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09 दिसंबर 2016
14 नवंबर 2016
हमेशा हाथ फैलाये रहने वालों से लोग दूरी बना लेते हैं
"मैं भौतिक और अध्यात्मिक जगत के बीच सेतु बनाना चाहता हूँ |" -ठाकुर दयानन्द देव (१८८१-१९३७)
यही एक लाइन थी, जिसने मुझे इनके आश्रम में खींच लिया क्योंकि यही है सच्ची शिक्षा और जो ऐसा कह सकता है, वही सही मायने में सही गुरु है | बाकी जितने भी गुरु, संत या बाबा मुझे मिले, सभी ने यही कहा कि जगत मिथ्या है, माया है बस ईश्वर सत्य है, मृत्यु सत्य है |
21 अक्टूबर 2016
साधारणत: सौ में से निन्यानबे प्रतिशत लोग नास्तिक हैं
नास्तिक का अर्थ है—जो नहीं को जीवन का आधार बना ले, जो नकार को जीवन की शैली बना ले। नास्तिक का अर्थ वैसा नहीं है जैसा साधारणत: समझा जाता है। साधारणत: समझा जाता है जो ईश्वर को इनकार करे वह नास्तिक। वह परिभाषा मूलत: गलत है। क्योंकि बुद्ध ने ईश्वर को इनकार किया और बुद्ध से बड़ा आस्तिक पृथ्वी पर दूसरा नहीं हुआ। महावीर ने ईश्वर को इनकार किया, लेकिन क्या महावीर को नास्तिक कह सकोगे? और जो कह सके वह अंधा है। जो कह सके वह जड़ है।
नास्तिक की पुरानी परिभाषा ओछी पड़ गई, छोटी पड़ गई। इसलिए मैं नहीं कहता कि नास्तिक वह है जो ईश्वर को अस्वीकार करता है। नास्तिक वह है जो अस्वीकार में जीता है। स्वभावत:, मेरे आस्तिक की परिभाषा भी भिन्न हो जाएगी। आस्तिक का अर्थ नहीं है कि जो ईश्वर को स्वीकार करता है, आस्तिक का अर्थ है जो स्वीकार में जीता है। आस्था में जीए, वह आस्तिक। अनास्था में जीए, वह नास्तिक।
साधारणत: सौ में से निन्यानबे प्रतिशत लोग नास्तिक हैं। क्योंकि नहीं उनके जीवन का ढंग है। हर बात में नहीं। नहीं उनको बिलकुल सहज है, जबान पर रखी है; हां कहना बहुत कठिन है। और कारण साफ है। नहीं कहने से अहंकार को पोषण मिलता है और हां कहने से अहंकार की मृत्यु होती है।
नास्तिक की पुरानी परिभाषा ओछी पड़ गई, छोटी पड़ गई। इसलिए मैं नहीं कहता कि नास्तिक वह है जो ईश्वर को अस्वीकार करता है। नास्तिक वह है जो अस्वीकार में जीता है। स्वभावत:, मेरे आस्तिक की परिभाषा भी भिन्न हो जाएगी। आस्तिक का अर्थ नहीं है कि जो ईश्वर को स्वीकार करता है, आस्तिक का अर्थ है जो स्वीकार में जीता है। आस्था में जीए, वह आस्तिक। अनास्था में जीए, वह नास्तिक।
साधारणत: सौ में से निन्यानबे प्रतिशत लोग नास्तिक हैं। क्योंकि नहीं उनके जीवन का ढंग है। हर बात में नहीं। नहीं उनको बिलकुल सहज है, जबान पर रखी है; हां कहना बहुत कठिन है। और कारण साफ है। नहीं कहने से अहंकार को पोषण मिलता है और हां कहने से अहंकार की मृत्यु होती है।
19 अक्टूबर 2016
मुझे वैसी पीडा कभी नहीं हुई क्योंकि मैंने हर प्रकार के ढोंग से इंकार कर दिया

मैं खड़ा हूं ?—अजीब बात है, इस समय तो मैं आराम कर रहा हूं—मेरा मतलब है अपनी स्मृति में मैं मस्तो कि साथ खड़ा हूं। निश्चित ही तो ऐसा कोई और नहीं है जिसके साथ मैं खड़ा हो सकता हूं। मस्तो के बाद दूसरे किसी का संग-साथ तो बिलकुल अर्थहीन है।
