ठाकुर दयानंद देव जी (1882-1937) ने कहा था, "जगत यदि मिथ्या है, तो ईश्वर भी मिथ्या है |" - एक नास्तिक भौतिक धरातल से ऊपर नहीं उठ पता और उसे ही सर्वस्व मानकर जीता है | जबकि एक आस्तिक यह मानकर जीता है कि कोई है जो सम्पूर्ण सृष्टि की व्यवस्था देखता है |
- एक कट्टर धार्मिक और धर्मों के ठेकेदार जो मानते है उसे दूसरों पर भी थोपना चाहते है, क्योंकि वे स्वयं नहीं जानते कि जो वे मानते हैं वह सही है या गलत | लेकिन किताबों में लिखा है इसलिए सही ही होगा... उनका व्यक्तिगत कोई अनुभव नहीं होता | इसलिए वे डर आतंक और बल आदि का प्रयोग करते हैं और अब तो प्रेम-विवाह जैसे संबंधो को लेकर ब्लैकमेल भी करने लगे हैं |
- एक व्यावसायिक संत पुरोहित, यह मानते हैं कि दुनिया मुर्ख है और ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है इसलिए जितना मुर्ख बनाकर लोगों को ठग सको ठग लो |
लेकिन मेरे जैसा कलियुगी सन्यासी यह मानता है कि भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत जीवन के दो पहलू हैं और दोनों में जब तक समन्वयता नहीं आएगी जीवन सुखी नहीं हो सकता | आध्यात्मिकता और भौतिकता परस्पर पूरक हैं ठीक वैसे ही, जैसे स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं, प्रतिद्वंदी नहीं | लेकिन जब हम कहते हैं स्त्री नरक का द्वार है, संसार मिथ्या है... तो हम ईश्वर का अनादर ही कर रहे होते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य
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