी है कि अब इन लुच्चे लफंगों से धर्म सीखना पड़े, तो बेहतर है कि सारा समाज ही आत्महत्या कर ले | यदि इनके बहकावे में आकर पढ़े-लिखे भी गुंडागर्दी करने लगें, साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने लगें, तो बेहतर है कि समाज खुद को धार्मिक कहना ही छोड़ दे |

तो शायद अब आप समझ गये होंगे कि धर्म वास्तव में खतरे में हैं क्योंकि समाज धर्म से विमुख हो गया और साम्प्रदायिकता को धर्म के रूप में धारण कर चुका है | और यही स्थिति रही, तो बहुत ही जल्द धर्म लुप्त जाएगा और उसके साथ ही लुप्त हो जाएगा इंसान और इन्सानियत |

~विशुद्ध चैतन्य

11 जून 2018

अंधविश्वास



दुनिया का कोई भी किताबी मजहब या धर्म अन्धविश्वास के विरुद्ध नहीं है | क्योंकि सभी धर्मों, मजहबों में एक अंधविश्वास बहुत प्रभावी है और वह है निराकार की उपासना | उस काल्पनिक ईश्वर की उपासना करना जिसे न किसी ने देखा, न जाना, न समझा...बस किसी ने कहा और मान लिया और लगे पूजने उसे |

22 मार्च 2017

गृह-प्रवेश से पहले शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है ?

"गुरू जी एक बात बताइये ?
क्या उस स्थान का शुद्धिकरण करना उचित है, जहाँ हाल ही में कोई परिवार रह कर गया हो ?

विशुद्ध चैतन्य जी, अगर उचित है तो फिर अगर में नेता हु तो मुझे भी शुद्धिकरण कराना चाहिए ?

हाँ स्थान के बजाए वोटो का शुद्धिकरण कराना चाहिए, पता नही किस किस प्रजाति के मनुष्यों ने मुझे वोट दिया हो ?" -Asif Khan


योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री आवास में प्रवेश से पहले शुद्धिकरण करवाया तो उपरोक्त प्रश्न हर जगह से उठने लगे | जो भी खुद को पढ़ा-लिखा आधुनिक व वैज्ञानिक सोच का मानता है, वह इसी प्रश्न को अलग अलग रूपों में उछाल रहा है | कुछ इसे जातिवाद से जोड़ रहे हैं तो कुछ रूढ़ीवाद व अन्धविश्वास से | इसका कारण केवल इतना ही है, कि जैसे जैसे मनुष्य पढ़ा-लिखा व आधुनिक होता चला गया, उसकी ज्ञानेन्द्रिया कमजोर होतीं चलीं गयीं | वह मात्र एक मशीन बनकर रह गया और उतनी भी प्राकृतिक क्षमता नहीं बचा पाया, जितनी की पशु-पक्षियों में होती हैं | चलिए मैं आपको समझाता हूँ कि शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है नए या कई वर्षों तक दूसरों के द्वारा प्रयोग हुए घर में प्रवेश से पहले |

08 मार्च 2017

मैं मूर्ती पूजक नहीं हूँ


 मैं शायद ऐसा व्यक्ति हूँ जो कभी किसी की समझ में नहीं सकता क्योंकि मैं अंधों की उस दुनिया में रहता हूँ जिसके लिए हाथी को समग्रता से देख व समझ पाना लगभग असंभव होता है | कोई हाथी को उसके पैर से जानता है और कोई उसकी पूँछ से तो कोई उसकी सूंड या कान से | पूरा हाथी उनकी समझ में कभी नहीं आ सकता |

इसी प्रकार मैं भी शायद कभी नहीं समझ में आऊंगा किसी के | मेरे आश्रम के लोगों का मानना है कि मैं मूर्ती-पूजक नहीं हूँ और आश्रम के बाहर के लोगों का माना है कि मैं मूर्तीपूजक हूँ | कुछ लोग मुझे नास्तिक मानते हैं तो कुछ लोग मुझे वामपन्थी | कुछ लोग मुझे मुसलमान मानते हैं तो कुछ लोग मुझे पाखण्डी | कुछ को मैं मोदी विरोधी दीखता हूँ तो कुछ को सरकार विरोधी | तो सभी ने मेरे प्रति अपनी अपनी मान्यताएं बना रखीं हैं |