मस्तो तो पूर्णतया समृद्ध थे—भीतर से भी और बाहर से भी। उनके रोम-रोम से उनकी आंतरिक समृद्धि झलकती थी। अपने विविध संबंधों का उन्होंने जो विशाल जाल बुन रखा था उसका हर तंतु मूल्य वान था और इसके बारे मैं उन्होंने मुझे धीरे-धीरे अवगत किया। अपने जाने-पहचाने सब लोगो से तो उन्होंने मुझे परिचित नहीं कराया—ऐसा करना संभव नहीं था। मुझे जल्दी थी वह करने की जिसे में कहता हूं, न करना। वे मेरे प्रति अपनी जिम्मेवारी को पूरा करने की जल्दी मैं थे। चाहते हुए भी वह मेरे लिए अपने सब संबंधों का लाभ उपलब्ध न करा सके। इसके दूसरे कारण भी थे।
12 अक्टूबर 2016
Stop acting so small. You are the universe in ecstatic motion.
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| सूर्य की आराधना करती एक आदिवासी कन्या | |
Stop acting so small. You are the universe in ecstatic motion.
“You were born with potential. You were born with goodness and trust. You were born with ideals and dreams. You were born with greatness. You were born with wings. You are not meant for crawling, so don’t. You have wings. Learn to use them and fly.”
09 अक्टूबर 2016
"दो व्यक्ति समान नहीं है, हो भी नहीं सकते..." -ओशो
एक-एक व्यक्ति की अलग-अलग यात्रा है, अलग-अलग रुझान है, अलग-अलग दृष्टि है। किसी को संगीत प्यारा लगता है, और किसी को केवल शोरगुल मालूम होता है। किसी के पास सौंदर्य को अनुभव करने की क्षमता होती है, और किसी के पास सिवाय पत्थर के, और हृदय में कुछ भी नहीं होता। ऐसे ही कोई प्रेम के झरने से भरा होता है और कोई सूखा।
14 सितंबर 2016
पहली सीढ़ी पर खड़े हुए संन्यासी को, फकीर को अंतिम अवस्था का संन्यासी भ्रष्ट मालूम पड़ सकता है
एक बार राबिया बीमार थी। सहानुभूति में दो फकीर देखने आये। एक थे हसन और दूसरे मलिक।
हसन ने कहा : ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे, फकीर को कोई शिकायत नहीं होती। वह उसे चुपचाप सह लेता है।’
फिर मलिक बोले : राबिया फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं, बल्कि मिले हुए दंड में भी खुशी मानता है।’
राबिया थोड़ी देर चुप रही फिर वह बोली : ‘मुझे माफ करना, लेकिन जब से मैंने खुदा को जाना है, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती। तो फिर कैसी शिकायत ? क्या सहना ? और किसकी खुशी ?’
ओशो, तीन फकीरों की इस परिचर्चा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।
हसन ने कहा : ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे, फकीर को कोई शिकायत नहीं होती। वह उसे चुपचाप सह लेता है।’
फिर मलिक बोले : राबिया फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं, बल्कि मिले हुए दंड में भी खुशी मानता है।’
राबिया थोड़ी देर चुप रही फिर वह बोली : ‘मुझे माफ करना, लेकिन जब से मैंने खुदा को जाना है, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती। तो फिर कैसी शिकायत ? क्या सहना ? और किसकी खुशी ?’
ओशो, तीन फकीरों की इस परिचर्चा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।
13 सितंबर 2016
या तो कुरान को स्वीकार करो या तलवार
मोहम्मद ने अपने धर्म को नाम दिया इस्लाम। इस्लाम यानी शांति। और दुनिया में इस्लाम ने जितना उपद्रव पैदा किया है, उतना किसी धर्म ने नहीं किया। निश्चित ही, मोहम्मद उसके लिए जिम्मेदारी होंगे। उन्होंने अपनी तलवार पर लिख रखा था, शांति मेरा संदेश है—यह कोई तलवार पर लिखने की बात नहीं है। क्योंकि तलवार शांति का संदेश नहीं है। ज्यादा से ज्यादा वह सुरक्षा बन सकती है, लेकिन संदेश नहीं बन सकती।
ये सारे महापुरुष, जो इस पृथ्वी पर हुए, उनके प्रति मेरा दृष्टिकोण इतना ही है: उनमें हमारे लिए जो संगत है उसे चुनें और असंगत है उसे छोड़ दें।
इस्लाम धर्म उस दंश में पैदा हुआ था जो ज्यादा सुसंस्कृत नहीं था। उसे सिर्फ एक ही तर्क मालूम था—तलवार का तर्क। और तलवार कोई तर्क नहीं है। और इस्लाम धर्म ठीक उसी बिंदु पर अटका रह गया है, जहां मोहम्मद छोड़ गए थे। क्योंकि कहा है, और मैं उसका निषेध करता हूं, कि मैं अल्लाह का आखिरी पैगंबर हूं; कि अल्लाह के पूर्ववर्ती संदेशों में कुरान अंतिम सुधार है। अब इसके बाद कोई और पैगंबर नहीं होगा और अन्य कोई परिवर्तन नहीं होंगे।
अब यह धर्मांधता है और यह किसने कहा है कि इसको कोई सवाल नहीं है—बात ही गलत है। जीवन विकसित होता रहेगा और लोगों को नए संदेशों की जरूरत पड़ेगी और नए लोगों की जरूरत पड़ेगी जो नई समस्याओं का हल खोजेंगे। और कुरान कोई बहुत बड़ा धर्म ग्रंथ नहीं है। उसमें उपनिषद की वह उड़ान नहीं है। उसमें गौतम बुद्ध की विचार संपदा नहीं है। लेकिन यह स्वाभाविक भी था क्योंकि मोहम्मद अशिक्षित लोगों से बोल रहे थे। लेकिन वे अशिक्षित लोग अब भी वही ढोए चले जा रहे हैं। एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुरान। या तो कुरान को स्वीकार करो या तलवार को।
भारत में जो मुस्लिम रहते हैं, जिन मुस्लिम लोगों ने पाकिस्तान निर्मित किया है, उन्हें बौद्धिक रूप से यह बात स्वीकृत नहीं है कि वे जिस धर्म को छोड़ रहे हैं, उससे इस्लाम धर्म कोई अधिक श्रेष्ठ धर्म है। उनसे जबरदस्ती की जा रही है। और कम से कम धर्म के मामले में जोर जबरदस्ती नहीं की जा सकती है, नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपना दर्शन अभिव्यक्त करने की छूट होनी चाहिए। और प्रत्येक व्यक्ति को उसे स्वीकार या अस्वीकार करने की छूट होनी चाहिए। उसका अस्वीकार करना उसका अपमान नहीं है। धर्म केवल स्वतंत्रता की आबोहवा में विकसित होता है। इस्लाम ने खुद मुस्लिमों को भी यह स्वतंत्रता नहीं दी है।
ओशो : फिर अमरित की बूंद पड़ी--(प्रवचन--05)

06 सितंबर 2016
शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का भटकना और दूसरे शरीर में प्रवेश करना
एक अंतिम प्रश्न और फिर हम ध्यान के लिए बैठेगें एक मित्र ने सुबह की चर्चा के बाद पूछा है कि क्या कुछ आत्माएं शरीर छोड़ने के बाद भटकती रह जाती हैं?कुछ आत्माएं निश्चित ही शरीर छोड़ने के बाद एकदम से दूसरा शरीर ग्रहण नहीं कर पाती हैं। उसका कारण? उसका कारण है। और उसका कारण शायद आपने कभी न सोचा होगा कि यह कारण हो सकता है। दुनिया में अगर हम सारी आत्माओं को विभाजित करें, सारे व्यक्तित्वों को, तो वे तीन तरह के मालूम पड़ेंगे। एक तो अत्यंत निकृष्ट, अत्यंत हीन चित्त के लोग; एक अत्यंत उच्च, अत्यंत श्रेष्ठ, अत्यंत पवित्र किस्म के लोग; और फिर बीच की एक भीड़ जो दोनों का तालमेल है, जो बुरे और भले को मेल —मिलाकर चलती है। जैसे कि अगर डमरू हम देखें, तो डमरू दोनों तरफ चौड़ा है और बीच में पतला होता है। डमरू को उलटा कर लें। दोनों तरफ पतला और बीच में चौड़ा हो जाए तो हम दुनिया की स्थिति समझ लेंगे। दोनों तरफ छोर और बीच में मोटा—डमरू उलटा। इन छोरों पर थोड़ी—सी आत्माएं हैं।
15 अगस्त 2016
जो ठग रहे हैं, जो लूट रहे हैं उन्हें ये समाज बड़े सम्मान की नजर से देखते हैं.... दोष किसका है ?