चलिए मैं अपने विषय में आप लोगों की कुछ गलतफहमियाँ दूर करने का प्रयास करता हूँ, हालांकि जानता हूँ यह एक मूर्खतापूर्ण प्रयास ही होगा

20 फ़रवरी 2017

कोई भी धार्मिक ग्रन्थ ऐसा नहीं है दुनिया में जो किसी को अच्छा या बुरा बनाता है


आपने सुना या देखा होगा कि जब भी कोई हिंसक घटना घटती है, फिर चाहे वह इस्लामिक या हिन्दू आतंकवादियों द्वारा घटित हो या दंगाइयों द्वारा या गौरक्षकों, संघी-बजरंगियों द्वारा | सभी धार्मिक अपने अपने सम्प्रदाय का बचाव करते हुए कहते मिलेंगे कि उनसे हमारे धर्म के कोई लेना देना नहीं, हमारी ईश्वरीय किताबें (कुरान, वेद, गीता, बाइबल...आदि) कभी भी ऐसे कामों का समर्थन नहीं करतीं | ये लोग भटके हुए हैं या फिर ईश्वर के आदेश को समझ नहीं पाए |

22 दिसंबर 2016

प्रकृति के साथ तारतम्यता यानि ब्रम्हचर्य


धर्म की शिक्षा ही शायद विश्व की ऐसी शिक्षा है, जिसको देने और लेने वाले दोनों ही धर्म से अनभिज्ञ हैं | इसलिए सदियों में कभी-कभी ही कोई सूफी, कोई संत, कोई बुद्ध, कोई ओशो ही समझ पाते हैं धर्म को और समझाने का प्रयास करते हैं |

मैंने अपने जीवन में बहुत ही कम ऐसे लोग देखें हैं जो धर्म न केवल समझते हैं, बल्कि जीते भी हैं | वास्तव में धर्म इतना सहज है, कि वह किसी को लगता ही नहीं कि धर्म है | लोगों को जब तक मार-काट, दंगा-फसाद, उपद्रव न दिखे तब तक यही मानते हैं कि धर्म अब बचा ही नहीं | उन्हें धर्म तभी दिखाई देता है जब दूसरे सम्प्रदायों की निंदा की जाए और खुद को ईश्वर या खुदा का बंदा समझा जाए |

21 दिसंबर 2016

लोगों को लगाम वाला धर्म ही पसंद आता है



सनातनी होना वास्तव में बहुत ही कठिन है | यह इतना विराट भाव है, कि संकीर्ण मानसिकता की बुद्धि में नहीं समा पाता | लोगों को यह लगता है कि सनातन तो बिना नियम का कोई धर्म होगा और यदि कोई सनातनी हो जायेगा तो वह बेलगाम हो जाएगा | इसलिए लोगों को लगाम वाला धर्म ही पसंद आता है, जो कि वास्तव में केवल किसी कबीले, किसी मजहब, किसी रिलिजन, किसी सम्प्रदाय, गाँव, देहात बस्ती आदि का नियम कानून होता है | उसे प्रभावी बनाने के लिए ईश्वर का भय दिखाया जाता है |

30 नवंबर 2016

हमारी राजनीती किसी नेता या पार्टी पर आधारित नहीं है


यह ध्यान रहे,

  • बहुत से नागरिक ईश्वर भक्ति के नाम पर समाज व राष्ट्रीय समस्याओं से मुँह चुरा कर आश्रमों में भजगोविन्दम जप रहे हैं |
  • बहुत से भक्त नए भक्तों को फाँसने के लिए जगह जगह भजनमण्डली ले कर घूम रहे हैं |
  • बहुत नागरिक अपने बीवी बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी की चिंता में ही घुले जा रहे हैं |
  • बहुत से नागरिक नौकरी-छोकरी-गाड़ी-कोठी की चिंता मे ही दुबले हुए चले जा रहे हैं |
  • बहुत से नागरिक अपने अपने नेताओं के जयकारे लगाने में ही व्यस्त हैं |
  • बहुत से नागरिक चुटकुलों, शेरो-शायरी में मस्त हैं
  • बहुत से नागरिक अभिनेताओं और क्रिकेटरों की भक्ति में डूबे हुए हैं |