न तो गौतम बुद्ध निकले थे गरीबों की सेवा करने और न ही महावीर और न ही ओशो | इन सभी ने केवल मार्ग दिखाया, जो आगे बढ़ना चाहते थे वे बढ़ गये, जो भीख और दान की आस में बैठे थे, वे बैठे रह गये | बुद्ध को गए वर्षो बीत गये, महावीर को गये वर्षों बीत गये, ओशो भी चले गये.... लेकिन लोग आज भी बैठे हैं कि कोई दान कर दे कोई भीख दे तो दो वक्त की रोटी मिल जाये |
श्री कृष्ण भी राजा रहते हुए, कभी किसी गरीब को रोटी खिलाने नहीं पहुंचे यहाँ तक कि अपने मित्र सुदामा को भी | वह तो सुदामा जब स्वयं उनके पास पहुँचा तो उनकी सहायता हुई, वरना वे तो ईश्वर थे, क्या उनको सुदामा की आर्थिक स्थिति के विषय में पता नहीं था ?
13 अगस्त 2016
साहसी बनो हिम्मतवर वनों और हमेशा जीवन में विश्वास रखो
ओशो ने कहा था;
जब तक सद्गुरु जीवित है उसका पूरा स्वाद लो ।केवल मूढ़ ही मृत्यु को पूजते हैं बुद्धिमान हमेशा ही जीवन की पूजा करते हैं।"
"जल्द ही मै यहाँ नही रह जाऊंगा और याद रखना विशेष रूप से मै अपने शिष्यों को याद दिलाना चाहता हूँ यदि तुम हकीकत में ही मुझे प्रेम करते हो जब मै नही रहूँ मै चाहूँगा तुम किसी ऐसे व्यक्ति को खोज लो जो अभी भी जीवित है और यह मत कहना क्योकि तुम मुझसे सम्वंधित हो क्योंकि तुम मेरे शिष्य हो इसलिए तुम किसी और वास्तविक सद्गुरु से सम्बंधित नही हो सकते। उन आखोँ में झांको तो एक बार फिर तुम वहां मेरी ही आखें पाओगे। शरीर तो वही नही होगा लेकिन आंखे वही होंगी ।साहसी बनो हिम्मतवर वनों और हमेशा जीवन में विश्वास रखो ।तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम अथवा मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम कभी भी बाधा नही बनना चाहिए ।प्रेम स्वतंत्रता देता है। प्रेम तुम्हे मुक्त करता है।
यदि मेरे यहाँ रहते हुए तुम्हारी यात्रा पूरी नही होती यदि अभी भी कुछ बाकि रह गया है तब घबराओ मत तुम मुझे छोड़ कर मेरे साथ विश्वासघात नही कर रहे हो वल्कि हकीकत तो ये है कि तुम मुझे न छोड़ कर और किसी वास्तविक सद्गुरु के पास न जाकर तुम मेरे साथ विश्वासघात कर रहे हो।
जब तक सद्गुरु जीवित है उसका पूरा स्वाद लो ।केवल मूढ़ ही मृत्यु को पूजते हैं बुद्धिमान हमेशा ही जीवन की पूजा करते हैं।"
10 अगस्त 2016
26 Native American Traditional Code of Ethics Everyone Needs to Follow

Creed and Code are the essence of the standards our honored ancestors lived by. They are based on honesty, integrity, helping one another in work and play, making the best of things, being friendly and kind, respecting elders, and taking care of Mother Earth that gives us food and shelter needed to survive.
08 अगस्त 2016
साक्षी— भाव से अभिनय की कला तो आती दिखती है, पर आनंद— भाव क्यों कर नहीं जुड़ पाता?

तब तुम अभिनय का भी अभिनय ही कर रहे हो। वह असली नहीं है। अभिनय असली होना चाहिए। अगर तुमने अभिनय का भी अभिनय किया, कि भीतर तो तुम जानते हो कि कर्ता हो, मगर अब क्या करें, यह कृष्ण पीछे पड़े हैं; चलो, अभिनय करो! तो आनंद का भाव उदय नहीं होगा। आनंद का भाव तो कसौटी है कि तुमने अगर अभिनय अभिनय की तरह किया, तो आनंद— भाव घटता ही है, उसमें कभी कोई अंतर नहीं पड़ता। वह होता ही नहीं उससे विपरीत।
तो वह परीक्षा है। अगर आनंद न घटे, तो समझना, अभिनय भी झूठा है। अगर आनंद घटे, तो समझना कि तुमने अभिनय का सूत्र पकड़ लिया है। तुम राह पर हो, ठीक मार्ग पर हो। मंदिर दूर भला हो, बहुत दूर नहीं है। कलश उसके दिखाई पड़ने लगेंगे, आनंद थिरकने लगेगा। सच्चिदानंद ज्यादा दूर नहीं है, जब आनंद थिरकने लगे।
अब सूत्र :
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।18.49।।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।18.49।।
तथा हे अर्जुन, आसक्तिरहित बुद्धि वाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष संन्यास के द्वारा भी परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है अर्थात क्रियारहित हुआ शुद्ध सच्चिदानंदघन परमात्मा की प्राप्तिरूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
द्वार पर उसने ऐसे दस्तक दी कि जैसे उसने सब जीवन लुटा दिया हो दान में
प्रश्न: आपने कहा कि महावीर हिंसा के भय से अनेक कर्मो से बचते रहे। यह हिंसा का भय था अथवा अहिंसा और करुणा का उद्रेक?
महावीर के लिए तो अहिंसा और करुणा का उद्रेक ही था, लेकिन महावीर के अनुयायियों के लिए हिंसा का भय। वहीं सदगुरु और अनुयायियों में फर्क पड़ जाता है। कारण बदल जाते हैं, कृत्य एक से मालूम पड़ते हैं। अगर करुणा का उद्रेक हुआ हो, तो तुम दूसरा मर न जाए, इससे चिंतित नहीं हो, क्योंकि तुम जानते ही हो कि मृत्यु तो घटती ही नहीं। तुम सिर्फ इससे चिंतित हो कि मेरे कारण पीड़ा न पहुंचे! अकारण मैं किसी की पीड़ा के लिए आधार न बनूं! तुम्हारी करुणा के कारण ही तुम अपने को हटाते हो उन—उन जगह से, जहां किसी कै लिए पीड़ा बन सकती थी, दुख हो सकता था।
महावीर तो बचते हैं इसीलिए कि महाकरुणा का जन्म हुआ है। लेकिन महावीर के पीछे चलने वाला महाकरुणा के जन्म के कारण नहीं बच रहा है। वह केवल हिंसा न हो जाए, हिंसा होकर कहीं पाप न लग जाए, पाप लगकर कहीं नर्क में न पड़ना पड़े, कर्मबंध न हो जाए, वह हिसाब कर रहा है। उसे दूसरे से प्रयोजन नहीं है। उसे अपने से ही प्रयोजन है। वह हिसाब स्वार्थ का ही है।