07 नवंबर 2016

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया

बचपन से द्वन्द रहता था मन में कि माँसाहार यदि पाप है तो फिर अंग्रेजों को पाप क्यों नहीं लगता, अरबियों को पाप क्यों नहीं लगता, आदिवासियों को पाप क्यों नहीं लगता ?

कई विद्वानों और पंडितों से प्रश्न किया कई से तर्क किये... लेकिन कोई ऐसा उत्तर नहीं मिल पाया जो मुझे संतुष्टि दे पाता | सारे वैज्ञानिक-अवैज्ञानिक तथ्यों को खंगाले लेकिन यह सिद्ध नहीं हो पाया कि माँसाहार करने से पाप लगता है |

मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया, दोनों ही जीवनदाई है, दोनों ही वंशवृद्धि करते हैं, दोनों ही जीवित हैं, लेकिन एक को खाने से पाप नहीं लगता और दूसरे को खाने से पाप लगता है |
फिर यही नहीं समझ में आया कि झूठ बोलने से भी पाप लगता है, लेकिन मैंने किसी भी जुमलेबाज नेता को पाप लगते नहीं देखा, उलटे अदालतों से उसे बरी होते ही देखा है | दुनिया भर के घोटाले करने वाले, रिश्वतखोरों, अत्याचारियों, शोषकों को दुनिया भर के गंभीर अपराधों में आरोपी होते हुए भी सत्ता सुख भोगते देखा है | वहीँ अपने बच्चों को भूख से मरने से बचाने के लिए की गयी चोरी पर भी प्रताड़ित होते हुए, जेल भोगते हुए देखा है और वह भी बिना अदालत का फैसला आये | तो समझ में नहीं आया कि यह पाप किस बला का नाम है, होता कैसा है, दिखता कैसा है |

कई विद्वान कहते हैं कि माँसाहार अध्यात्मिक मार्ग में बाधक है, लेकिन मनुस्मृति कहती है,

29 अक्टूबर 2016

भ्रष्ट, दुष्ट दानवों को अमरता का वरदान प्राप्त है



हर आश्रम में एक परम्परा होती है, गुरु की प्रतिमा को स्नान करवाने का, यहाँ भी है | तो हर संन्यासी का कर्तव्य होता है कि वह हफ्ते में एक बार गुरु की प्रतिमा को विधिवत स्नान करवाए | लेकिन मैंने आज तक स्नान नहीं करवाया |

इस कारण आश्रम के सभी भक्तों और संन्यासियों से लेकर ट्रस्टियों और ग्रामीणों की नजर में अधार्मिक व्यक्ति हूँ | तो मुझे अक्सर किसी न किसी बहाने से उस दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाता है, जिसे आश्रम की परम्परा निभाना कहा जाता है | लेकिन शब्दों से खेलने की तो हमें बचपन से ही बीमारी लग चुकी थी, तो कौन किस उद्देश्य से कौन सी कहानी सूना रहा है, तुरंत समझ में आ जाता है | मुझसे कहा जाता है कि ठाकुर का स्नान करवाने से परमसुख की अनुभूति होती है, अध्यात्म की महान उपलब्धी होती है....और मेरा प्रश्न होता है कि कोई एक व्यक्ति ऐसा दिखा दीजिये जिसने ठाकुर को स्नान करवाया और उसे परम की उपलब्धि हो गयी ?

11 अक्टूबर 2016

सनातनी को सनातन धर्मानुसार जीने क्यों नहीं देते आप लोग ?