महावीर के लिए तो अहिंसा और करुणा का उद्रेक ही था, लेकिन महावीर के अनुयायियों के लिए हिंसा का भय। वहीं सदगुरु और अनुयायियों में फर्क पड़ जाता है। कारण बदल जाते हैं, कृत्य एक से मालूम पड़ते हैं। अगर करुणा का उद्रेक हुआ हो, तो तुम दूसरा मर न जाए, इससे चिंतित नहीं हो, क्योंकि तुम जानते ही हो कि मृत्यु तो घटती ही नहीं। तुम सिर्फ इससे चिंतित हो कि मेरे कारण पीड़ा न पहुंचे! अकारण मैं किसी की पीड़ा के लिए आधार न बनूं! तुम्हारी करुणा के कारण ही तुम अपने को हटाते हो उन—उन जगह से, जहां किसी कै लिए पीड़ा बन सकती थी, दुख हो सकता था।
महावीर तो बचते हैं इसीलिए कि महाकरुणा का जन्म हुआ है। लेकिन महावीर के पीछे चलने वाला महाकरुणा के जन्म के कारण नहीं बच रहा है। वह केवल हिंसा न हो जाए, हिंसा होकर कहीं पाप न लग जाए, पाप लगकर कहीं नर्क में न पड़ना पड़े, कर्मबंध न हो जाए, वह हिसाब कर रहा है। उसे दूसरे से प्रयोजन नहीं है। उसे अपने से ही प्रयोजन है। वह हिसाब स्वार्थ का ही है।
01 जून 2016
नर मादा के गहरे मिलन से ही अस्तित्व संभव है।
सोचो जरा! क्या बिना गहरे मिलन के, बिना गहरे संभोग के किसी का अस्तित्व संभव है? राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, कबीर, नानक, मोहम्मद कैसे पैदा हुए? इनके माँ बाप का मिलन, केवल वासना मात्र नही था! वो था एक अद्भुत प्रेम मिलन! आज के बच्चे बिना प्रेम के पैदा हो रहे है, हर पुरूष स्त्री एक दूसरे को सेक्स की मशीन समझ रहे है! जब तक दोनों में प्रेम पैदा नही होगा, तब तक सिर्फ शारीरिक मिलन ही संभव है। जब तक वासना रहेगी तब तक प्रेम पूर्वक मिलन हो ही नही सकता, और जहां प्रेम नही वहां कैसे उम्मीद कर सकते है कि फिर से राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, मोहम्मद पैदा होंगे! उलटा इससे बुद्धू जरूर पैदा होंगे! तभी तो बच्चे मानसिक रूप से बीमार, अपंग, पागल पैदा हो रहे है।
अगर अभी भी सेक्स पे ध्यान नही दिया गया तो 21 वीं सदी के अन्त तक दुनीया में 40% से ज्यादा आबादी समलैंगिक हो जायेगी, किन्नर पैदा होंगे, और लोगो का सेक्स भी प्राकृतिक नही रहेगा, 60% आबादी आज सेक्स से सम्बन्धित बीमारियों से पीड़ित है, ऐसा क्यों हो रहा है? सेक्स को समझने की कोशिश नही करने के कारण ही आज मानव जाति में इतना तनाव, हिंसा, आतंकवाद हो रहा है। यहाँ तक की 90% पागल होने वाले लोगो का कारण सेक्स ही है।
क्या दुनिया को सेक्स को समझने की जरूरत नही है? सब लोग हां ही बोलेंगे! लेकीन सब बड़े छोटो से छुपा रहे हैं, माँ बाप अपने बच्चों के सामने सेक्स की बात करने से डरते हैं, यहाँ तक की लोग तो अपने बच्चों को प्यार करने से भी डरते है, इतना डरते है कि ज्यादा प्यार से बाप बेटी, माँ बेटे, भाई बहन के सम्बन्ध खराब ना हों जाये, बाप बेटे की मर्यादा ना खत्म हो जाये! अजीब प्रकार के मनुष्य हो गए है, इन सबका एक मात्र कारण है, सेक्स;
और अब तो सेक्स भी सेक्स नही रहा! वो भी नकली हो गया है, शारीरिक सेक्स कम होता जा रहा है, मानसिक सेक्स ज्यादा हो रहा है, मन में सेक्स चल रहा है लेकिन तन सेक्स के योग्य नही रहा, ऐसा क्यों हो रहा है? कभी सोचा आपने? लोग पोर्न देख रहे है, सेक्स की कहानियां पढ़ रहे है, हस्तमैथुन कर रहे है, आज 95% आबादी हस्तमैथुन करती है। 80 साल के बूढ़े 20 साल की लड़की से शादी कर रहे है।आये दिन आप पढ़ते ही होंगे लोग जानवरो से भी सेक्स कर रहे है, मनुष्य के सिवा कोई भी दूसरी प्रजाती ऐसा नही कर रही है, बकरी को देख कर भैंसे के मन में सेक्स का ख्याल नही आता, लेकिन इंसान तो ये भी कर रहे हैं।
यूरोपीय देशो में तो लोग जानवरो से शादी तक कर रहे है। शादीशुदा लोग हस्तमैथुन कर रहे है, ये सब सेक्स को गन्दा समझने, मानने और दबाने के कारण हो रहा है। जबकि इसके बिना जीवन संभव नहीं है। लेकिन कोई इसे समझने, जानने और मानने को राजी नहीं हैं। इसलिए मैं कहता हूँ! सेक्स से डरो नही, इसे समझो! ये भी जीवन का हिस्सा है। अस्तित्व का आरम्भ है, आंनद का महासागर है। बस एक डुबकी गहरे में लगानी है! लेकिन वासना में नही, प्रेम में !!
~ओशो~
अगर अभी भी सेक्स पे ध्यान नही दिया गया तो 21 वीं सदी के अन्त तक दुनीया में 40% से ज्यादा आबादी समलैंगिक हो जायेगी, किन्नर पैदा होंगे, और लोगो का सेक्स भी प्राकृतिक नही रहेगा, 60% आबादी आज सेक्स से सम्बन्धित बीमारियों से पीड़ित है, ऐसा क्यों हो रहा है? सेक्स को समझने की कोशिश नही करने के कारण ही आज मानव जाति में इतना तनाव, हिंसा, आतंकवाद हो रहा है। यहाँ तक की 90% पागल होने वाले लोगो का कारण सेक्स ही है।
क्या दुनिया को सेक्स को समझने की जरूरत नही है? सब लोग हां ही बोलेंगे! लेकीन सब बड़े छोटो से छुपा रहे हैं, माँ बाप अपने बच्चों के सामने सेक्स की बात करने से डरते हैं, यहाँ तक की लोग तो अपने बच्चों को प्यार करने से भी डरते है, इतना डरते है कि ज्यादा प्यार से बाप बेटी, माँ बेटे, भाई बहन के सम्बन्ध खराब ना हों जाये, बाप बेटे की मर्यादा ना खत्म हो जाये! अजीब प्रकार के मनुष्य हो गए है, इन सबका एक मात्र कारण है, सेक्स;
और अब तो सेक्स भी सेक्स नही रहा! वो भी नकली हो गया है, शारीरिक सेक्स कम होता जा रहा है, मानसिक सेक्स ज्यादा हो रहा है, मन में सेक्स चल रहा है लेकिन तन सेक्स के योग्य नही रहा, ऐसा क्यों हो रहा है? कभी सोचा आपने? लोग पोर्न देख रहे है, सेक्स की कहानियां पढ़ रहे है, हस्तमैथुन कर रहे है, आज 95% आबादी हस्तमैथुन करती है। 80 साल के बूढ़े 20 साल की लड़की से शादी कर रहे है।आये दिन आप पढ़ते ही होंगे लोग जानवरो से भी सेक्स कर रहे है, मनुष्य के सिवा कोई भी दूसरी प्रजाती ऐसा नही कर रही है, बकरी को देख कर भैंसे के मन में सेक्स का ख्याल नही आता, लेकिन इंसान तो ये भी कर रहे हैं।
यूरोपीय देशो में तो लोग जानवरो से शादी तक कर रहे है। शादीशुदा लोग हस्तमैथुन कर रहे है, ये सब सेक्स को गन्दा समझने, मानने और दबाने के कारण हो रहा है। जबकि इसके बिना जीवन संभव नहीं है। लेकिन कोई इसे समझने, जानने और मानने को राजी नहीं हैं। इसलिए मैं कहता हूँ! सेक्स से डरो नही, इसे समझो! ये भी जीवन का हिस्सा है। अस्तित्व का आरम्भ है, आंनद का महासागर है। बस एक डुबकी गहरे में लगानी है! लेकिन वासना में नही, प्रेम में !!