कई जमीनी विद्वान हैं जो जमीन में काम करना पसंद करते हैं और कर भी रहे हैं | मैं उनके जमीनी कार्यों की हृदय से प्रशंसा करता हूँ और आशा करता हूँ कि वे इसी प्रकार जमीन पर कार्य करते रहेंगे |

परेशानी मुझे इनसे तब होती है, जब ये विद्वान जमीन से उड़कर फेसबुक में आ जाते हैं गलती से | तब उनको यह दुनिया बड़ी अजीब सी दिखाई देने लगती है | फिर वे कहते हैं कि फेसबुक में समय व्यर्थ करने से अच्छा है जमीन पर कार्य करो |

हज़ारों वर्षों से न जाने कितने लोगों ने जमीन पर कार्य किया और आज भी कर रहे हैं, सिवाय जंगलों, खेतों को नष्ट करने, वायु और जल प्रदुषण बढ़ाने के और कोई महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हों मुझे ऐसा नहीं लगता | कितने लोग वेदों, पुराणों, कुरान, गीता, बाइबिल... आदि रट और रटा रहे हैं, लेकिन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, हत्या, बलात्कार बढ़ते ही चले जा रहे हैं | इतने सारे विद्वानों के जमीन पर काम करने के बाद भी नेता हम उसे ही चुनते हैं जो, जुमलेबाज हो, व्यापारियों और उद्योगपतियों का हितैषी लेकिन आदिवासियों और किसानों का शत्रु हो | इतने सारे धार्मिक ग्रंथों, धर्मों, सम्प्रदायों, अवतारों, बाबाओं, पैगम्बरों... आने के बाद भी और न जाने कितने और आयेंगे भी.... जनता वोट उन्हें ही देती है जिन्होंने कई तरह के जघन्य अपराधों में अपना नाम रौशन किया हो |

07 अक्टूबर 2016

संन्यासी कितने प्रकार के होते हैं ?

मेरी अनपढ़ बुद्धि कहती है कि संन्यासी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं | एक तो वे संन्यासी होते हैं जो शुद्ध हिन्दू हैं और...
Posted by विशुद्ध चैतन्य on 7 अक्टूबर 2015

03 अक्टूबर 2016

ध्यान का अर्थ है स्वयं के भीतर उतरना और अनुभव करना अद्वैत को

प्रार्थना और मैडिटेशन में जो सबसे बड़ा अंतर है वह यह कि प्रार्थना में ईश्वर को स्वयं से अलग माना जाता है और मैडिटेशन में ...
Posted by विशुद्ध चैतन्य on 18 अगस्त 2014

17 सितंबर 2016

जो नवीन विचार या अविष्कार या मार्ग की खोज में रहते हैं वे नौकरी करने में स्वयं को असमर्थ पायेंगे

मैं जब ब्रॉडकास्ट मीडिया में काम करता था, तब वहां कभी कोई भेदभाव देखने नहीं मिला कि कोई हिन्दू है, मुस्लिम है शूद्र है, ब्राह्मण है... आदि इत्यादि | लेकिन एक प्रोड्यूसर मुझे मिली जिसका मानना था कि उसे मीन राशि वालों से नफरत है क्योंकि वे विश्वास के काबिल नहीं होते, कभी भी धोखा दे देते हैं | अर्थात उसकी नजर में मीन राशि वाले शूद्र हो गये..... वह अक्सर लोगों से दोस्ती भी करती थी तो राशियाँ देखकर |

तभी मेरे दिमाग में यह बात आई कि इसी प्रकार मानवों के गुण धर्म के अनुसार जो चार वर्गीकरण किया गया था, उसमें कोई शूद्र निम्न कैसे हो गया और ब्राह्मण श्रेष्ठ कैसे हो गया ?