~ओशो~
03 मई 2016
तुम धन खाकर मरते हो, वे जहर खाकर मरते हैं
कहते हैं, मुल्ला नसरुद्दीन को चोरों ने पकड़ लिया था और उन्होंने कहा कि तू धर दे जो तेरे पास हो। चाबी भी, बैंक का एकाउंट भी, और नहीं तो तेरी जान ले लेंगे। बोल क्या करता है? उसने कहा, जरा सोचने भी तो दो भाई! अब विकल्प दो ही हैं। वे कह रहे हैं, समझा कि नहीं तूने? दो ही विकल्प हैं। या तो धन दे दे, या तेरे प्राण ले लेंगे। उसने कहा, जरा सोचने दो। वह जरा देर लगाने लगा सोचने में। चोरों ने कहा, जल्दी करो, सोचना क्या है? उसने कहा, तो तुम जान ही ले लो, क्योंकि धन तो बड़ी मुश्किल से कमाया है, और फिर बुढ़ापे में काम भी आएगा। जान ले लो, मुफ्त मिली है। कमाई भी नहीं। और धन गया और जान बच गयी, तो क्या करेंगे? जान गयी, धन बच गया, सब ठीक है।
इस पर तुम हंसना मत। यही तुम्हारी हालत है।
02 मई 2016
जो लोग सेक्स का विरोध करेंगे वे काम वासना में फँसे रहेंगे
आज सुबह फेसबुक खोलते ही पहला मैसेज जो मिला वह था,
"सर में ओशो रजनीश के विचारो का समर्थक हु पर नजाने क्यों में खुल कर समर्थन नहीं कर पाता ? मुझे इसकी सिर्फ एक वजह लगती हे की वो फ्री सेक्स के समर्थन मे थे। आप अपना जवाब पोस्ट के जरिये दीजिये | अगर आप चाहे तो इन बॉक्स मे देदे पर मैं चाहता हूँ सबको पता चले की हम जैसे लोग भी ओशो के समर्थक है ।" -एक सुन्नी मुस्लिम
22 अप्रैल 2016
"सच तो यह है कि हमारा मन सेक्स-सेन्टर की तरफ ही बहता रहता है |" -ओशो
पुराने दिनों में जब भी दीक्षा दी जाती थी, और दीक्षा वही दे सकता है जो आपकी समस्त जन्मों की सार संपदा क्या है, उसे समझ पाता हो, अन्यथा नहीं दे सकता। अन्यथा देने का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि जहां तक आप पहुंच गए हैं उसके आगे यात्रा करनी है। तो तिलक अगर ठीक—ठीक लगाया जाए, तो वह कई अर्थों का सूचक था। वे सारे अर्थ समझने पड़ेंगे।
पहला तो, वह इस बात का सूचक था कि जब एक बार गुरु ने बता दिया कि तिलक यहां लगाना है ठीक जगह, तो आपको भी उस ठीक जगह का अनुभव होने लगे, तिलक लगाने का पहला प्रयोजन यही है। आपने कभी खयाल नहीं किया होगा कि आप आंख बन्द करके बैठ जाएं और कोई व्यक्ति आपकी दोनों आंखों के बीच में सिर के पास उंगली ले जाए तो बन्द आंख में भी आपके भीतर एहसास होना शुरू हो जाएगा कि कोई आंख की तरफ उंगली किए हुए है—वह तीसरी आंख की प्रतीति है।
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