आइये पहले हम जान लें कि बारह राशियों को चार वर्गों में किस प्रकार रखा गया है |

15 सितंबर 2016

जब भी किसी को स्वीकारो तो सम्पूर्णता में स्वीकारो, टुकड़ों में नहीं

मेरा एक पोस्ट ("मुझे गर्व है कि मेरे भोजन में किसी की भी चीख़ पुकार शामिल नहीं है !") बहुत शेयर हो रहा है शाकाहारियों द्वारा | कई लोग मुझे बहुत महान समझने लगे होंगे पोस्ट की हेडलाइन देखकर... लेकिन जैसे ही उन्हें कहता हूँ कि पोस्ट भी पढ़ लो... तो पोस्ट पढ़ने के बाद उन्हें गहरा सदमा लगता है और पता चलता है कि वे विशुद्ध चैतन्य को कितना भला मानते थे, लेकिन वह तो पाखंडी निकला |

तो बाहरी दिखावों पर न जाएँ अपनी अक्ल लगायें | हर कोई अपनी शक्ल में मास्क लगाए घूम रहा है और कई लोग तो ऐसे भी हैं जो यह भी भूल गये होंगे कि उनकी अपनी असली शक्ल क्या है |

मेरे साथ ऐसा नहीं है | मैं अपनी असली शक्ल में ही रहता हूँ और मास्क लगाना कई वर्ष पहले ही छोड़ दिया था | क्योंकि मास्क लगाने पर नकली लोग ही मिलते हैं असली लोग नहीं |

इसलिए अपनी असली शक्ल में रहिये...

30 अगस्त 2016

विचार-धारा और जल-धारा


अक्सर लोग कहते हैं कि मैं फलाँ विचारधारा को मानता हूँ या हमारी अपनी विचारधारा है | पार्टियों की अपनी विचारधारा होती है, पंथों-सम्प्रदायों की अपनी विचारधारा होती है.... ध्यान दें तो सारी दुनिया में कई विचारधाराएँ हैं और लगभग हर कोई किसी न किसी विचारधारा का अनुयाई होता है | बाकियों की छोड़िये मैं भी सनातन विचारधारा का अनुयाई हूँ | अब सनातन विचारधारा क्या है यह बाद में बताऊंगा, पहले हम विचारधारा को समझ लें |

27 अगस्त 2016

वंदना का अर्थ यह नहीं कि हम बैठ कर ईश्वर का नाम जाप करते रहे हैं


बहुत आश्चर्य होता है, जब देखता हूँ निराकार को पूजने वाले साकार को पूजने वालों का मजाक उड़ाते हैं | बहुत आश्चर्य होता है जब देखता हूँ नास्तिक आस्तिकों का मजाक उड़ाते हैं | क्योंकि इन दोनों ही समुदायों को ईश्वर का कोई ज्ञान नहीं | जिन्होंने ईश्वर को जाना ही नहीं, पहचाना ही नहीं, वे दूसरों का मजाक उड़ाते हुए बिलकुल ऐसे लगते हैं जैसे कुँए के मेंढक झील या सागर के मेंढकों का मजाक उड़ा रहे हों कि हमारे कुँए से बड़ा आकाश तो कहीं और हो ही नहीं सकता, हमारे कुँए में जितना जल है उतना तो कहीं और हो ही नहीं सकता |

हमारे ऋषि-मुनि पंचतत्व की बातें करते हैं और विज्ञान भी यह सिद्ध कर चुका है कि पंचतत्व होते हैं, जैसे कि आकाश (यानि रिक्त स्थान) जल, अग्नि, वायु और भूमि (खनिज) | इनके अलावा एक और चीज है वह है प्राण यानि आत्मा जिसे अब वैज्ञानिक भी स्वीकार चुके हैं | तो इन सभी के समूह को ईश्वर कहा जाता है | ईश्वर इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके बिना हमारा अस्तित्व नहीं है | इनमे से के भी चीज लुप्त हो जाए तो हम जीवित नहीं रहेंगे इसलिए ईश्वर वन्दनीय है |

21 अगस्त 2016

मैं यह सोचकर कभी कभी परेशान हो जाता हूँ कि मैं इतनी दूर कैसे आ गया भटक कर ?




अक्सर वे लोग मुझपर पक्षपात का आरोप लगाते हैं जो स्वयं पक्षपात से मुक्त नहीं हो पाते | वैसे देखा जाए तो पक्षपात से मुक्त कोई होता भी नहीं, सिवाय मुर्दों के | मैं भी पक्षपात से मुक्त नहीं हूँ, क्योंकि मैं हमेशा शोषितों के पक्ष में होता हूँ बिना यह देखे कि उसका जात, पंथ, सम्प्रदाय या लिंग क्या है | मैं हमेशा अत्याचार व शोषण के विरोध में होता हूँ भले ही वह कितना ताकतवर क्यों न हो | तो मैं पक्षपात से मुक्त नहीं हूँ लेकिन मेरा पक्षपात सनातनी है, किताबी नहीं | मेरा पक्षपात प्राकृतिक है थोपी हुई मान्यता नहीं |

अधिकाँश लोगों को मैंने देखा है निष्पक्षता की बात करते हुए और यह कहते हुए, "न काहू से दोस्ती न काहू से बैर", लेकिन उनकी दोस्ती हमेशा ताकतवर के साथ रहती है और कमजोर से दूरी | ऐसे लोगों से मैं हमेशा सतर्क रहता हूँ, क्योंकि ये लोग कभी भी धोखा दे सकते हैं और इनको एहसास भी नहीं होगा कि इन्होने कुछ गलत किया | अधिकांश लोगों को मैंने देखा है प्रेम और भाईचारा की बात करते हुए, लेकिन इनका प्रेम और भाईचारा केवल अपने समुदाय, समाज, पंथ, सम्प्रदाय या जाति के प्रति ही रहता है | उदाहरण के लिए मुस्लिम सम्प्रदाय या संघी-बजरंगी, दलित या ब्राह्मणवादी सम्प्रदाय को ही लें, तो आप पायेंगे कि इनको अपने संप्रदाय के लोगों में कोई बुराई नहीं दिखाई देगी | ये सभी भाईचारा की बात करेंगे लेकिन ब्राहमण दलितों को मंदिर में नहीं घुसने देंगे क्योंकि उनका भाईचारा केवल सवर्णों से है | संघी बजरंगियों को मुस्लिमों और दलितों में ही सारी बुराई दिखाई देगी, अपने सम्प्रदाय में नहीं, फिर उनके लोग बम बनाएं, गौरक्षा के नाम पर किसी की हत्या कर दें, दंगे भड़काएं.... कुछ नहीं दिखेगा उनको | इसी प्रकार मुस्लिमों में है, यदि किसी मुसलमान को कुछ हो जाए तो भाईचारा जाग जाएगा, वहीँ किसी हिन्दू को कुछ हो जाए तो उन्हें पता भी नहीं चलेगा |

07 अगस्त 2016

मेरा आत्मज्ञान

समाज के बिछाए जाल पर फँसने की बजाय उसेअपनी शक्ति बना लीजिये 
मुझे कई वर्षों तक अपनी ही तस्वीर खिंचवाने में शर्म आती थी क्योंकि मैं स्वयं को सुंदर नहीं मानता था | मुझे लगता है कि दूसरे लोग मुझसे अधिक सुंदर हैं | बड़ी मजबूरी में पासपोर्ट साइज़ तस्वीर खिंचवाता था वह भी एक ही बार में साठ-सत्तर कॉपियां निकलवा लेता था, ताकि दुबारा न आना पड़े यदि और कहीं आवश्यकता पड़े | तो मैं उन्हीं तस्वीरों को हर जगह प्रयोग करता था, चाहे बैंक हो, चाहे और कोई सरकारी काम हो....वे सारी कॉपियां खत्म होते-होते तीन-चार साल निकल ही जाते थे या फिर वे खुद ही खराब हो जाते थे..... तब फिर कहीं जरूरत पड़ती तब खिंचवाता था |

मेरी पहली पोर्टेट तस्वीर मेरी बहन ने खिंचवाई फोटो स्टूडियो में बस वही ऐसी तस्वीर थी जो मुझे पसंद आई उसके बाद उसी तस्वीर की निगेटिव से तस्वीर निकलवाता और उसको आधा काट कर पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर बनाता और वही प्रयोग करता | उस तस्वीर को लगभग दस वर्ष प्रयोग किया | दस वर्ष बाद लोग बोलने लगे कि भाई नई तस्वीर लगाओ, इस तस्वीर से तो आपकी शक्ल बिलकुल नहीं मिलती |